मंगलवार, 2 जून 2009

हँसी


बहुत अरसा पहले लिखी थी ये कविता, आज अचानक से याद आ गई। अभी भी लगता है कि अधूरी है, पर जो भी है प्रस्तुत है।

हँसना यूँ तो बहुत अच्छा होता है
पर कभी-कभी मुझे चुभती है हँसी
बेवजह, छोटी-छोटी बात पर
अगर ना हँसें लोग
तो शायद जीवन की आपाधापी
लोगों को मौका भी ना दे हँसने का

जानता हूँ फिर भी
कभी-कभी गुस्से से भर देती है हँसी
जब कोई गिरता है केले के छिलके पर फिसलकर
तो लोग हँसते हैं
मानो वो गिरा हो आपको हँसाने के लिए ही
जानबूझकर किसी सर्कस के जोकर की तरह

लोग हँसते हैं
नहीं समझते मन:स्थिति
गिरने के बाद अपने ही भीतर
सिमट जाने को आतुर उस व्यक्ति की

मुझे चुभती है ये हँसी और
मैं देखता हूँ उस केले के छिलके की ओर
जिसमें लगा बाकी का गूदा भी
निकाल बाहर किया फिसलकर लोगों को हँसाने वाले पैर ने.

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