गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

बेवकूफ़ बनोगे ?


यूँ तो इसका कोई ख़ास महत्व नहीं रह गया है क्योंकि रोज़ ही कई-कई तरह से आदमी बनता-बनाता है। फिर भी, जैसी कि परंपरा है कि एक अप्रैल को आप ख़ास तौर से बेवकूफ़ बनाए जा सकते हैं, सो सतर्कता रखना लाजिमी था। मैं पूरी तरह सतर्क था और सोच रहा था कि वैसे ठीक ही है कि एक दिन लोग घोषित तरीके से एक-दूसरे को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश करते हैं, बेचारे साल भर तो अनजाने में बनते ही रहते हैं, किसी दिन वे इस बात का भी तो सुख पाएँ कि देखो हम डंके की चोट पर भी बेवकूफ़ बना लेते हैं। रोज़ तो रोजी-रोटी और तमाम दुनियावी झंझटों में दबे-दबे रहते हैं, किसी दिन तो ललकार कर लड़ाई जीतने का सुख मिले। पर उन्हें ये सुख मैं क्यों दूँ? वे किसी और से पाएँ।

दूसरों को सुखी करना पुण्य का काम होता है, मैं अन्य लोगों को पुण्य कमाने का मौका देना चाहता था। सो मैं सतर्क था। जिनका छठे-चैमासे ही कभी फोन आता था, वे भी इस सुख की लालसा में मुझे फोन कर रहे थे और मैं कॉल अटेण्ड न करके उन्हे सुख से वंचित किए हुए था। छोड़ी गई कॉल की सूची बढ़ती जा रही थी कि इसी बीच मोबाइल के चित्र-पटल पर लल्लन मियाँ अवतरित हुए।

लल्लन मियाँ से अप्रैल फ़ूल वाला ख़तरा नहीं होता। सीधे-साधे आदमी हैं। इतने कि हर साल इस दिन बहुत सारा पुण्य कमा लेते हैं। सो बिना झिझक उनकी कॉल रिसीव की। हैल्लो बोलते ही सवाल सुनाई दिया – ‘भाई मियाँ, बेवकूफ़ बनोगे?’ मैंने कहा – ‘क्या लल्लन मियाँ! अब आप भी बेवकूफ़ बनाएँगे, वो भी पूछ कर। कोई जान-बूझकर भी बेवकूफ़ बनता है भला?’ वे बोले- ‘क्या बात करते हो मियाँ! अरे आजकल जान-बूझकर बेवकूफ़ बनने का ही रिवाज है। शायद तुम्हें पता नहीं है कि बेवकूफ़ बनना आजकल समझदारी का सर्टिफिकेट है। अगर आप अब तक नहीं बने हैं तो नालायक या कमअक़्ल समझे जा सकते हैं। इसलिए लोग जान-बूझकर बेवकूफ़ बन रहे हैं।’

जब मैंने कहा कि भई साफ़-साफ़ कहिए कि जान-बूझकर बेवकूफ़ बनने से आपकी मुराद क्या है, तो वे अपने चिर-परिचित अंदाज में गरियाते हुए बोले- ‘यार पता नहीं क्यों लोग तुम्हें समझदार कहते हैं! ज़रा-सी बात तो खुलासा किए बिना तुम्हारे पल्ले नहीं पड़ती। खैर छोड़ो... बात ये है कि बहुत लोग ‘आप’ में मच रही कलह के बारे में कह रहे हैं कि हमें तो पहले से पता था ऐसा होगा। आज नहीं तो कल महत्वाकांक्षाएँ और अहंकार टकराते ही, और पार्टी में टूटन आती ही। जब हमने उनसे पूछा कि भाई जब इतना सब पहले से ही पता था तो क्यों उस पार्टी के समर्थन में लिख-लिखकर काग़ज़ और फेसबुक काला कर रहे थे, जिसकी दो दिन की चाँदनी थी? जवाब में लोगों ने कहा कि अरे सबका कच्चा चिट्ठा दिखाती हुई, सबको गरियाने वाली, ईमानदार और क्रांतिकारी टाइप पार्टी बनी थी। इतने बड़े-बड़े विद्वान उससे जुड़ रहे थे। अगर उसे सपोर्ट न करके पुरानी भ्रष्टाचारी पार्टियों का समर्थन करते तो लोग हमें बेवकूफ़ न कहते।’

