मंगलवार, 10 अगस्त 2010

कल रात - त्रिवेणी की तरह

यूं तो इस तरह की छोटी-छोटी पंक्तियों की लिखाई कई बार की है, पर कभी किसी नाम के दायरे में नहीं रख सका। देखा तो गुलज़ार साहब की त्रिवेणियों की ही शक्ल है, पर कुछ लोग इन्हें क्षणिकाएं भी कहते हैं। मुझे नहीं पता कि इसे क्या कहा जाना चाहिए। अगर कोई कहे कि गुलज़ार साहब का फार्म लिया है तो ये सच भी होगा, क्योंकि लहज़े में थोड़ा फ़र्क तो पैदा हुआ है। आखिर प्रेरित होना या जो अच्छा लगे उसको दोहराना इंसानी फ़ितरत है।


(१)
कल जिस काग़ज़ पे लिखा था हमने तेरा नाम
बना के कश्ती बारिश की लहरों पे छोड़ दिया है

देर हो गई, आंखें अब भी सूखी लगती हैं।


(२)
कल देर रात तक तुझसे की थीं बातें
कितना हल्का ख़ुद को मैंने महसूस किया था

तेरी दी हुई वो क़िताब अब भी टेबल पर है।


(३)
कल फिर से चांद की किरणों पे बादल छाया था
कुछ टूटी किरणों की किरचें आंगन में गिरी थीं

रातरानी कल फिर से आधी भूखी सोई।


(४)
कल रात शहर की एक अजनबी गली से गुज़रा
दूर तलक कुछ कुत्ते पीछे-पीछे आए

जाने उनको फ़िक्र थी मेरी, या कोई डर था।
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.