गुरुवार, 6 नवंबर 2014

हमारे नायक, उनके नायक


साम्प्रदायिकता की चपेट में साझा गर्व

फेसबुक पर भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम 1857 के विस्मृत नायकों में से एक मौलवी अहमदुल्लाह शाह के बारे में जानकारी देती एक पोस्ट देखी जिसे 700 लोग शेयर कर चुके हैं. यूँ ही इच्छा हुई कि देखूँ किस-किस ने शेयर किया है. जो सूची सामने आई उसमें 25-30 से अधिक हिन्दू नाम नहीं दिखे. ठीक ऐसी ही स्थिति हिन्दू व आदिवासी नायकों से जुड़ी कई पोस्ट्स पर दूसरे समुदायों की भी दिखी. भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक़उल्ला खान, महात्मा गाँधी आदि कुछ नामों जिन्हें कि शुरू से ही पूरे मुल्क की मोहब्बत हासिल रही या यूँ कहें कि जिनका नाम स्वतंत्रता-संग्राम के साथ इतिहास के पन्नों में बार-बार आता रहा है को छोड़ दें तो आज़ादी के कई नायकों, ख़ासकर जिनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है, के ज़िक्र वाली कई पोस्ट्स का सोशल मीडिया पर यही हाल है. इस स्थिति को देखते हुए सवाल उठता है कि ऐसा क्यों? क्या वजह है इसके पीछे? 

यह बात तो स्पष्ट है कि स्वतंत्रता संग्राम में हर मज़हब के लोगों ने अपना योगदान दिया. वह मुल्क के लिए, आज़ादी के लिए साझी लड़ाई थी. इस लिहाज़ से आज़ादी की उस लड़ाई का गर्व साझा होना चाहिए, न कि हिन्दू-मुसलमान के खेमे में बंटा हुआ. आज़ादी के उन सभी चितेरों के प्रति सम्मान और गर्व भी साझा होना चाहिए जिन्होंने 1857 के पहले से लेकर मुल्क के आज़ाद होने तक किसी भी स्तर पर लड़ाई जारी रखी; सिद्धो-कान्हू, बिरसा मुंडा से लेकर भगत सिंह, अशफाक़उल्ला खां और गाँधी तक सबके प्रति. उन सबमें जो कमियाँ नज़र आईं उस पर चर्चा के बावज़ूद कई बरसों तक ऐसा रहा भी और आज भी यह कई लोगों का सच और गर्व है. 

लेकिन किसी पोस्ट पर ऐसी प्रतिक्रिया इशारा करती है कि अब इस गर्व में भी दरार पड़ने लगी है. चाहे सोशल मीडिया की आभासी दुनिया हो या फिर हक़ीकत की ज़िन्दगी साझी संस्कृति, साझी विरासत की झंडाबरदारी और हिमायत करने वालों की भरमार है. फिर ऐसा क्यों है कि आदिवासी नायकों से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में हिन्दू-मुसलिम लोगों की संख्या ज्यादा नहीं होती, मुस्लिम नायकों से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में हिन्दुओं की संख्या ज्यादा नहीं होती और हिन्दू नायकों से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में मुस्लिमों की? कई लोग यह तर्क दे सकते हैं और देते भी हैं कि ऐसा इसलिए कि लोगों को अपनी कौम के नायकों पर गर्व होना स्वाभाविक है, इसलिए जो नायक जिस कौम से सम्बंधित था उसके लोग ज्यादा शेयर करते हैं. ठीक है, एक स्तर पर यह तर्क स्वीकार्य भी है. लेकिन क्या वाक़ई बात सिर्फ़ इतनी ही है? इसे यूँ भी देखा और सोचा जाना चाहिये कि स्वतंत्रता-संग्राम के शहीद साझे गर्व के अधिकारी हैं और फिर उनसे सम्बंधित किसी पोस्ट को शेयर करने वाले कई लोगों के लिए भी वे पूरे मुल्क का गर्व नहीं रह जाते, वे केवल क्रन्तिकारी नहीं रह जाते बल्कि यूपी का गर्व हो जाते हैं, बिहार का गौरव हो जाते हैं, हिन्दू योद्धा हो जाते हैं, मुसलिम जांबाज़ हो जाते हैं, मराठा शान हो जाते हैं, राजपूत वीर हो जाते हैं. एक क्रन्तिकारी कई खेमों में बंट जाता है.

