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शनिवार, 31 अगस्त 2019

यह क्या कम आपत्तिजनक है!


बहुत दिनों से लल्लन मियाँ की कोई खोज-ख़बर नहीं थी तो मैं सुबह-सुबह उनके घर जा धमका. लल्लन मियाँ सिर के बल खड़े होने की कोशिश कर रहे थे. वे बार-बार सिर तकिए पर टिकाकर दोनों टाँगें ऊपर को उछालते और नाकाम होते. पास में ही अखबार और चाय के तीन ख़ाली कप पड़े थे. उन्हें इस हाल में देख मैंने पूछा – ‘शीर्षासन करने का शौक़ कब से हो गया लल्लन मियाँ? या पेट में कुछ अलामत है?’

लल्लन मियाँ रुककर बोले- ‘भाड़ में जाए शीर्षासन, और पेट भी दुरुस्त है. हम तो दिमाग ठिकाने लगाकर नज़रिया समझने की कोशिश कर रहे हैं.’

मैंने पूछा कि ‘क्या हुआ दिमाग को और किसका नज़रिया?’ तो अपनी कोशिश में लगे-लगे ही आँखों से अख़बार की तरफ़ इशारा करके बोले- ‘अख़बार पढ़ो अख़बार.’ और उसी सांस में अपनी बेगम को आवाज़ दी, ‘सुनो! एक चाय और बढ़ा लो, कलमघसीट भी आ गया.’

मैं जानता था कि दो-चार बातों के बाद ही लल्लन मियाँ मुद्दे पर आएँगे सो अखबार उठाते हुए मैं बोला- ‘ख़बरों से तो अख़बार का नज़रिया तक साफ़ पता चल जाता है. इसमें भला ऐसा क्या होगा जो आपको उलझाए.’

इससे पहले कि लल्लन मियाँ कुछ कहते उनकी बेगम चाय लिए आ गईं. मैंने अपना कप कब्जाते हुए उनसे पूछा- ‘ये क्या हरकतें कर रहे हैं? ऐसा क्या पढ़ लिया इन्होंने जिसने इनका दिमाग़ हिला दिया?’

वे बोलीं- ‘हरकतों का तो इनसे ही पूछो तुम, पर जब से ये ख़बर पढ़ी है कि भीमा कोरेगांव मामले में जज ने पूछा है कि घर में युद्ध और शान्ति किताब क्यों थी, तब से तीन बार चाय बनवा चुके हैं. ये चौथी है. ऊपर से उल्टे-सीधे हो रहे हैं.’ चाय की चुस्की लेते हुए बोलीं ‘अब तुम ही पूछो कि क्या माजरा है, मैं पूछती हूँ तो ग़ालिब का मिसरा पढ़ देते हैं – कोई बतला दे के हम बतलाएं क्या.’

माजरा मेरी समझ में आ चुका था. मैंने लल्लन मियाँ से पूछा – ‘टॉलस्टॉय को शांतिदूत कहा गया है और उनकी किताब युद्ध और शान्ति को पुलिस ने आपत्तिजनक कहा है. जज ने भी पूछा है कि ये आपत्तिजनक किताब घर में क्यों थी? बताइए, जैसा कहा जा रहा है, वैसे वह किताब भी उकसाती है क्या भला?'

'जैसा कहा जा रहा है वैसे तो नहीं, लेकिन वह उकसाती तो है भाई मियाँ.' उन्होंने जवाब दिया.

'वो कैसे? आपकी क्या राय है युद्ध और शान्ति के बारे में?’ मैंने पूछा.

लल्लन मियाँ सीधे हुए, चाय का एक घूँट भरा और बोले – ‘वही क़ायम करने के लिए तो नज़रिया समझने की कोशिश कर रहे थे हम.'

मैंने पूछा कि क्या समझे तो बोले - 'देखो भाई मियां, युद्ध कई प्रकार का होता है. मल्ल युद्ध, वाक् युद्ध, द्वंद्व युद्ध से लेकर कम्बल परेड, किचाइन तक. आमतौर पर इसे लड़ाई-झगड़ा भी कहा जाता है.’

उनकी बेगम ज़रा झुंझलाकर बोलीं – ‘यही मुसीबत है इनकी, फैलते बहुत हैं. अरे परिभाषा काहे बघार रहे हो! सीधे-सीधे राय बताओ न.’ लल्लन मियाँ चाय चुसकते हुए बोले – ‘भगवान भला करे तुम्हारा, पर अब जब हमारे आसपास चाय है, चाय पर चर्चा है तो फैलना तो बनता है. वैसे भी अभी लोकतंत्र है, शाही फ़रमान ज़ारी नहीं हुआ अब तक कि कोई और नहीं फ़ैल सकता.’

मैंने याद दिलाया कि बात युद्ध की हो रही थी तो लल्लन मियाँ आगे बढ़े. बोले- ‘हाँ तो भाई मियाँ, ऐसा पाया जाता है कि जब लड़ाई-झगड़ा होता है तो सब को फैलने का सुभीता होता है. जो जिस हद तक जा सकता है उस हद तक जाकर फैलता है. जिसका लड़ाई-झगड़े से सीधा संबंध नहीं होता वो भी फैलता है. मने के घर की दीवार का सालों का झगड़ा न सुलटा पाने वाले पड़ोसी दूसरों के दीवानी मुकदमों पर राय देते हैं. अपने इलाके के थाने की सीमा के मामलों को न जाननेवाले भी कश्मीर और पाकिस्तान का नाम सुनकर समस्या का हल बताते ही हैं, नेहरू को गलियां दे ही लेते हैं.’

‘मतलब यही न कि लड़ाई-झगड़े में हर कोई अपना ज्ञान बांटता है. तुम्हारी तरह.’ बेगम ने बीच में कहा, जिस पर लल्लन मियाँ बोले- ‘यार तुम ज्ञान को मत पकड़ो, फैलने को पकड़ो. और बात सिर्फ ज्ञान बांटने की नहीं है. अपन बदला उतारू लोग हैं. पुरानी दुश्मनी निकालने को अपने यहां लोग तैयार ही बैठे मिलते हैं. खानदानी दुश्मनियों की परंपरा का देश है अपना. तुम्हारे दादा ने हमारे बाप को मारा था अब हम तुम्हारे बेटे को मारेंगे. मतलब बाबर की ग़लतियों पर जुम्मन पीटा जाता है. फिर मौके की नज़ाकत एक और पहलू है जिसका फ़ायदा उठाना हर कोई अपना कर्तव्य मानता है. लड़ाई दो लोगों की होती है, अमरीका की तरह हाथ साफ़ तीसरा कर लेता है. दंगे होते हैं तो लोग दुकानें लूट लेते हैं. किचाइनप्रेमियों को हर झगड़े में बतकुच्चन के लिए माल मिलता है. कुल मिलाकर फैलने वालों के लिए लड़ाई काम का अवसर है. बड़ी लड़ाई और बड़ा अवसर.‘

मैंने पूछा ‘और बड़े अवसर से क्या मतलब?’

चाय चुसकते लल्लन मियाँ बोले – ‘अभी जो मामला चल रहा है सो तुम देख ही रहे हो कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान दोनों की ही बड़ी आबादी का मन युद्ध के लिए हिलोरें मार रहा है. उनके लिए युद्ध आशंका नहीं, संभावना है, जिसमें रस आ रहा है. लड़ाई हो तो रस फूटकर बाहर छलकेगा. तो भाई मियाँ हमको लगता नहीं है कि युद्ध से किसी को कोई आपत्ति है.’

