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शुक्रवार, 31 मई 2013

दृश्यों से लुभाता शख्स

फिल्म के क्रेडिट्स में हम यह तो देख लेते हैं कि फिल्म के कलाकार कौन हैं, निर्माता-नर्देशक कौन है, संगीत किसका है, गीत किसके हैं, लेकिन इन्हीं के बीच आने वाले उस व्यक्ति का नाम हम देखते की जहमत भी नहीं उठाते, जिसकी आंखों से हम फिल्म देखते हैं।


जब हम कोई फिल्म देखते हैं, तो अक्सर किसी दृश्य को देखकर हम अभिभूत हो जाते हैं कि वाह! कितना खूबसूरत फिल्माया गया है। कई बार यह सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि यह दृश्य फिल्माया कैसे गया होगा? और अंत में हम निर्देशक की तारीफ करते हैं कि भई वाह! क्या दिमाग लगाया है, कमाल कर दिया है, वगैरह-वगैरह। लेकिन उन आंखों को हम अक्सर भूल जाते हैं, जिनके जरिए हमने वह दृश्य देखा और साथ ही भूल जाते हैं उस शख्स को, जिसकी वे आंखें हैं। जबकि वह फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है यानी सिनेमेटोग्राफर। एक सिनेमेटोग्राफर के बिना फिल्म का निर्माण भला कैसे संभव हो सकता है।

तमाम बेहतरीन सिनेमेटोग्राफरों की सूची में एक ऐसा नाम है, जिसने अपनी आंखों, यानी कैमरे से हमें ऐसे
यादगार दृश्य दिखाए हैं, जो आज भी मिसाल के तौर पर सामने रखे जाते हैं। यह नाम है गुरुदत्त की तकरीबन सारी फिल्मों की सिनेमेटोग्राफी करने वाले वीके मूर्ति का।

26 नवंबर 1923 को मैसूर में जन्मे वीके मूर्ति बचपन से ही सामान्य-सी घटनाओं और रोजमर्रा के दृश्यों को आंखों में कैद करने में खासी दिलचस्पी लिया करते थे। वे सिर्फ दृश्यों को आंखों में कैद ही नहीं करते थे, बल्कि उनमें अपनी कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करते हुए, एक नए तरीके से उन्हें तरतीब में रखने के ख्वाब भी बुनते थे। चीजों को नए दृष्टिकोण से देखने का यही नजरिया उन्हें बैंगलौर के राजेन्द्र पॉलीटेक्निक तक लेकर गया, जहां से 1946 में उन्होंने सिनेमेटोग्राफी का डिप्लोमा हासिल किया।

फिल्म 'बाजी' में सिर्फ एक शॉट फिल्माने का मौका मिलने पर वीके मूर्ति ने वह कमाल दिखाया कि वे गुरुदत्त की टीम का अभिन्न हिस्सा बन गए। गुरुदत्त की फिल्में अपने कला सौंदर्य के लिए खास तौर से जानी जाती हैं, लेकिन यह कला सौंदर्य सिर्फ गुरुदत्त का नहीं था, वीके मूर्ति उनके जोड़ीदार हुआ करते थे। फिल्मांकन के समय के ऐसे कई किस्से हैं, जिनमें किसी दृश्य के फिल्मांकन के दौरान निर्देशक की जगह पर मूर्ति खड़े होते थे, क्योंकि वे उस दृश्य को बेहतर ढंग से शूट करना चाहते थे।

