शुक्रवार, 2 मई 2014

यह निजता पर हमला है

बात मानसिकता और अधिकारों की है

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प्रेम का स्वीकार एक सहज स्वाभाविक बात है, लेकिन दिग्विजय सिंह की स्वीकारोक्ति के बाद सोशल मीडिया और ख़ासकर फेसबुक पर जिस तरह से उनके प्रेम का चर्चा और उस पर टिप्पणियों का तांता लगा है उसने एक स्वाभाविक-सी बात को अस्वाभाविक बना दिया है. अस्वाभाविक इस अर्थ में कि कुछ लोग इस नितांत निजी मामले को राजनीतिक रूप देने की कोशिश में लगे हैं, कुछ इसके बहाने दिग्विजय सिंह का चरित्र हनन करने में जुट गए हैं और कुछ सामाजिक मर्यादाओं की झंडाबरदारी में उनकी निजता पर हमला कर रहे हैं. इसमें मोदी समर्थकों, कांग्रेस विरोधियों की संख्या तो काफी है ही पत्रकारों की संख्या भी कम नहीं है. जिस भद्दे ढंग से इस मामले में टिप्पणियां की जा रही हैं, तस्वीरें साझा की जा रही हैं उसमे सबसे आपत्तिजनक पहलू यह है कि इसमें एक महिला के सम्मान और उसकी निजता का भी मखौल उड़ाया जा रहा है. जो लोग सम्बंधित महिला के बारे में जानते तक नहीं वे भी उसके बारे में अनर्गल बातें कर रहे हैं. कुल मिलाकर यह सिवाय किसी की निजता में जबरन दखल देने और महिला के अपमान के अलावा और कुछ नहीं है.

अब बात यह कि आखिर दिग्विजय सिंह और उनकी महिला मित्र ने ऐसा क्या अपराध कर दिया है? वे न केवल पूरी ईमानदारी से अपने रिश्ते को स्वीकार कर रहे हैं बल्कि उसे सामाजिक व वैधानिक मान्यता प्रदान करने की ओर भी अग्रसर हैं. वे चाहते तो इसे अपना निजी मामला कहकर चुप रह सकते थे, पर दोनों ने ही ऐसा नहीं किया. क्या इसी से स्पष्ट नहीं होता कि दाल में कहीं भी कुछ भी वैसा काला नहीं है जिसकी सम्भावना अक्सर तलाशी जाती है. न तो प्रेम करना कोई अपराध है, न तलाक़ लेना और न ही विवाह करना. उम्र का हवाला देकर भी आप उनकी ईमानदार स्वीकारोक्ति को किसी कठघरे में नहीं खड़ा कर सकते. फिर आखिर इस तरह किसी की निजता पर हमला करके क्या साबित करने की कोशिश की जा रही है? ऐसा करने वालों की मंशा चाहे जो भी हो पर इससे उनका ही मानसिक दीवालियापन साबित होता है.

किसी का विरोध करने के कई तरीके होते हैं. जो लोग दिग्विजय सिंह से राजनीतिक मतभेद रखते हैं या व्यक्तिगत रूप से उन्हें पसंद नहीं करते और इस बात को उनके खिलाफ़ इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें विरोध की सीमा-रेखा का ध्यान रखने की ज़रूरत है. मैं दिग्विजय सिंह का समर्थक नहीं हूँ, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मैं उनके नि:तांत निजी संबंधों (जिन्हें कि वे क़ानूनी मान्यता देने की भी बात कह रहे हैं) की छीछालेदर करूँ और उस महिला का मखौल उड़ाऊँ जो अपना जीवन एक नए सिरे से शुरू करना चाहती है. इस प्रकार की हरकतें महिलाओं के प्रति आपकी संवेदनशीलता के स्तर को भी दर्शाती हैं. असल में इस तरह की अशोभनीय टिप्पणियां करने वाले लोग वही हैं जिनके घरों की महिलाओं को कोई देख भर ले तो उसका सिर उतारने पर आ जाते हैं लेकिन बाकी सभी महिलाओं को खुद भी मनोरंजन का सामान समझते हैं. चाहे वे किसी के भी समर्थक, विरोधी होने का मुखौटा पहन लें, कितना भी बड़ा पत्रकार होने का तमगा लटका लें, इससे चरित्र नहीं बदल जायेगा. इस मामले में जिस ढंग से चटखारे लेकर बातें की जा रही हैं वह भीतर छुपी लार-टपकाऊ नीयत, महिलाओं के प्रति घटिया सोच और दोगले व्यवहार को दर्शा ही देती हैं. गपशप (गॉसिप) के प्रति दिलचस्पी तो स्वत: ही दिख जाती है.