बहरहाल बात हो रही थी कि एक मज़हब से ताल्लुक रखते क्रन्तिकारी से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में दूसरे मज़हब के लोगों की संख्या कम क्यों? दरअसल बीते कई सालों में अपने मज़हब व कौम से प्रेम जिस तेज़ी से बढ़ा और मुखर हुआ है उसी के अनुपात में एक और चीज़ ने लोगों के ज़ेहन में अपनी जगह बनाई है और वह है दूसरे मज़हब व कौम से एक अदृश्य-सी दूरी, उसके प्रति एक अस्पष्ट-सा विरोध. ऐसा करने के लिए सांप्रदायिक ताक़तों ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया है. इसमें सांप्रदायिक ताक़तों की अच्छी-ख़ासी भूमिका है, इस बात को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.

सांप्रदायिक ताक़तें दूसरे मज़हब के प्रति सबके दिलों में नफ़रत भरने में कामयाब भले ही न रही हों पर बड़े सुनियोजित ढंग से एक बड़े हिस्से के दिलों में उन्होंने एक ऐसी दूरी पैदा कर दी है जो ऊपरी तौर पर भले न दिखे लेकिन अंदर कहीं मौजूद है. ये ताक़तें अपने मज़हब और कौम के प्रति व्यक्ति को विरासत में हासिल सामीप्य व आत्मीयता वाले सॉफ्ट कॉर्नर (जिसे आप प्रेम भी कह सकते हैं) को भुनाती रही हैं और एक हथियार की तरह इस्तेमाल करती रही हैं. इन भावनाओं को गर्व और श्रेष्ठता के साथ जोड़कर कुछ इस ढंग से प्रोत्साहित किया जाता है कि व्यक्ति हर चीज़ को अनजाने में ही अपने और पराये मज़हब के चश्मे से देखने लग जाता है और उसी के हिसाब से चीजों, घटनाओं से ख़ुद को जोड़ने लगता है. नतीजा यह होता है कि कई लोगों को पता भी नहीं चलता कि ऐसा क्यों हो रहा है पर वे अनायास ही एक चीज़ को ज़्यादा पसंद और दूसरी को कम पसंद या नापसंद करने लग जाते हैं. उनके पास इस बात का कई बार जवाब नहीं होता कि वे क्यों किसी चीज़ की अनदेखी कर रहे हैं या क्यों उसे नकार रहे हैं. कई ऐसे लोग भी इसका शिकार हुए हैं जो चेतन अवस्था में सभी समुदायों की एकता चाहते हैं. सोशल मीडिया पर खूब देखा गया है कि भाईचारे, देश की साझी विरासत की बात करने वाले लोग भी अपनी कौम के नायक को शेयर करेंगे, दूसरी कौम के नायक को लाइक मारकर निकल लेंगे. क्यों भई! आप तो साझी विरासत पर गर्व करते हैं फिर ऐसा भेदभाव क्यों? ज़ाहिर है कि वे जान-बूझकर ऐसा नहीं कर रहे हैं, बस एक लम्हे के किसी हिस्से में उनके भीतर कहीं छुपी बैठी यह दूरी निर्णय लेती है और वे ऐसा कर देते हैं. यह एक तरह से पहला चरण है.