‘चलिए माना कि युद्ध में लोगों को रस मिल रहा है इसलिए युद्ध से कोई आपत्ति नहीं हो सकती. पर शान्ति में तो चीज़ें ज्यादा बेहतर होती हैं, उसमें और ज्यादा रस है.’ लल्लन मियाँ की बेगम बोलीं. मैंने भी समर्थन करते हुए बात आगे बढाई - ‘बिलकुल. शान्ति युद्ध से हमेशा बेहतर है तो शान्ति से भी किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?’

लल्लन मियाँ हँसते हुए बोले – ‘तुम दोनों भी कमाल करते हो. आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के जमाने में ख़ाली इंटेलीजेंस की बात कर रहे हो. भई जैसे युद्ध कई तरह का होता है वैसे ही शान्ति भी दो तरह की होती है. आर्टिफिशियल शान्ति और असली वाली शान्ति. दूसरी वाली आपत्तिजनक है.’

‘मतलब?’ मैं और लल्लन मियाँ की बेगम दोनों एक साथ हैरत से बोले. लल्लन मियाँ को मज़ा आया. ठहाका लगाते हुए बोले – ‘ये देक्खो! इत्ती से बात समझ नहीं आती. कल से ट्यूशन लेना हमसे.’ फिर बिना हमारे बोलने का इंतजार किए आगे बोले – ‘अरे भाई, छोटे-मोटे झगड़े में भी मार-पीट भले बंद हो जाए पर जहाँ मौका मिले सामने वाले को लोग बुरा-भला कहते हैं कि नहीं. गलियाँ देते हैं कि नहीं. अब मान लो युद्ध हो गया, हम जीत गए. उसके बाद? लोग जीत का जश्न मनाएंगे, फिर कुछ दिन तक मानेंगे कि शान्ति है क्योंकि सरकार कह रही है. फिर कुछ दिन बाद पहले तो महंगाई और दूसरी चीज़ों की किल्लत से होगा उनके दिमाग़ का दही, फिर फैलेगा रायता. मने आदमी कटी पतंग-सा अशांत डोलेगा और कहा जाएगा युद्ध के बाद शान्ति है. दिस इस कॉल्ड आर्टिफ़िशियल शान्ति. इससे भी ज़्यादा लोगों को आपत्ति नहीं है. जिन्हें युद्ध के पहले और दौरान फैलने का मौका मिलेगा वो तब फैलेंगे, कुछ को आर्टिफिशियल शान्ति में फैलने का मौका मिल जाएगा. अपने-अपने हिसाब से सब फैल लेंगे.

‘जब आर्टिफिशियल शान्ति से तक आपत्ति नहीं है तो फिर असली वाली शान्ति में भला क्या आपत्तिजनक है?’ मैंने पूछा.

लल्लन मियाँ बोले – ‘उसमें फैलने वालों को फैलने के अवसर नहीं मिलते न भाई मियाँ. यह क्या कम आपत्तिजनक है.’

‘पर युद्ध और शान्ति किताब कैसे आपत्तिजनक हो गई?’ लल्लन मियाँ की बेगम ने सवाल किया.

लल्लन मियाँ ने ठंडी हो चुकी चाय का आख़िरी घूँट लिया और शान्ति से बोले – ‘क्योंकि वह असली वाली शान्ति के लिए उकसाती है.’

सोमवार, 19 मई 2014

अच्छे दिन आने वाले हैं



बीत गए थे जो फिर से क़िस्से दुहराने वाले हैं
शोर बड़ा घनघोर है ये अच्छे दिन आने वाले हैं

अभी समझ की देहरी तक जो पहुँचे हैं मुश्किल से
उन नादानों के फिर से सपने भरमाने वाले हैं

देख-भाल के सोच-समझ के खाद-पानी ये डाला है
नागफनी के पौधों से आलम हरियाने वाले हैं

फूल दिखा कर सुंदरता का भरम बनाये रखा है
मिलते ही मौक़ा मुँह  कीचड़ मल जाने वाले हैं

सुबह-ओ-शाम रात-दोपहर हमने जिसको बीना है
उस चादर पर तेल छिड़क लपटें उठवाने वाले हैं

औरत देवी घर की ज़ीनत मैला धोना पुण्य का काम
मनु-सूत्र को वो फिर से जड़ में रखवाने वाले हैं

क्या होगा, कैसे होगा, ये मत पूछो बिलकुल भी
सारे मिलकर भजन करो अच्छे दिन आने वाले हैं.

शुक्रवार, 2 मई 2014

यह निजता पर हमला है

बात मानसिकता और अधिकारों की है

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प्रेम का स्वीकार एक सहज स्वाभाविक बात है, लेकिन दिग्विजय सिंह की स्वीकारोक्ति के बाद सोशल मीडिया और ख़ासकर फेसबुक पर जिस तरह से उनके प्रेम का चर्चा और उस पर टिप्पणियों का तांता लगा है उसने एक स्वाभाविक-सी बात को अस्वाभाविक बना दिया है. अस्वाभाविक इस अर्थ में कि कुछ लोग इस नितांत निजी मामले को राजनीतिक रूप देने की कोशिश में लगे हैं, कुछ इसके बहाने दिग्विजय सिंह का चरित्र हनन करने में जुट गए हैं और कुछ सामाजिक मर्यादाओं की झंडाबरदारी में उनकी निजता पर हमला कर रहे हैं. इसमें मोदी समर्थकों, कांग्रेस विरोधियों की संख्या तो काफी है ही पत्रकारों की संख्या भी कम नहीं है. जिस भद्दे ढंग से इस मामले में टिप्पणियां की जा रही हैं, तस्वीरें साझा की जा रही हैं उसमे सबसे आपत्तिजनक पहलू यह है कि इसमें एक महिला के सम्मान और उसकी निजता का भी मखौल उड़ाया जा रहा है. जो लोग सम्बंधित महिला के बारे में जानते तक नहीं वे भी उसके बारे में अनर्गल बातें कर रहे हैं. कुल मिलाकर यह सिवाय किसी की निजता में जबरन दखल देने और महिला के अपमान के अलावा और कुछ नहीं है.

अब बात यह कि आखिर दिग्विजय सिंह और उनकी महिला मित्र ने ऐसा क्या अपराध कर दिया है? वे न केवल पूरी ईमानदारी से अपने रिश्ते को स्वीकार कर रहे हैं बल्कि उसे सामाजिक व वैधानिक मान्यता प्रदान करने की ओर भी अग्रसर हैं. वे चाहते तो इसे अपना निजी मामला कहकर चुप रह सकते थे, पर दोनों ने ही ऐसा नहीं किया. क्या इसी से स्पष्ट नहीं होता कि दाल में कहीं भी कुछ भी वैसा काला नहीं है जिसकी सम्भावना अक्सर तलाशी जाती है. न तो प्रेम करना कोई अपराध है, न तलाक़ लेना और न ही विवाह करना. उम्र का हवाला देकर भी आप उनकी ईमानदार स्वीकारोक्ति को किसी कठघरे में नहीं खड़ा कर सकते. फिर आखिर इस तरह किसी की निजता पर हमला करके क्या साबित करने की कोशिश की जा रही है? ऐसा करने वालों की मंशा चाहे जो भी हो पर इससे उनका ही मानसिक दीवालियापन साबित होता है.