मूर्ति अपने काम में बेतरह डूब जाने वाले इंसान थे और उनकी हमेशा कोशिश होती थी कि वे अपनी सीमाओं से परे जाकर भी दृश्यों को यादगार बना सकें। 1959 में आई फिल्म 'कागज के फूल' उनकी इसी लगन और धुन का एक अनूठा उदाहरण है। भारतीय हिंदी सिनेमा में सिनेमेटोग्राफी को नए आयाम देने वाली इस फिल्म का वह दृश्य, जहां मंच पर सूर्य की किरण गिर रही है, जिसकी रोशनी में फिल्म का नायक मौजूद है, अपनी कलात्मकता के लिए आज भी मील का पत्थर है। इस दृश्य की कलात्मकता मूर्ति की ही देन थी। गुरुदत्त का खुद का कहना था कि उन्होंने भी वह दृश्य उतना खूबसूरत नहीं सोचा था, जितना कुछ आईनों का प्रयोग करके मूर्ति ने बना दिया था। यह भारतीय सिनेमा की पहली सिनेमास्कोप फिल्म भी थी और वह फिल्म भी, जिसने पहली बार एक सिनेमेटोग्राफर को फिल्मफेयर के मंच तक पहुंचाया। अपनी नायाब कलात्मकता का नमूना पेश करने वाले वीके मूर्ति को 'कागज के फूल' के लिए बेस्ट सिनेमेटोग्राफर का फिल्मफेयर का पुरस्कार मिला। अपनी इस कामयाबी को मूर्ति ने 1962 में फिर दोहराया, जब 'साहब बीवी और गुलाम' के लिए उन्हें एक बार फिर फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया।

गुरुदत्त के जीवनकाल में मूर्ति ने किसी अन्य निर्देशक के साथ काम नहीं किया। शायद इसमें गुरुदत्त के साथ उनके प्रोफेशनल से ज्यादा, मित्रवत और आत्मीय रिश्तों की मजबूती एक वजह रही, लेकिन गुरुदत्त की मौत के बाद उन्होंने अन्य निर्देशकों के साथ भी काम किया। हालांकि गुरुदत्त के बाद उन्होंने कम ही काम किया, लेकिन जो भी किया, वह बेमिसाल किया। कमाल अमरोही की 'पाकीजा' और 'रजिया सुल्तान', प्रमोद चक्रवती की 'नया जमाना' और 'जुगनू' की यादगार सिनेमेटोग्राफी मिर्ति ने ही की थी। इसके अलावा श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी (तमस) के साथ भी उन्होंने यादगार दृश्यों को जन्म दिया है। हिंदी के अलावा 1993 में उन्होंने राजेंद्र सिंह बाबू के निर्देशन में बनी सुपर हिट कन्नड़ फिल्म 'होवू हन्नू' की सिनेमेटोग्राफी भी की। वे इस फिल्म के न केवल सिनेमेटोग्राफर रहे, बल्कि उन्होंने इसमें अभिनय भी किया।

मूर्ति ने भारतीय सिनेमा जगत में न सिर्फ सिनेमेटोग्राफी को एक नए मुकाम पर पहुंचाया, बल्कि फिल्मफेयर हासिल करने वाला पहला सिनेमेटोग्राफर बनकर इस विधा से जुड़े लोगों की हौसलाअफजाई भी की। रंगीन फिल्मों की सिनेमेटोग्राफी की ट्रेनिंग हासिल करने इंग्लैंड गए मूर्ति ने 'द गंस ऑफ़ नेवरॉन' जैसी फिल्म की
यूनिट के साथ भी काम किया और अपनी छाप छोड़ी। सिनेमा जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए वीके मूर्ति को 2005 में आईफा लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और 19 जनवरी 2010 को वर्ष 2008 के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया। 2001 में मूर्ति सिनेमा को अलविदा कहकर वापस बैंगलौर जा बसे। उन्होंने भले ही फिल्मों को अलविदा कह दिया है, लेकिन उनका कलात्मक पक्ष आज भी दूसरे सिनेमेटोग्राफर्स को प्रेरणा देने का काम करता है।

