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शनिवार, 31 अगस्त 2019

यह क्या कम आपत्तिजनक है!


बहुत दिनों से लल्लन मियाँ की कोई खोज-ख़बर नहीं थी तो मैं सुबह-सुबह उनके घर जा धमका. लल्लन मियाँ सिर के बल खड़े होने की कोशिश कर रहे थे. वे बार-बार सिर तकिए पर टिकाकर दोनों टाँगें ऊपर को उछालते और नाकाम होते. पास में ही अखबार और चाय के तीन ख़ाली कप पड़े थे. उन्हें इस हाल में देख मैंने पूछा – ‘शीर्षासन करने का शौक़ कब से हो गया लल्लन मियाँ? या पेट में कुछ अलामत है?’

लल्लन मियाँ रुककर बोले- ‘भाड़ में जाए शीर्षासन, और पेट भी दुरुस्त है. हम तो दिमाग ठिकाने लगाकर नज़रिया समझने की कोशिश कर रहे हैं.’

मैंने पूछा कि ‘क्या हुआ दिमाग को और किसका नज़रिया?’ तो अपनी कोशिश में लगे-लगे ही आँखों से अख़बार की तरफ़ इशारा करके बोले- ‘अख़बार पढ़ो अख़बार.’ और उसी सांस में अपनी बेगम को आवाज़ दी, ‘सुनो! एक चाय और बढ़ा लो, कलमघसीट भी आ गया.’

मैं जानता था कि दो-चार बातों के बाद ही लल्लन मियाँ मुद्दे पर आएँगे सो अखबार उठाते हुए मैं बोला- ‘ख़बरों से तो अख़बार का नज़रिया तक साफ़ पता चल जाता है. इसमें भला ऐसा क्या होगा जो आपको उलझाए.’

इससे पहले कि लल्लन मियाँ कुछ कहते उनकी बेगम चाय लिए आ गईं. मैंने अपना कप कब्जाते हुए उनसे पूछा- ‘ये क्या हरकतें कर रहे हैं? ऐसा क्या पढ़ लिया इन्होंने जिसने इनका दिमाग़ हिला दिया?’

वे बोलीं- ‘हरकतों का तो इनसे ही पूछो तुम, पर जब से ये ख़बर पढ़ी है कि भीमा कोरेगांव मामले में जज ने पूछा है कि घर में युद्ध और शान्ति किताब क्यों थी, तब से तीन बार चाय बनवा चुके हैं. ये चौथी है. ऊपर से उल्टे-सीधे हो रहे हैं.’ चाय की चुस्की लेते हुए बोलीं ‘अब तुम ही पूछो कि क्या माजरा है, मैं पूछती हूँ तो ग़ालिब का मिसरा पढ़ देते हैं – कोई बतला दे के हम बतलाएं क्या.’

माजरा मेरी समझ में आ चुका था. मैंने लल्लन मियाँ से पूछा – ‘टॉलस्टॉय को शांतिदूत कहा गया है और उनकी किताब युद्ध और शान्ति को पुलिस ने आपत्तिजनक कहा है. जज ने भी पूछा है कि ये आपत्तिजनक किताब घर में क्यों थी? बताइए, जैसा कहा जा रहा है, वैसे वह किताब भी उकसाती है क्या भला?'

'जैसा कहा जा रहा है वैसे तो नहीं, लेकिन वह उकसाती तो है भाई मियाँ.' उन्होंने जवाब दिया.

'वो कैसे? आपकी क्या राय है युद्ध और शान्ति के बारे में?’ मैंने पूछा.

लल्लन मियाँ सीधे हुए, चाय का एक घूँट भरा और बोले – ‘वही क़ायम करने के लिए तो नज़रिया समझने की कोशिश कर रहे थे हम.'

मैंने पूछा कि क्या समझे तो बोले - 'देखो भाई मियां, युद्ध कई प्रकार का होता है. मल्ल युद्ध, वाक् युद्ध, द्वंद्व युद्ध से लेकर कम्बल परेड, किचाइन तक. आमतौर पर इसे लड़ाई-झगड़ा भी कहा जाता है.’

उनकी बेगम ज़रा झुंझलाकर बोलीं – ‘यही मुसीबत है इनकी, फैलते बहुत हैं. अरे परिभाषा काहे बघार रहे हो! सीधे-सीधे राय बताओ न.’ लल्लन मियाँ चाय चुसकते हुए बोले – ‘भगवान भला करे तुम्हारा, पर अब जब हमारे आसपास चाय है, चाय पर चर्चा है तो फैलना तो बनता है. वैसे भी अभी लोकतंत्र है, शाही फ़रमान ज़ारी नहीं हुआ अब तक कि कोई और नहीं फ़ैल सकता.’

मैंने याद दिलाया कि बात युद्ध की हो रही थी तो लल्लन मियाँ आगे बढ़े. बोले- ‘हाँ तो भाई मियाँ, ऐसा पाया जाता है कि जब लड़ाई-झगड़ा होता है तो सब को फैलने का सुभीता होता है. जो जिस हद तक जा सकता है उस हद तक जाकर फैलता है. जिसका लड़ाई-झगड़े से सीधा संबंध नहीं होता वो भी फैलता है. मने के घर की दीवार का सालों का झगड़ा न सुलटा पाने वाले पड़ोसी दूसरों के दीवानी मुकदमों पर राय देते हैं. अपने इलाके के थाने की सीमा के मामलों को न जाननेवाले भी कश्मीर और पाकिस्तान का नाम सुनकर समस्या का हल बताते ही हैं, नेहरू को गलियां दे ही लेते हैं.’

‘मतलब यही न कि लड़ाई-झगड़े में हर कोई अपना ज्ञान बांटता है. तुम्हारी तरह.’ बेगम ने बीच में कहा, जिस पर लल्लन मियाँ बोले- ‘यार तुम ज्ञान को मत पकड़ो, फैलने को पकड़ो. और बात सिर्फ ज्ञान बांटने की नहीं है. अपन बदला उतारू लोग हैं. पुरानी दुश्मनी निकालने को अपने यहां लोग तैयार ही बैठे मिलते हैं. खानदानी दुश्मनियों की परंपरा का देश है अपना. तुम्हारे दादा ने हमारे बाप को मारा था अब हम तुम्हारे बेटे को मारेंगे. मतलब बाबर की ग़लतियों पर जुम्मन पीटा जाता है. फिर मौके की नज़ाकत एक और पहलू है जिसका फ़ायदा उठाना हर कोई अपना कर्तव्य मानता है. लड़ाई दो लोगों की होती है, अमरीका की तरह हाथ साफ़ तीसरा कर लेता है. दंगे होते हैं तो लोग दुकानें लूट लेते हैं. किचाइनप्रेमियों को हर झगड़े में बतकुच्चन के लिए माल मिलता है. कुल मिलाकर फैलने वालों के लिए लड़ाई काम का अवसर है. बड़ी लड़ाई और बड़ा अवसर.‘

मैंने पूछा ‘और बड़े अवसर से क्या मतलब?’

चाय चुसकते लल्लन मियाँ बोले – ‘अभी जो मामला चल रहा है सो तुम देख ही रहे हो कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान दोनों की ही बड़ी आबादी का मन युद्ध के लिए हिलोरें मार रहा है. उनके लिए युद्ध आशंका नहीं, संभावना है, जिसमें रस आ रहा है. लड़ाई हो तो रस फूटकर बाहर छलकेगा. तो भाई मियाँ हमको लगता नहीं है कि युद्ध से किसी को कोई आपत्ति है.’

‘चलिए माना कि युद्ध में लोगों को रस मिल रहा है इसलिए युद्ध से कोई आपत्ति नहीं हो सकती. पर शान्ति में तो चीज़ें ज्यादा बेहतर होती हैं, उसमें और ज्यादा रस है.’ लल्लन मियाँ की बेगम बोलीं. मैंने भी समर्थन करते हुए बात आगे बढाई - ‘बिलकुल. शान्ति युद्ध से हमेशा बेहतर है तो शान्ति से भी किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?’