किसी का विरोध करने के कई तरीके होते हैं. जो लोग दिग्विजय सिंह से राजनीतिक मतभेद रखते हैं या व्यक्तिगत रूप से उन्हें पसंद नहीं करते और इस बात को उनके खिलाफ़ इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें विरोध की सीमा-रेखा का ध्यान रखने की ज़रूरत है. मैं दिग्विजय सिंह का समर्थक नहीं हूँ, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मैं उनके नि:तांत निजी संबंधों (जिन्हें कि वे क़ानूनी मान्यता देने की भी बात कह रहे हैं) की छीछालेदर करूँ और उस महिला का मखौल उड़ाऊँ जो अपना जीवन एक नए सिरे से शुरू करना चाहती है. इस प्रकार की हरकतें महिलाओं के प्रति आपकी संवेदनशीलता के स्तर को भी दर्शाती हैं. असल में इस तरह की अशोभनीय टिप्पणियां करने वाले लोग वही हैं जिनके घरों की महिलाओं को कोई देख भर ले तो उसका सिर उतारने पर आ जाते हैं लेकिन बाकी सभी महिलाओं को खुद भी मनोरंजन का सामान समझते हैं. चाहे वे किसी के भी समर्थक, विरोधी होने का मुखौटा पहन लें, कितना भी बड़ा पत्रकार होने का तमगा लटका लें, इससे चरित्र नहीं बदल जायेगा. इस मामले में जिस ढंग से चटखारे लेकर बातें की जा रही हैं वह भीतर छुपी लार-टपकाऊ नीयत, महिलाओं के प्रति घटिया सोच और दोगले व्यवहार को दर्शा ही देती हैं. गपशप (गॉसिप) के प्रति दिलचस्पी तो स्वत: ही दिख जाती है.

इन टिप्पणियों का विरोध करने पर कुछ लोगों ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि मोदी के विवाहित होने की ख़बर पर और दिग्विजय सिंह के मामले में अलग-अलग रुख क्यों? उनके लिए एक ही जवाब है कि बिलकुल भी अलग-अलग रुख नहीं है, हम तब भी अधिकार की बात कर रहे थे और अब भी कर रहे हैं. हम तब भी एक महिला के अधिकारों की हिमायत कर रहे थे और अब भी कर रहे हैं. फर्क है तो इस बात का कि मोदी ने एक महिला के विवाहोपरांत अधिकारों को नकार दिया, सामाजिक व वैधानिक मान्यता होते हुए भी उसे उसके अधिकारों से वंचित रखा और एक स्त्री के पूरे अस्तित्व को नकारते हुए अपने अविवाहित होने का भ्रम फैलाये रखने में अहम् भूमिका निभाई. जबकि दिग्विजय सिंह उन तमाम अधिकारों को सामाजिक/वैधानिक मान्यता प्रदान करने की बात खुद कर रहे हैं, किसी जवाबदेही से पीछे नहीं हट रहे हैं. अब अगर आप अधिकारों/वैधानिक मान्यता को नकारने और प्रदान किये जाने का फ़र्क ही न समझते हों तो बात अलग है. दूसरी बात यह कि प्रश्न खड़े करने और मखौल उड़ाने में फ़र्क होता है. यदि किसी ने मोदी की निजता का मखौल उड़ाया है तो वह भी निंदनीय है.

यहाँ एक और गंभीर बात यह है कि न केवल दिग्विजय सिंह और उनकी महिला मित्र की निजता का मखौल उड़ाया जा रहा है बल्कि अपरोक्ष रूप से उस तीसरे व्यक्ति को भी हलकान किया जा रहा है जिससे तलाक़ की अर्जी दाखिल-दफ़्तर है. क्या यह शर्मनाक और दु:खद नहीं है कि ऐसी अभद्र टिप्पणियों और ख़बरों के चलते उस व्यक्ति को व्यथित मन से अपनी ज़िन्दगी की नि:तांत निजी बात सार्वजनिक करनी पड़ती है कि तलाक़ की अर्ज़ी में उसकी भी सहमति है और दोनों के बीच पहले ही संबध-विच्छेद हो चुका है. इस मामले में उस इंसान की समझदारी उन तमाम टिप्पणियों और ख़बरों को प्रसारित करने वालों का मुंह बंद करने के लिए काफ़ी है, जो बिना कोई पृष्ठभूमि जाने उस महिला के सन्दर्भ में अनर्गल बातें कर रहे हैं. लेकिन बड़ा मसला यहाँ मुँह बंद करना नहीं कुछ और है.

बात मोदी या सिंह की नहीं है, बीजेपी या कांग्रेस की नहीं है और न ही मुँह बंद करने की है. बात है उस मानसिकता की जिससे आप आज तक उबर नहीं पाए हैं और जिसके चलते आज तक महिलाओं का और किसी की निजता का सम्मान करना नहीं सीख पाए हैं. महिलाओं के प्रति तो इस हद तक असंवेदनशील बने हुए हैं कि आज भी महिलाओं को घर के भीतर रखने की सोच से मुक्त नहीं हो पाए हैं जिसका परिणाम है कि कामकाजी महिलाओं को एक अलग ही नज़रिए से देखा जाता है और यह स्वीकार करने में परेशानी होती है कि कोई स्त्री बिना किसी स्वार्थ के अपने से कहीं अधिक उम्र के पुरुष से प्रेम कर सकती है. यही हाल हमारे दोहरे चरित्र का है. महिलाओं के विरुद्ध किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के बयान पर उँगलियाँ उठाते हैं लेकिन निजी जीवन में रोज़ कितनी बार महिला-विरोधी शब्दों/जुमलों का इस्तेमाल करते हैं इसका ख़याल भी नहीं रखते और न ही यह सोचते हैं कि ऐसा क्यों कर रहे हैं. वजह सिर्फ यही है कि हम उस मानसिकता के साथ ही बड़े हुए हैं जिसमे खुद की ग़लतियाँ भी जायज़ हैं, दूसरा करे तो उसकी खैर नहीं. जब तक इस मानसिकता से नहीं उबरा जायेगा हमारे सभ्य होने के दावे झूठे ही रहेंगे. पढ़-लिख लेने भर से, कोट-टाई पहन लेने से, संस्कृति की ध्वजा भर उठा लेने से ही कोई सभ्य नहीं हो जाता. इसकी सबसे पहली शर्त दूसरों के अधिकारों और जीवन का सम्मान करना है.

02 मई 2014, दैनिक जनवाणी, मेरठ 
बहरहाल, जिन पत्रकार बंधुओं ने इस मामले में अशोभनीय व्यवहार किया है उनसे अतिरिक्त रूप से यही कहा जा सकता है कि पत्रकार होने, हाथ में माइक या कलम पकड़ लेने, सूचनाओं तक आपकी पहुँच होने से आपको ये अधिकार नहीं मिल जाता है कि आप किसी के भी निजी संबंधों की छीछालेदर करें. अपनी सीमा रेखा को पहचानिए वरना करते रहिये देश/दुनिया को बदलने के दावे, कुछ नहीं बदलेगा. फिर कल को अगर आपकी निजता पर कोई हमला हुआ तो कितना भी करते रहिएगा अपनी निजता के अधिकार का हल्ला, जैसे आज आप नहीं समझ रहे कल को कोई आपकी स्थिति नहीं समझेगा.

- रजनीश 'साहिल'

बुधवार, 14 अगस्त 2013

विज्ञापनों का आपत्तिजनक रंग


ज़रा कल्पना कीजिये- 'एक पुरुष का सिर दर्द से फटा जा रहा है और आसपास से लड़कियां उसकी तरफ देखकर नाक-भौं सिकोड़ती हुई दूर-दूर से निकली चली जा रही हैं. फिर वो पुरुष सिर दर्द से निजात दिलाने वाली एक गोली खाता है, गोली खाते ही उसका सिर दर्द दूर होता है और लड़कियों की उसी भीड़ से एक सुन्दर सी कन्या आकर उस पुरुष की गोद में बैठ जाती है.'

