मंगलवार, 28 अगस्त 2012

एक मार्गदर्शक की सक्रियता

इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ए के हंगल को याद करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव जितेन्द्र  रघुवंशी से फ़ोन पर हुई बातचीत का छोटा सा हिस्सा...

रंगमंच और फिल्मों में उन्होंने फर्क नहीं किया। वह कहते थे, 'अपनी बात कहने के लिए हर स्पेस का इस्तेमाल करो।’

खुद ए के हंगल ने अपनी आत्मकथा ‘लाइफ एंड टाइम्स ऑफ़  ए के हंगल’ में लिखा है कि ‘जीवन शाश्वत है और जीना सीमित।’ लेकिन एक सीमित जीवन में कितना कुछ पूरी ईमानदारी के साथ ऐसा किया जा सकता है जो शाश्वत जीवन के लिए महत्वपूर्ण होता है, यह उनकी जिंदगी को जानने से पता चलता है। ए के हंगल का जन्म एक फरवरी 1916 को सियालकोट में हुआ था। यह एक अलग बात है कि लंबे समय तक सही जन्मतिथि ज्ञात न होने के कारण उनका जन्मदिन 15 अगस्त को मनाया जाता रहा। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा पेशावर में पाई थी। यहीं वह खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर सरकारी नौकरी की पारिवारिक परंपरा को तोड़ आजादी के आंदोलन में शामिल हो गए। 1931 में जब चंदेर सिंह गढ़वाली ने निर्दोष लोगों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया और इसके जवाब में अंग्रेजों ने सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया, तो इस घटना ने उन्हें बहुत उद्वेलित किया और वे इसके खिलाफ खड़े हुए।
वह आजादी को सिर्फ अंग्रेजों के भारत से चले जाने के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि इसके मूल में बेहतर जिंदगी देखते थे। उन्होंने जीवन-यापन करने के लिए टेलरिंग की, तो टेलर्स यूनियन में सक्रिय भूमिका निभाई। चूंकि कला से उन्हें बचपन से ही लगाव था, उन्होंने बाकायदा संगीत-नाटक की शिक्षा भी ली थी, सो रंगमंच को भी अपनी बात कहने का माध्यम बनाया। यह वह दौर था जब देश न केवल गुलाम था, बल्कि सांप्रदायिकता का माहौल भी था। कुल मिलाकर हालात खराब थे, पुलिस लगातार उनके पीछे लगी रहती थी, लेकिन ए के हंगल सक्रिय थे। यह सक्रियता ताउम्र बरकरार रही। वह गोआ की आजादी के लिए सक्रिय रहे, पड़ोसी देशों से मित्रता के लिए सक्रिय रहे, सीनियर सिटीजन मूवमेंट में सक्रिय रहे और सांस्कृतिक आंदोलनों में तो खैर हमेशा ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ए के हंगल 1947 में अहमदाबाद में आयोजित भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के राष्ट्रीय अधिवेशन में शामिल हुए थे। इसी अधिवेशन में उन्होंने निर्णय लिया था कि वापस कराची जाकर वह पाकिस्तान पीपुल्स थियेटर एसोसियेशन का गठन करेंगे। लेकिन तब भी उनके लिए हालात मुश्किल ही थे। वापस जाकर उन्हें पाकिस्तान सरकार के विरोध का सामना करना पड़ा और दो साल जेल में गुजारने पड़े। 1949 में जब छूटे, तो मुंबई का रुख किया। जब वे मुंबई आए थे, तो उनकी जेब में सिर्फ 20 रुपये थे। वे फ्रीडम फाइटर भी थे और रिफ्यूजी भी, लेकिन उन्होंने इसके आधार पर मिलने वाली पेंशन की मांग नहीं की। उन्होंने इप्टा के साथियों से मुलाकात की और मुंबई इप्टा को फिर से सक्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1985 में इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने और 2002 से अंतिम सांस तक इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे।
ए के हंगल राजनैतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को अलहदा नहीं देखते थे। वे मानते थे कि दोनों ही एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और आम आदमी दोनों से प्रभावित होता है। उनकी सांस्कृतिक और राजनैतिक गतिविधियों पर हमेशा नजर रहती थी। रंगमंच और फिल्मों में उन्होंने फर्क नहीं किया। वे कहते थे, ‘अपनी बात कहने के लिए हर स्पेस का इस्तेमाल करो।’ शोले में अपने अंधे व्यक्ति के किरदार को वह महज एक किरदार नहीं मानते थे। वह कहते थे कि ‘एक नेत्रहीन व्यक्ति अपनी आंखें खोजता रहता है।’ इस एक वाक्य के बहाने वे समाज, मार्क्स के लेख और वर्तमान परिस्थितियों का जिक्र भी करते थे। वे आजीवन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे और हमारा सांस्कृतिक-राजनैतिक मार्गदर्शन करते रहे। एक आम आदमी के प्रति उनकी सोच और संवेदनशीलता को अपनी आत्मकथा में लिखे उनके इस अंश से समझा जा सकता है कि ‘फिल्म के परदे और नाटक के मंच पर मृत्यु के बाद में पुनर्जीवित होता रहा हूं। क्या इस बार ऐसा कर सकूंगा?’
इस गैज़ेट में एक गड़बड़ी थी.