शुक्रवार, 31 मई 2013

दृश्यों से लुभाता शख्स

फिल्म के क्रेडिट्स में हम यह तो देख लेते हैं कि फिल्म के कलाकार कौन हैं, निर्माता-नर्देशक कौन है, संगीत किसका है, गीत किसके हैं, लेकिन इन्हीं के बीच आने वाले उस व्यक्ति का नाम हम देखते की जहमत भी नहीं उठाते, जिसकी आंखों से हम फिल्म देखते हैं।


जब हम कोई फिल्म देखते हैं, तो अक्सर किसी दृश्य को देखकर हम अभिभूत हो जाते हैं कि वाह! कितना खूबसूरत फिल्माया गया है। कई बार यह सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि यह दृश्य फिल्माया कैसे गया होगा? और अंत में हम निर्देशक की तारीफ करते हैं कि भई वाह! क्या दिमाग लगाया है, कमाल कर दिया है, वगैरह-वगैरह। लेकिन उन आंखों को हम अक्सर भूल जाते हैं, जिनके जरिए हमने वह दृश्य देखा और साथ ही भूल जाते हैं उस शख्स को, जिसकी वे आंखें हैं। जबकि वह फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है यानी सिनेमेटोग्राफर। एक सिनेमेटोग्राफर के बिना फिल्म का निर्माण भला कैसे संभव हो सकता है।

तमाम बेहतरीन सिनेमेटोग्राफरों की सूची में एक ऐसा नाम है, जिसने अपनी आंखों, यानी कैमरे से हमें ऐसे
यादगार दृश्य दिखाए हैं, जो आज भी मिसाल के तौर पर सामने रखे जाते हैं। यह नाम है गुरुदत्त की तकरीबन सारी फिल्मों की सिनेमेटोग्राफी करने वाले वीके मूर्ति का।

26 नवंबर 1923 को मैसूर में जन्मे वीके मूर्ति बचपन से ही सामान्य-सी घटनाओं और रोजमर्रा के दृश्यों को आंखों में कैद करने में खासी दिलचस्पी लिया करते थे। वे सिर्फ दृश्यों को आंखों में कैद ही नहीं करते थे, बल्कि उनमें अपनी कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करते हुए, एक नए तरीके से उन्हें तरतीब में रखने के ख्वाब भी बुनते थे। चीजों को नए दृष्टिकोण से देखने का यही नजरिया उन्हें बैंगलौर के राजेन्द्र पॉलीटेक्निक तक लेकर गया, जहां से 1946 में उन्होंने सिनेमेटोग्राफी का डिप्लोमा हासिल किया।

फिल्म 'बाजी' में सिर्फ एक शॉट फिल्माने का मौका मिलने पर वीके मूर्ति ने वह कमाल दिखाया कि वे गुरुदत्त की टीम का अभिन्न हिस्सा बन गए। गुरुदत्त की फिल्में अपने कला सौंदर्य के लिए खास तौर से जानी जाती हैं, लेकिन यह कला सौंदर्य सिर्फ गुरुदत्त का नहीं था, वीके मूर्ति उनके जोड़ीदार हुआ करते थे। फिल्मांकन के समय के ऐसे कई किस्से हैं, जिनमें किसी दृश्य के फिल्मांकन के दौरान निर्देशक की जगह पर मूर्ति खड़े होते थे, क्योंकि वे उस दृश्य को बेहतर ढंग से शूट करना चाहते थे।

मूर्ति अपने काम में बेतरह डूब जाने वाले इंसान थे और उनकी हमेशा कोशिश होती थी कि वे अपनी सीमाओं से परे जाकर भी दृश्यों को यादगार बना सकें। 1959 में आई फिल्म 'कागज के फूल' उनकी इसी लगन और धुन का एक अनूठा उदाहरण है। भारतीय हिंदी सिनेमा में सिनेमेटोग्राफी को नए आयाम देने वाली इस फिल्म का वह दृश्य, जहां मंच पर सूर्य की किरण गिर रही है, जिसकी रोशनी में फिल्म का नायक मौजूद है, अपनी कलात्मकता के लिए आज भी मील का पत्थर है। इस दृश्य की कलात्मकता मूर्ति की ही देन थी। गुरुदत्त का खुद का कहना था कि उन्होंने भी वह दृश्य उतना खूबसूरत नहीं सोचा था, जितना कुछ आईनों का प्रयोग करके मूर्ति ने बना दिया था। यह भारतीय सिनेमा की पहली सिनेमास्कोप फिल्म भी थी और वह फिल्म भी, जिसने पहली बार एक सिनेमेटोग्राफर को फिल्मफेयर के मंच तक पहुंचाया। अपनी नायाब कलात्मकता का नमूना पेश करने वाले वीके मूर्ति को 'कागज के फूल' के लिए बेस्ट सिनेमेटोग्राफर का फिल्मफेयर का पुरस्कार मिला। अपनी इस कामयाबी को मूर्ति ने 1962 में फिर दोहराया, जब 'साहब बीवी और गुलाम' के लिए उन्हें एक बार फिर फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया।