थोड़ा रुक कर लल्लन मियाँ आगे बढ़े- ‘कल ऐसे ही टहलते हुए तीन-चार भाजपा के वोटरों से भी बात हो गई। वे कह रहे थे कि हमें पता है कि काला धन वापस आ भी जाए तो किसी के खाते में एक पैसा नहीं आने वाला और कांग्रेस ने जितना बेड़ागर्क किया बताते हैं उस हिसाब से सौ दिन तो क्या सौ हफ़्ते में भी कोई अच्छे खाँ अच्छे दिन नहीं ला सकता। हमने उनसे भी पूछा कि फिर क्यों वोट दिया? वे बोले- क्या बात करते हैं साहब! अरे मोदी की लहर चल रही थी। कांग्रेस की नैया तो डूबनी ही थी। पिछले चुनावों में कांग्रेस को वोट दिया था। पर अब डूबती नैया पर सवार होकर बेवकूफ़ तो न कहलाते।’

‘अब तुम ही बताओ भाई मियाँ, बेवकूफ़ न कहलाएँ, इस चाहत में लोग अगर एक पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी से सहर्ष बेवकूफ़ बनना स्वीकारें तो  यह जान-बूझकर बेवकूफ़ बनना हुआ कि नहीं।’

इधर मैं यह सोचने लगा कि बहती हवा के साथ रुख़ बदलने के तो कई उदाहरण हैं पर क्या वाकई यह संभव है कि लोग सिर्फ़ इसलिए किसी पार्टी का समर्थन करने लगें कि वे बेवकूफ़ न कहलाएँ। उधर लल्लन मियाँ गला साफ करते हुए बोले – ‘वैसे भाई मियाँ हम सोच रहे हैं कि सरकार को एक कानून बना देना चाहिए कि हर आदमी को साल में न्यूनतम आठ-दस या जितना सरकार निश्चित करे उतनी बार सरकारी तौर पर बेवकूफ़ बनना अनिवार्य होगा। अगर आप बेवकूफ़ बनने की अपनी न्यूनतम सीमा तक नहीं पहुँचते हैं तो माना जाएगा कि आप राष्ट्रहित में अपना योगदान नहीं दे रहे हैं।’

मैंने पूछा इससे क्या होगा, तो लल्लन मियाँ बोले- ‘भाई एक तो जनता के सिर से यह बोझ उतर जाएगा कि वह ठगी गई, सरकार ने उसे झूठे सब्ज़बाग़ दिखाए। जनता को पता रहेगा कि हम बेवकूफ बन रहे हैं और संतोष रहेगा कि सब कानून के हिसाब से हो रहा है। दूसरे, सरकार को भी एक ही चीज़ के लिए एक के बाद एक सौ झूठ नहीं बोलने पड़ेंगे। अब जैसे अपने प्रधानमंत्री जी भूमि अधिग्रहण को लेकर कभी बोल रहे हैं कि किसानों का विकास होगा, कभी कहते हैं उनके बच्चों का भविष्य संवरेगा, कभी कहते हैं रोज़गार बढ़ेगा, कभी कहते हैं देश प्रगति करेगा। इतना कुछ नहीं कहना पड़ेगा न। एक जुमले में बात निपट जाएगी कि मित्रो, आपको सरकारी तौर पर बेवकूफ बनना है कि विकास होगा।’

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

साम्प्रदायिकता और सरकार: एक पंथ दो काज का नया उदाहरण


16 मई के बाद से अब तक की अवधि में ऐसे कई मुद्दे रहे हैं जो बेहद संक्रामक ढंग से लोगों तक पहुंचे हैं. इसे यूँ कहा जाये तो ज़्यादा सटीक होगा कि कई मुद्दे जनता के बीच संक्रामक बनाकर छोड़े गए हैं. सरकार और उससे जुड़े तमाम हिन्दूवादी संगठन पूरी गंभीरता से इस काम में जुटे हुए हैं. क्यों? इसका तमाम हलकों से एक ही जवाब आता है – ‘सांप्रदायिक राजनीति’. लेकिन बात इतनी सरल नहीं है. बेशक विश्व हिन्दू परिषद्, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, बजरंग दल, अखिल भारतीय हिन्दू महासभा और इन जैसे तमाम संगठनों की नींव साम्प्रदायिकता है, इसी पर उनकी इमारत खड़ी है और उनकी हालिया गतिविधियाँ भी इसी धारा से उपजी हैं. भारतीय जनता पार्टी भी इन्हीं धाराओं में से एक है यह भी स्पष्ट है. बावजूद इसके एक तथ्य यह भी है कि भाजपा के पास फ़िलहाल देश को चलाने की ज़िम्मेदारी है और यह दल इतना बेवकूफ़ भी नहीं है कि वर्तमान स्थितियों में सिर्फ़ ‘हिंदुत्व’ के लिए अपने राजनैतिक दल होने को दांव पर लगा दे. लोकतान्त्रिक व्यवस्था में एक राजनैतिक दल होने के नाते भाजपा को यह अच्छी तरह पता है कि सिर्फ़ हिंदुत्व के दम पर सत्ता की लड़ाई में टिके रह पाना मुश्किल है, खासकर तब जबकि अच्छा-खासा हिन्दू पहचान वाला तबका भी उसके इस एजेंडे को नकारता हो. लोकसभा चुनावों में भाजपा के घोषणा-पत्र में हिंदुत्व का प्रतिशत इस बात को साफ भी करता है. भले ही ‘मोदी पर विश्वास’ कहकर प्रचारित किया जा रहा हो लेकिन यह उन्हें भी पता है कि लोकसभा चुनावों की जीत ‘कांग्रेस पर अविश्वास’ का ‘आकस्मिक लाभ’ है, जो विकास के ऑफर ने उसकी झोली में ला पटका है.