आप कहेंगे कि ये क्या बेहूदा कल्पना है, पर जनाब नाराज़ होने कि ज़रूरत नहीं है, ये भविष्य में किसी भी दवा कंपनी का विज्ञापन हो सकता है. इन दिनों विज्ञापन जिस ढंग से अपने-अपने ब्रांड के माध्यम से लड़की पटाने की गारंटी करवाते दिख रहे हैं, उसे देखते हुए कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि आने वाले समय में आप ऐसा विज्ञापन देखें जिसमे एक ख़ास कंपनी की दवा खाने से आप पर कोई लड़की मोहित हो जाये, बीमारी ठीक होने का ज़िक्र हो न हो लड़की का मोहित हो जाना ख़ासतौर से दिखाया जायेगा उसमें. जैसे कि अब चश्मे का विज्ञापन नज़र दुरुस्त करने या धूप से आँखों को बचाने के बजाय लड़की को राजी करने के नुस्खे में बदल गया है. 

आज ही एक विज्ञापन देखा- 'लाइब्रेरी में बैठा चश्माधारी लड़का एक लड़की के सामने चाय का प्रस्ताव रखता है, लड़की इनकार कर देती है. यही सीक्वेंस बार-बार दोहराया जाता है, हर बार लड़के के चश्मे का फ्रेम बदला हुआ होता है और हर बार चाय के प्रस्ताव पर लड़की 'नहीं, कभी नहीं से लेकर पुलिस को बुलाये जाने तक के वाक्यों द्वारा कई अलग-अलग तरीकों से इंकार ही करती है.... पर अंतिम बार में जैसे ही लड़का नयी फ्रेम के साथ अपना प्रस्ताव दोहराता है, अगले ही शॉट में लड़की लड़के की गोद में बैठी नज़र आती है और दोनों के हाथ में थमे चाय के कपों में दिल धड़क रहा होता है... फिर दिखाई देता है उस चश्मा कंपनी का नाम.'

अब आप ही बताएं ये चश्मे का विज्ञापन है या यह बताया जा रहा है कि जनाब हमारी कंपनी का चश्मा पहनिए और लड़की पटाइए. आज अधिकतर विज्ञापन तकरीबन यही भाव लिए हुए हैं. फलां कंपनी के रेजर से दाढ़ी बनाइये, फलां कंपनी का अंडरवियर पहनिए, फलां कंपनी का परफ्यूम लगाइए, फलां कंपनी का टूथपेस्ट इस्तेमाल कीजिये, फलां च्युइंगगम चबाइए, और कुछ हो न हो एक सुन्दर कन्या आपके पहलू में आ जाएगी.

कितना आपत्तिजनक है विज्ञापनों का यह संसार. युवा मस्तिष्क को कुंठाओं से भर देने वाला, प्रेम को महज़ सेक्स के दायरे में समेट देने वाला, संवेदनाओं को वस्तु भर बना देने वाला और स्त्री विरोधी तो निश्चित रूप से है. स्त्री को बस भोग्या बना दिया गया है इन विज्ञापनों में. मगर सबसे तकलीफदेह बात यह है कि इन विज्ञापनों ने धीरे-धीरे दर्शकों को ऐसा बना दिया है कि वे यह सोचते भी नहीं कि आखिर चल क्या रहा है, ये विज्ञापन कैसे उनकी संवेदनाओं और सामाजिकता से खिलवाड़ कर रहे हैं और उन्हें कुंठित किये चले जा रहे हैं.

शुक्रवार, 3 मई 2013

आवाज़


वह तक़रीबन 80 वर्ष का बुज़ुर्ग था जिसके बस एक पाँव में जूता था। कंधे पर एक छोटी-सी पोटली और तन पर ऐसे मैले कपड़े जिन्हें देखकर ही लग रहा था कि वह पाँच-छः दिन की धूल-धूप खा चुके हैं। वह किसी गाँव से शहर आया था शायद। कह रहा था- ‘भैया कछु कर दो। हमरे मुंडा तक भड़िया लए (जूते तक चोरी कर लिये)। एकई पईसा नईंएँ चाय-रोटी खों। भईया कछु कर दो।’
         आवाज़ में कुछ अजीब-सा था जो भीतर विचलन पैदा कर रहा था। दिल कह रहा था कि वाकई ज़रूरतमंद है, कुछ तो मदद कर ही देनी चाहिए। अरसे बाद उस शहर और बदले हुए हालात को देख रहा था। आसपास के लोगों का उस बुज़ुर्ग के प्रति उदासीन या हड़काने वाला रवैया मन को शंकित भी कर रहा था कि यह कहीं उसका कारोबार न हो।
         मन की शंका और दिल की संवेदनशीलता एक डोर को दो विपरीत धुरों से तान रहे थे। दो बार तो हाथ पर्स वाली जेब तक जाकर लौटा। आख़िरकार बाइक की किक पर पूरी झल्लाहट के साथ पैर पटका और सधा-सधाया जुमला, जो ऐसे मौकों पर अक्सर कहा जाता है, कह दिया - ‘छुट्टे नहीं हैं बाबा।’
         भर्राती हुई, घबराहट औैर बेचैनी से भरी, रोने को तत्पर वह आवाज़ जैसे बाइक पर मेरे पीछे सवार हो गई थी। पर्स की तरफ़ बढ़ते हाथ की तरह बाइक भी वापस मुड़ते-मुड़ते रह गई थी। हर बार शंका बलवती साबित हुई थी- ‘ अगर यह उसका धंधा हुआ तो?’
         ‘हुआ भी तो क्या! उसे कुछ पैसे देकर तेरी उलझन तो दूर होगी कि तूने कुछ क्यों नहीं किया।’ ख़ुद को दिया गया यह तर्क ठीक लगा। बाइक ठिठकी ही थी कि इस तर्क की काट भी सामने आ गई- ‘पर ऐसे तो रोज़ ही कोई न कोई मिलता है।’
         भीतर यह विचार और बाहर बाइक दोनों लगातार चल रहे थे। घर आ गया था। कई गलियों से घूम कर, कई मोड़ों को काट कर आया था। शोर भरे बाज़ारों से होकर आया था। वह कहीं नहीं गिरी। रोने को तत्पर वह आवाज़ रोने लगी थी। अब वह बाइक से उतर कर मेरे कंधों पर सवार थी।