लल्लन मियाँ हँसते हुए बोले – ‘तुम दोनों भी कमाल करते हो. आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के जमाने में ख़ाली इंटेलीजेंस की बात कर रहे हो. भई जैसे युद्ध कई तरह का होता है वैसे ही शान्ति भी दो तरह की होती है. आर्टिफिशियल शान्ति और असली वाली शान्ति. दूसरी वाली आपत्तिजनक है.’

‘मतलब?’ मैं और लल्लन मियाँ की बेगम दोनों एक साथ हैरत से बोले. लल्लन मियाँ को मज़ा आया. ठहाका लगाते हुए बोले – ‘ये देक्खो! इत्ती से बात समझ नहीं आती. कल से ट्यूशन लेना हमसे.’ फिर बिना हमारे बोलने का इंतजार किए आगे बोले – ‘अरे भाई, छोटे-मोटे झगड़े में भी मार-पीट भले बंद हो जाए पर जहाँ मौका मिले सामने वाले को लोग बुरा-भला कहते हैं कि नहीं. गलियाँ देते हैं कि नहीं. अब मान लो युद्ध हो गया, हम जीत गए. उसके बाद? लोग जीत का जश्न मनाएंगे, फिर कुछ दिन तक मानेंगे कि शान्ति है क्योंकि सरकार कह रही है. फिर कुछ दिन बाद पहले तो महंगाई और दूसरी चीज़ों की किल्लत से होगा उनके दिमाग़ का दही, फिर फैलेगा रायता. मने आदमी कटी पतंग-सा अशांत डोलेगा और कहा जाएगा युद्ध के बाद शान्ति है. दिस इस कॉल्ड आर्टिफ़िशियल शान्ति. इससे भी ज़्यादा लोगों को आपत्ति नहीं है. जिन्हें युद्ध के पहले और दौरान फैलने का मौका मिलेगा वो तब फैलेंगे, कुछ को आर्टिफिशियल शान्ति में फैलने का मौका मिल जाएगा. अपने-अपने हिसाब से सब फैल लेंगे.

‘जब आर्टिफिशियल शान्ति से तक आपत्ति नहीं है तो फिर असली वाली शान्ति में भला क्या आपत्तिजनक है?’ मैंने पूछा.

लल्लन मियाँ बोले – ‘उसमें फैलने वालों को फैलने के अवसर नहीं मिलते न भाई मियाँ. यह क्या कम आपत्तिजनक है.’

‘पर युद्ध और शान्ति किताब कैसे आपत्तिजनक हो गई?’ लल्लन मियाँ की बेगम ने सवाल किया.

लल्लन मियाँ ने ठंडी हो चुकी चाय का आख़िरी घूँट लिया और शान्ति से बोले – ‘क्योंकि वह असली वाली शान्ति के लिए उकसाती है.’

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

हमारे नायक, उनके नायक


साम्प्रदायिकता की चपेट में साझा गर्व

फेसबुक पर भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम 1857 के विस्मृत नायकों में से एक मौलवी अहमदुल्लाह शाह के बारे में जानकारी देती एक पोस्ट देखी जिसे 700 लोग शेयर कर चुके हैं. यूँ ही इच्छा हुई कि देखूँ किस-किस ने शेयर किया है. जो सूची सामने आई उसमें 25-30 से अधिक हिन्दू नाम नहीं दिखे. ठीक ऐसी ही स्थिति हिन्दू व आदिवासी नायकों से जुड़ी कई पोस्ट्स पर दूसरे समुदायों की भी दिखी. भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, अशफाक़उल्ला खान, महात्मा गाँधी आदि कुछ नामों जिन्हें कि शुरू से ही पूरे मुल्क की मोहब्बत हासिल रही या यूँ कहें कि जिनका नाम स्वतंत्रता-संग्राम के साथ इतिहास के पन्नों में बार-बार आता रहा है को छोड़ दें तो आज़ादी के कई नायकों, ख़ासकर जिनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है, के ज़िक्र वाली कई पोस्ट्स का सोशल मीडिया पर यही हाल है. इस स्थिति को देखते हुए सवाल उठता है कि ऐसा क्यों? क्या वजह है इसके पीछे? 

यह बात तो स्पष्ट है कि स्वतंत्रता संग्राम में हर मज़हब के लोगों ने अपना योगदान दिया. वह मुल्क के लिए, आज़ादी के लिए साझी लड़ाई थी. इस लिहाज़ से आज़ादी की उस लड़ाई का गर्व साझा होना चाहिए, न कि हिन्दू-मुसलमान के खेमे में बंटा हुआ. आज़ादी के उन सभी चितेरों के प्रति सम्मान और गर्व भी साझा होना चाहिए जिन्होंने 1857 के पहले से लेकर मुल्क के आज़ाद होने तक किसी भी स्तर पर लड़ाई जारी रखी; सिद्धो-कान्हू, बिरसा मुंडा से लेकर भगत सिंह, अशफाक़उल्ला खां और गाँधी तक सबके प्रति. उन सबमें जो कमियाँ नज़र आईं उस पर चर्चा के बावज़ूद कई बरसों तक ऐसा रहा भी और आज भी यह कई लोगों का सच और गर्व है. 

लेकिन किसी पोस्ट पर ऐसी प्रतिक्रिया इशारा करती है कि अब इस गर्व में भी दरार पड़ने लगी है. चाहे सोशल मीडिया की आभासी दुनिया हो या फिर हक़ीकत की ज़िन्दगी साझी संस्कृति, साझी विरासत की झंडाबरदारी और हिमायत करने वालों की भरमार है. फिर ऐसा क्यों है कि आदिवासी नायकों से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में हिन्दू-मुसलिम लोगों की संख्या ज्यादा नहीं होती, मुस्लिम नायकों से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में हिन्दुओं की संख्या ज्यादा नहीं होती और हिन्दू नायकों से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में मुस्लिमों की? कई लोग यह तर्क दे सकते हैं और देते भी हैं कि ऐसा इसलिए कि लोगों को अपनी कौम के नायकों पर गर्व होना स्वाभाविक है, इसलिए जो नायक जिस कौम से सम्बंधित था उसके लोग ज्यादा शेयर करते हैं. ठीक है, एक स्तर पर यह तर्क स्वीकार्य भी है. लेकिन क्या वाक़ई बात सिर्फ़ इतनी ही है? इसे यूँ भी देखा और सोचा जाना चाहिये कि स्वतंत्रता-संग्राम के शहीद साझे गर्व के अधिकारी हैं और फिर उनसे सम्बंधित किसी पोस्ट को शेयर करने वाले कई लोगों के लिए भी वे पूरे मुल्क का गर्व नहीं रह जाते, वे केवल क्रन्तिकारी नहीं रह जाते बल्कि यूपी का गर्व हो जाते हैं, बिहार का गौरव हो जाते हैं, हिन्दू योद्धा हो जाते हैं, मुसलिम जांबाज़ हो जाते हैं, मराठा शान हो जाते हैं, राजपूत वीर हो जाते हैं. एक क्रन्तिकारी कई खेमों में बंट जाता है.

बहरहाल बात हो रही थी कि एक मज़हब से ताल्लुक रखते क्रन्तिकारी से सम्बंधित पोस्ट को शेयर करने वालों में दूसरे मज़हब के लोगों की संख्या कम क्यों? दरअसल बीते कई सालों में अपने मज़हब व कौम से प्रेम जिस तेज़ी से बढ़ा और मुखर हुआ है उसी के अनुपात में एक और चीज़ ने लोगों के ज़ेहन में अपनी जगह बनाई है और वह है दूसरे मज़हब व कौम से एक अदृश्य-सी दूरी, उसके प्रति एक अस्पष्ट-सा विरोध. ऐसा करने के लिए सांप्रदायिक ताक़तों ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया है. इसमें सांप्रदायिक ताक़तों की अच्छी-ख़ासी भूमिका है, इस बात को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.