बहरहाल, भाजपा अब इस देश की सरकार है और ऐसी सरकार है जिसके सामने मजबूत विपक्ष भी नहीं है. इस स्थिति में उसके पास यह सुभीता ज़्यादा है कि वह अपनी मनचाही व्यवस्था बिना अधिक विरोध के लागू कर सकती है. लेकिन ऐसी सरकार के सामने भी एक चुनौती तो होती ही है कि जनता को सब दिखाई देता है, पल-पल की ख़बर रखने वाला मीडिया यह ख़बर तक लोगों के पास पहुँचा देता है कि सरकार करने क्या जा रही है. फिर जनता, लेखक, बुद्धिजीवी और तमाम विवेकशील वर्ग उसके कर्मों-कुकर्मों का विश्लेषण, आलोचना और विरोध करते हैं. सड़कों पर भी उतर आते हैं, जो उसके लिए असुविधाजनक होते हैं. इस असुविधा से बचने का बहुत ही शातिराना तरीका हैं 16 मई के बाद से हुई हलचलें. इसके लिए भाजपा ने अपनी विरासत का ही बखूबी इस्तेमाल किया है.

अपने पिछले अनुभवों से भाजपा और उसके सहयोगी संगठन यह बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि किसको कहाँ उलझाये रखा जा सकता है. वे जानते हैं कि ‘साम्प्रदायिकता’ इस देश की बड़ी समस्या है और कोई भी ऐसा वाकया/मुद्दा जिससे सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हो सके वह इस हद तक लोगों का ध्यान खींचेगा और बहस-मुबाहिसों की शक्ल अख्तियार करेगा कि किसी दूसरे फ्रंट पर चल रही गतिविधियों की ओर ध्यान आसानी से नहीं जाएगा. बयानवीर तमाम आपत्तिजनक बयान देते रहेंगे, सरकार चुप्पी साधे रहेगी. यह इनकी ‘एक पंथ दो काज’ वाली रणनीति है. एक तरफ़ लोगों का ध्यान भटकाकर सरकार अपना काम करती रहेगी, दूसरी तरफ़ इन संगठनों के माध्यम से साम्प्रदायिकता पोषित होती रहेगी. इससे एक तीसरा काम भी होगा कि मीडिया का ज़्यादातर समय उपजे तनाव को कवर करते बीतेगा. राजनीति के गलियारों की खबरों में भी संसद-विधान सभाओं में क्या हुआ की तुलना में साम्प्रदायिकता पर सरकार के रुख को टटोला जा रहा होगा. वर्तमान में मीडिया पर जो बिक जाने के आरोप हैं उनमें कितनी सच्चाई है यह तो अलग बात है पर यह तीसरा काम ज़रूर हुआ और ‘एक पंथ दो काज’ की रणनीति भी किसी हद तक सफल रही है, कम से कम अब तक तो.

