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रविवार, 16 सितंबर 2012

बिखरे रंग

(16 सितम्बर को जनवाणी में प्रकाशित )
रोजाना एक न एक एक्सीडेंट की खबर सामने आती ही है। कभी अखबार के जरिए, कभी चर्चाओं में। यूं तो एक्सीडेंट की घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी भी रहा हूं और कई बार चोटिलों को अस्पताल तक भी पहुंचाया है, पर जब भी तेज रफ्तार दौड़ते वाहनों को टकराते देखा है, यही सवाल दिमाग में आया है कि आखिर सबको इतनी जल्दी क्यों है? ओवरटेक करने की इतनी आपाधापी क्यों है? क्या यह हमारी आदत बन चुका है या हमेशा पहले नंबर पर रहने की लालसा भर है? या कि यह भी उसी तरह है कि ‘आखिर किसी और की कमीज हमारी कमीज से ज्यादा सफेद क्यों हो!’
बहरहाल, अभी तीन दिन पहले ही मेरठ से दिल्ली जा रहा था, तब भी एक एक्सीडेंट का दृश्य देखा। जो देखा वह घटना घट चुकने के बाद का दृश्य था। एक आदमी बीच सड़क पर लहूलुहान पड़ा था। सड़क पर बिखरे दिमाग और बगल से झांकती पसलियों को देखकर मेरे बस के कुछ सहयात्री उबकाइयां लेने लगे थे, महिलाओं ने मुंह-नाक पर रूमाल रखते हुए नजरें फेर ली थीं। कुछ पुरुषों का भी यही हाल था। कोई बड़ी बात नहीं थी, जब एक्सीडेंट में चोटिल हुए व्यक्ति की तरफ से लोग नजरें फेर लेते हैं ताकि ‘व्यर्थ के झंझट’ में पड़ने से बचा जा सके, तो फिर यह आदमी तो मर चुका था। लेकिन मरकर भी यह आदमी लोगों के लिए ‘मुसीबत’ था, क्योंकि बीच रोड पर पड़ी उसकी मृत देह के पास भीड़ जमा थी, ट्रैफिक जाम था और लोगों को अपने-अपने गंतव्य तक पहुंचने की ‘जल्दी’ में बाधा बन रहा था। मेरे सहयात्री एक सज्जन का कहना था, ‘पता नहीं लोगों को इतनी जल्दी क्यों रहती है! देखो, जल्दबाजी में सड़क पार कर रहा था और ट्रक ने ठोक दिया। अब इसकी वजह से ट्रैफिक जाम हुआ पड़ा है। मुझे आठ बजे घर पहुंचना था, बच्चों के साथ फिल्म देखने का प्रोग्राम था। ...अरे ड्राइवर साहब, धीरे-धीरे गाड़ी बढ़ाओ यार, जल्दी पहुंचना है।’
उस आदमी की मृत देह से थोड़ी दूरी पर कुछ सामान बिखरा पड़ा था। एक पॉलीथिन से बाहर छिटक कर गिरीं वाटर कलर की कुछ शीशियों का सड़क पर बिखरा हुआ रंग, कुछ पेंसिलें और बच्चों के इस्तेमाल में आने वाली ड्राइंग बुक। उसके बच्चे के हाथों से बनने वाले न जाने कितने ही चित्र दिमाग में कौंध गए, जिन्हें देखने की शायद उसे भी जल्दी थी। मगर रंग तो बिखर चुके। सहयात्री के शब्द दिमाग में गूंज रहे थे- ‘बच्चे... फिल्म का प्रोग्राम... जल्दी...।’

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

अभिव्यक्ति और शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया...

(मुक्तिबोध की डायरी पढते हुए विचारो के लेखन प्रक्रिया से गुज़रने को लेकर जो विचार मन मे आए.)



          निश्चय ही जीवनानुभूतियां/भावनाएं, लिखने या शब्दबद्ध होकर प्रस्तुत होने से पृथक होती हैं। जीवनानुभूतियों से उत्पन्न पीड़ा, आनंद और उनके उद्वेग से उत्पन्न भावनाएं स्वयमेव ही एक काव्य हैं, जिन्हें पूर्णत: समझ पाना स्वयं के लिए ही संभव होता है। (कई बार नहीं भी होता क्योंकि मन विचारात्मक दुविधाओ से दो-चार होता है।) परंतु इन समस्त अनुभूतियों को शब्दबद्ध करने की प्रक्रिया में बहुत ही मंद गति से और स्वयमेव ही अन्य अनुभूतियो, विंबों, व्याख्यात्मक शब्दों के समाहित होने से अनुभूतियां निरंतर परिष्कृत होती हैं। अनुभूतियों से उत्पन्न हुई कलात्मक/सौंदर्यात्मक बिंब दृष्टि नवीन चित्रों, शब्दों, अभिव्यक्ति की भाषा के समावेश होते ही शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया में परिष्कृत होती है और शब्दबद्ध होने के उपरान्त उत्पन्न सौन्दर्यबोध, प्रारंभकि सौन्दर्यबोध से पृथक होता है।

          अक्सर जिस बिंब दृष्टि, जिस अनुभूति को हम शब्दबद्ध करके प्रदर्शित करने के अभिलाषी होते हैं, शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया में निरंतर वह अपने मूल रूप से कहीं न कहीं भिन्न होती जाती है। परिणामत: अंत तक पहुंचते-पहुंचते यह आभास होता है कि जिस बिंब को हम प्रदर्शित करना चाहते थे उसमें हम पूर्णत: सफल नहीं हो सके। बहुत कुछ ऐसा छूट गया है जो व्यक्त किया जाना था और बहुत कुछ ऐसा व्यक्त हो गया है जिसे प्रारंभ में सोचा नहीं गया था किन्तु रचना प्रक्रिया में स्वत: ही जुड़ गया है।

          निश्चय ही शब्दबद्ध करने की प्रक्रिया भी अत्यंत जटिल होती है। जीवनानुभूतियां या उनसे उत्पन्न भावबोध जितना मानसिक/भावनात्मक रूप से स्पर्श करता है उस स्पर्श को, उस उद्वेलन को शब्दबद्ध करने में शब्द और भाषा का चयन एक जटिल समस्या है। विचारात्मक या भावनात्मक उद्वेलन जिस गंभीरता, गहनता से अनुभूत होता है उसे व्यक्त करने के लिये प्रयुक्त किया जाने वाला शब्द या शब्द-समूह वैसी ही गहनता से उसे पाठक के मन में भी अनुभूत करा सके यह सदैव संदेहास्पद है। कई बार लेखक को स्वयं भी वे शब्द-समूह नाकाफ़ी प्रतीत होते हैं। परिणामत: लेखक निरंतर अपनी शैली और भाषा को परिष्कृत करने को प्रयासरत होता है। वह अपनी स्वयं की एक ऐसी भाषा तैयार करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील होता है जो उसकी अनुभूतियों को बिल्कुल वैसा प्रदर्शित कर सके जैसा वह करना चाहता है।

          शब्दबद्ध करने की प्रक्रिया में उपस्थित यह जटिलता ही अनुभूतियों के परिष्कृत होने और मूल रूप से भिन्न हो जाने में संभवत: महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। साथ ही अनायास ही और कई बार व्याख्या या सरल करने की दृष्टि से समाहित हो जाने वाले अनुभूति-चित्र भी अपना सहयोग देते ही हैं। निश्चय ही अभिव्यक्ति की संपूर्ण प्रक्रिया में शब्दबद्ध करने की प्रक्रिया सर्वाधिक जटिल है।