सांप्रदायिक ताक़तें दूसरे मज़हब के प्रति सबके दिलों में नफ़रत भरने में कामयाब भले ही न रही हों पर बड़े सुनियोजित ढंग से एक बड़े हिस्से के दिलों में उन्होंने एक ऐसी दूरी पैदा कर दी है जो ऊपरी तौर पर भले न दिखे लेकिन अंदर कहीं मौजूद है. ये ताक़तें अपने मज़हब और कौम के प्रति व्यक्ति को विरासत में हासिल सामीप्य व आत्मीयता वाले सॉफ्ट कॉर्नर (जिसे आप प्रेम भी कह सकते हैं) को भुनाती रही हैं और एक हथियार की तरह इस्तेमाल करती रही हैं. इन भावनाओं को गर्व और श्रेष्ठता के साथ जोड़कर कुछ इस ढंग से प्रोत्साहित किया जाता है कि व्यक्ति हर चीज़ को अनजाने में ही अपने और पराये मज़हब के चश्मे से देखने लग जाता है और उसी के हिसाब से चीजों, घटनाओं से ख़ुद को जोड़ने लगता है. नतीजा यह होता है कि कई लोगों को पता भी नहीं चलता कि ऐसा क्यों हो रहा है पर वे अनायास ही एक चीज़ को ज़्यादा पसंद और दूसरी को कम पसंद या नापसंद करने लग जाते हैं. उनके पास इस बात का कई बार जवाब नहीं होता कि वे क्यों किसी चीज़ की अनदेखी कर रहे हैं या क्यों उसे नकार रहे हैं. कई ऐसे लोग भी इसका शिकार हुए हैं जो चेतन अवस्था में सभी समुदायों की एकता चाहते हैं. सोशल मीडिया पर खूब देखा गया है कि भाईचारे, देश की साझी विरासत की बात करने वाले लोग भी अपनी कौम के नायक को शेयर करेंगे, दूसरी कौम के नायक को लाइक मारकर निकल लेंगे. क्यों भई! आप तो साझी विरासत पर गर्व करते हैं फिर ऐसा भेदभाव क्यों? ज़ाहिर है कि वे जान-बूझकर ऐसा नहीं कर रहे हैं, बस एक लम्हे के किसी हिस्से में उनके भीतर कहीं छुपी बैठी यह दूरी निर्णय लेती है और वे ऐसा कर देते हैं. यह एक तरह से पहला चरण है.

अगले चरण में जब यह दूरी व गर्व और भुना लिया जाता है तो लोग अपनी, अपने मज़हब की आलोचना न सुनने व दूसरे की खामियों को प्रचारित कर अपने अहं को तुष्टि पहुँचाने के स्तर तक पहुँच जाते हैं. यह कई बार सोशल मीडिया पर प्राप्त समर्थन में बहुत साफ़ दिखाई देता है. आपने ऐसी कई पोस्ट देखी होंगी जो किसी धर्म की खामियों को उधेड़ती हैं. कभी ऐसी पंद्रह-बीस पोस्ट को समर्थन में मिले लाइक्स, कमेंट्स और शेयर्स को गौर से देखिएगा. आप पाएंगे कि ज़्यादातर मामलों में अगर हिन्दू धर्म के बखिये उधेड़े गए हैं तो मुस्लिम समर्थन का प्रतिशत ज्यादा होगा, ज़्यादातर हिन्दू बुरा-भला कह रहे होंगे. अगर मुस्लिम धर्म के बखिये उधेड़े गए हैं तो हिन्दू समर्थन का प्रतिशत ज्यादा होगा, ज़्यादातर मुसलमान बुरा-भला कह रहे होंगे. कुछ लोग ढंके-छुपे ढंग से बच-बचाकर समर्थन या विरोध करते नज़र आयेंगे. इन दिनों आदिवासी दर्शन और हिन्दू धर्म को लेकर जो बहस सोशल मीडिया पर है उसमें भी समर्थन और विरोध का ऐसा ही अनुपात है. अगले चरणों में यह स्थिति जात/वर्ग/ समुदाय को पार कर सिर्फ़ और सिर्फ़ धर्म के गौरव व अपमान के स्तर पर पहुँचती है और नतीजा वह होता है जो बीते दिनों में मुज़फ्फ़र नगर, सहारनपुर और त्रिलोकपुरी में दिखाई दिया.

सोशल मीडिया को कभी बारीकी से देखें तो आप पाएंगे कि इस तरह की घटनाओं की भरमार है. ये घटनाएं साफ़ इशारा हैं कि सांप्रदायिक ताक़तें लोगों के दिमाग को किस हद तक अपने कब्ज़े में ले रही हैं. वे कह भले ही रही हैं लेकिन लोगों को अपने मज़हब से, अपनी कौम से प्रेम करना नहीं सिखा रहीं बल्कि दूसरे मजहबों, दूसरी कौम के प्रति नफ़रत और असहिष्णुता के बीज उनके भीतर बो रही हैं. लोग मानें या न मानें पर वे इसके शिकार हो रहे हैं. लोगों को पता भी नहीं चलता और चुपके से कोई पूर्वाग्रह उनके भीतर बिठा दिया जाता है. नतीजतन एक-दूसरे से दूरी बढ़ रही है और यही तो साम्प्रदायिक ताक़तें चाहती हैं. इसके बिना उनकी वह इमारत खड़ी नहीं हो सकती, जिसमे ज़ात, पंथ, वर्ण, क्षेत्र और शुद्ध-अशुद्ध के तमाम तरह के कमरे मौजूद होते हैं, जिनकी रौशनी में मुल्क के लिए मर-मिटने वाला एक क्रांतिकारी भी मुल्क का गौरव होने के बजाय किसी एक मज़हब या कौम के लिए गौरव हो जाता है, और दूसरी कौम उसे अनदेखा करके गुज़रने लगती है.

फ़िक्र करने वाली बात यह है कि लोगों की भावनाओं को भुनाकर उनको हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का अब कोई एक तरीका या रास्ता नहीं है, कई हैं. भगत सिंह की पगड़ी का भगवा हो जाना, बिरसा मुंडा की जन्मस्थली पर ‘भगवान बिरसा मुंडा’ लिखा जाना, मसला सामाजिक या राजनीतिक ही क्यों न हो उसे इस्लाम से जोड़ दिया जाना, ‘इस्लाम के मुताबिक’ कहकर ज़ारी किये जा रहे कई अजीबोग़रीब फतवे और हर हिन्दू के घर में तुलसी का पौधा लगाने जैसे अभियान, सब ऐसे ही रास्तों पर बढ़े हुए कदम हैं. फिर अब, जबकि लोगों को अपने इतिहास से ही काट देने की क़वायद भी तेज़ हो चुकी है और एक अलग ही इतिहास सामने रखे जाने की आशंकाएं मंडराने लगी हैं तब साझी संस्कृति – साझी विरासत के ईमानदार पक्षधरों की ये एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी बन जाती है कि हर उस रास्ते पर नज़र रखी जाये जहाँ से सांप्रदायिक ताक़तें लोगों के ज़ेहन तक पहुँच सकती हैं.

रविवार, 20 जुलाई 2014

अक्षर-अक्षर ढलती रात


काग़ज़ स्याही कलम दवात
अक्षर-अक्षर ढलती रात

बादल ख़्वाब सितारे चाँद
गहरी बुझती जलती रात

ढोंगी लम्पट कुंठित लोग
बस्ती में इनकी इफ़रात

गली-मोहल्ला मुल्क़-जहान
खींचा-तानी झगड़े घात

गोली भाले ख़ंजर आग
फिरते पूछें सबकी जात

मज़हब दौलत सत्ता नाक
हत्या शोषण धोखा लात

सैनिक जनता जंग फ़साद
राजा जीते, अपनी मात

नदिया जंगल खेत कछार
सब के सब पे उसकी घात

मरहम नश्तर ज़हर सबात
जाने क्या हो उसकी बात.