ज़रा पीछे लौटकर देखें, जब ‘लव-जिहाद’ का शिगूफ़ा छोड़ा गया था. मीडिया में देश के अलग-अलग हिस्सों से लव-जिहाद से जुड़ी ख़बरें छायी हुई थीं. कहीं इन संगठनों द्वारा तथाकथित लव-जिहाद को रोकने के लिए की जा रही गतिविधियों की ख़बर थी, कहीं इनका विरोध कर रहे लोगों की ख़बरें थीं और कहीं ऐसे गाँव की ख़बरें जहाँ हिन्दू-मुसलिम का कोई भेद ही नहीं है. प्राइम-टाइम में बहसें हो रहीं थी, सोशल मीडिया की दीवारें रंगी जा रहीं थीं लव-जिहाद पर. हम-आप इस मसले पर अपनी-अपनी तरह से राय व्यक्त कर रहे थे. यह होना भी चाहिए था, ज़रूरी भी था. पर यही वह वक़्त भी था जब विभिन्न क्षेत्रों में एफ़डीआई को अमली जामा पहनाया जा रहा था. बहस और रायशुमारी इस पर भी हुई लेकिन लव-जिहाद की खींच-तान में यह मुद्दा उस तरह जनता के बीच पहुँच ही नहीं सका कि ट्रेन में रोज़ सफ़र करने वाला एक सामान्य आदमी बढ़े हुए किराये के अलावा एफ़डीआई के और पहलुओं पर सोच भी सके. कितने बीमाधारकों ने बीमाक्षेत्र में एफ़डीआई लागू होने की सम्भावना के वक़्त इस पर चर्चा की, कम से कम मेरी नज़र में तो कोई नहीं आया. 

जो लोग ढूंढकर संसदीय गतिविधि की ख़बरें देखते हैं - जिनका कि बहुत अधिक प्रतिशत भी नहीं है – को छोड़ दें तो अधिकांश लोगों को एफ़डीआई लागू करने से लेकर दवाओं की कीमतें बढ़ने, आत्महत्या को अपराध न मानने, स्वास्थ्य और शिक्षा बजट में कटौती, और भूमि अधिग्रहण के नये मसौदे तक तमाम मसलों में ठीक-ठाक ख़बर तब मिली है जब काफ़ी हद तक निर्णय लिया जा चुका, कुछ मामलों में तो अंतिम निर्णय ही. और ऐसा इसलिए कि जब इन मुद्दों से जुड़े सरकार के निर्णय अपना रूप ले रहे थे, हम भाजपा, आरएसएस, विहिप के तैयार किये लव-जिहाद, धर्मान्तरण, घर वापसी, सांप्रदायिक तनाव के चक्रव्यूह में फँसे हुए थे. अभी जब भूमि अधिग्रहण का नया मसौदा सामने आया है तब प्रतिरोध की ताक़त का एक बड़ा हिस्सा इस बहस में खर्च हो रहा है कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में वायुयान थे या नहीं. स्थिति यह है कि आम-आदमी से लेकर विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों, मीडिया सबको उलझाये रखने का इंतज़ाम सरकार और उसकी टीम ने कर दिया है और कर रही है.

ऐसा नहीं है कि लव-जिहाद, घर-वापसी, बत्रा जी के इतिहास, प्राचीन भारतीय विज्ञान आदि मुद्दों को नज़रंदाज़ कर देना चाहिए. अतीत के गौरव और संस्कृति के नाम पर की जा रही भगवाकरण की इन तमाम सरकारी - ग़ैर सरकारी कोशिशों की गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ तार्किक मुखालफ़त होनी ही चाहिए. लेकिन इस पर भी उतनी ही प्रतिबद्धता से नज़र रखने की और प्रतिरोध दर्ज करने की ज़रूरत है कि ‘सरकार’ जिस विकास का सपना दिखाकर आयी थी, उससे जुड़े कैसे क़दम उठा रही है. वरना प्राचीन इतिहास में विमान मिलें न मिलें, देश की आबादी का बड़ा हिस्सा बाज़ार की भेंट चढ़ अपना भविष्य गंवा चुका होगा.

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

हमारे नायक, उनके नायक


साम्प्रदायिकता की चपेट में साझा गर्व

फेसबुक पर भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम 1857 के विस्मृत नायकों में से एक मौलवी अहमदुल्लाह शाह के बारे में जानकारी देती एक पोस्ट देखी जिसे 700 लोग शेयर कर चुके हैं. यूँ ही इच्छा हुई कि देखूँ किस-किस ने शेयर किया है. जो सूची सामने आई उसमें 25-30 से अधिक हिन्दू नाम नहीं दिखे. ठीक ऐसी ही स्थिति हिन्दू व आदिवासी नायकों से जुड़ी कई पोस्ट्स पर दूसरे समुदायों की भी दिखी. भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक़उल्ला खान, महात्मा गाँधी आदि कुछ नामों जिन्हें कि शुरू से ही पूरे मुल्क की मोहब्बत हासिल रही या यूँ कहें कि जिनका नाम स्वतंत्रता-संग्राम के साथ इतिहास के पन्नों में बार-बार आता रहा है को छोड़ दें तो आज़ादी के कई नायकों, ख़ासकर जिनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है, के ज़िक्र वाली कई पोस्ट्स का सोशल मीडिया पर यही हाल है. इस स्थिति को देखते हुए सवाल उठता है कि ऐसा क्यों? क्या वजह है इसके पीछे? 

