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शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

तुम्हारी आवाज़ अपनी ही तो लगी है


कहते हैं कि अगर आप संगीत की बारीकियों को समझते हैं तो इसका आनंद दोगुना हो जाता है. सुर-ताल-लय, राग-रागनियाँ, आरोह-अवरोह के ज्ञान के साथ इस समंदर की लहरों का कुछ अलग ही भान होता है. कुछ अलग ही मज़ा आता है स्वरलहरियों पर तैरने का. पर जब मामला डूबने का हो, तब! 

.....तब कहाँ याद रहता है कि उंगलियों पर दादरा, कहरवा, रूपक या दीपचंदी की चाल पकड़ी जा रही है या नहीं, कि जो किसी किनारे से रिसता हुआ मन को धीरे-धीरे भिगोये दे रहा है वह मल्हार है या मेघ मल्हार, कि कब कौन सा सुर कोमलता से छू गया और कौन सा बार-बार अपने होने को हठात जता रहा है. बस एक आवाज़ गूँजती है कानों में और हम चल पड़ते हैं उसके पीछे-पीछे, चले जाते हैं उतरते हुए..... गहरे और गहरे.

कितना अद्भुत है न कि कभी-कभी कैसे बस एक आवाज़ सुनते हुए अचानक हम उसे जीने लग जाते हैं. लगने लगता है मानो अपने ही भीतर से गूँज रही हो वह. कितनी भूली-बिसरी टीसें कचोटने लगती हैं जब ये आवाज़ कहती है कि कसमें-वादे सब बस बातें भर हैं, कितना क्षणभंगुर सा लगने लगता है जीवन और जब पिंजरे वाली मुनिया के यहाँ-वहाँ जा बैठने का किस्सा सुनाई देता है तो इसी जीवन में कितने रस दिखाई देने लगते हैं. कभी इसी आवाज़ के सहारे प्यार के इक़रार और इश्क़ में डूबकर हँसते हुए जान और ईमान कुर्बान कर देने का दिल हो उठता है तो कभी यही दिल खिले हुए फूलों के बीच ख़ुद के मुरझाने के ग़म में डूब-डूब जाता है और एक हूक सी उठती है कि अब जब सुर ही नहीं सजते तो आख़िर क्या गाऊँ.

अब यह उस आवाज़ का जादू नहीं तो और क्या है कि वह मुड़-मुड़ के न देखने की हिदायत देती हुई भी उतनी ही अपनी लगती है जितनी मधुर चाँदनी के तले मिलन को वीराने में बहार की उपमा देते हुए लगती है. और तब तो कमाल ही कर देती है जब शास्त्रीय संगीत की जटिलताओं में उलझाए बिना हमारे ही विनोदी स्वभाव में लपकते-झपकते बदरवा को बुलाती है या किसी चतुर नार की होशियारी पर चुटकी भरती है.


किस-किस अंदाज़ की बात की जाए. हर मूड, हर अंदाज़ में तुम्हारी आवाज़ अपनी ही तो लगी है मन्ना डे.

