मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

अपने लौंडे की भी हवा चलेगी

लल्लन मियाँ बोले - 'अमां यार, हम सोच रहे हैं कि अपने लौंडे को अगले सरपंची के चुनाव में खड़ा कर दें.'

मैंने पूछा कि क्यों तो बोले - 'कल ताश का महल बना रहा था. टेबल हिल रही थी सो कमबख्त ने बगल की अलमारी में रखी गुटका रामायण टेबल के टूटे पाए के नीचे सरका दी. टेबल पर रखी अपनी इतिहास की किताब एक कोने में फेंकी और जब हमने आपत्ति की तो बोला क्या फिजूल बातें करते हैं, अरे मैं भविष्य बना रहा हूँ. दुक्की-तिक्की टाइप निचले पत्तों से उसने निचली मंजिल बनाई और महल के सबसे ऊपर रखा बादशाह. हमने वजह पूछी तो बोला कि बताइए भला बादशाह ही अगर निचली मंजिल में लग जायेगा तो राज कौन करेगा? ये दुक्की जो तिक्की से पिट जाती है या ये नहला जिस पर दहला भारी पड़ता है? और सब किसके लिए पिटते-पिटाते हैं, बादशाह के लिए ही न! बादशाह सब को पीटता है और सब चुपचाप पिट जाते हैं, इसलिए बादशाह सबसे ऊपर. और जब महल बनकर तैयार हुआ तो  उसने ऐसा हल्ला मचाया कि घर सिर पर उठा लिया.'

'खैर... जब हमने कहा कि मियाँ बादशाह भी इक्के से पिट जाता है और देखो तो तुमने इस महल को बनाने के चक्कर में क्या किया, धर्म को टेका बना दिया, इतिहास की किताब के साथ-साथ शिक्षा को कोने में फेंक दिया तो वो बिदक गया. बोला - आप मेरी सफलता से जलते हैं, आपको बर्दाश्त नहीं हो रहा कि मैंने एक महल बना लिया है.'

'अब तुम खुद ही सोचो भाई मियाँ कि जो लड़का अभी से धर्म को बुनियाद में इस्तेमाल करता हो, सामाजिक ताने-बाने को जानता हो, हुक्मरान की हैसियत जानता हो, कुछ काम करने पर हल्ला मचाना जानता हो और आलोचना होने पर अपने बाप को भी कह दे कि वो उससे जलता है, उसके लिए राजनीति से अच्छा और कौन-सा रोज़गार होगा.' 

'हमें तो यकीन है भाई मियाँ कि एक दिन अपने लौंडे की भी हवा चलेगी.'
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