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

दादासाहब फालके: बोलते रास्तों का खामोश सूत्रधार


 दादा साहब फालके
पुण्यतिथि: 16 फरवरी 
आज बैकग्राउण्ड म्यूजिक, स्पेशल इफेक्ट्स, सराउण्ड साउण्ड और विविध कैमरा तकनीकों की मौजूदगी में दिखाई देने वाले अभिनेता के सिर्फ़  आंगिक अभिनय पर ध्यान दे पाना आसान नहीं रहा है। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि अभिनय में यदि कोई कमी रह जाती है, तो उसे संगीत और इन विविध तकनीकों के सहारे ‘कवर’ किया जा सकता है। अब ज़रा सोचिये कि उस वक़्त में, जबकि फिल्मों में आवाज़ भी नहीं हुआ करती थी, तब कहानी के एक-एक भाव को महज़ आंगिक अभिनय के ज़रिये ही जीवंत करना अभिनेताओं के लिए और उसका बेहतरीन ढंग से फ़िल्मांकन करना फ़िल्मकारों के लिए कितनी बड़ी चुनौती होती होगी। खासकर तब, जब आज जैसी उन्नत तकनीक भी फ़िल्मांकन  के लिए उपलब्ध नहीं थी। लेकिन तब भी फ़िल्में बनती थीं और ऐसा करने की शुरुआत जिस शख्स ने की उसका नाम आज भी भारतीय सिने जगत का सबसे बड़ा नाम है। यह नाम है ढुंडिराज गोविन्द फालके यानी दादासाहब फालके का। 
भारतीय सिने जगत के पिता कहे जाने वाले दादा साहब फालके ने जिस दौर में फिल्में बनाना शुरू किया था, उस दौर में इतिहास और मिथकों के महान पात्रों की कथाओं का वर्चस्व रहा। इन पात्रों की कहानियाँ सुनी भी जाती थीं और रंगमंच पर प्रदर्शित भी की जाती थीं। फ़िल्मों में इन पात्रों को प्रदर्शित करने की शुरुआत दादासाहब फाल्के ने 1913 में फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ से की। इसी फ़िल्म को पहली भारतीय फ़ीचर फ़िल्म होने का गौरव हासिल है। बहरहाल, हम यहाँ बात भारत की पहली फ़ीचर फ़िल्म की नहीं, उसे बनाने वाले की कर रहे हैं। दादा साहब फालके ने जिन 90 फ़िल्मों का निर्माण किया, उनमें से अधिकाँश की कहानियाँ धार्मिक पृष्ठभूमि की थीं। यह उस दौर का प्रभाव तो था ही, लेकिन उससे कहीं ज्यादा प्रभाव था द लाइफ ऑफ क्राइस्ट का। 
मूक फ़िल्म ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ दादा साहब फालके ने 1910 के आसपास तब देखी थी जब उन्होंने अपने तीसरे व्यवसाय यानी प्रिंटिंग प्रेस को छोड़ा था। इस मूक फिल्म को देखकर ही उनके मन में विचार आया था कि क्यों न भारतीय देवताओं को परदे पर उतारा जाये। इसी विचार की व्यावहारिक परिणति थी ‘राजा हरिश्चंद्र’, जो 1912 में बनकर तैयार हुई, 3 मई 1913 को मुंबई के कॉरोनेशन सिनेमा में प्रदर्शित हुई और जिसके साथ एक विवाद भी जुड़ा। विवाद यह था कि इसके एक साल पहले ही रामचन्द्र गोपाल यानी दादा साहब तोरने ने एक नाटक ‘पुण्डालिक’ का फिल्मांकन किया था और इसी सिनेमाघर में उसे प्रदर्शित भी किया था। इस लिहाज से ‘पुण्डालिक’ को भारत की पहली फ़िल्म कहा जाना चाहिये था। बावजूद इस विवाद के ‘राजा हरिश्चंद्र’ को भारत की पहली फ़ीचर फ़िल्म और दादा साहब फालके को भारतीय सिनेमा का जनक होने का ख़िताब हासिल हुआ, क्योंकि यह पूरी तरह से भारतीय कलाकारों द्वारा बनायी गयी फिल्म थी, जबकि ‘पुण्डालिक’ का फ़िल्मांकन ब्रिटिश सिनेमेटोग्राफर्स ने किया था। इसके बाद दादा साहब फालके धार्मिक और ऐतिहासिक पात्रों पर फ़िल्में बनाते गये और साथ ही शॉर्ट फिल्म्स, डॉक्युमेंट्री पर भी काम करते रहे। इसी सफ़र के आरम्भिक वर्षों में उन्होंने मुम्बई के पाँच व्यवसायियों के साथ मिलकर एक फिल्म कम्पनी हिन्दुस्तान फिल्म्स’ बनायी थी, जिससे जल्द ही 1920 में उन्होंने विदा भी ले ली।