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

दादासाहब फालके: बोलते रास्तों का खामोश सूत्रधार


 दादा साहब फालके
पुण्यतिथि: 16 फरवरी 
आज बैकग्राउण्ड म्यूजिक, स्पेशल इफेक्ट्स, सराउण्ड साउण्ड और विविध कैमरा तकनीकों की मौजूदगी में दिखाई देने वाले अभिनेता के सिर्फ़  आंगिक अभिनय पर ध्यान दे पाना आसान नहीं रहा है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि अभिनय में यदि कोई कमी रह जाती है, तो उसे संगीत और इन विविध तकनीकों के सहारे ‘कवर’ किया जा सकता है। अब ज़रा सोचिये कि उस वक़्त में, जबकि फिल्मों में आवाज़ भी नहीं हुआ करती थी, तब कहानी के एक-एक भाव को महज़ आंगिक अभिनय के ज़रिये ही जीवंत करना अभिनेताओं के लिए और उसका बेहतरीन ढंग से फ़िल्मांकन करना फ़िल्मकारों के लिए कितनी बड़ी चुनौती होती होगी। खासकर तब, जब आज जैसी उन्नत तकनीक भी फ़िल्मांकन  के लिए उपलब्ध नहीं थी। लेकिन तब भी फ़िल्में बनती थीं और ऐसा करने की शुरुआत जिस शख्स ने की उसका नाम आज भी भारतीय सिने जगत का सबसे बड़ा नाम है। यह नाम है ढुंडिराज गोविन्द फालके यानी दादासाहब फालके का। 
भारतीय सिने जगत के पिता कहे जाने वाले दादा साहब फालके ने जिस दौर में फिल्में बनाना शुरू किया था, उस दौर में इतिहास और मिथकों के महान पात्रों की कथाओं का वर्चस्व रहा। इन पात्रों की कहानियाँ सुनी भी जाती थीं और रंगमंच पर प्रदर्शित भी की जाती थीं। फ़िल्मों में इन पात्रों को प्रदर्शित करने की शुरुआत दादासाहब फाल्के ने 1913 में फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ से की। इसी फ़िल्म को पहली भारतीय फ़ीचर फ़िल्म होने का गौरव हासिल है। बहरहाल, हम यहाँ बात भारत की पहली फ़ीचर फ़िल्म की नहीं, उसे बनाने वाले की कर रहे हैं। दादा साहब फालके ने जिन 90 फ़िल्मों का निर्माण किया, उनमें से अधिकाँश की कहानियाँ धार्मिक पृष्ठभूमि की थीं। यह उस दौर का प्रभाव तो था ही, लेकिन उससे कहीं ज्यादा प्रभाव था ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ का। 
मूक फ़िल्म ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ दादा साहब फालके ने 1910 के आसपास तब देखी थी जब उन्होंने अपने तीसरे व्यवसाय यानी प्रिंटिंग प्रेस को छोड़ा था। इस मूक फिल्म को देखकर ही उनके मन में विचार आया था कि क्यों न भारतीय देवताओं को परदे पर उतारा जाये। इसी विचार की व्यावहारिक परिणति थी ‘राजा हरिश्चंद्र’, जो 1912 में बनकर तैयार हुई, 3 मई 1913 को मुंबई के कॉरोनेशन सिनेमा में प्रदर्शित हुई और जिसके साथ एक विवाद भी जुड़ा। विवाद यह था कि इसके एक साल पहले ही रामचन्द्र गोपाल यानी दादा साहब तोरने ने एक नाटक ‘पुण्डालिक’ का फिल्मांकन किया था और इसी सिनेमाघर में उसे प्रदर्शित भी किया था। इस लिहाज से ‘पुण्डालिक’ को भारत की पहली फ़िल्म कहा जाना चाहिये था। बावजूद इस विवाद के ‘राजा हरिश्चंद्र’ को भारत की पहली फ़ीचर फ़िल्म और दादा साहब फालके को भारतीय सिनेमा का जनक होने का ख़िताब हासिल हुआ, क्योंकि यह पूरी तरह से भारतीय कलाकारों द्वारा बनायी गयी फिल्म थी, जबकि ‘पुण्डालिक’ का फ़िल्मांकन ब्रिटिश सिनेमेटोग्राफर्स ने किया था। इसके बाद दादा साहब फालके धार्मिक और ऐतिहासिक पात्रों पर फ़िल्में बनाते गये और साथ ही शॉर्ट फिल्म्स, डॉक्युमेंट्री पर भी काम करते रहे। इसी सफ़र के आरम्भिक वर्षों में उन्होंने मुम्बई के पाँच व्यवसायियों के साथ मिलकर एक फिल्म कम्पनी ‘हिन्दुस्तान फिल्म्स’ बनायी थी, जिससे जल्द ही 1920 में उन्होंने विदा भी ले ली।