गुरुदत्त के जीवनकाल में मूर्ति ने किसी अन्य निर्देशक के साथ काम नहीं किया। शायद इसमें गुरुदत्त के साथ उनके प्रोफेशनल से ज्यादा, मित्रवत और आत्मीय रिश्तों की मजबूती एक वजह रही, लेकिन गुरुदत्त की मौत के बाद उन्होंने अन्य निर्देशकों के साथ भी काम किया। हालांकि गुरुदत्त के बाद उन्होंने कम ही काम किया, लेकिन जो भी किया, वह बेमिसाल किया। कमाल अमरोही की 'पाकीजा' और 'रजिया सुल्तान', प्रमोद चक्रवती की 'नया जमाना' और 'जुगनू' की यादगार सिनेमेटोग्राफी मिर्ति ने ही की थी। इसके अलावा श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी (तमस) के साथ भी उन्होंने यादगार दृश्यों को जन्म दिया है। हिंदी के अलावा 1993 में उन्होंने राजेंद्र सिंह बाबू के निर्देशन में बनी सुपर हिट कन्नड़ फिल्म 'होवू हन्नू' की सिनेमेटोग्राफी भी की। वे इस फिल्म के न केवल सिनेमेटोग्राफर रहे, बल्कि उन्होंने इसमें अभिनय भी किया।

मूर्ति ने भारतीय सिनेमा जगत में न सिर्फ सिनेमेटोग्राफी को एक नए मुकाम पर पहुंचाया, बल्कि फिल्मफेयर हासिल करने वाला पहला सिनेमेटोग्राफर बनकर इस विधा से जुड़े लोगों की हौसलाअफजाई भी की। रंगीन फिल्मों की सिनेमेटोग्राफी की ट्रेनिंग हासिल करने इंग्लैंड गए मूर्ति ने 'द गंस ऑफ़ नेवरॉन' जैसी फिल्म की
यूनिट के साथ भी काम किया और अपनी छाप छोड़ी। सिनेमा जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए वीके मूर्ति को 2005 में आईफा लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और 19 जनवरी 2010 को वर्ष 2008 के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया। 2001 में मूर्ति सिनेमा को अलविदा कहकर वापस बैंगलौर जा बसे। उन्होंने भले ही फिल्मों को अलविदा कह दिया है, लेकिन उनका कलात्मक पक्ष आज भी दूसरे सिनेमेटोग्राफर्स को प्रेरणा देने का काम करता है।

शुक्रवार, 3 मई 2013

आवाज़


वह तक़रीबन 80 वर्ष का बुज़ुर्ग था जिसके बस एक पाँव में जूता था। कंधे पर एक छोटी-सी पोटली और तन पर ऐसे मैले कपड़े जिन्हें देखकर ही लग रहा था कि वह पाँच-छः दिन की धूल-धूप खा चुके हैं। वह किसी गाँव से शहर आया था शायद। कह रहा था- ‘भैया कछु कर दो। हमरे मुंडा तक भड़िया लए (जूते तक चोरी कर लिये)। एकई पईसा नईंएँ चाय-रोटी खों। भईया कछु कर दो।’
         आवाज़ में कुछ अजीब-सा था जो भीतर विचलन पैदा कर रहा था। दिल कह रहा था कि वाकई ज़रूरतमंद है, कुछ तो मदद कर ही देनी चाहिए। अरसे बाद उस शहर और बदले हुए हालात को देख रहा था। आसपास के लोगों का उस बुज़ुर्ग के प्रति उदासीन या हड़काने वाला रवैया मन को शंकित भी कर रहा था कि यह कहीं उसका कारोबार न हो।
         मन की शंका और दिल की संवेदनशीलता एक डोर को दो विपरीत धुरों से तान रहे थे। दो बार तो हाथ पर्स वाली जेब तक जाकर लौटा। आख़िरकार बाइक की किक पर पूरी झल्लाहट के साथ पैर पटका और सधा-सधाया जुमला, जो ऐसे मौकों पर अक्सर कहा जाता है, कह दिया - ‘छुट्टे नहीं हैं बाबा।’
         भर्राती हुई, घबराहट औैर बेचैनी से भरी, रोने को तत्पर वह आवाज़ जैसे बाइक पर मेरे पीछे सवार हो गई थी। पर्स की तरफ़ बढ़ते हाथ की तरह बाइक भी वापस मुड़ते-मुड़ते रह गई थी। हर बार शंका बलवती साबित हुई थी- ‘ अगर यह उसका धंधा हुआ तो?’
         ‘हुआ भी तो क्या! उसे कुछ पैसे देकर तेरी उलझन तो दूर होगी कि तूने कुछ क्यों नहीं किया।’ ख़ुद को दिया गया यह तर्क ठीक लगा। बाइक ठिठकी ही थी कि इस तर्क की काट भी सामने आ गई- ‘पर ऐसे तो रोज़ ही कोई न कोई मिलता है।’
         भीतर यह विचार और बाहर बाइक दोनों लगातार चल रहे थे। घर आ गया था। कई गलियों से घूम कर, कई मोड़ों को काट कर आया था। शोर भरे बाज़ारों से होकर आया था। वह कहीं नहीं गिरी। रोने को तत्पर वह आवाज़ रोने लगी थी। अब वह बाइक से उतर कर मेरे कंधों पर सवार थी।
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.