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

वेलेंटाइन जी: इंडियन मटीरियल का सुख


प्रेम पर्व समाप्त होने में बस एक दिन और बाकी है और इस पर्व को मनाने वाले अपनी सुरक्षा के इंतजाम के साथ हैं। ठीक वैसे ही जैसे दीवाली पर पटाखे छोड़ते वक्त कुछ लोग पानी की बाल्टी साथ रख लेते हैं। कल एक युवक मिला। यूं तो वह हाथ अगरबत्ती पांव मोमबत्ती था, लेकिन कल अचानक से मोटा हो उठा था। उसने मोटे-मोटे कपड़ों की दो-तीन तहें अपने शरीर पर जमा रखी थीं। हाथ में लाल गुलाब, चॉकलेट का डिब्बा और दो-तीन और गिफ्ट आइटम।
       चूंकि सर्दी का मौसम है तो मैंने पूछ लिया, ‘क्यों भाई सर्दी कुछ ज्यादा ही लग रही है क्या?’, वह बोला, ‘नहीं जी, यह तो सब सुरक्षात्मक इंतजाम है, अपनी भावी पत्नी के साथ प्रेम पर्व के अवसर पर घूमने का इरादा है।’
       बात कुछ अटपटी लगी, मैंने पूछा, ‘भैया क्या तुम्हारी भावी पत्नी जूडो-कराटे में ब्लैक-बेल्ट है, जिसके गुस्से से बचने का यह उपाय खोजा है?’ वह बोला, ‘अरे नहीं भैया, मेरी भावी पत्नी तो बिल्कुल गौ है, जहां गुस्सा दिखाना चाहिए वहां भी रो पड़ती है। यह उपाय तो डंडों से बचने के लिए किया है।’ जब पूछा कि किसके डंडे? तो बोला, ‘अब धर्मरक्षक, संस्कृति रक्षक, शिवभक्त, रामभक्त, हनुमानभक्त या पुलिस, कब, कौन डंडा बरसा दे, कह नहीं सकते न।’
       मैंने तर्क फेंका, ‘भैया, तुम्हारा जल्द ही ब्याह होने जा रहा है, वह भी घर वालों की सहमति से, तो अपनी भावी पत्नी से तुम्हारे मिलने में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?’ उसने इतने सपाटे से जवाब दिया कि मैं तो हैरान रह गया। बोला, ‘अपने तर्क अपने पास रखो महाराज, लगता है तुम कभी इस पर्व के दौरान घर से बाहर नहीं निकले। भैया अपने देश का रिवाज है, पिटाई पहले होती है, सही-गलत बाद में तय किया जाता है। पिछली बार तो कई जगह इस पर्व के दौरान भाई-बहन तक पिट गए। ठीक है कि बाद में पीटने वालों की थू-थू हुई, लेकिन बेचारे भाई की पीठ और बहन का चेहरा तो लाल हो ही गया न। तो भैया हम तो फिर भी प्रेम करने जा रहे हैं।’
       मैंने कहा, ‘जब इतना ही डर है, तो जा ही क्यों रहे हो? जब विवाह हो जाए तो घर में बैठकर मनाना यह पर्व।’ यह सुनते वह नौजवान क्रांतिकारी हो उठा। रामप्रसाद बिस्मिल का शैर दोहराते हुए बोला, ‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं, प्रेम करना हमारा अधिकार है, और अब से नहीं है, भगवान राम के जमाने से है। उन्हें भी तो अशोक वाटिका में सीता से प्रेम हो गया था, इसलिए हम तो प्रेम करेंगे, अब देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है। भगवान राम ने प्रेम के बल पर शिव का धनुष तोड़ दिया था, हम डंडे सह लेंगे। सुरक्षा का इंतजाम हमने कर ही लिया है।’
      जब मैंने पूछा, ‘भाई जब राम और कृष्ण के प्रेम को पूजा जाता है, मंदिर में राधा-कृष्ण की मूर्तियां हैं, तो फिर इतना बवाल क्यों?’ तो वह बोला, ‘वो क्या है कि प्रेम जो है न, वह भगवानों के लिए रिजर्व्ड है, वह इसे ‘लीला’ की कैटेगरी में करते थे, जैसे कृष्णलीला, रासलीला वगैरह-वगैरह। आम आदमियों के लिए यह अलाउड नहीं है। पर हमारी कोशिश जारी है।’
       मैंने उसके जोश की दाद देते हुए कहा, ‘लगता है तुम जैसे नौजवान इन तर्कों और इस जोश के सहारे इस पर्व के विरोध को खत्म करवा ही देंगे।’ खींसें निपोरते हुए वह बोला, ‘शुरुआत हो चुकी है भैया जी। अब जब यह लगने लगा है कि वेलेंटाइन जी को लोग याद करना बंद नहीं करेंगे, तो जापानी कंपनी के माइक पर स्वदेशी और भारत के दर्शन की बात करने वाले एक सज्जन ने कहा है कि संत वैलेंटाइन यूरोप में शादियां कराते थे, और यह सब उन्होंने भारतीय परंपरा और दर्शन का अध्ययन करके सीखा था। वह लोगों को समझाते थे कि एक पति-एक पत्नि के साथ रहो और यह यूरोप की परंपरा के खिलाफ था, इसलिए उन्हें 14 फरवरी 498 ईसवी को फांसी दे दी गई।’
       दिमाग में फिर कुछ कीड़े कुलबुलाए तो मैंने कहा, ‘लेकिन भारत में बहुविवाह  प्रथा भी तो रही है। खुद राम के पिता जनक की तीन पत्नियां थीं, कृष्ण की तो सोलह हजार से उपर रानियां थी, पांच पांडवों की एक कॉमन पत्नी थी, और उसके बाद जब तक राजे-रजवाड़ों का दौर चला तब तक भी कई राजाओं की एक से अधिक पत्नियां थीं, फिर कैसे कहा जा सकता है कि वेलेंटाइन ने यह भारत से सीखा?’
       युवक बोला, ‘भैया खुद पर गौरव करने का जो सुख होता है न, उसे भला आप क्या समझेंगे जो हर चीज का विश्लेषण करने लगते हैं। अरे भारत और भारत की संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है की नहीं, तो भला ये कैसे हो सकता है कि कोई भारत से बिना कुछ सीखे अच्छा काम कर ले। यह हमारी संस्कृति की महानता ही तो है कि जिसे हम परास्त नहीं कर पाते, उसे अपना लेते हैं। यह पता कर ही लेते हैं कि उसका जो प्रबल पक्ष है, वह उसने भारत की सभ्यता और संस्कृति से ही हासिल किया है। मेड इन यूएसए आइटम में भी इंडियन मटीरियल ढूंढ ही लेते हैं। आखिर ऐसे ही तो हम विश्वगुरु और महान नहीं हैं।’
       मैंने कहना चाहा, ‘लेकिन यह कहना कि यूरोप में इसके पहले शादियां नहीं होती थीं...’ युवक बीच में ही बोल पड़ा, ‘पता है बड़े बनने का सबसे आसान तरीका क्या है, दूसरे को नीचा दिखा दो।’ मैंने फिर कहना चाहा, ‘पर इस प्रेम प्रकट करने के पर्व का विरोध क्यों, जबकि हमारे यहां भी पहले वसंतोत्सव व चंद्रोत्सव जैसे पर्वों और कृष्ण के प्रेम के कई उदाहरण....’, उसने फिर बीच में बात काटी और बोला, ‘ज्ञानीजन कहते हैं कि ईश व स्व-संस्कृति की निंदा करना और सुनना पाप है। देशद्रोह है। आप पर ज़रूर देशद्रोह का मुकदमा चलेगा। मैं चलता हूं, भावी पत्नी इंतजार कर रही होगी।’

शनिवार, 5 जनवरी 2013

ज़रूरत शिक्षा की: ताकि दामिनी खुलकर चमके


-रजनीश ‘साहिल’