सीमित तकनीक के बावजूद दादा साहब फालके की फिल्मों का कला पक्ष बड़ा ही महत्वपूर्ण रहा है, और ऐसा क्यों है, इसे उनकी पूरी जीवन यात्रा में शामिल कला को जाने बिना समझना आसान नहीं है। त्रयम्बकेश्वर में जन्मे दादा साहब फालके के पिता संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे, जिनसे उन्हें पठन-पाठन की रुचि विरासत में मिली। उन्होंने अपनी शिक्षा भी कला क्षेत्र में ही सर जे जे स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई से प्राप्त की और फिर चले गए कला भवन, बड़ौदा, जहां उन्होंने मूर्तिकला, चित्रकला, फोटोग्राफी और इन्जीनियरिंग की शिक्षा हासिल की। उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत भी एक कला माध्यम के ज़रिये ही की। वह गोधरा में बतौर फोटोग्राफर काम करने लगे थे, लेकिन प्लेग जैसी महामारी में अपनी पत्नी और बच्चे की मौत के बाद उन्होंने गोधरा छोड़ दिया। इसी समय में उनकी मुलाकात हुई जर्मन जादूगर कार्ल हर्ट्ज़ से, जिनके साथ उन्होंने कुछ समय बिताया और कला के एक नये आयाम नज़दीकी से जाना-समझा। फिर उन्होंने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया में बतौर ड्राफ्टमैन काम किया। भले ही उन्होंने ड्राइंग की शिक्षा हासिल की थी, लेकिन इस नौकरी में सिर्फ एक मशीनी हाथ की तरह काम करना उन्हें रास नहीं आया। प्राप्त की हुई शिक्षा का कलात्मक उपयोग करने का विचार हमेशा मन को विचलित करता रहा, सो उन्होंने प्रिंटिंग का व्यवसाय अपनाया। लिथोग्राफी और ओलियोग्राफ में विशिष्टता हासिल की, जर्मनी जाकर नई मशीनरी को समझा और काम शुरू किया प्रख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा के साथ। यह काम उनकी रुचि का था, लेकिन इसे उन्होंने अकेले नहीं बल्कि पार्टनरशिप में शुरू किया था. जल्द ही पार्टनर से कुछ व्यावसायिक और वैचारिक मतभेद सामने आने लगे, नतीजतन उन्होंने यह काम भी छोड़ दिया। इसी वक़्त में उन्होंने देखी थी ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट।’ 
यह उल्लेखनीय है कि दादा साहब फालके ने जब भी कोई काम शुरू किया, कला के नये माध्यम में किया। पहले फोटोग्राफी, फिर ड्राइंग, फिर पेंटिंग और फिर फ़िल्म। शायद यही वजह रही कि उन्होंने कला के विविध रूपों की बारीक़ी को नज़दीकी से जाना-समझा और जब फ़िल्म बनायी तो सबके सम्मिलन से कलापक्ष प्रभावी हो उठा। चूंकि फ़िल्में मूक थीं और महज़ शारीरिक हाव-भाव से ही सब कुछ बयाँ करना था, इसलिये उन्होंने आंगिक अभिनय पर भी गंभीरता से काम किया।
यह भी एक महत्वपूर्ण बात है कि उन्होंने कला और व्यावसायिकता के बीच समझौते को कभी स्वीकार नहीं किया। प्रिंटिंग व्यवसाय में भी जब कला से ज्यादा व्यवसाय को तरजीह देने के बात आई तो उन्होंने उस व्यवसाय को ही अलविदा कह दिया। ठीक यही आलम ‘हिन्दुस्तान फिल्म्स’ के साथ रहा। 1920 में अपने पार्टनर्स से मतभेद के बाद जब उन्होंने हिन्दुस्तान फ़िल्म्स छोड़ी, तब घोषणा कर दी थी कि अब वह फ़िल्में नहीं बनाएंगे। इसके बाद वह लेखन में जुट गये और लिखा चर्चित नाटक ‘रंगभूमि।' हालाँकि उन्होंने फ़िल्म न बनाने की घोषणा कर दी थी, लेकिन जब हिंदुस्तान फ़िल्म्स आर्थिक संकट से जूझने लगी तो एक बार फिर उन्होंने इसकी कमान सँभाली।
यूँ तो दादासाहब फालके अपने जीवन में नये-नये कला माध्यमों और तकनीक को अपनाते रहे थे, लेकिन फ़िल्मों के मामले में आगे चलकर वे ऐसा नहीं कर सके। 1931 में पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम आरा’ के आने के साथ मूक फ़िल्मों का आकर्षण कम होने लगा था और दादासाहब फालके बोलती फिल्मों की तकनीक के साथ अपनापा नहीं बना सके। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि वह मूक फ़िल्मों की दुनिया में इतने रच-बस गये थे कि उसके मोहजाल से बाहर आना भी नहीं चाहते थे। बहरहाल, वजह जो भी रही हो, लेकिन 1932 में उन्होंने अपनी आख़िरी मूक फ़िल्म ‘सेतुबंधन’ रिलीज की और बतौर निर्माता उनकी आख़िरी फ़िल्म थी 1937 में आई ‘गंगावतरण।’
16 फरवरी 1944 को नासिक में दादासाहब फालके की मृत्यु के साथ ही भारतीय सिनेमा का मूक फिल्मों का अध्याय भी बन्द हो गया। बिना आवाज़ के शुरू हुआ यह श्वेत-श्याम सफ़र अब जब 100 साल की यात्रा में रंग, ध्वनि, तरंग में आ चुका है और कल्पनालोक से बाहर निकलकर यथार्थ की बात भी करने लगा है, तब पीछे मुड़कर देखने पर हम पाते हैं कि दादासाहब फालके उस सूत्रधार की तरह थे, जिसकी ख़ामोश शुरुआत ने भविष्य के पात्रों को आवाज दी।