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

बंद दरवाज़ों के पार स्त्री


यह सब कुछ हो रहा है अभी में
वे जो कहते हैं अब नहीं है ऐसा
उन्हें चाहिए
पड़ताल करें अपने 'अब' की
झाँकें अभी की झिर्रियों से
अभी भी बंद दरवाज़ों के पार

अभी-अभी ख़त्म हुआ है
अधिकारों पर भाषण
अभी-अभी कहा गया है
लड़ो अपनी स्वतंत्रता के लिए
अभी-अभी निकली है
कई संगठनों की रैली
अभी-अभी गूँजे हैं
नारे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के

क्योंकि उसे इजाज़त नहीं है
अपने आँगन में भी खड़े होने की
इनमें से कुछ भी
नहीं पहुँचा उसके कानों तक

क्योंकि उसे इजाज़त नहीं है
एक निश्चित आवृति से ऊपर
कर सके अपनी आवाज़
नहीं पहुँचा किसी के कानों तक
उसके कंठ से निकला मूक क्रंदन

यह कहते हुए कि बस एक बार
लेने दो मुझे अपनी मर्ज़ी से साँस
बस एक बार
करने दो मुझे अपने मन का
एक चारदीवारी के भीतर
बंद दरवाज़ों के पीछे पस्त पड़ी स्त्री ने
घोंट दिया है अपना गला अभी-अभी.

सोमवार, 19 मई 2014

अच्छे दिन आने वाले हैं



बीत गए थे जो फिर से क़िस्से दुहराने वाले हैं
शोर बड़ा घनघोर है ये अच्छे दिन आने वाले हैं

अभी समझ की देहरी तक जो पहुँचे हैं मुश्किल से
उन नादानों के फिर से सपने भरमाने वाले हैं

देख-भाल के सोच-समझ के खाद-पानी ये डाला है
नागफनी के पौधों से आलम हरियाने वाले हैं

फूल दिखा कर सुंदरता का भरम बनाये रखा है
मिलते ही मौक़ा मुँह  कीचड़ मल जाने वाले हैं

सुबह-ओ-शाम रात-दोपहर हमने जिसको बीना है
उस चादर पर तेल छिड़क लपटें उठवाने वाले हैं

औरत देवी घर की ज़ीनत मैला धोना पुण्य का काम
मनु-सूत्र को वो फिर से जड़ में रखवाने वाले हैं

क्या होगा, कैसे होगा, ये मत पूछो बिलकुल भी
सारे मिलकर भजन करो अच्छे दिन आने वाले हैं.

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

अपने लौंडे की भी हवा चलेगी

लल्लन मियाँ बोले - 'अमां यार, हम सोच रहे हैं कि अपने लौंडे को अगले सरपंची के चुनाव में खड़ा कर दें.'

मैंने पूछा कि क्यों तो बोले - 'कल ताश का महल बना रहा था. टेबल हिल रही थी सो कमबख्त ने बगल की अलमारी में रखी गुटका रामायण टेबल के टूटे पाए के नीचे सरका दी. टेबल पर रखी अपनी इतिहास की किताब एक कोने में फेंकी और जब हमने आपत्ति की तो बोला क्या फिजूल बातें करते हैं, अरे मैं भविष्य बना रहा हूँ. दुक्की-तिक्की टाइप निचले पत्तों से उसने निचली मंजिल बनाई और महल के सबसे ऊपर रखा बादशाह. हमने वजह पूछी तो बोला कि बताइए भला बादशाह ही अगर निचली मंजिल में लग जायेगा तो राज कौन करेगा? ये दुक्की जो तिक्की से पिट जाती है या ये नहला जिस पर दहला भारी पड़ता है? और सब किसके लिए पिटते-पिटाते हैं, बादशाह के लिए ही न! बादशाह सब को पीटता है और सब चुपचाप पिट जाते हैं, इसलिए बादशाह सबसे ऊपर. और जब महल बनकर तैयार हुआ तो  उसने ऐसा हल्ला मचाया कि घर सिर पर उठा लिया.'

'खैर... जब हमने कहा कि मियाँ बादशाह भी इक्के से पिट जाता है और देखो तो तुमने इस महल को बनाने के चक्कर में क्या किया, धर्म को टेका बना दिया, इतिहास की किताब के साथ-साथ शिक्षा को कोने में फेंक दिया तो वो बिदक गया. बोला - आप मेरी सफलता से जलते हैं, आपको बर्दाश्त नहीं हो रहा कि मैंने एक महल बना लिया है.'

'अब तुम खुद ही सोचो भाई मियाँ कि जो लड़का अभी से धर्म को बुनियाद में इस्तेमाल करता हो, सामाजिक ताने-बाने को जानता हो, हुक्मरान की हैसियत जानता हो, कुछ काम करने पर हल्ला मचाना जानता हो और आलोचना होने पर अपने बाप को भी कह दे कि वो उससे जलता है, उसके लिए राजनीति से अच्छा और कौन-सा रोज़गार होगा.' 

'हमें तो यकीन है भाई मियाँ कि एक दिन अपने लौंडे की भी हवा चलेगी.'

शनिवार, 9 नवंबर 2013

जोगी वही जो कपड़ा रंगाए


सुबह-सुबह मोबाइल फोन की घंटी बजी तो आदत के मुताबिक नींद में ही हरा बटन दबाया और कान पर लगा लिया। सुनाई दिया- ‘मन न रंगाए जोगी कपड़ा रंगाए....’। हरिओम शरण की आवाज़ में कबीर की यही एक लाइन बार-बार सुनाई दे रही थी, लगा कि टेप एक जगह अटक गया है शायद, लेकिन पीछे से गूँजी दूसरी खुरदरी आवाज़ ने भ्रम तोड़ दिया। पूछा गया- ‘बोलो, क्या समझे? सप्रसंग व्याख्या करो।’
       बिना किसी भूमिका के ऐसे सीधे सवाल दाग देने की हिम्मत और वह भी अलसुबह भला और किसकी हो सकती थी सिवाय लल्लन मियाँ के। फिर भी नींद की ख़ुमारी अब तक उतरी न थी सो मैंने पूछा- ‘कौन? लल्लन मियाँ!’ जवाब मिला- ‘नहीं भाई मियाँ, मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूँ और सीधा सवा अरब का सवाल पूछ रहा हूँ।’ मैंने याद दिलाते हुए कहा कि अमिताभ करोड़पति-करोड़पति खिलाते हैं अरबपति-अरबपति नहीं, तो जवाब आया- ‘वो तो रुपयों की बात है जो जीतने के बाद मिलते हैं, अपन तो खिलाड़ी को देखने वालों की बात कर रहे हैं। तुम तो ये बताओ कि क्या समझे?’
       ‘समझना क्या है, कबीर उन लोगों को गरिया रहे हैं जो धार्मिक होने का दिखावा करते हैं, आडंबर रचते हैं और.....।’ इससे पहले कि मैं अपनी बात पूरी करता लल्लन मियाँ बोल पड़े- ‘अमाँ क्या तोते की तरह स्कूल में रटी व्याख्या दोहरा रहे हो, कुछ नई व्याख्या करो, आधुनिक टाइप।’ कुछ क्षण सोचकर मैंने कहा- ‘मतलब है कि आपका ‘माइंडसैट’ तो पुराना वाला ही है ‘बट’ आप दिखाते हैं कि आप ‘चेंज्ड पर्सन’ हैं।’ इतना सुनते ही लल्लन मियाँ का रिकॉर्ड चालू हो गया। बोले- ‘हद्द है यार तुम्हारी भी! हिन्दी मीडियम स्कूल में पढ़कर ताजा-ताजा कॉलेज पहुँचे लौंडे की तरह आधुनिक हो रहे हो, बात में दो-चार अंग्रेजी के शब्द घुसेड़ कर अंग्रेज हुए जा रहे हो। अमाँ ये कोई आधुनिक व्याख्या नहीं है। अगर तुम कबीर की आधुनिक व्याख्या कर पाते, उस पर अमल कर पाते तो यूँ चप्पलें चटकाते, कलम घसीटते न फिर रहे होते, भावी प्रधानमंत्री या इसरो प्रमुख होते। रहने दो तुमसे न हो पाएगा।’
       जब लल्लन मियाँ चप्पल चटकाने वाली हालत का हवाला देकर मुझे अयोग्य साबित कर ही चुके, तो मेरा पलटकर उन्हीं से सही व्याख्या पूछना तो बनता था। वे तो जैसे तैयार ही बैठे थे, छूटते ही बोले- ‘देखो भाई, ये जो व्याख्या है न कि कबीर उन जोगियों को गरिया रहे हैं जो कपड़ा रंगा लेते हैं पर मन से सांसारिक ही रहते हैं, यह एकदम ग़लत है। इसका असल मतलब अब खुलकर सामने आया है और वह यह है कि असली जोगी वही है जो कपड़ा जरूर रंगा ले लेकिन मन न रंगने दे।’
       मैंने कहा कि यह तो भावार्थ हुआ, तो लल्लन मियाँ ने खुलासा किया- ‘देखो मियाँ! पुराने टाइम का जो जोगी होता था वो होता था ऐसा आदमी जिसके बारे में दिखता था कि ईश्वर से लौ लग गई है। मन का किसे पता कि भीतर क्या चल रहा है, लोग तो बाहरी चोला देखकर ही उसे जोगी कहते थे न। आवभगत भी खूब करते थे। कुल मिलाकर बात यही हुई न कि बेटा आवभगत करानी है तो मन रंगे या न रंगे, कपड़े का रंगना जरूरी है। अब आधुनिक टाइम के जोगी जो हैं वे कई फील्ड्स में हैं अलग-अलग रंग के चोलों में। जैसे वाल्मीकि की कथा से प्रेरणा लेकर कई चोर-लुटेरे जोगी-बाबा हो गए हैं। सालों से एक दल सेक्युलर धारा का चोला ओढ़ मौज काट रहा है। 84 के दंगे टाइप चीजें उसके मन के भीतर की चीजें हैं, बाहर से वह सेक्युलर जोगी है। जैसे जोगी हर चर्चा का मुँह ईश्वर की ओर मोड़ आदमी को भक्ति की दुनिया में पहुँचा देता है, वैसे ही अपने भगवा ब्रिगेड के भावी प्रधानमंत्री हर मुद्दे का मुँह भावनाओं की ओर मोड़ लोगों को देशभक्ति की दुनिया में पहुँचा देते हैं। आजकल पटेल से जुड़ी भावनाओं से खेल रहे हैं। चैनल-वैनल सब पटेल-कांग्रेस-आरएसएस के संबंध खंगालने में जुटे पड़े हैं। बताओ किसी ने पूछा कि भैया पटेल की मूर्ति बन जाने से आत्महत्या कर रहे उन किसानों का क्या भला होगा, जिनसे तुम लोहा मांग रहे हो? किसानों और देश का भला हो या न हो, देशभक्ति धारा के जोगी होने से इनकी मौज है। समाजवादी जोगियों की क्या मौज है ये तुम उत्तर प्रदेश में देख ही रहे हो।’
       थोड़ा रुक कर लल्लन मियाँ फिर बोले- ‘वैसे तुम्हारी ‘माइंडसैट’ वाली बात भी थोड़ी ठीक ही थी, पूछो कैसे?’ मैंने कहा- ‘आप ही बताइए।’ वे बोले- ‘ताजा उदाहरण तुम्हारी व्याख्या के करीब है। इसरो प्रमुख के. राधाकृष्णन ने कपड़े तो विज्ञान के रंग में रंग लिए पर मन तिरमाला तिरपति देवस्थानम के रंग में रंगा रहा। चलो अब फोन रखते हैं, बोलो ऊँ विज्ञान देवाय नमः।’ 
       इससे पहले कि वह फोन रखते मैंने पूछा लिया कि आपकी सवा अरब का सवाल वाली बात कहाँ फिट बैठती है। वह बोले- ‘तुम यार निरे मूरख ही रहे। अरे देखते नहीं हो देश की सवा अरब जनता अपने हाथ की रेखाओं से लेकर देश का भविष्य तक बांचने की उम्मीद लिए कैसे इन तरह-तरह के जोगियों का मुँह ताकती रहती है।’