सीमित तकनीक के बावजूद दादा साहब फालके की फिल्मों का कला पक्ष बड़ा ही महत्वपूर्ण रहा है, और ऐसा क्यों है, इसे उनकी पूरी जीवन यात्रा में शामिल कला को जाने बिना समझना आसान नहीं है। त्रयम्बकेश्वर में जन्मे दादा साहब फालके के पिता संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे, जिनसे उन्हें पठन-पाठन की रुचि विरासत में मिली। उन्होंने अपनी शिक्षा भी कला क्षेत्र में ही सर जे जे स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई से प्राप्त की और फिर चले गए कला भवन, बड़ौदा, जहां उन्होंने मूर्तिकला, चित्रकला, फोटोग्राफी और इन्जीनियरिंग की शिक्षा हासिल की। उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत भी एक कला माध्यम के ज़रिये ही की। वह गोधरा में बतौर फोटोग्राफर काम करने लगे थे, लेकिन प्लेग जैसी महामारी में अपनी पत्नी और बच्चे की मौत के बाद उन्होंने गोधरा छोड़ दिया। इसी समय में उनकी मुलाकात हुई जर्मन जादूगर कार्ल हर्ट्ज़ से, जिनके साथ उन्होंने कुछ समय बिताया और कला के एक नये आयाम नज़दीकी से जाना-समझा। फिर उन्होंने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया में बतौर ड्राफ्टमैन काम किया। भले ही उन्होंने ड्राइंग की शिक्षा हासिल की थी, लेकिन इस नौकरी में सिर्फ एक मशीनी हाथ की तरह काम करना उन्हें रास नहीं आया। प्राप्त की हुई शिक्षा का कलात्मक उपयोग करने का विचार हमेशा मन को विचलित करता रहा, सो उन्होंने प्रिंटिंग का व्यवसाय अपनाया। लिथोग्राफी और ओलियोग्राफ में विशिष्टता हासिल की, जर्मनी जाकर नई मशीनरी को समझा और काम शुरू किया प्रख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा के साथ। यह काम उनकी रुचि का था, लेकिन इसे उन्होंने अकेले नहीं बल्कि पार्टनरशिप में शुरू किया था. जल्द ही पार्टनर से कुछ व्यावसायिक और वैचारिक मतभेद सामने आने लगे, नतीजतन उन्होंने यह काम भी छोड़ दिया। इसी वक़्त में उन्होंने देखी थी ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट।’ 
यह उल्लेखनीय है कि दादा साहब फालके ने जब भी कोई काम शुरू किया, कला के नये माध्यम में किया। पहले फोटोग्राफी, फिर ड्राइंग, फिर पेंटिंग और फिर फ़िल्म। शायद यही वजह रही कि उन्होंने कला के विविध रूपों की बारीक़ी को नज़दीकी से जाना-समझा और जब फ़िल्म बनायी तो सबके सम्मिलन से कलापक्ष प्रभावी हो उठा। चूंकि फ़िल्में मूक थीं और महज़ शारीरिक हाव-भाव से ही सब कुछ बयाँ करना था, इसलिये उन्होंने आंगिक अभिनय पर भी गंभीरता से काम किया।
यह भी एक महत्वपूर्ण बात है कि उन्होंने कला और व्यावसायिकता के बीच समझौते को कभी स्वीकार नहीं किया। प्रिंटिंग व्यवसाय में भी जब कला से ज्यादा व्यवसाय को तरजीह देने के बात आई तो उन्होंने उस व्यवसाय को ही अलविदा कह दिया। ठीक यही आलम ‘हिन्दुस्तान फिल्म्स’ के साथ रहा। 1920 में अपने पार्टनर्स से मतभेद के बाद जब उन्होंने हिन्दुस्तान फ़िल्म्स छोड़ी, तब घोषणा कर दी थी कि अब वह फ़िल्में नहीं बनाएंगे। इसके बाद वह लेखन में जुट गये और लिखा चर्चित नाटक ‘रंगभूमि।' हालाँकि उन्होंने फ़िल्म न बनाने की घोषणा कर दी थी, लेकिन जब हिंदुस्तान फ़िल्म्स आर्थिक संकट से जूझने लगी तो एक बार फिर उन्होंने इसकी कमान सँभाली।
यूँ तो दादासाहब फालके अपने जीवन में नये-नये कला माध्यमों और तकनीक को अपनाते रहे थे, लेकिन फ़िल्मों के मामले में आगे चलकर वे ऐसा नहीं कर सके। 1931 में पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम आरा’ के आने के साथ मूक फ़िल्मों का आकर्षण कम होने लगा था और दादासाहब फालके बोलती फिल्मों की तकनीक के साथ अपनापा नहीं बना सके। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि वह मूक फ़िल्मों की दुनिया में इतने रच-बस गये थे कि उसके मोहजाल से बाहर आना भी नहीं चाहते थे। बहरहाल, वजह जो भी रही हो, लेकिन 1932 में उन्होंने अपनी आख़िरी मूक फ़िल्म ‘सेतुबंधन’ रिलीज की और बतौर निर्माता उनकी आख़िरी फ़िल्म थी 1937 में आई ‘गंगावतरण।’
16 फरवरी 1944 को नासिक में दादासाहब फालके की मृत्यु के साथ ही भारतीय सिनेमा का मूक फिल्मों का अध्याय भी बन्द हो गया। बिना आवाज़ के शुरू हुआ यह श्वेत-श्याम सफ़र अब जब 100 साल की यात्रा में रंग, ध्वनि, तरंग में आ चुका है और कल्पनालोक से बाहर निकलकर यथार्थ की बात भी करने लगा है, तब पीछे मुड़कर देखने पर हम पाते हैं कि दादासाहब फालके उस सूत्रधार की तरह थे, जिसकी ख़ामोश शुरुआत ने भविष्य के पात्रों को आवाज दी।