(3 जनवरी 2013 को दैनिक जनवाणी, मेरठ में प्रकाशित अंश)
16 दिसंबर की रात आज की रात से कहीं ज़्यादा सर्द थी। शायद इन सर्दियों की सबसे सर्द रात। इस मायने में नहीं कि ठिठुरन से हाथ-पांवों ने चलना बंद कर दिया था, बल्कि इस मायने में कि उस रात दिलो-दिमाग ने भी चलना बंद कर दिया था। जिसे भी वाकये की खबर लगी उसके पास बस एक सवाल था, ‘आखिर कोई इतना बर्बर कैसे हो सकता है?’ जवाब देने लायक दिमाग शायद ही किसी का चल रहा हो, सब बंद हो चुके थे। बलात्कार की खबरें लोग रोज की अखबारों में पढ़ते हैं, न्यूज चैनलों पर देखते हैं, थोड़ी ‘हाय-हाय, धिक्-धिक्’ करते हैं और फिर लग जाते हैं अपने काम में। पर इस बार ऐसा नहीं कर सके। उन्होंने अपने काम छोड़े, एकत्रित हुए, सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, देश के अलग-अलग हिस्सों में भी, और दोषियों को सजा, कानून में बदलाव की मांग की आवाजें उठाईं। दामिनी बुझते-बुझते भी लोगों को रास्ता दिखा गई।
       महिला अधिकारों की बात सालों से की जा रही है, लेकिन इस घटना के बाद उन्हें इस हद तक राजनीतिक मुद्दा बनते कम से कम बीते दस बरस में तो पहली बार देखा है। पर क्या यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा है? क्या इन घटनाओं पर सिर्फ कानून को सख्त बनाकर काबू पाया जा सकता है? इस कानून की मांग कर रहे लोगों का भी मानना है कि ऐसा नहीं है, क्योंकि यह राजनीतिक से कहीं ज्यादा एक सामाजिक मुद्दा है। और जहां तक बात कानून के सख्त होने की है, तो हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया के उदाहरण मौजूद हैं कि किसी भी अपराध की सजा कितनी भी सख्त क्यों न हो, अपराध फिर भी होते हैं। कहने का आशय यह कतई नहीं है कि कानून सख्त नहीं होना चाहिए, वह सख्त होना चाहिए और इस हद तक होना चाहिए कि उसमें लचीलेपन की कोई गुंजाइश बाकी न रहे। सख्त कानून अपराध की आशंका को मानसिक दबाव के जरिए कम करने में मददगार होता है। पर जब बात महिलाओं के साथ होने वाले यौन दुव्यर्वहार की, और वह भी ताजा आंकडों के परिप्रेक्ष्य में आती है, तो यह और भी साफ हो जाता है कि यह किसी सख्त कानून के बनने, उसके ठीक ढंग से लागू होने, दोषियों को सजा मिलने से कहीं पहले आपके-हमारे बीच के संबंधों और सोच को बदलने की मांग करती है।
       यह बात साफ तौर पर सामने है कि महिलाओं के प्रति यौन हिंसा की घटनाओं में भारत में तेजी से इजाफा हुआ है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक पूरे देश में दर्ज हुए बलात्कार को मामलों में 2010 में 7.1 प्रतिशत और 2011 में 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2012 की रिपोर्ट क्या कहेगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। अब अगर इन कुल दर्ज मामलों के विभाजन पर नजर डाली जाए, तो इस बात पर गर्व करना छोड़ देना होगा कि भारत में स्त्रियों को देवी का दर्जा प्राप्त है, वह घर की लक्ष्मी होती है। कुल दर्ज मामलों में से 94.2 प्रतिशत मामलों में बलात्कार करने वाला उस महिला का अपना पिता, भाई, चाचा, मामा, मौसा, ससुर, देवर, जीजा या ऐसा ही कोई रिश्तेदार या पड़ोसी या पारिवारिक मित्र था। यानी महज 5.2 प्रतिशत मामलों में महिला किसी अपरिचित की कुदृष्टि की शिकार हुई वरना उसे लूटने वाले उसके अपने थे। इस स्थिति में जब ऐसी खबरें आती हैं कि किसी लड़की का पिता उसका दो साल तक लगातार बलात्कार करता रहा, तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था में होने वाले बलात्कार के कितने मामले दर्ज ही नहीं होते। दो साल बाद भी अगर पता न चलता तो कानून-व्यवस्था अंतर्यामी तो है नहीं! यहीं यह सवाल भी खड़ा होता है कि कोई कानून किस हद तक कारगर हो सकता है? इन स्थितियों में कानून की भूमिका सिर्फ सजा देने भर तक सिमट कर रह जाती है; और जाहिर है कि महिला के सम्मान की रक्षा का मतलब उसका अपमान करने वाले को सजा देना भर तो नहीं है।
       महिलाओं के सम्मान और स्वतंत्रता की प्रारंभिक इकाई समाज है। पिछले बहुत थोड़े से वक्फे में ऐसे कई बयान और फरमान सामने आ चुके हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बलात्कार की घटनाओं के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। यह बयान या फरमान समाज के ही प्रतिष्ठित लोगों द्वारा दिए गए हैं। कुछ तथ्यों पर नजर डालना जरूरी हो जाता है, जो इन बयानों और फरमानों की की धज्जियां उड़ाते हैं, जिनमें लड़कियों के कम कपड़़े पहनने का, मोबाइल इस्तेमाल करने का या लड़कों से संपर्क बढ़ने का हवाला दिया गया।
       एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार के कुल दर्ज मामलों में से लगभग 11 प्रतिशत मामलों में पीड़िता की उम्र 14 वर्ष से कम थी। क्या 14 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं के बलात्कार के संदर्भ में भी यह तर्क दिए जा सकते हैं? ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिनमें पूरी तरह पारंपरिक पोशाक पहने, बुर्के में सिर से पांव तक ढंकी महिलाएं भी बलात्कार की शिकार हुई हैं। मोबाइल का तर्क तो और भी बचकाना है। स्टॉकिंग, यानी फोन पर परेशान करने, अश्लील मैसेज भेजने, अभद्र बातें करने और धमकाने के लगभग 91 प्रतिशत मामलों में लड़के दोषी पाए गए हैं।
       इन तथ्यों और इन बयानों से साफ जाहिर होता है कि गड़बड़ी कहीं न कहीं हमारी सामाजिक व्यवस्था और सोच में है। तभी तो घर के भीतर से लेकर समाज के बाहरी हिस्सों तक हर कोई महिलाओं को ही बचकर निकलने की, कन्नी काट जाने की सलाह देता है, जबकि यह पुरुषों से कहना ज्यादा जरूरी है कि वे महिलाओें को ससम्मान निकलने के लिए रास्ता दें।
       यदि बारीकी से देखें, तो बलात्कार का मुद्दा कई और मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है। यह जानकर शायद आपको हैरानी हो कि डायन कहकर मार डाले जाने के कई मामलों के मूल में किसी पुरुष द्वारा महिला को हासिल करने की कोशिश और महिला का प्रतिरोध रहा है। असफल होने पर पुरुष का दंभ अशिक्षित और अंधविश्वासी  समाज में डायन प्रथा का रूप लेता है, तो शिक्षित समाज में प्रताड़ना के नये-नये तरीके अपनाता है। यह संभवतः पुरुष होने का दंभ और स़्त्री को कमजोर समझने की पीढ़ियों से हासिल हुई ट्रेनिंग ही है जो मणिपुर से लेकर छत्तीसगढ़ तक, मनोरमा से लेकर सोनी सोरी तक महिलाएं सुरक्षा और शांति के लिए तैनात फौज और पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार की शिकार होती हैं, और उतनी ही बर्बरता से जितनी बर्बरता से दिल्ली में दामिनी। यह एक पितृसत्तात्मक समाज का, पुरुष होने का दंभ ही है, वरना ऐसा करने की इजाजत उन्हें कानून या संविधान ने तो नहीं दी।
       कुल मिलाकर सारे तथ्य इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इन घटनाओं के पीछे की सबसे महत्वपूर्ण वजह महिलाओं के बारे में वह सोच है, जो उन्हें पुरुष से कमतर मानती है। यानी यह एक सामाजिक व्यवस्था की कमी है। निश्चित है कि इस कमी को एक झटके में जादू के जोर से दूर नहीं किया जा सकता। यह एक सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया है, जो वक्त लेगी। लेकिन इसके लिए संदर्भित कानून के प्रस्तावों में से उस प्रस्ताव पर गंभीरता से ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है जो सबसे जरूरी है, और जिस पर कि शायद अब तक सबसे कम बात की गई है। शिक्षा में जेंडर इक्वलिटी और उससे जुड़े बिंदुओं को विषय के रूप में शामिल किए जाने का प्रस्ताव। विचार, सोच की पुरातन बेड़ियों को हमेशा से ही नये ज्ञान स्रोतों और अध्ययन की नयी कोशिशों  ने काटा है। कानून समाज को नियंत्रित रखने की एक पद्धति है, जिसका होना भी ज़रूरी है; लेकिन समाज में बदलाव हमेशा एक सकारात्मक विचार और ज्ञान स्रोतों के माध्यम से आया है। इसलिए इन स्थितियों में बदलाव लाने का और सही मायनों में महिला और पुरुष को बराबरी पर खड़ा करने का इससे बेहतर कोई और विकल्प संभव नहीं है कि हम न केवल अपनी अकादमिक शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाएं, बल्कि ऐसे विकल्प भी तलाशें जिनके माध्यम से समाज के हर तबके में महिलाओं के प्रति बराबरी और संवेदनशीलता के बीज बोए जा सकें। संविधान और कानून व्यवस्था में तो अब तक कई संशोधन हम करके देख चुके हैं, क्यों न इस बार शिक्षा में संशोधन करके देख लिया जाए, ताकि आने वाले समय में कोई दामिनी अपने सपनों के फलक पर खुल कर चमक सके और हमें शर्मसार न होना पड़े।