बुधवार, 6 नवंबर 2013

असहमति का सम्मान और मेरी तेरी उसकी बात


ठीक-ठीक याद नहीं पर शायद दसवीं या ग्यारहवीं में पढ़ता था, जब बड़े भाइयों और उनकी इप्टा, प्रलेसं वाली मित्र मंडली की सोहबत का असर मुझ पर होने लगा था और स्कूल के कोर्स में शामिल कहानियों से इतर भी हिन्दी साहित्य पढ़ने की ठीक-ठाक आदत विकसित हो चुकी थी। प्रेमचंद के 'गबन' और 'गोदान' सरीखे उपन्यास पढ़ चुका था। यही वक्त था जब पहली बार राजेन्द्र यादव का नाम जाना, उनके उपन्यास ‘सारा आकाश’ से। अब भी याद है कि बीच में एक-दो बार ही उठा था, वरना एक ही बैठक में पूरा पढ़ डाला था ‘सारा आकाश’। फिर अरसे तक इसके पात्र दिमाग में बने रहे, आज भी हैं। बहू के घड़ी पहनकर रसोई में जाने पर तंज़, ननद का दाल में मुट्ठीभर नमक झोंक देना, पत्नी के लिए साड़ी लाने पर मां का तंज़ जैसी कितनी छोटी-छोटी चीजों की कहानियां हैं इसमें। उस भाषा में, जिसे समझने के लिए हिन्दी के भारी-भरकम शब्दकोशीय ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। इतने सालों बाद भी यह उपन्यास कहानियों के कोलाज की शक्ल में ज़ेहन की दीवारों पर टंगा हुआ है।

उपन्यास के माध्यम से यह राजेन्द्र जी से पहला परिचय था. उनसे कभी मिलना नहीं हुआ, पर एक अरसे तक हर महीने उनकी बात सुनी जाती थी। सालों तक ‘हंस’ कहानियों के लिए कम उनके लिखे संपादकीय के लिए ज्यादा ख़रीदी गई और ये संपादकीय यानी ‘मेरी तेरी उसकी बात’ इस बात को और पुख्ता करते गए कि राजेन्द्र यादव छोटी-छोटी चीजों को देखने का नाम है। यह अपने शीर्षक के अनुरूप ही लगता था। भारी-भरकम शब्द विन्यास के बिना सीधे-सीधे छोटी लेकिन ज़रूरी चीजों पर खरी बात करता हुआ। अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकीयों से अलग, बातचीत करता हुआ, असहमतियों का प्रत्युत्तर देता हुआ और इस आग्रह के साथ अपने तर्क रखता हुआ कि असहमत हैं तो आइए चर्चा करें। बीच के कुछ अंतराल के बाद जब दो-ढाई साल पहले फिर से हंस खरीदना शुरू किया तो लगा कि संपादकीय की धार पहले जितनी तीखी नहीं रही, ‘मेरी बात’ शायद ज्यादा प्रधान हो गई है लेकिन ‘तेरी’ और ‘उसकी’ बात अभी भी जारी है।

हिन्दी के पाठकों की गिरती संख्या और साहित्य की दुर्दशा के बारे में उछलते जुमलों पर अपने एक संपादकीय में वह लिखते हैं- ‘हिंदी में पाठकों की कमी का रोना लगभग हर लेखक और प्रकाशक रोता है। मगर इस बात पर चिंता कभी-कभी ही की जाती है कि हमारे यहां बैठकी की वह परंपरा लुप्त हो गई है जहां से साहित्य ही नहीं दुनिया-भर की दूसरी बौद्धिक बहसें जन्म लेती हैं, आन्दोलन शुरू होते हैं। किसी भी साहित्यिक, राजनैतिक या सांस्कृतिक गतिविधि के लिए बैठकबाजी एक अनिवार्य तत्व है। इन दिनों दिल्ली में ऐसी जगह तलाश करना मुष्किल है जहां कुछ लोग दो-चार घंटे बैठकर अपनी बेचैनी और जेब के हिसाब से बकवास कर सकें।’ बैठकबाजी की इस अनिवार्यता के अलावा वह लेखकों के भीतर मौजूद कमी का भी ज़िक्र करते हैं- ‘किसी भी स्थिति को लंबे समय तक अपने भीतर पचाने और रचाने की क्षमता चूंकि लेखकों में कम हुई है इसीलिए लघुकथाओं की बाढ़ है। ये लघुकथाएं बेहद फॉर्मूलाबद्ध ढर्रे पर लिखी जाती हैं। राजनैतिक भ्रष्टाचार, अमीरों द्वारा ग़रीबों का शोषण या ऐसी ही दो-चार सामान्य घटनाएं।’ यहां यह आपत्ति तो दर्ज की जा सकती है कि भ्रष्टाचार और शोषण बड़ी और जवलंत समस्याएं हैं इसलिए इन्हें सामान्य तो नहीं कहा जा सकता लेकिन राजेन्द्र जी के ‘फॉर्मूलाबद्ध ढर्रे’ के आशय से असहमत भी नहीं हुआ जा सकता।