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

मंटो: थप्पड़ मारने वाला कहानीकार

 -रजनीश ‘साहिल’
‘सब कुछ अच्छा भला चल रहा था। दिन-रात, चौबीस घंटे कभी विज्ञापन में, तो कभी धारावाहिकों-फ़िल्मों में दिखती साड़ी से लेकर बिकनी तक में मौजूद देहयष्टि की कल्पना करते दिमाग को जो कुछ पढ़ने में मज़ा आ सकता था, उसके लिहाज से सब अच्छा भला ही चल रहा था। फिर अचानक लगा कि किसी ने अपनी पूरी ताकत से एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया हो। एक ऐसा थप्पड़, जो रंगीन कल्पनाओं की दुनिया से खींचकर सीधे उस हकीकत से रू-ब-रू कराता है, जो तकलीफ़देह है, घिनौनी है, इंसान के जानवर होने की तसदीक़ करती है और जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। और भी कुछ ऐसा महसूस होता है यार, जिसे मैं कह नहीं पा रहा हूं।’
     जब मेरे मित्र ने मुझसे यह कहा था, तब मैं बखूबी समझ रहा था कि वह क्या महसूस कर रहा है, क्या कहना चाहता है, जिसके लिए सही शब्द नहीं ढूंढ पा रहा है। वह जो कुछ महसूस कर रहा था, तकरीबन वैसा ही कुछ मैंने भी महसूस किया था, जब उस बदनाम कहानीकार की कहानी सही मायनों में पहली बार पढ़ी थी। फिर जितनी कहानियां पढ़ता गया, हर बार एक थप्पड़ का इजाफ़ा होता गया। मुझे यकीन है कि यह हर उस शख्स के साथ हुआ होगा, जिसने सआदत हसन मंटो की कहानियां पढ़ी हैं, ढंग से पढ़ी हैं।
     एक नजर में मंटो को थप्पड़ मारने वाला कहानीकार कहा जा सकता है, मगर हर कहानी में इस थप्पड़ की किस्म जुदा है। कभी वह झन्नाटेदार थप्पड़ मारते हैं, तो कभी हल्की सी चपत लगाते हैं। उनकी तकरीबन कहानियों में यह भाव है। बावजूद इसके उनकी बहुतेरी कहानियां हैं, जहां इंसान के दुर्भावनापूर्ण चेहरे के अलावा संवेदनाओं से लबरेज़ चेहरे भी दिखाई देते हैं। ‘काली सलवार’ जैसी कहानियां इसका उदाहरण हैं, जहां एक-दूसरे से नितांत दो अजनबी एक-दूसरे की अभिलाषाओं के बारे में सोचते हैं। 
     बहरहाल, मंटो की कहानियों के पात्रों के बारे में अगर बात करें, तो वे आज भी वैसे ही हैं, जैसे मंटो के समय में थे। यानी मंटो की कहानियों के पात्र सर्वकालिक हैं। कल भी वैसे ही थे, आज भी वैसे ही हैं। अपनी एक कहानी ‘सरकंडों के पीछे’ में मंटो खुद शुरुआत में ही लिखते हैं, ‘देखिए मैं उस स्त्री का नाम बताना भूल गया। बात असल में यह है कि उसका नाम कोई मायने नहीं रखता। उसका नाम आप कुछ भी समझ जाइए। सकीना, महताब, गुलशन या कोई और। आख़िर नाम में क्या रखा है।’ सच है, नाम में कुछ नहीं रखा। मंटो की कहानियों के पात्र हमारे चारों ओर हैं। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि मंटो ने उनके बारे में लिखा और हम उनके बारे में सोचने से भी क़तराने लगे हैं। ठीक ऐसे ही जब मंटो लिखते हैं, ‘कौन-सा शहर था, जहां तक मैं जानता हूं आपको मालूम करने और मुझे बताने की कोई जरूरत नहीं।’ तो यकीन जानिए कि जिस जगह का जिक्र मंटो कर रहे हैं, वह पेशावर भी हो सकती है, कोलकाता भी, मुंबई भी और उजाड़ में बसा कोई गांव भी। वह आज की पूरी दुनिया का कोई भी हिस्सा हो सकता है, जहां हर हाल में रोटी का जुगाड़ आज भी सबसे अहम सवाल है।
      मंटो के बारे में अमूमन यही कहा जाता है कि विभाजन, उसके दौरान और उसके बाद की विभीषिका पर उनसे ज्यादा दहलाने वाली कहानियां शायद किसी ने नहीं लिखीं। यह सच भी है, फिर भी मुझे लगता है कि यह मंटो जिस वक्त में कहानियां लिख रहे थे, उस वक्त के हालात से जोड़कर उन्हें देखने का नतीजा है। वरना उन्होंने ऐसी कहानियां भी लिखी हैं जो किसी खास वक्त की हो ही नहीं सकतीं। ठीक है कि आज हालात में काफ़ी तब्दीली आ चुकी है लेकिन ‘हीरामंडी’ के सलाहू और दूदा पहलवान हों, चाहे ‘लायसेंस’ की इनायत उर्फ नीति का अंजाम, आज भी चीजें वैसी ही हैं। आज जिस ढंग से तमाम तरीकों की आड़ में हिंदुस्तान, पाकिस्तान, ब्रिटेन, अमेरिका, अफगानिस्तान और अरब देशों में ऑनर किलिंग के मामले सामने आ रहे हैं, ऐसे में मंटो की कहानी ‘इश्क पर ज़ोर नहीं’ कुछ अलग ढंग की कहानी लगती है। शरुआत में ही मंटो लिखते हैं, ‘लोगों को यह शिकायत है कि मैं रोमांटिक कहानियां नहीं लिखता। मैं अब इश्क़िया कहानी लिख रहा हूं, ताकि लोगों की यह शिकायत भी किसी हद तक दूर हो जाए।’ इसके बाद मंटो बाकायदा एक इश्क़िया कहानी लिखते हैं, जहां नायक जमील पूरी तरह इश्क़ियाया हुआ दिखाई देता है। मगर यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है, जिसका अंत सुखद हो। जमील पूरी कहानी के दौरान इश्क़ तलाशता रह जाता है और अंत में पता चलता है कि मूर्खता की हद तक सादा और सीधी अजरा ने सिर्फ इसलिए ख़ुदकुशी कर ली कि उसे जमील से बेइंतहा मोहब्बत थी और जमील की शादी कहीं और तय हो चुकी थी, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर सकी। जहां तक समझ आता है मंटो ने अजरा की ख़ुदकुशी का ताना सिर्फ इसलिए नहीं बुना कि वह इश्क़ में हार जाने से टूट गई थी। हारना कैसा, जबकि उसने इज़हार-ए-मोहब्बत कभी किया ही नहीं। असल में यह ख़ुदकुशी उन ख़्वाबों की है, जो एक नौजवान स्त्री देखती है, जिनका इज़हार करने तक की उसे इजाज़त नहीं है। आज भी ऑनर किलिंग के नाम पर दुनियाभर के देशों में जो सबसे ज़्यादा आसान शिकार है, वह महिलाएं ही हैं। वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के कारण मारी जा रही हैं, और अजरा बिना व्यक्त किए मर गई। फ़र्क क्या है? 
     देखा जाए तो मंटो उर्दू के वैसे ही कहानीकार हैं, जैसे हिंदी के प्रेमचंद या बांग्ला के शरतचंद्र। या शायद उससे भी कहीं ज़्यादा, क्योंकि इंसानियत को जिस बुरी तरह से झिंझोड़ा जा सकता है, उसकी पराकाष्ठा सिर्फ मंटो के यहां मिलती है। मंटो की कहानियां किसी भी दौर में क़ैद नहीं की जा सकतीं। वह हर दौर में उसी के मुताबिक झंझोड़ती हैं, दिमाग की चूलें हिलाती हैं और सवाल खड़े करती हैं। ‘नंगी आवाज़े’, ‘तमाशा’, ‘दो क़ौमें’, ‘सड़क के किनारे’, ‘नारा’, ‘डरपोक’, ‘नया कानून’ जैसी उनकी तमाम कहानियों का ज़िक्र इस सिलसिले में किया जा सकता है। भले ही यह कहानियां बहुत अलग-अलग तरीके से अलग-अलग चीजों को बयां करती हैं, लेकिन अंतत: हमारे आसपास और बीच की स्थितियों को लेकर सवाल खड़े करती हैं। इसके बरअक्स ‘टोबा टेकसिंह’, ‘काली सलवार’, ‘मंजूर’, ‘हीरामंडी’ जैसी कहानियां इंसान की अतिशय संवेदनशीलता को भी नुमायां करती हैं, जहां कहानी के दो पात्र एक-दूसरे से किसी मुलाहजे में नहीं बंधे हैं, लेकिन एक की तक़लीफ से दूसरा द्रवित होता है। 
     कहानी कहने की विधाओं के बारे में अगर बात की जाए तो मुख्यत: दो किस्म की कहानियां सामने आती हैं। एक वह जो दृश्य वर्णन के साथ-साथ उसके मायने भी साथ ही व्यक्त करती जाती हैं, दूसरी वह जो महज़ एक कथ्य के माध्यम से पूरा दृश्य और उसका विस्तृत आख्यान वर्णित करती हैं। मंटो की कहानियां दूसरी किस्म की हैं, लेकिन फिर भी अलग हैं। वह कहानी लिखते नहीं, सुनाते हैं। अक्सर कहानियों में वह किस्सागो नज़र आते हैं। चाहे वह स्त्री देह का वर्णन हो या अस्पताल में पड़े मरीज़ों के बीच की बातचीत, वह अपनी हर पंक्ति के साथ एक दृश्य दिखाते हैं। दृश्य-दर-दृश्य चलती एक जीवंत कथा कहते हैं और अंत की तीन या चार पंक्तियों में पूरी कहानी की असलियत बयां करते हैं। कुछ इस तरह कि वह आखिरी पंक्तियां ही असली कहानी हो जाती हैं, बाकी पूरा वृत्तांत तो महज़ भूमिका भर लगता है। बकौल वाल्टर बेंजामिन कहानी कहने की आधी कला इसी में है कि सुनाते समय उसे तमाम स्पष्टीकरणों से मुक्त रखा जाए। इस नज़रिए से दुनियाभर के किस्सागो कहानी कहने की जिस शैली को सबसे बेहतर मानते रहे हैं, वही शैली मंटो की कहानियों में मौजूद है, यानी जहां अंत ही सबकुछ है। मंटो ऐसा ही करते हैं, वह कहानी के क्लाइमैक्स के साथ ऐसा कुछ छोड़ जाते हैं, जिस पर बात करनी अभी बाकी है। जिस पर सामाजिक नज़रिये से कदम उठाऐ जाने की अभी भी ज़रूरत बाकी है। अपने शब्दों में कहूं तो यह कि वह हर कहानी के अंत के साथ हमारे मुंह पर एक ऐसा तमाचा जड़ते हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वाकई हम इसी लायक हैं।
(जनपथ के जुलाई 2012 अंक में प्रकाशित)