यह बात तो स्पष्ट है कि स्वतंत्रता संग्राम में हर मज़हब के लोगों ने अपना योगदान दिया. वह मुल्क के लिए, आज़ादी के लिए साझी लड़ाई थी. इस लिहाज़ से आज़ादी की उस लड़ाई का गर्व साझा होना चाहिए, न कि हिन्दू-मुसलमान के खेमे में बंटा हुआ. आज़ादी के उन सभी चितेरों के प्रति सम्मान और गर्व भी साझा होना चाहिए जिन्होंने 1857 के पहले से लेकर मुल्क के आज़ाद होने तक किसी भी स्तर पर लड़ाई जारी रखी; सिद्धो-कान्हू, बिरसा मुंडा से लेकर भगत सिंह, अशफाक़उल्ला खां और गाँधी तक सबके प्रति. उन सबमें जो कमियाँ नज़र आईं उस पर चर्चा के बावज़ूद कई बरसों तक ऐसा रहा भी और आज भी यह कई लोगों का सच और गर्व है. 

लेकिन किसी पोस्ट पर ऐसी प्रतिक्रिया इशारा करती है कि अब इस गर्व में भी दरार पड़ने लगी है. चाहे सोशल मीडिया की आभासी दुनिया हो या फिर हक़ीकत की ज़िन्दगी साझी संस्कृति, साझी विरासत की झंडाबरदारी और हिमायत करने वालों की भरमार है. फिर ऐसा क्यों है कि आदिवासी नायकों से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में हिन्दू-मुसलिम लोगों की संख्या ज्यादा नहीं होती, मुस्लिम नायकों से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में हिन्दुओं की संख्या ज्यादा नहीं होती और हिन्दू नायकों से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में मुस्लिमों की? कई लोग यह तर्क दे सकते हैं और देते भी हैं कि ऐसा इसलिए कि लोगों को अपनी कौम के नायकों पर गर्व होना स्वाभाविक है, इसलिए जो नायक जिस कौम से सम्बंधित था उसके लोग ज्यादा शेयर करते हैं. ठीक है, एक स्तर पर यह तर्क स्वीकार्य भी है. लेकिन क्या वाक़ई बात सिर्फ़ इतनी ही है? इसे यूँ भी देखा और सोचा जाना चाहिये कि स्वतंत्रता-संग्राम के शहीद साझे गर्व के अधिकारी हैं और फिर उनसे सम्बंधित किसी पोस्ट को शेयर करने वाले कई लोगों के लिए भी वे पूरे मुल्क का गर्व नहीं रह जाते, वे केवल क्रन्तिकारी नहीं रह जाते बल्कि यूपी का गर्व हो जाते हैं, बिहार का गौरव हो जाते हैं, हिन्दू योद्धा हो जाते हैं, मुसलिम जांबाज़ हो जाते हैं, मराठा शान हो जाते हैं, राजपूत वीर हो जाते हैं. एक क्रन्तिकारी कई खेमों में बंट जाता है.

बहरहाल बात हो रही थी कि एक मज़हब से ताल्लुक रखते क्रन्तिकारी से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में दूसरे मज़हब के लोगों की संख्या कम क्यों? दरअसल बीते कई सालों में अपने मज़हब व कौम से प्रेम जिस तेज़ी से बढ़ा और मुखर हुआ है उसी के अनुपात में एक और चीज़ ने लोगों के ज़ेहन में अपनी जगह बनाई है और वह है दूसरे मज़हब व कौम से एक अदृश्य-सी दूरी, उसके प्रति एक अस्पष्ट-सा विरोध. ऐसा करने के लिए सांप्रदायिक ताक़तों ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया है. इसमें सांप्रदायिक ताक़तों की अच्छी-ख़ासी भूमिका है, इस बात को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.