इन दिनों जब हिन्दी के बरअक्स अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य की मौजूदगी और उसे महत्वपूर्ण स्थान दिए जाने की चर्चाएं और अधिक गंभीर होती जा रही हैं, तब पांचवे जयपुर साहित्य समारोह पर लिखे गए राजेन्द्र जी के संपादकीय के अंश याद आते हैं, जहां वह भाषा को अपना हथियार बनाने की साम्राज्यवाद की मंशा और मानसिक औपनिवेशिकता की परतों को देखते हैं। वह लिखते हैं- ‘भारतीय भाषाएं ही नहीं, क्यों इसमें चीन, जापान, रूस या ऐसे ही दूसरे देश सिरे से गायब हैं? पश्चिमी, विशेषकर योरुप, अमेरिका के नोबेल-बुकर से सुसज्जित देशों के अलावा दूसरे कोई नाम चूंकि सुनाई नहीं देते इसलिए उनका यहां नामलेवा भी नहीं है।...... जब से योरुपीय और अमेरिकन पुरस्कार और फैलोशिप तीसरी दुनिया के युवा लेखकों को दिए जाने लगे हैं और जिस तरह मीडिया उन्हें उछाल रहा है, तब से अंग्रेजी में लिखने वाला हर नया लेखक महान बनने के लिए बेचैन हो उठा है।...... सेकेंड और थर्डरेट रचनाओं की जिस तरह अंग्रेजी के अखबारों में पूरे पन्नों पर समीक्षाएं आती हैं वह किसी के भी मन में ईर्ष्या जगाने को काफ़ी है।’ साहित्य, साहित्यिक चर्चाओं और सत्ता से आम-जन की दूरी पर उन्होंने अपनी चिंता लगातार व्यक्त की। इसी संपादकीय में सत्ता के चरित्र का ज़िक्र करते हुए वह लिखते हैं- ‘दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर गणतंत्र दिवस का भव्य आयोजन और जयपुर साहित्य समारोह लगभग एक साथ ही मनाए जा रहे हैं; जिस जनता के प्रतिनिधित्व की कसमें ये खाते हैं, वह सामान्य-जन दोनों ही जगह ताली बजाऊ दर्शक है। पता नहीं क्यों, सत्ता के चरित्र पर सोचते हुए मुझे जयपुर समारोह का ही ध्यान हो आया। क्या इसे सत्ता का सांस्कृतिक विस्तार कहना बहुत दूर की कौड़ी लाना है?’

राजेन्द्र यादव को जितना श्रेय इस बात के लिए दिया जाता है कि उन्होंने कई अच्छे रचनाकारों को सामने लाने का काम किया, उतना ही श्रेय इस बात का भी दिया ही जाना चाहिए कि उन्होंने असहमत होने के अधिकार का पूरी ईमानदारी से सम्मान किया। जितनी बेबाकी से आप अपनी असहमति हंस में व्यक्त कर सकते हैं, बिना किसी संकोच के, और वह शामिल भी की जाती है तो इसके पीछे वजह राजेन्द्र यादव जैसे संपादक का होना है। असहमति के संवाद को किसी पत्रिका में बनाए रखना इस व्यावसायिक दौर में कम जोखिम भरा नहीं है, जबकि पत्रिका की सामग्री की तारीफ करते पत्र शामिल करना अधिकांश संपादक मुफीद मानते हों। ‘अपना मोर्चा’ पूरी तरह पाठकों का मोर्चा ही रहा, जहां वे खुलकर तारीफ भी कर सकते हैं और गलतियां बताते हुए आलोचना भी कर सकते हैं। उन्होंने अपने संपादकीयों में विभिन्न विषयों पर खुलकर अपनी असहमति भी व्यक्त की, फिर चाहे वह सत्ता पक्ष से असहमति हो या किसी विचार से असहमत लोगों से असहमति। वैचारिक-राजनैतिक चेतना और युवा वर्ग की इसके प्रति जागरूकता पर सहमति, असहमति और एक विचारधारा से असहमत लोगों से सवाल करते हुए वह लिखते हैं- ‘जब हमारे पास विचारधारा थी तो वह समाज के हर वर्ग में राजनैतिक जागरूकता और अपने दायित्व को बार-बार रेखांकित करती थी। चारों ओर से निराशा और हताश परिवेष में राजनीतिक चेतना संपन्न युवा हजारों की संख्या में आज भी नक्सल आंदोलनों में शामिल हो रहे हैं। इनमें दलितों, आदिवासियों और सर्वहाराओं को संघर्षों से जोड़ने का एक जनून है जिसे सरकार सिर्फ कानून और व्यवस्था से अधिक कुछ भी मानने को तैयार नहीं है।......... वे किनके खिलाफ और क्यों लड़ रहे हैं, यह सवाल अक्सर ही सरकारी तबकों में नहीं पूछा जाता।............. बैंगन की तरह मार्क्सवाद नाम से ही चिढ़ने वाले हमारे अशोक वाजपेयी और ओम थानवी जैसे लोग उन लागों लाख संघर्षशील युवाओं के उभार को क्या नाम देना चाहेंगे? दुनिया में जहां भी शोषक और शोषित के बीच असमानताओं की लड़ाई है, उसे बिना मार्क्सवाद के कैसे समझा जा सकता है, अगर अशोक जी इस पर भी प्रकाश डालते तो हम जैसे मूढ़मतों को कोई दिशा दिखाई देती।’

यह दुःखद है कि मरणोपरांत आखिर लोगों ने अपनी मनमानी कर ही ली। धार्मिक रीतियों से उनके विचारों को फूंकने की कोशिश की गई लेकिन विचार शरीर के साथ ख़त्म नहीं हो जाते। राजेन्द्र यादव के विचार भी नहीं ख़त्म नहीं होंगे। वे जब तक जीये धार्मिक कर्मकांडों और साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ लिखते रहे। धर्म के नाम पर सरकार की चुप्पी और जनमानस की धार्मिक आस्था पर भी उन्होंने प्रहार किए। अपने एक संपादकीय में उन्होंने लिखा है- ‘सरकार चाहे जितनी लोकतांत्रिक हो, मगर उसे यह अधिकार नहीं है कि किसी के धर्म में हस्तक्षेप करे - धार्मिक स्वतंत्रता के इस सिद्धांत के तहत धोखेबाजी और हत्या-बलात्कार के इन अड्डों को खुलेआम पनपने दिया जा रहा है। अनधिकृत रूप से किसी भी ज़मीन पर कब्जा करके मंदिर या मठ बनाने की बातें तो आम हो गई हैं और धार्मिक भावनाओं को चोट न पहुंचे, इसलिए सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है।........... हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं आस्थाओं और भावनाओं का आधार लेकर हमारे यहां लाखों औरतों को सती कर दिया गया या मासूमों के सिर काट कर देवी-देवताओं पर चढ़ा दिए गए।’

अपने अंतिम समय तक विवाद में घिरे रहे राजेन्द्र यादव की व्यक्तिगत और कार्यक्षेत्र की गतिविधियों पर लोगों की अपनी-अपनी राय है। कुछ उनसे सहमत हैं कुछ असहमत, लेकिन शायद यही राजेन्द्र यादव होने की शर्त भी थी। तमाम असहमतियों को स्वीकारने और पुरजोर ढंग से अपनी बात रखने की शर्त। व्यक्तिगत जीवन में वह क्या थे, क्या नहीं थे यह अलग बात है लेकिन एक लेखक-संपादक के रूप में असहमति को सम्मान देने वाले शख्स तो निश्चित ही थे।

शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

ख़रामा ख़रामा गजब कर रहे हैं


ख़रामा ख़रामा गजब कर रहे हैं
फ़स्ल-ए-मोहब्बत हड़प कर रहे हैं
हमारी रगों में ज़हर भर रहे हैं