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

एक मार्गदर्शक की सक्रियता

इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ए के हंगल को याद करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव जितेन्द्र  रघुवंशी से फ़ोन पर हुई बातचीत का छोटा सा हिस्सा...

रंगमंच और फिल्मों में उन्होंने फर्क नहीं किया। वह कहते थे, 'अपनी बात कहने के लिए हर स्पेस का इस्तेमाल करो।’

खुद ए के हंगल ने अपनी आत्मकथा ‘लाइफ एंड टाइम्स ऑफ़  ए के हंगल’ में लिखा है कि ‘जीवन शाश्वत है और जीना सीमित।’ लेकिन एक सीमित जीवन में कितना कुछ पूरी ईमानदारी के साथ ऐसा किया जा सकता है जो शाश्वत जीवन के लिए महत्वपूर्ण होता है, यह उनकी जिंदगी को जानने से पता चलता है। ए के हंगल का जन्म एक फरवरी 1916 को सियालकोट में हुआ था। यह एक अलग बात है कि लंबे समय तक सही जन्मतिथि ज्ञात न होने के कारण उनका जन्मदिन 15 अगस्त को मनाया जाता रहा। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा पेशावर में पाई थी। यहीं वह खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर सरकारी नौकरी की पारिवारिक परंपरा को तोड़ आजादी के आंदोलन में शामिल हो गए। 1931 में जब चंदेर सिंह गढ़वाली ने निर्दोष लोगों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया और इसके जवाब में अंग्रेजों ने सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया, तो इस घटना ने उन्हें बहुत उद्वेलित किया और वे इसके खिलाफ खड़े हुए।
वह आजादी को सिर्फ अंग्रेजों के भारत से चले जाने के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि इसके मूल में बेहतर जिंदगी देखते थे। उन्होंने जीवन-यापन करने के लिए टेलरिंग की, तो टेलर्स यूनियन में सक्रिय भूमिका निभाई। चूंकि कला से उन्हें बचपन से ही लगाव था, उन्होंने बाकायदा संगीत-नाटक की शिक्षा भी ली थी, सो रंगमंच को भी अपनी बात कहने का माध्यम बनाया। यह वह दौर था जब देश न केवल गुलाम था, बल्कि सांप्रदायिकता का माहौल भी था। कुल मिलाकर हालात खराब थे, पुलिस लगातार उनके पीछे लगी रहती थी, लेकिन ए के हंगल सक्रिय थे। यह सक्रियता ताउम्र बरकरार रही। वह गोआ की आजादी के लिए सक्रिय रहे, पड़ोसी देशों से मित्रता के लिए सक्रिय रहे, सीनियर सिटीजन मूवमेंट में सक्रिय रहे और सांस्कृतिक आंदोलनों में तो खैर हमेशा ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ए के हंगल 1947 में अहमदाबाद में आयोजित भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के राष्ट्रीय अधिवेशन में शामिल हुए थे। इसी अधिवेशन में उन्होंने निर्णय लिया था कि वापस कराची जाकर वह पाकिस्तान पीपुल्स थियेटर एसोसियेशन का गठन करेंगे। लेकिन तब भी उनके लिए हालात मुश्किल ही थे। वापस जाकर उन्हें पाकिस्तान सरकार के विरोध का सामना करना पड़ा और दो साल जेल में गुजारने पड़े। 1949 में जब छूटे, तो मुंबई का रुख किया। जब वे मुंबई आए थे, तो उनकी जेब में सिर्फ 20 रुपये थे। वे फ्रीडम फाइटर भी थे और रिफ्यूजी भी, लेकिन उन्होंने इसके आधार पर मिलने वाली पेंशन की मांग नहीं की। उन्होंने इप्टा के साथियों से मुलाकात की और मुंबई इप्टा को फिर से सक्रिय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1985 में इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने और 2002 से अंतिम सांस तक इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे।
ए के हंगल राजनैतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को अलहदा नहीं देखते थे। वे मानते थे कि दोनों ही एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं और आम आदमी दोनों से प्रभावित होता है। उनकी सांस्कृतिक और राजनैतिक गतिविधियों पर हमेशा नजर रहती थी। रंगमंच और फिल्मों में उन्होंने फर्क नहीं किया। वे कहते थे, ‘अपनी बात कहने के लिए हर स्पेस का इस्तेमाल करो।’ शोले में अपने अंधे व्यक्ति के किरदार को वह महज एक किरदार नहीं मानते थे। वह कहते थे कि ‘एक नेत्रहीन व्यक्ति अपनी आंखें खोजता रहता है।’ इस एक वाक्य के बहाने वे समाज, मार्क्स के लेख और वर्तमान परिस्थितियों का जिक्र भी करते थे। वे आजीवन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे और हमारा सांस्कृतिक-राजनैतिक मार्गदर्शन करते रहे। एक आम आदमी के प्रति उनकी सोच और संवेदनशीलता को अपनी आत्मकथा में लिखे उनके इस अंश से समझा जा सकता है कि ‘फिल्म के परदे और नाटक के मंच पर मृत्यु के बाद में पुनर्जीवित होता रहा हूं। क्या इस बार ऐसा कर सकूंगा?’

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

वाह गान में छुपे आह सुर...

बीते कुछ महीनों, सालों में अक्सर ट्रेन में गा-बजाकर पैसा मांगने वालो को देखकर दिल में उठी कुलबुलाहट को शांत करने के लिए उनसे कुछ बेतरतीब बातें की थीं. और जब से उनकी जुबानी, जो कुछ जाना, वो किसी स्थायी और अंतरे की तरह लगातार ज़ेहन में बजता रहा. उनकी लय, ताल और तान में जो सुर शामिल थे, वे 'सा' से 'सा' तक के सात सुरों के अलावा भी थे, जो डायरी की शक्ल में मैंने लिख छोड़े थे, उनसे की गई बेतरतीब बातों की ही तरह बिखरे हुए. थोड़ी कोशिश की थी तरतीब में सजाने की, ताकि कोई धुन बन सके, इसी का नतीजा है यह, जो 'वाह गान में छुपे आह सुरों' के रूप में सामने है. कामयाब कितना हुआ हूँ, पता नहीं....