सांप्रदायिक ताक़तें दूसरे मज़हब के प्रति सबके दिलों में नफ़रत भरने में कामयाब भले ही न रही हों पर बड़े सुनियोजित ढंग से एक बड़े हिस्से के दिलों में उन्होंने एक ऐसी दूरी पैदा कर दी है जो ऊपरी तौर पर भले न दिखे लेकिन अंदर कहीं मौजूद है. ये ताक़तें अपने मज़हब और कौम के प्रति व्यक्ति को विरासत में हासिल सामीप्य व आत्मीयता वाले सॉफ्ट कॉर्नर (जिसे आप प्रेम भी कह सकते हैं) को भुनाती रही हैं और एक हथियार की तरह इस्तेमाल करती रही हैं. इन भावनाओं को गर्व और श्रेष्ठता के साथ जोड़कर कुछ इस ढंग से प्रोत्साहित किया जाता है कि व्यक्ति हर चीज़ को अनजाने में ही अपने और पराये मज़हब के चश्मे से देखने लग जाता है और उसी के हिसाब से चीजों, घटनाओं से ख़ुद को जोड़ने लगता है. नतीजा यह होता है कि कई लोगों को पता भी नहीं चलता कि ऐसा क्यों हो रहा है पर वे अनायास ही एक चीज़ को ज़्यादा पसंद और दूसरी को कम पसंद या नापसंद करने लग जाते हैं. उनके पास इस बात का कई बार जवाब नहीं होता कि वे क्यों किसी चीज़ की अनदेखी कर रहे हैं या क्यों उसे नकार रहे हैं. कई ऐसे लोग भी इसका शिकार हुए हैं जो चेतन अवस्था में सभी समुदायों की एकता चाहते हैं. सोशल मीडिया पर खूब देखा गया है कि भाईचारे, देश की साझी विरासत की बात करने वाले लोग भी अपनी कौम के नायक को शेयर करेंगे, दूसरी कौम के नायक को लाइक मारकर निकल लेंगे. क्यों भई! आप तो साझी विरासत पर गर्व करते हैं फिर ऐसा भेदभाव क्यों? ज़ाहिर है कि वे जान-बूझकर ऐसा नहीं कर रहे हैं, बस एक लम्हे के किसी हिस्से में उनके भीतर कहीं छुपी बैठी यह दूरी निर्णय लेती है और वे ऐसा कर देते हैं. यह एक तरह से पहला चरण है.

अगले चरण में जब यह दूरी व गर्व और भुना लिया जाता है तो लोग अपनी, अपने मज़हब की आलोचना न सुनने व दूसरे की खामियों को प्रचारित कर अपने अहं को तुष्टि पहुँचाने के स्तर तक पहुँच जाते हैं. यह कई बार सोशल मीडिया पर प्राप्त समर्थन में बहुत साफ़ दिखाई देता है. आपने ऐसी कई पोस्ट देखी होंगी जो किसी धर्म की खामियों को उधेड़ती हैं. कभी ऐसी पंद्रह-बीस पोस्ट को समर्थन में मिले लाइक्स, कमेंट्स और शेयर्स को गौर से देखिएगा. आप पाएंगे कि ज़्यादातर मामलों में अगर हिन्दू धर्म के बखिये उधेड़े गए हैं तो मुस्लिम समर्थन का प्रतिशत ज्यादा होगा, ज़्यादातर हिन्दू बुरा-भला कह रहे होंगे. अगर मुस्लिम धर्म के बखिये उधेड़े गए हैं तो हिन्दू समर्थन का प्रतिशत ज्यादा होगा, ज़्यादातर मुसलमान बुरा-भला कह रहे होंगे. कुछ लोग ढंके-छुपे ढंग से बच-बचाकर समर्थन या विरोध करते नज़र आयेंगे. इन दिनों आदिवासी दर्शन और हिन्दू धर्म को लेकर जो बहस सोशल मीडिया पर है उसमें भी समर्थन और विरोध का ऐसा ही अनुपात है. अगले चरणों में यह स्थिति जात/वर्ग/ समुदाय को पार कर सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्म के गौरव व अपमान के स्तर पर पहुँचती है और नतीजा वह होता है जो बीते दिनों में मुज़फ्फ़र नगर, सहारनपुर और त्रिलोकपुरी में दिखाई दिया.

सोशल मीडिया को कभी बारीकी से देखें तो आप पाएंगे कि इस तरह की घटनाओं की भरमार है. ये घटनाएं साफ़ इशारा हैं कि सांप्रदायिक ताक़तें लोगों के दिमाग को किस हद तक अपने कब्ज़े में ले रही हैं. वे कह भले ही रही हैं लेकिन लोगों को अपने मज़हब से, अपनी कौम से प्रेम करना नहीं सिखा रहीं बल्कि दूसरे मजहबों, दूसरी कौम के प्रति नफ़रत और असहिष्णुता के बीज उनके भीतर बो रही हैं. लोग मानें या न मानें पर वे इसके शिकार हो रहे हैं. लोगों को पता भी नहीं चलता और चुपके से कोई पूर्वाग्रह उनके भीतर बिठा दिया जाता है. नतीजतन एक-दूसरे से दूरी बढ़ रही है और यही तो साम्प्रदायिक ताक़तें चाहती हैं. इसके बिना उनकी वह इमारत खड़ी नहीं हो सकती, जिसमे ज़ात, पंथ, वर्ण, क्षेत्र और शुद्ध-अशुद्ध के तमाम तरह के कमरे मौजूद होते हैं, जिनकी रौशनी में मुल्क के लिए मर-मिटने वाला एक क्रांतिकारी भी मुल्क का गौरव होने के बजाय किसी एक मज़हब या कौम के लिए गौरव हो जाता है, और दूसरी कौम उसे अनदेखा करके गुज़रने लगती है.