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

ताकि जब चाहें वे चुन सकें फूल

बार-बार लिखता हूँ और डिलीट कर देता हूँ। क्योंकि बात एक नहीं कई हैं जो दिलो दिमाग में घुमड़ रही हैं।  क्योंकि बात सिर्फ एक दामिनी की या एक शहर और उसके प्रशासन व समाज व्यवस्था की नहीं है। रोज़ देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग अख़बारों में न जाने कितनी ही दामिनियों का ज़िक्र होता रहा है और अब भी जारी है, जो इस इंतजार में हैं कि उन्हें वह मिले जिसे देने की ज़िम्मेदारी समाज और सरकार दोनों पर है, नैतिक भी और संवैधानिक भी। यानी बराबरी का अधिकार, स्वतंत्रता और शोषण मुक्त समाज।....
      समाज, जो अब तक पितृ सत्तात्मक सोच से मुक्त नहीं हो पाया।... सरकार, प्रशासन और तथाकथित राजनीति, जिसकी मंशा पर एक प्रश्न खड़ा करते ही पचास प्रश्न अपने-आप खड़े हो जाते हैं।... और फिर हम खुद, जो अच्छी-अच्छी बातों को बस नारा बनाकर दोहराने के आदी हो गए हैं। मणिपुर, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, असम, देश के किस हिस्से से यह दामिनी सामने आकर खड़ी नहीं हुई?
     बार-बार लिखता हूँ और डिलीट कर देता हूँ। क्योंकि बहुत कुछ एक साथ और तरतीब से लिखने लायक शांत दिमाग फ़िलहाल मुझमे नहीं है। बस बहुत साल पहले लिखी एक कविता और कुछ अरसा पहले ही बनाया गया एक अधूरा चित्र बार-बार याद आ रहा है-


मैंने कहा
बहार आई है
उन्होंने कहा
ख़ुशगवार है

मैंने कहा
नयी कोपलें फूटी हैं
उन्होंने कहा
कितनी कोमल हैं

मैंने कहा
पौधों पर
हरियाली छा रही है
उन्होंने कहा
कितनी मनमोहक है

मैंने कहा
फूल खिल रहे हैं
उन्होंने कहा
कितनी सुंदर पंखुड़ियाँ हैं

मैंने कहा
फूलों की सुरक्षा के लिए
उग आए हैं काँटे भी
उन्होंने कहा
काँटे नष्ट कर दो

फिर उन्होंने तान दिये
फूलों के चारों ओर
कंटीले तार
ताकि जब चाहें
वे चुन सकें फूल।