रविवार, 8 जनवरी 2012

हर बात तो कहता रहा...

न हमने ही कोई बात की, न उसने ही हाल-ए-दिल कहा
खामोशी का एक तार था, जो दरमियाँ बजता रहा

कुछ लफ्ज़ थे जो कहे नहीं, सुने मगर फिर भी गए
चुपचाप लब, पर सरगोशियों का सिलसिला चलता रहा

इक शिकायत उसे रही, मैं दिखा नहीं हँसते हुए
वो ही तो था मेरा आइना, जैसा मैं था दिखता रहा

लिखूं जो उसको ख़त कभी, लिखूंगा क्या उलझन में हूँ
वो इतना मेरे करीब है, हर बात तो कहता रहा

अपनी ख़ामोशी से तू यूँ ही, लेना साहिल हौसला
मौज-ए-दरिया सा जहां, उठता रहा गिरता रहा. 

रविवार, 27 मार्च 2011

तर्क, विनम्रता और दृढ़ता के योग थे कमला प्रसाद

अच्छे आलोचक, साहित्य सर्जक की उनकी भूमिका परसाई रचनावली और वसुधा जैसे प्रगतिशील प्रकाशन से ही स्पष्ट हो जाती है, लेकिन वे इससे कहीं ज्यादा एक कार्यकर्ता और संगठनकर्ता थे। प्रगतिशील लेखक संघ का पूरे देश में विस्तार इसका उदाहरण है। कैंसर के बावजूद सतत कार्य करते कमला प्रसाद 25 मार्च 2011 को हमसे विदा हो गए। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी ने उन्हें इन शब्दों में याद किया।