था उन्वान तो ख़ूबसूरत बड़ा
अंजाम पर मुँह के बल गिर पड़ा
किरदार बदलते गए, रंग भी
इक अफ़साने में हम सफ़र कर रहे हैं

अपनी ज़मीं क्यों गई उनकी जानिब
कोई बता दे कारण मुनासिब
अपने ही घर से बेगाने हुए हम
और दुःख बन के मोती उधर झर रहे हैं

मैं उनके फ़साने सुना तो कई दूँ
ज़ालिम के ज़ुल्मों की ला तो बही दूँ
मगर मेरे मुंसिफ़ की देखो अदा तो
कागज़ पे कागज़ महज़ धर रहे हैं

मैं क़तरा सही पर हूँ मौजों का ज़रिया
है अपना सफ़र जैसे इक बहता दरिया
कल-कल तुम इसकी मधुर ही न जानो
कि तूफ़ान इसमें कई भर रहे हैं। 

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

जानवरों का विरोध प्रदर्शन


अभी-अभी लल्लन मियाँ का फोन आया था। यूँ तो वे आसानी से होते नहीं हैं लेकिन बड़े परेशान थे। उनका परेशान होना ही गंभीर मसले का आभास देता है, सो इस बार तो वे बड़े परेशान थे। बोले- ‘भाई मियाँ गजब हो गया। मेरे मोहल्ले के सारे जानवर अचानक से विरोधी हो उठे हैं। गाय, भैंस, गधे, कुत्ते, मुर्गे-मुर्गियां, सुअर सब इतनी रात गए इकट्ठे होकर गलियों में रैली निकाल रहे हैं और नारे लगा रहे हैं।’
(कल्पतरु एक्सप्रेस में 16 जुलाई 2013 को प्रकाशित)

मैंने कहा कि ‘यूँ ही मौज में आए होंगे। अभी भी गर्मी अच्छी-खासी है तो रात की ठंडक का मजा लेने निकले होंगे और हँसी-ठिठोली कर रहे होंगे। दिन में तो आप लोग उन्हें घूमने नहीं देते, कभी लट्ठ मारते हो कभी लतिया देते हो तो कभी अपनी गाड़ी के नीचे कुचलकर भी शर्म नहीं करते। अब जब खुल्ली सड़कें मिली हैं तो वे भी अपना कोटा पूरा कर रहे होंगे।’ इस पर लल्लन मियाँ बोले- ‘अमाँ यार तुम बकवास न करो। हम क्या उनकी हँसी-ठिठोली समझते नहीं हैं। रात-दिन देखते हैं उन्हें। मियाँ मामला इतना सरल नहीं है, वे नारे ही लगा रहे हैं और कह रहे हैं कि इस इन्सानी जिन्स का कुछ इलाज करना पड़ेगा। अब वक़्त आ गया है कि हम अपने प्रति अन्याय का इससे हिसाब माँगें।’

जिज्ञासावश मैंने पूछा कि आपको कैसे पता कि वे क्या कह रहे हैं? क्या आप उनकी भाषा समझते हैं? तो लल्लन मियाँ बोले- ‘लो कल्लो बात! अरे जब इन्सान उनकी तरह चुनावों में एक-दूसरे पर भौंक सकते हैं, उल्टी पड़ जाने पर मिमिया सकते हैं, समर्थन में डेंचू-डेंचू बोल सकते हैं, दुलत्ती मारकर भी गाय की तरह भोलेपन से रँभा सकते हैं तो क्या वे हमारी भाषा नहीं सीख सकते, टूटी-फूटी ही सही। वे सुबह चौक पर इकट्ठे होकर इन्सानों से जवाब तलब करने की माँग कर रहे हैं और ऐसा न होने पर पूरे शहर में चक्का जाम करने की धमकी दे रहे हैं। मियाँ हमें तो समझ नहीं आ रहा कि क्या करें?’

मैंने उन्हें मशविरा दिया कि आप सुबह उनकी बात सुन ही आइए, एक दफा बातचीत कर लेने में हर्ज भी कोई नहीं है। लगे कि बात संभल नहीं रही तो आप भी चुनावी वक्तव्यों टाइप का कुछ इस्तेमाल कर लीजिएगा, उन्हें अपना भाई-बहिन कह दीजिएगा। कह दीजिएगा कि आप खुद में और उनमें कोई भेद नहीं समझते, जैसा कि हाल ही में एक नेताजी ने कहा है।

लल्लन मियाँ थोड़े आश्वस्त हुए। बोले- ‘ठीक है मियाँ। सुन लेते हैं कि आखिर ये सारे जानवर चाहते क्या हैं। लेकिन यार धुकधुकी तो फिर भी लगी है, पता नहीं वे किन सवालों के जवाब चाहते हैं? ख़ैर सुबह जाते हैं चौक पर और लौटकर बताते हैं क्या हुआ?’

लल्लन मियाँ तो फोन रखकर गायब हो गए लेकिन मेरा दिमाग उलझन में पड़ गया कि आख़िर माजरा क्या है? किस अन्याय से इन जानवरों की आत्मा आहत हो गई है? किसी की भावनाओं को सबसे जल्दी ठेस तो तब लगती है जब बाचतीत में उसके धर्म का ज़िक्र आ जाए, पर इन्सान तो हमेशा एक-दूसरे के धर्म का तिया-पाँचा करने में लगा रहा, इनके धर्म की तो कभी बात ही नहीं हुई? कभी इनकी माँ-बहनों को भी नहीं छेड़ा क्योंकि इन्सान को अभी तक अपनी ही प्रजाति का चीरहरण करने से फुरसत नहीं मिली। न जाने क्या मामला है?
पता नहीं क्या-क्या दिमाग में घूम रहा है। अब तो लल्लन मियाँ ही इन गुत्थियों को सुलझा सकते हैं जब वे चौक पर आयोजित जानवरों की सभा से लौटेंगे। 

शुक्रवार, 3 मई 2013

आवाज़


वह तक़रीबन 80 वर्ष का बुज़ुर्ग था जिसके बस एक पाँव में जूता था। कंधे पर एक छोटी-सी पोटली और तन पर ऐसे मैले कपड़े जिन्हें देखकर ही लग रहा था कि वह पाँच-छः दिन की धूल-धूप खा चुके हैं। वह किसी गाँव से शहर आया था शायद। कह रहा था- ‘भैया कछु कर दो। हमरे मुंडा तक भड़िया लए (जूते तक चोरी कर लिये)। एकई पईसा नईंएँ चाय-रोटी खों। भईया कछु कर दो।’
         आवाज़ में कुछ अजीब-सा था जो भीतर विचलन पैदा कर रहा था। दिल कह रहा था कि वाकई ज़रूरतमंद है, कुछ तो मदद कर ही देनी चाहिए। अरसे बाद उस शहर और बदले हुए हालात को देख रहा था। आसपास के लोगों का उस बुज़ुर्ग के प्रति उदासीन या हड़काने वाला रवैया मन को शंकित भी कर रहा था कि यह कहीं उसका कारोबार न हो।
         मन की शंका और दिल की संवेदनशीलता एक डोर को दो विपरीत धुरों से तान रहे थे। दो बार तो हाथ पर्स वाली जेब तक जाकर लौटा। आख़िरकार बाइक की किक पर पूरी झल्लाहट के साथ पैर पटका और सधा-सधाया जुमला, जो ऐसे मौकों पर अक्सर कहा जाता है, कह दिया - ‘छुट्टे नहीं हैं बाबा।’
         भर्राती हुई, घबराहट औैर बेचैनी से भरी, रोने को तत्पर वह आवाज़ जैसे बाइक पर मेरे पीछे सवार हो गई थी। पर्स की तरफ़ बढ़ते हाथ की तरह बाइक भी वापस मुड़ते-मुड़ते रह गई थी। हर बार शंका बलवती साबित हुई थी- ‘ अगर यह उसका धंधा हुआ तो?’
         ‘हुआ भी तो क्या! उसे कुछ पैसे देकर तेरी उलझन तो दूर होगी कि तूने कुछ क्यों नहीं किया।’ ख़ुद को दिया गया यह तर्क ठीक लगा। बाइक ठिठकी ही थी कि इस तर्क की काट भी सामने आ गई- ‘पर ऐसे तो रोज़ ही कोई न कोई मिलता है।’
         भीतर यह विचार और बाहर बाइक दोनों लगातार चल रहे थे। घर आ गया था। कई गलियों से घूम कर, कई मोड़ों को काट कर आया था। शोर भरे बाज़ारों से होकर आया था। वह कहीं नहीं गिरी। रोने को तत्पर वह आवाज़ रोने लगी थी। अब वह बाइक से उतर कर मेरे कंधों पर सवार थी।