फ़िक्र करने वाली बात यह है कि लोगों की भावनाओं को भुनाकर उनको हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का अब कोई एक तरीका या रास्ता नहीं है, कई हैं. भगत सिंह की पगड़ी का भगवा हो जाना, बिरसा मुंडा की जन्मस्थली पर ‘भगवान बिरसा मुंडा’ लिखा जाना, मसला सामाजिक या राजनीतिक ही क्यों न हो उसे इस्लाम से जोड़ दिया जाना, ‘इस्लाम के मुताबिक’ कहकर ज़ारी किये जा रहे कई अजीबोग़रीब फतवे और हर हिन्दू के घर में तुलसी का पौधा लगाने जैसे अभियान, सब ऐसे ही रास्तों पर बढ़े हुए कदम हैं. फिर अब, जबकि लोगों को अपने इतिहास से ही काट देने की क़वायद भी तेज़ हो चुकी है और एक अलग ही इतिहास सामने रखे जाने की आशंकाएं मंडराने लगी हैं तब साझी संस्कृति – साझी विरासत के ईमानदार पक्षधरों की ये एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी बन जाती है कि हर उस रास्ते पर नज़र रखी जाये जहाँ से सांप्रदायिक ताक़तें लोगों के ज़ेहन तक पहुँच सकती हैं.

शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

किसी की आँख में तिनका पड़ा है


शहर में आजकल झगड़ा बड़ा है
किसी की आँख में तिनका पड़ा है

बहुत कमज़ोर आँखें हो गई हैं
अजब ये मोतिया इनमें मढ़ा है

कभी आकर हमारे पास बैठो
पसीना ये नहीं, हीरा जड़ा है

कोई कैसे उसे अब सच बताये
इदारा झूठ का जिसका खड़ा है

वही दिखता है जो वे चाहते हैं
नज़र पे उनकी इक चश्मा चढ़ा है

बटेरों की भी ये कैसी समझ है
कि अंधे हाथ में अक्सर पड़ा है

हमारी भी कहाँ सुनता है ये दिल
न जाने किस से ये रूठा पड़ा है 

शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

ख़बर बारूद होती है


शहर की भीड़ में यूँ तो बहुत ज़्यादा निकलते हैं 
मगर कुछ तो हैं सन्नाटे जो अपने साथ चलते हैं 

कोई रस्ता नहीं सच का जहाँ क़दमों को राहत हो 
जहाँ भी जाएँ हम ये आबले भी साथ चलते हैं

उन्हें ख़ुशफ़हमियाँ हैं ये के सबकुछ है यहाँ बेहतर 
हमीं जानें के कब कैसे ये अपने दिन निकलते हैं 

बहुत तामीर मुश्किल है मगर उसको यक़ीं भी है 
अभी मुफ़लिस की आँखों में सुनहरे ख़्वाब पलते हैं 

सभी को फ़िक्र है बेहद दरिंदे क्यों हैं बस्ती में 
यहीं आँचल सरकते के मगर क़िस्से उछलते हैं 

बदल जाता है हाकिम भी निज़ाम-ए-दहर भी लेकिन 
फ़क़त काग़ज़ बदलते हैं कहाँ ये दिन बदलते हैं 

ख़बर जो देते हैं सब को उन्हें कोई ख़बर ये दे 
ख़बर बारूद होती है शहर इससे भी जलते हैं

रविवार, 20 जुलाई 2014

अक्षर-अक्षर ढलती रात


काग़ज़ स्याही कलम दवात
अक्षर-अक्षर ढलती रात

बादल ख़्वाब सितारे चाँद
गहरी बुझती जलती रात

ढोंगी लम्पट कुंठित लोग
बस्ती में इनकी इफ़रात

गली-मोहल्ला मुल्क़-जहान
खींचा-तानी झगड़े घात

गोली भाले ख़ंजर आग
फिरते पूछें सबकी जात

मज़हब दौलत सत्ता नाक
हत्या शोषण धोखा लात

सैनिक जनता जंग फ़साद
राजा जीते, अपनी मात

नदिया जंगल खेत कछार
सब के सब पे उसकी घात

मरहम नश्तर ज़हर सबात
जाने क्या हो उसकी बात.