अगले चरण में जब यह दूरी व गर्व और भुना लिया जाता है तो लोग अपनी, अपने मज़हब की आलोचना न सुनने व दूसरे की खामियों को प्रचारित कर अपने अहं को तुष्टि पहुँचाने के स्तर तक पहुँच जाते हैं. यह कई बार सोशल मीडिया पर प्राप्त समर्थन में बहुत साफ़ दिखाई देता है. आपने ऐसी कई पोस्ट देखी होंगी जो किसी धर्म की खामियों को उधेड़ती हैं. कभी ऐसी पंद्रह-बीस पोस्ट को समर्थन में मिले लाइक्स, कमेंट्स और शेयर्स को गौर से देखिएगा. आप पाएंगे कि ज़्यादातर मामलों में अगर हिन्दू धर्म के बखिये उधेड़े गए हैं तो मुस्लिम समर्थन का प्रतिशत ज्यादा होगा, ज़्यादातर हिन्दू बुरा-भला कह रहे होंगे. अगर मुस्लिम धर्म के बखिये उधेड़े गए हैं तो हिन्दू समर्थन का प्रतिशत ज्यादा होगा, ज़्यादातर मुसलमान बुरा-भला कह रहे होंगे. कुछ लोग ढंके-छुपे ढंग से बच-बचाकर समर्थन या विरोध करते नज़र आयेंगे. इन दिनों आदिवासी दर्शन और हिन्दू धर्म को लेकर जो बहस सोशल मीडिया पर है उसमें भी समर्थन और विरोध का ऐसा ही अनुपात है. अगले चरणों में यह स्थिति जात/वर्ग/ समुदाय को पार कर सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्म के गौरव व अपमान के स्तर पर पहुँचती है और नतीजा वह होता है जो बीते दिनों में मुज़फ्फ़र नगर, सहारनपुर और त्रिलोकपुरी में दिखाई दिया.

सोशल मीडिया को कभी बारीकी से देखें तो आप पाएंगे कि इस तरह की घटनाओं की भरमार है. ये घटनाएं साफ़ इशारा हैं कि सांप्रदायिक ताक़तें लोगों के दिमाग को किस हद तक अपने कब्ज़े में ले रही हैं. वे कह भले ही रही हैं लेकिन लोगों को अपने मज़हब से, अपनी कौम से प्रेम करना नहीं सिखा रहीं बल्कि दूसरे मजहबों, दूसरी कौम के प्रति नफ़रत और असहिष्णुता के बीज उनके भीतर बो रही हैं. लोग मानें या न मानें पर वे इसके शिकार हो रहे हैं. लोगों को पता भी नहीं चलता और चुपके से कोई पूर्वाग्रह उनके भीतर बिठा दिया जाता है. नतीजतन एक-दूसरे से दूरी बढ़ रही है और यही तो साम्प्रदायिक ताक़तें चाहती हैं. इसके बिना उनकी वह इमारत खड़ी नहीं हो सकती, जिसमे ज़ात, पंथ, वर्ण, क्षेत्र और शुद्ध-अशुद्ध के तमाम तरह के कमरे मौजूद होते हैं, जिनकी रौशनी में मुल्क के लिए मर-मिटने वाला एक क्रांतिकारी भी मुल्क का गौरव होने के बजाय किसी एक मज़हब या कौम के लिए गौरव हो जाता है, और दूसरी कौम उसे अनदेखा करके गुज़रने लगती है.

फ़िक्र करने वाली बात यह है कि लोगों की भावनाओं को भुनाकर उनको हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का अब कोई एक तरीका या रास्ता नहीं है, कई हैं. भगत सिंह की पगड़ी का भगवा हो जाना, बिरसा मुंडा की जन्मस्थली पर ‘भगवान बिरसा मुंडा’ लिखा जाना, मसला सामाजिक या राजनीतिक ही क्यों न हो उसे इस्लाम से जोड़ दिया जाना, ‘इस्लाम के मुताबिक’ कहकर ज़ारी किये जा रहे कई अजीबोग़रीब फतवे और हर हिन्दू के घर में तुलसी का पौधा लगाने जैसे अभियान, सब ऐसे ही रास्तों पर बढ़े हुए कदम हैं. फिर अब, जबकि लोगों को अपने इतिहास से ही काट देने की क़वायद भी तेज़ हो चुकी है और एक अलग ही इतिहास सामने रखे जाने की आशंकाएं मंडराने लगी हैं तब साझी संस्कृति – साझी विरासत के ईमानदार पक्षधरों की ये एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी बन जाती है कि हर उस रास्ते पर नज़र रखी जाये जहाँ से सांप्रदायिक ताक़तें लोगों के ज़ेहन तक पहुँच सकती हैं.
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