गुरुवार, 29 सितंबर 2011

सरकारी योजनाएं और श्रम


भारतीय व्यवस्था में 1936 से लेकर अब तक कई कानून श्रमिकों को केंद्र में रखते हुए बनाए गए हैं। राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर श्रमिकों के जीवन स्तर में सुधार के लिए तमाम शासकीय योजनाएं भी संचालित की गईं। कुछ में सुधार किए गए, कुछ का अन्य योजनाओं में विलयन कर दिया गया। फिर भी आज श्रमिक वर्ग की स्थिति कैसी है यह किसी से छुपा नहीं है। बेशक श्रमिकों में जागरूकता  है, अपने अधिकारों के लिए लड़ने की प्रवृत्ति व हौसला है। स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के तमाम संगठन हैं, लेकिन क्या श्रमिकों की स्थिति में सुधार हुआ है? कानूनों, शासकीय योजनाओं, प्रयासों के प्रकाश में यह सवाल बचकाना लग सकता है, पर शायद इतना छोटा भी नहीं है कि इसके बारे में गंभीरता से बात न की जाए। यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि श्रमिक का तात्पर्य सिर्फ कुदाल हाथ में लिए, सिर पर बोझा लादे और नंगे बदन वाली तस्वीर ही नहीं है, श्रमिकों का दायरा इससे कहीं अधिक व्यापक है।

शासकीय योजनाओं की बात करें, तो संप्रग सरकार की मनरेगा योजना पूर्णत: मजदूरों की योजना है। नरेगा से मनरेगा तक का सफर तय कर चुकने के बाद भी स्थिति यह है कि तकरीबन 30 प्रतिशत मजदूर आबादी रोजगार की तलाश में अब भी पलायन करती है। पिछले सालों की रिपोर्टों पर नजर डालें तो पाएंगे कि कुछ अपवादों को छोड़कर पूरे सौ दिन का काम कहीं भी मजदूरों को नहीं मिला है। यह अधिकतम 60 से 80 दिनों तक आकर अटक जाता है। यानी अब तक सरकार एक वर्ष में 100 दिन का रोजगार सभी मजदूरों को पूरे भारत में कहीं भी सुनिश्चित नहीं कर सकी। ऐसी स्थिति में यदि लोगों की सहभागिता कम हो रही है, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

हाथकरघा व अन्य घरेलू उद्योगों में लगे लोगों की स्थिति तो और भी खराब है। अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आपके पास उत्पादन के लिए कच्चा माल है, उत्पादन की क्षमता है, तैयार उत्पाद हैं लेकिन बेचने के लिए स्थाई और पर्याप्त बाजार उपलब्ध नहीं है। सरकार हथकरघा उद्योग के लिए आर्थिक सहयोग प्रदान करती है, परंतु तैयार माल को बेचने के लिए खुले बाजार के नाम पर सिर्फ इतनी सुविधा प्रदान करती है कि जिला, राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर 6 से 10 दिन की एक प्रदर्शनी लगाई जाए। रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुएं बहुत कम मूल्य पर घरेलू उद्योगों से उपलब्ध हो सकती हैं, परंतु उसे बाजार तक पहुंचाने के सरकारी प्रयास अपर्याप्त हैं। नतीजतन जब यही उत्पाद निजी कंपनियों द्वारा बाजार में पहुंचते हैं, तो कीमत तीन से चार गुना ज्यादा होती है और लाभ निजी कंपनियों की जेब में पहुंचता है। हालांकि इन उत्पादों की एक बड़ी खरीदार भारत सरकार खुद है, जिसके लिए उद्योगों का शासकीय खरीद योजना में पंजीकृत होना जरूरी है, परंतु वर्तमान में निरंतर रोजगार के लिए बढ़ते पलायन और इन उद्योगों से प्राप्त उत्पादों की बाजार में उपलब्धता के प्रतिशत को देखें, तो इस व्यवस्था की सफलता और क्रियान्वयन प्रक्रिया पर प्रश्न खड़ा होता है। सरकारी योजनाओं में इन उद्योगों को कम कीमत पर कच्चा माल उपलब्ध कराने, उद्योग स्थापना के लिए आवश्यक धनराशि मुहैया कराने, प्रशिक्षण प्रदान करने जैसी तमाम बातों का समावेश है, लेकिन उद्योग को बरकरार रखने के लिए सबसे आवश्यक तत्व 'बाजार तक पहुंच' को सुनिश्चित करने के कोई ठोस और वृहद इंतजाम नजर नहीं आते।