इन टिप्पणियों का विरोध करने पर कुछ लोगों ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि मोदी के विवाहित होने की ख़बर पर और दिग्विजय सिंह के मामले में अलग-अलग रुख क्यों? उनके लिए एक ही जवाब है कि बिलकुल भी अलग-अलग रुख नहीं है, हम तब भी अधिकार की बात कर रहे थे और अब भी कर रहे हैं. हम तब भी एक महिला के अधिकारों की हिमायत कर रहे थे और अब भी कर रहे हैं. फर्क है तो इस बात का कि मोदी ने एक महिला के विवाहोपरांत अधिकारों को नकार दिया, सामाजिक व वैधानिक मान्यता होते हुए भी उसे उसके अधिकारों से वंचित रखा और एक स्त्री के पूरे अस्तित्व को नकारते हुए अपने अविवाहित होने का भ्रम फैलाये रखने में अहम् भूमिका निभाई. जबकि दिग्विजय सिंह उन तमाम अधिकारों को सामाजिक/वैधानिक मान्यता प्रदान करने की बात खुद कर रहे हैं, किसी जवाबदेही से पीछे नहीं हट रहे हैं. अब अगर आप अधिकारों/वैधानिक मान्यता को नकारने और प्रदान किये जाने का फ़र्क ही न समझते हों तो बात अलग है. दूसरी बात यह कि प्रश्न खड़े करने और मखौल उड़ाने में फ़र्क होता है. यदि किसी ने मोदी की निजता का मखौल उड़ाया है तो वह भी निंदनीय है.

यहाँ एक और गंभीर बात यह है कि न केवल दिग्विजय सिंह और उनकी महिला मित्र की निजता का मखौल उड़ाया जा रहा है बल्कि अपरोक्ष रूप से उस तीसरे व्यक्ति को भी हलकान किया जा रहा है जिससे तलाक़ की अर्जी दाखिल-दफ़्तर है. क्या यह शर्मनाक और दु:खद नहीं है कि ऐसी अभद्र टिप्पणियों और ख़बरों के चलते उस व्यक्ति को व्यथित मन से अपनी ज़िन्दगी की नि:तांत निजी बात सार्वजनिक करनी पड़ती है कि तलाक़ की अर्ज़ी में उसकी भी सहमति है और दोनों के बीच पहले ही संबध-विच्छेद हो चुका है. इस मामले में उस इंसान की समझदारी उन तमाम टिप्पणियों और ख़बरों को प्रसारित करने वालों का मुंह बंद करने के लिए काफ़ी है, जो बिना कोई पृष्ठभूमि जाने उस महिला के सन्दर्भ में अनर्गल बातें कर रहे हैं. लेकिन बड़ा मसला यहाँ मुँह बंद करना नहीं कुछ और है.

बात मोदी या सिंह की नहीं है, बीजेपी या कांग्रेस की नहीं है और न ही मुँह बंद करने की है. बात है उस मानसिकता की जिससे आप आज तक उबर नहीं पाए हैं और जिसके चलते आज तक महिलाओं का और किसी की निजता का सम्मान करना नहीं सीख पाए हैं. महिलाओं के प्रति तो इस हद तक असंवेदनशील बने हुए हैं कि आज भी महिलाओं को घर के भीतर रखने की सोच से मुक्त नहीं हो पाए हैं जिसका परिणाम है कि कामकाजी महिलाओं को एक अलग ही नज़रिए से देखा जाता है और यह स्वीकार करने में परेशानी होती है कि कोई स्त्री बिना किसी स्वार्थ के अपने से कहीं अधिक उम्र के पुरुष से प्रेम कर सकती है. यही हाल हमारे दोहरे चरित्र का है. महिलाओं के विरुद्ध किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के बयान पर उँगलियाँ उठाते हैं लेकिन निजी जीवन में रोज़ कितनी बार महिला-विरोधी शब्दों/जुमलों का इस्तेमाल करते हैं इसका ख़याल भी नहीं रखते और न ही यह सोचते हैं कि ऐसा क्यों कर रहे हैं. वजह सिर्फ यही है कि हम उस मानसिकता के साथ ही बड़े हुए हैं जिसमे खुद की ग़लतियाँ भी जायज़ हैं, दूसरा करे तो उसकी खैर नहीं. जब तक इस मानसिकता से नहीं उबरा जायेगा हमारे सभ्य होने के दावे झूठे ही रहेंगे. पढ़-लिख लेने भर से, कोट-टाई पहन लेने से, संस्कृति की ध्वजा भर उठा लेने से ही कोई सभ्य नहीं हो जाता. इसकी सबसे पहली शर्त दूसरों के अधिकारों और जीवन का सम्मान करना है.

02 मई 2014, दैनिक जनवाणी, मेरठ 
बहरहाल, जिन पत्रकार बंधुओं ने इस मामले में अशोभनीय व्यवहार किया है उनसे अतिरिक्त रूप से यही कहा जा सकता है कि पत्रकार होने, हाथ में माइक या कलम पकड़ लेने, सूचनाओं तक आपकी पहुँच होने से आपको ये अधिकार नहीं मिल जाता है कि आप किसी के भी निजी संबंधों की छीछालेदर करें. अपनी सीमा रेखा को पहचानिए वरना करते रहिये देश/दुनिया को बदलने के दावे, कुछ नहीं बदलेगा. फिर कल को अगर आपकी निजता पर कोई हमला हुआ तो कितना भी करते रहिएगा अपनी निजता के अधिकार का हल्ला, जैसे आज आप नहीं समझ रहे कल को कोई आपकी स्थिति नहीं समझेगा.

- रजनीश 'साहिल'

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