उनसे आप लड़ सकते थे, नाराज हो सकते थे, लेकिन वो लड़ाई और नाराजगी कायम नहीं रह सकती थी। वे आलोचक थे इसलिए विश्लेषण उनका सहज स्वभाव था, साथ ही वे संगठनकर्ता थे इसलिए अपनी आलोचना सुनने, खामियों को दुरुस्त करने और दूसरों को गलतियां सुधारने का भरपूर मौका देने का जबर्दस्त संयम उनके पास था। कोई अगर एक अच्छे कार्यक्रम की अस्पष्ट सी आकांक्षा भी प्रकट कर दे, तो वे उसके सामने संसाधनों के प्रबंध से लेकर वक्ता, विषय आदि का विस्तृत खाका खींच निश्चित कर देते थे कि कार्यक्रम हो। सक्रियता और गतिविधि में उनका गहरा यकीन था। वे कहते भी थे कि अगर कुछ हो रहा है तो उसमें कुछ गलत भी हो सकता है और उसे ठीक भी किया जा सकता है। पूरी तरह पवित्र और सही तो वही बने रह सकते हैं जो कुछ करते ही न हों।
मध्य प्रदेश के प्रगतिशील लेखक संघ का महासचिव होने के नाते मेरा अनेक इकाइयों में जाना हुआ। हर जगह छोटे-बड़े अनेक साहित्यकार उनसे अपने परिचय का जिक्र करते। मुझे देखने का तो मौका नहीं मिला लेकिन कुमार अंबुज, हरिओम, योगेश वगैरह से कितनी ही बार जाना कि उन्होंने संगठनकर्ता के नाते कितनी ही असुविधाजनक यात्राएं कीं। कहीं से इकाई बनाने का संकेत मिलते ही शनिवार-रविवार की छुट्टी में चल देते। रिजर्वेशन तो दूर की बात, सीट न मिलने पर घंटों खड़े रहकर भी संगठन के विस्तार की चाह में दूर-दूर दौड़े जाते थे। वे अपना वैचारिक और सांगठनिक गुरू परसाई जी को कहा करते थे और उन्होंने अपने गुरू के नाम और काम को आगे ही बढ़Þाया। नामवर जी से लेकर होशंगाबाद के गोपीकांत घोष तक उन्हें कमांडर कहते थे। कार्यक्रम की योजना वे कमांडर की ही तरह बनाते भी थे और फिर एक साधारण कार्यकर्ता की तरह काम में हिस्सा भी बंटाते थे, लेकिन कभी शायद ही किसी ने उन्हें आदेशात्मक भाषा में बात करते सुना हो। उल्टे हम कुछ साथियों को तो कई बार कुछ अयोग्य व्यक्तियों के प्रति उनकी उतनी विनम्रता भी बर्दाश्त नहीं होती थी। लेकिन सांस्कृतिक संगठन बनाने का काम तुनकमिजाजी और अक्खड़पन से नहीं, बल्कि तर्क, विनय और दृढ़ता के योग से बनता है, यह सीख हमने उनके काम को देखते-देखते हासिल की। उनको याद करते हुए राजेन्द्र शर्मा की याद न आए, मुमकिन ही नहीं। राजेन्द्र शर्मा ने जैसे उनके काम में जितना हो सके उतना हिस्सा बंटाने को ही अपना मिशन बना लिया था।
कमला प्रसाद की प्रतिष्ठा आलोचक के रूप में, लेखक व संपादक के रूप में खूब रही है। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने सांगठनिक कार्य का चयन अपनी प्राथमिकता के तौर पर कर लिया था और इसलिए अपनी लेखकीय क्षमताओं के भरपूर दोहन के बारे में वे बहुत सजग कभी नहीं रहे। उनका अपना लेखन, किसी हद तक पठन-पाठन भी, संगठन के रोज के कामों के चलते किसी न किसी तरह प्रभावित होता ही था। फिर भी उन्होंने खूब लिखा। 'वसुधा' में उनके संपादकीय तो अनेक रचनाकारों के लिए राजनीतिक व संस्कृतिकर्म के रिश्तों की बुनियादी शिक्षा, और अनेक के लिए रचनात्मक असहमति व लेखन के लिए उकसावा भी हुआ करते थे। लेकिन वे ऐसे लोगों की बिरादरी में थे, जिन्होंने संगठन के लिए, और नए रचनाकार तैयार करने के लिए अपने खुद के लेखक की महत्त्वाकांक्षा को कहीं पीछे छोड़ दिया था।
प्रगतिशील लेखक संगठन का देश भर में विस्तार। पहले हिन्दी क्षेत्र में संगठन को एक साथ सक्रिय करना, फिर उर्दू के लेखकों से संपर्क और हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील ताकतों को इकट्ठा करना, फिर कश्मीर में, उत्तर-पूर्व में, बंगाल में और दक्षिण भारत में संगठन का आधार तैयार करना, और फिर समान विचार वाले संगठनों से भी संवाद कायम करना, इस सबके साथ-साथ 'वसुधा' का संपादन। दरअसल इतना काम आदमी तब ही कर सकता है, जब उसके सामने एक बड़ा लक्ष्य हो। यह एक बड़े विजन वाले व्यक्ति की कार्यपद्धति थी। अभी एक महीना पहले जब कालीकट, केरल में हम लोग राष्ट्रीय कार्य परिषद की बैठक में साथ में थे, तभी देश भर से आए संगठन के प्रतिनिधियों ने बेहद प्यार और सम्मान के साथ उनका 75वां जन्मदिन वहीं सामूहिक रूप से मनाया था। कैंसर का असर उनके शरीर पर भले ही दिखने लगा था, लेकिन कैंसर उनके मन पर बिल्कुल बेअसर था। वहां बैठक में और बाद में केरल से भोपाल तक के सफर के दौरान उनके पास ढेर सारे सांगठनिक कामों की फेहरिस्त थी, ढेर सारी योजनाएं थीं। सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी ताकतों से अपने सांस्कृतिक औजारों से किस तरह मुकाबला किया जाए, किस तरह हम समाजवादी दुनिया के निर्माण में एक ईंट लगाने की अपनी भूमिका ठीक से निभा सकें, यह सोचते उनका मन कभी थकता नहीं था।
उनके जाने से उस पूरी प्रक्रिया में ही एक अवरोध आएगा, जो उन्होंने शुरू की थी। लेकिन हम उम्मीद करें कि देश में उनके जोड़े इतने सारे लेखक मिलकर उसे रुकने नहीं देंगे, आगे बढ़ाएंगे, यही उनके जाने के बाद उन्हें अपने साथ बनाए रखने का तरीका है, और यही उनके प्रति श्रद्धांजलि भी।

- विनीत तिवारी
महासचिव, मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ,
संपर्क: 2, चिनार अपार्टमेंट, 172, श्रीनगर एक्सटेंशन, इन्दौर-452018 
मोबाइल: ०९८९३१९२७४०

(२७ मार्च २०११ को दैनिक जनवाणी में प्रकाशित)

सोमवार, 21 जून 2010

तुम्हारी याद में मेरा वजूद

वक्त की शोख़ सरगर्मियों से
दूर जा गिरा हूँ छिटककर
नहीं आता कोई बरसों का साथी नज़र
चेहरा अपना भी

कुछ चेहरे टटोले हैं यादों में अक्सर
पर धुंधला इक कोलाज-सा कुछ बन रह जाता है
अपना चेहरा ढूंढा है उसमें कई बार
हर चेहरे पर अटकती आँखें
आगे बढ़ जाती हैं
क्या गुज़रे वक़्त में मेरा कोई दख्ल नहीं था ?

आईने में देखा है जिसको अभी-अभी
कल शायद इसको फिर न देख सकूं
माथे पे उग आएं शायद कुछ और लकीरें
आवाज़ हो बदली-बदली सी
आँखों में बदले सालों की बदली तारीख़ें
जब दफ्तर से लौटूं

बैठ के इक दिन खोजूंगा ख़ुद को शायद

है शुकर, बचाए रखा है
तुमने अपनी यादों में मुझे।