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

वेलेंटाइन जी: इंडियन मटीरियल का सुख


प्रेम पर्व समाप्त होने में बस एक दिन और बाकी है और इस पर्व को मनाने वाले अपनी सुरक्षा के इंतजाम के साथ हैं। ठीक वैसे ही जैसे दीवाली पर पटाखे छोड़ते वक्त कुछ लोग पानी की बाल्टी साथ रख लेते हैं। कल एक युवक मिला। यूं तो वह हाथ अगरबत्ती पांव मोमबत्ती था, लेकिन कल अचानक से मोटा हो उठा था। उसने मोटे-मोटे कपड़ों की दो-तीन तहें अपने शरीर पर जमा रखी थीं। हाथ में लाल गुलाब, चॉकलेट का डिब्बा और दो-तीन और गिफ्ट आइटम।
       चूंकि सर्दी का मौसम है तो मैंने पूछ लिया, ‘क्यों भाई सर्दी कुछ ज्यादा ही लग रही है क्या?’, वह बोला, ‘नहीं जी, यह तो सब सुरक्षात्मक इंतजाम है, अपनी भावी पत्नी के साथ प्रेम पर्व के अवसर पर घूमने का इरादा है।’
       बात कुछ अटपटी लगी, मैंने पूछा, ‘भैया क्या तुम्हारी भावी पत्नी जूडो-कराटे में ब्लैक-बेल्ट है, जिसके गुस्से से बचने का यह उपाय खोजा है?’ वह बोला, ‘अरे नहीं भैया, मेरी भावी पत्नी तो बिल्कुल गौ है, जहां गुस्सा दिखाना चाहिए वहां भी रो पड़ती है। यह उपाय तो डंडों से बचने के लिए किया है।’ जब पूछा कि किसके डंडे? तो बोला, ‘अब धर्मरक्षक, संस्कृति रक्षक, शिवभक्त, रामभक्त, हनुमानभक्त या पुलिस, कब, कौन डंडा बरसा दे, कह नहीं सकते न।’
       मैंने तर्क फेंका, ‘भैया, तुम्हारा जल्द ही ब्याह होने जा रहा है, वह भी घर वालों की सहमति से, तो अपनी भावी पत्नी से तुम्हारे मिलने में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?’ उसने इतने सपाटे से जवाब दिया कि मैं तो हैरान रह गया। बोला, ‘अपने तर्क अपने पास रखो महाराज, लगता है तुम कभी इस पर्व के दौरान घर से बाहर नहीं निकले। भैया अपने देश का रिवाज है, पिटाई पहले होती है, सही-गलत बाद में तय किया जाता है। पिछली बार तो कई जगह इस पर्व के दौरान भाई-बहन तक पिट गए। ठीक है कि बाद में पीटने वालों की थू-थू हुई, लेकिन बेचारे भाई की पीठ और बहन का चेहरा तो लाल हो ही गया न। तो भैया हम तो फिर भी प्रेम करने जा रहे हैं।’
       मैंने कहा, ‘जब इतना ही डर है, तो जा ही क्यों रहे हो? जब विवाह हो जाए तो घर में बैठकर मनाना यह पर्व।’ यह सुनते वह नौजवान क्रांतिकारी हो उठा। रामप्रसाद बिस्मिल का शैर दोहराते हुए बोला, ‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं, प्रेम करना हमारा अधिकार है, और अब से नहीं है, भगवान राम के जमाने से है। उन्हें भी तो अशोक वाटिका में सीता से प्रेम हो गया था, इसलिए हम तो प्रेम करेंगे, अब देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है। भगवान राम ने प्रेम के बल पर शिव का धनुष तोड़ दिया था, हम डंडे सह लेंगे। सुरक्षा का इंतजाम हमने कर ही लिया है।’
      जब मैंने पूछा, ‘भाई जब राम और कृष्ण के प्रेम को पूजा जाता है, मंदिर में राधा-कृष्ण की मूर्तियां हैं, तो फिर इतना बवाल क्यों?’ तो वह बोला, ‘वो क्या है कि प्रेम जो है न, वह भगवानों के लिए रिजर्व्ड है, वह इसे ‘लीला’ की कैटेगरी में करते थे, जैसे कृष्णलीला, रासलीला वगैरह-वगैरह। आम आदमियों के लिए यह अलाउड नहीं है। पर हमारी कोशिश जारी है।’
       मैंने उसके जोश की दाद देते हुए कहा, ‘लगता है तुम जैसे नौजवान इन तर्कों और इस जोश के सहारे इस पर्व के विरोध को खत्म करवा ही देंगे।’ खींसें निपोरते हुए वह बोला, ‘शुरुआत हो चुकी है भैया जी। अब जब यह लगने लगा है कि वेलेंटाइन जी को लोग याद करना बंद नहीं करेंगे, तो जापानी कंपनी के माइक पर स्वदेशी और भारत के दर्शन की बात करने वाले एक सज्जन ने कहा है कि संत वैलेंटाइन यूरोप में शादियां कराते थे, और यह सब उन्होंने भारतीय परंपरा और दर्शन का अध्ययन करके सीखा था। वह लोगों को समझाते थे कि एक पति-एक पत्नि के साथ रहो और यह यूरोप की परंपरा के खिलाफ था, इसलिए उन्हें 14 फरवरी 498 ईसवी को फांसी दे दी गई।’
       दिमाग में फिर कुछ कीड़े कुलबुलाए तो मैंने कहा, ‘लेकिन भारत में बहुविवाह  प्रथा भी तो रही है। खुद राम के पिता जनक की तीन पत्नियां थीं, कृष्ण की तो सोलह हजार से उपर रानियां थी, पांच पांडवों की एक कॉमन पत्नी थी, और उसके बाद जब तक राजे-रजवाड़ों का दौर चला तब तक भी कई राजाओं की एक से अधिक पत्नियां थीं, फिर कैसे कहा जा सकता है कि वेलेंटाइन ने यह भारत से सीखा?’
       युवक बोला, ‘भैया खुद पर गौरव करने का जो सुख होता है न, उसे भला आप क्या समझेंगे जो हर चीज का विश्लेषण करने लगते हैं। अरे भारत और भारत की संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है की नहीं, तो भला ये कैसे हो सकता है कि कोई भारत से बिना कुछ सीखे अच्छा काम कर ले। यह हमारी संस्कृति की महानता ही तो है कि जिसे हम परास्त नहीं कर पाते, उसे अपना लेते हैं। यह पता कर ही लेते हैं कि उसका जो प्रबल पक्ष है, वह उसने भारत की सभ्यता और संस्कृति से ही हासिल किया है। मेड इन यूएसए आइटम में भी इंडियन मटीरियल ढूंढ ही लेते हैं। आखिर ऐसे ही तो हम विश्वगुरु और महान नहीं हैं।’
       मैंने कहना चाहा, ‘लेकिन यह कहना कि यूरोप में इसके पहले शादियां नहीं होती थीं...’ युवक बीच में ही बोल पड़ा, ‘पता है बड़े बनने का सबसे आसान तरीका क्या है, दूसरे को नीचा दिखा दो।’ मैंने फिर कहना चाहा, ‘पर इस प्रेम प्रकट करने के पर्व का विरोध क्यों, जबकि हमारे यहां भी पहले वसंतोत्सव व चंद्रोत्सव जैसे पर्वों और कृष्ण के प्रेम के कई उदाहरण....’, उसने फिर बीच में बात काटी और बोला, ‘ज्ञानीजन कहते हैं कि ईश व स्व-संस्कृति की निंदा करना और सुनना पाप है। देशद्रोह है। आप पर ज़रूर देशद्रोह का मुकदमा चलेगा। मैं चलता हूं, भावी पत्नी इंतजार कर रही होगी।’