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

काला धन नहीं मेहनत की कमाई


अभी-अभी लल्लन मियाँ ने फ़ोन पर एक सवाल दागा - "भाई मियाँ, मान लो कि हम तुम्हें कहते हैं कि तुम ऑटो से बाज़ार जाओ-आओ और किसी बढ़िया सी फिलम की पाइरेटेड सीडी हमारे लिए खरीदकर लाओ. इस काम के तुम्हे 500 रुपये मिलेंगे. तुम ये काम कर दो फिर पता चले कि सीडी तो चल ही नहीं रही, तब क्या तुम हमसे पैसे नहीं वसूलोगे?"
मैंने कहा कि फ़िल्म चले न चले मेरी बला से, मैंने काम किया, समय लगाया, मेहनत लगाई इसलिए बिलकुल वसूलूँगा.
उन्होंने दूसरा सवाल दागा- "और अगर हम तुम्हे वो पैसे देकर ये कहें कि किसी को बताना मत कि हमने तुम्हे पैसे दिए और ये काम कराया वरना घर में हमारी शामत आ जाएगी, तो तुम क्या करोगे?"
मैंने कहा कि करना क्या है, नहीं बताऊंगा किसी को. लेकिन इस तरह के सवाल पूछने की ज़रूरत क्या पड़ गई? वो बोले- "मामला ये है भाई मियाँ की अब देखना कैसे फेसबुक, ट्विट्टर पर "काला धन - काला धन" का हल्ला मचेगा. लोग मुँह बाए कहेंगे - 'सवा करोड़! हाय इत्ता पइसा!' समझते ही नहीं कि ये सब तो मेहनत की कमाई है."
मुझे कुछ बात समझ नहीं आई, सो पुछा किस बारे में बात कर रहे हैं, खुलासा कीजिए ज़रा.
लल्लन मियाँ झिड़कते हुए बोले- "तुम भी न मियाँ! बंधा नोट तुम्हारे पल्ले नहीं पड़ता. बिना चिल्लर किये कुछ समझते ही नहीं हो. अरे मियाँ ये जो अपने नेताजी जी के यहाँ चोरी हुई है न सवा करोड़ की. उसके बारे में बात कर रहे हैं हम. लोग कह रहे हैं कि ये रकम जो है काला धन है, और हमारा मानना है कि ये मेहनत की कमाई है."
मैंने पूछा कि कैसे, तो बोले- "देखो भई, ये अलग बात है कि किसी को भेज नहीं पाए, पर ठेका तो लिया था न, वादा या दावा जो भी तुम कह लो वो तो किया था न. अब विरोधियों को बॉर्डर पार कराना हँसी-खेल थोड़े ही है. नहीं करा पाए तो क्या, फिलम चली नहीं तो क्या, राष्ट्रहित में इतनी जो मेहनत की, शानदार ट्रेलर तैयार किया उसका मेहनताना भी न लें क्या? और फिर ये तो एक काम था और भी तो न जाने किस-किस के कितने-कितने काम कराये होंगे या राष्ट्रहित में किये होंगे."
(जनवाणी में प्रकाशित)
फिर थोड़ी चुप्पी के बाद बोले- "अब तुम हो सोचो, कोई भी काम करने में मेहनत तो लगती है न. और ज्ञानी जन वैसे ही कहते हैं कि कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता, काम, काम होता है. तो मियां उस आदमी ने कुछ तो छोटे-बड़े काम किये ही होंगे, वरना बिना कुछ किये तो एक धेला नहीं मिलता, ऊपर से राष्ट्रहित को समर्पित पार्टी का नेता है तो पक्का है कि काम राष्ट्रहित में ही किये होंगे. यह भी समझ लो कि ज़रूर ही वे ऐसे काम होंगे जिनका उजागर होना सुरक्षा कारणों से राष्ट्रहित में नहीं होगा. इसलिए उनका मेहनताना भी उजागर नहीं किया गया. अब तुम ही बताओ भाई मियाँ कि ये मेहनत की कमाई हुई कि नहीं. पर लोग हैं कि समझते ही नहीं. बुड़बक कहीं के! हाँ नईं तो!"
मैंने कहा वो तो ठीक है पर चोरी गए माल में जो यूएस डॉलर भी शामिल हैं उनका राष्ट्रहित से क्या कनेक्शन? लल्लन मियाँ बोले- "हद्द है मियाँ तुम्हारी भी! देख नहीं रहे हो अब सारे राष्ट्रहित के कामों में एफडीआई है."

इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.