सोमवार, 12 नवंबर 2012

बीमार मानसिकता और शब्दों से बलात्कार


मुझे नहीं पता कि क्या लिखूँगा? कुछ लिख भी पाऊँगा या नहीं? पर आज बहुत बेचैनी और गुस्सा है। किसके ख़िलाफ़? मुझे नहीं पता। आख़िर पता हो भी कैसे सकता है? कोई एक नाम या शक्ल सामने नहीं है। है तो बस एक विशेष पहचान, एक विशेष भाव, एक बीमार मानसिकता, जिससे ग्रस्त हजारों लोग हमारे बीच हैं। चाहे अपनों की बात हो, चाहे गली-मोहल्ले की या फिर शहर, देश, दुनिया की, एक स्त्री की ‘औकात’ क्या है? क्या सिर्फ यही उसका अंतिम अस्तित्व है कि पुरुष किसी भी बहाने से उसकी देह को भोगे, वास्तविकता में नहीं तो कल्पनालोक में ही सही! 
     छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाएं जिस गति से बढ़ रही हैं और जितना उनके बारे में लिखा, कहा जा रहा है वह तो सबके सामने है, पर एक स्त्री के लिए संकट सिर्फ तब ही नहीं है, जब वह पुरुष की पहुँच में है। बहुत सारे लोगों ने किसी लड़के को किसी लड़की के बारे में अनाप-शनाप बकते सुना होगा, आपने भी। यहां तक कि अगर उनके बीच रहे निःतांत निजी अंतरंग संबंधों के बारे में भी सुना हो तो कोई बड़ी बात नहीं। 
पर क्या जो कुछ आपने सुना वह सच ही होता है? जी नहीं, ऐसा कतई जरूरी नहीं है। एक स्त्री का पुरुष की पहुँच में न होना भी इन बातों को जन्म देता है। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी घटनाओं का खुली तरह से उल्लेख करना भी परेशानी का सबब बन सकता है, इसलिए इससे परहेज ही रखूँगा, लेकिन ऐसी कई घटनाओं की तह में जाने का जो नतीजा हासिल हुआ वह यह है कि किसी लड़की के साथ अपने या किसी और के अंतरंग संबंधों के अधिकांश किस्से एक बीमार मानसिकता, यौनिक कुंठा, उस लड़की को हासिल करने की दबी हुई इच्छा और उसके पूरा न होने के कारण उपजे हैं। उदाहरण के लिए बिना व्यक्ति और शहर का नाम लिए एक किस्सा कुछ यूं है- 
     एक लड़की पढ़ाई के लिए किसी दूसरे शहर में थी। वह बीमार हुई तो उसी शहर में मौजूद अपने रिश्तेदार के घर चली गई और तकरीबन 15-20 दिन वहीं रही। जब तबियत ने सुधरने का नाम नहीं लिया तो उसके रिश्तेदार का बेटा, जो कि रिश्ते में उसका भाई था, उसे उसके घर छोड़ आया। लड़की बड़ी ही कमजोर हालत में अपने घर पहुंची और एक महीना वहीं रही। इस दौरान वह घर से बाहर भी बहुत कम निकली। जब वह वापस अपनी पढ़ाई के लिए पहुंची तो सारा माहौल बदला हुआ था। सहपाठी लड़के और लड़कियां उसे अजीब से नज़रों से देखते, शोहदे चुटकियां लेते हुए अभद्र इशारे करते। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसकी वजह तब सामने आई जब उस लड़की का वह भाई, जो मेरा करीबी था, एक दिन बेहद गुस्से में भरा मेरे साथ था। गुस्सा इतना था कि उसकी आवाज़ कांप रही थी, हालात को सही न कर पाने की बेबसी इतनी थी कि गला भर-भर आता था। हुआ यह था कि उस लड़की के साथ ‘संपर्क’ बढ़ाने के ख़्वाहिशमंद एक लड़के ने शराब के नशे में उस लड़की को लेकर अपने कुंठित सपने कुछ दोस्तों को कह सुनाए, कुछ इस ढंग से कि ‘मेरा उसके साथ पुराना संबंध है..., वह बहुत .... है, दोनों कई रातें साथ गुजार चुके हैं आदि-आदि’ और फिर अंतरंग संबंधों का वर्णन। 
     ...अब बात तो बात होती है, एक मुंह से निकली तो सार्वजनिक संपत्ति हो जाती है। कुछ उस लड़के की कल्पना और कुछ जिस-जिस तक बात पहुँची उसकी कल्पना, लब्बोलुआब यह कि लड़की प्रेगनेंट हो गई थी, गर्भपात कराना पड़ा जिसकी वजह से उसकी हालत गिर गई थी। बात यहाँ-वहाँ फैली और लड़की के दामन पर एक ऐसा दाग लगा गई कि वह न जाने कितनी नज़रों के लिए बस एक ‘भोग्या’ भर बन कर रह गई। एक लड़के की कुंठित मानसिकता के अपराध की सजा यह कि वह लड़की कहीं निकलती तो अपनी नज़रें नीची करके, ताकि वह किसी की नजरों का सामना न करे जिनमें तमाम तरह के सवाल और कीड़े बिलबिलाते दिखाई देते थे। 
     ऐसे कई मामलों की कभी भनक पड़ी, तो कई के बारे में बहुत करीब से जाना। आज जब फिर से किसी के दामन पर ऐसी ही कीचड़ उछलते देखी (जिसके निर्दोष होने का इत्तफ़ाकन मैं खुद गवाह हूँ) तो उस लड़की के भाई के रुंधे गले से निकली वह बात किसी खंजर की तरह फिर दिल में उतर गई कि ‘भैया, मुझे पता है कि मेरी बहिन निर्दोष है। अगर यह बात सच होती तो क्या हमें पता न चलता? वह जिस दिन बीमार हुई थी उसी दिन हमारे घर आ गई थी। मैं खुद उसे डॉक्टर के पास लेकर गया था, उसे तो बस टाइफाइड हुआ था। लेकिन यह बात मैं किस-किस को समझाऊँ? किस-किस का मुँह पकड़ूँ? उस ..... लड़के को मैं खुद मार डालूं या पुलिस कार्यवाही करूँ, तो भी यह बदनामी पीछा नहीं छोड़ेगी। बेचारी को घर से निकलते डर लगता है। आखिर मैं करूँ तो क्या करूँ?’ 
     उसके इस ‘क्या करूँ?’ का जवाब न तब मेरे पास था, न आज है। किसी एक को समझाया भी जा सकता है, पर..... बात तो बात होती है, एक बार मुँह से निकली तो सार्वजनिक संपत्ति हो जाती है। 
     बलात्कार को एक गंभीर अपराध माना जाता है। क्या यह भी बलात्कार नहीं, जिसे एक कुंठित बीमार मानसिकता महज शब्दों से ही अंजाम देती है। क्या इन घटनाओं की शिकार लड़कियाँ भी उसी मानसिक वेदना और परिस्थिति से नहीं गुजरतीं, जिनसे एक बलात्कार पीड़िता गुजरती है। वह भाई ‘क्या करूँ?’ का गंभीर प्रश्न करने के बाद रोने लगा था। ऐसे में इन परिस्थितियों की शिकार हुई लड़की पर क्या गुजरती होगी, इसका शायद अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। 
     छोटे-बड़े कस्बों-शहरों में न जाने कितनी लड़कियाँ रोज ही इस कुंठाग्रस्त मानसिकता द्वारा शब्दों से किए गए बलात्कार की शिकार होती हैं। शायद उससे कहीं ज्यादा जितनी कि शारीरिक बलात्कार की शिकार होती हैं। और जब शारीरिक अपराध की शिकायत दर्ज कराने में आज भी बदनामी बढ़ने के ख़तरे के बारे में पहले सोचा जाता हो, वहाँ  इस शाब्दिक अपराध की शिकायत भला कितनी होती होगी? और शिकायत भी क्या कि ‘यह कल्पनाओ में मेरे साथ.....’ या ‘इसने लोगों से कहा कि इसने मुझे इस-इस तरह से....।’ 
     यहाँ यह बात भी गौरतलब है कि कस्बों में पुलिस को रिपोर्ट लिखाते वक्त यह लिखाने से काम नहीं चलता कि ‘अश्लील बातें कहीं’ या ‘अश्लील हरकतें कीं’, वह सब हू-ब-हू वैसा ही लिखाना होता है, जैसा कि कहा गया या किया गया। माँ-बहन की गालियों से लेकर अंगों के नाम और उनसे की गई हरकतों तक। और फिर इस तरह के मामलों को सुलझने में लगने वाले वक्त के दौरान न जाने कितनी ही बार लजा देने वाली परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं। पुरुष इस बेशर्मी का सार्वजनिक रूप से जितना आदी और अभ्यस्त है, महिलाएँ अब तक नहीं हैं। शायद यही वजह है कि इस अपराध की शिकायत अमूमन नहीं ही होती और एक व्यक्ति की कुंठा और सड़ी-गली कल्पनाओं की बदबू का बादल एक निर्दोष के जीवन में कई बार इस तरह छा जाता है कि उसके कॅरियर और भविष्य के उजालों को ग्रहण लग जाता है। 
     वर्तमान स्थितियों में यह मानसिकता सिर्फ शब्दों को मुँह से निकालने तक ही सीमित नहीं है। इंटरनेट पर न जाने कितनी लड़कियों की पहचान का इस्तेमाल करके फेक अकाउंट हैं, पोर्न साइट्स बॉलीवुड, हॉलीवुड से लेकर आपके-हमारे बीच की स्कूल-कॉलेज की छात्राओं, घरेलू और कामकाजी महिलाओं की मॉर्फ़ और फेक तस्वीरों से भरी पड़ी हैं। तकनीक का इस तरह दुरुपयोग करने में भारत सबसे अव्वल है। बावजूद इसके आलम यह है कि इन फेक अकाउंट्स की शिकायत करने के बाद भी उनमें से कई बंद नहीं होते, चलते रहते हैं।
     यह सच है कि किसी के दिमाग पर काबू नहीं पाया जा सकता है, उसे सोचने से रोका नहीं जा सकता लेकिन गुस्सा इस बात का है कि इस तरह की सोच को व्यक्त करने पर भी जो दोषी है उसके बजाय निर्दोष ही क्यों दण्डित और परेशान होता है? क्या कभी सुना है कि किसी लड़की ने एक लड़के के बारे में ऐसा-वैसा कुछ कहा हो और उस लड़के का किसी से नजरें मिलाना मुश्किल हो गया हो? नहीं न! और अगर लड़के के बारे में ऐसा कह भी दिया जाए, तो भी लड़का ‘मर्द का बच्चा’ कहलाएगा, मगर लड़की, एक स्त्री..... क्या है वह? वह तो इन बीमारों के लिए बस एक मांस का लोथड़ा भर है और बाकी समाज के लिए ‘इज्जत’ की टोकरी सिर पर उठाने वाली सबसे कमजोर कड़ी। किसी ने कुछ कहा नहीं कि ‘इज्जत’ गई नहीं। 
     कितनी हैरत की बात है कि बीमार पुरुष है और तकलीफ स्त्री सहन करती है, बेइज्जत महिलाओं को किया जाता है और इज्जत की टोकरी भी उन्हीं के सिर पर लाद दी जाती है। इलाज भी महिलाओं के लिए नियम बनाकर खोजे जाते हैं। सभ्यता, संस्कृति और स्त्री के पूजनीय होने की झंडाबरदारी करने वाले बताएँ कि उनके पास इस बीमारी का क्या इलाज है? यह सवाल इसलिए नहीं है कि कोई संस्कृति रक्षा आंदोलन चलाना है, न ही कोई नैतिकता का पाठ पढ़ाना है, बल्कि इसलिए है कि महिलाओं के सिर पर इज्जत का ठीकरा फोड़ने वाली, बात-बात पर संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देने वाली, नैतिकता का झंडा उठाए फिरने वाली और आज भी भीतर से पुरुषवादी यह समाज व्यवस्था पुरुषों की ‘बदतमीजी’ और महिलाओं के ‘सब्र’ के फर्क को समझे, कुंठित और बीमार मानसिकता के इस शाब्दिक अपराध के दूरगामी प्रभावों-परिणामों के बारे में सोचे, अपने गिरेबां में झांके और इस सवाल का जबाब दे, जो ऐसी परिस्थितियों में किसी भी महिला और उसके हितचिंतकों के सामने खड़ा होता है कि - ‘क्या करूँ?’