ऐसे ही कुछ तथ्य कानूनों के संदर्भ में भी हैं। यदि बाल श्रम उन्मूलन अधिनियम को ही देखा जाए तो काम में लगे बच्चों को शिक्षा की ओर ले जाना बहुत महत्वपूर्ण व सार्थक कदम है। बच्चों से काम कराने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई करना भी कानून के क्रियान्वयन में उपयोगी है। तमाम सामाजिक संस्थाएं इसके लिए कार्यरत हैं, फिर भी बच्चे काम करते दिख ही जाएंगे। सवाल यह है कि बच्चे आखिर काम कर क्यों रहे हैं? जवाब आसान है - सरकार के लिए वे सिर्फ बच्चे हैं, उनके परिवार के लिए कमाऊ सदस्य। यदि 8-10 साल का बच्चा कहीं काम कर रहा है, तो निश्चित ही वह मजे के लिए नहीं कर रहा, अपने परिवार की आर्थिक आवश्यकता को पूरा करने में सहयोग कर रहा है। यानी उसके परिवार के पास रोजगार के पर्याप्त साधन नहीं हैं।

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के संदर्भ में अगर उत्तर प्रदेश की ही बात करें, तो न्यूनतम कृषि मजदूरी 100 रुपये है, यानी रोज काम करने पर वर्ष भर में एक व्यक्ति 36,500 रुपये कमाता है। मनरेगा में 100 दिन के काम का प्रावधान है यानी 10,000 रुपये सालाना। सरकार के आंकड़ों को ही मानें, तो प्रतिदिन भोजन के लिए औसतन 20 रुपये की जरूरत होती है, यानी साल भर में 7300 रुपये भोजन पर खर्च होते हैं। बाकी बचे 2700 रुपये से क्या साल भर के लिए स्वास्थ्य, कपड़े, आवास, शिक्षा व अन्य मूलभूत सुविधाएं प्राप्त की जा सकती हैं? खासकर तब, जबकि न्यूनतम मजदूरी वर्ष में एक बार बढ़ी हो और उपभोग्य वस्तुओं की कीमत चार बार।
यह तथ्य भी विचारणीय है कि एक तरफ तो सरकार गरीबों/श्रमिकों के जीवनस्तर में सुधार के लिए नित नई योजनाओं को अंजाम देती आई है, दूसरी ओर उन्हें निशाना भी बनाती है। जल विद्युत परियोजनाओं, बड़े बांधों, विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों (सेज) के नाम पर जो विकास है, उसके विस्थापितों का आज तक पूर्णत: पुनर्वास नहीं हो सका है। मैंगलौर, उड़ीसा, झारखंड, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश व और भी कई स्थानों पर विकास परियोजनाओं के चलते आज भी विस्थापन जारी है। इन विस्थापितों के सामने रोजगार की समस्या पहले से नहीं है, बल्कि सरकार निर्मित है। जिनके पास अपने जीवन-यापन के लिए कृषि भूमि या प्राकृतिक संसाधन थे, उनसे वह भी छीने जा रहे हैं और बदले में हैं सिर्फ आश्वासन। नतीजतन जो आत्मनिर्भर थे, आज मजदूरी पर निर्भर हैं। महानगरों में निर्माण और विकास कार्यों के लिए जो मजदूर कम पारिश्रमिक पर लाए जाते हैं, काम खत्म होने पर अपेक्षा की जाती है कि वे वापस अपने गृहनगर चले जाएं, जहां से वे अपने रोजगार के संसाधनों को छोड़कर आए हैं। प्रश्न यह है कि क्या वे वापस जाकर पुन: वह रोजगार पा सकेंगे? कॉमनवेल्थ खेलों के लिए तमाम मजदूर दिल्ली आयातित किए गए और अब उनके रहने की व्यवस्था पर भी सरकार की कोई चिंता नहीं है। इस हालत में यह एक बड़ा सवाल है कि महानगरों में रह रहे मजदूरों के रोजगार के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं, सिवाय रजिस्ट्रेशन करने के।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सरकार को जनता की कोई चिंता नहीं होती। जो भी योजनाएँ आ रही हैं उन का उद्देश्य केवल वोट प्राप्त करना होता है।

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