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

मंटो: थप्पड़ मारने वाला कहानीकार

 -रजनीश ‘साहिल’
‘सब कुछ अच्छा भला चल रहा था। दिन-रात, चौबीस घंटे कभी विज्ञापन में, तो कभी धारावाहिकों-फ़िल्मों में दिखती साड़ी से लेकर बिकनी तक में मौजूद देहयष्टि की कल्पना करते दिमाग को जो कुछ पढ़ने में मज़ा आ सकता था, उसके लिहाज से सब अच्छा भला ही चल रहा था। फिर अचानक लगा कि किसी ने अपनी पूरी ताकत से एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया हो। एक ऐसा थप्पड़, जो रंगीन कल्पनाओं की दुनिया से खींचकर सीधे उस हकीकत से रू-ब-रू कराता है, जो तकलीफ़देह है, घिनौनी है, इंसान के जानवर होने की तसदीक़ करती है और जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। और भी कुछ ऐसा महसूस होता है यार, जिसे मैं कह नहीं पा रहा हूं।’
     जब मेरे मित्र ने मुझसे यह कहा था, तब मैं बखूबी समझ रहा था कि वह क्या महसूस कर रहा है, क्या कहना चाहता है, जिसके लिए सही शब्द नहीं ढूंढ पा रहा है। वह जो कुछ महसूस कर रहा था, तकरीबन वैसा ही कुछ मैंने भी महसूस किया था, जब उस बदनाम कहानीकार की कहानी सही मायनों में पहली बार पढ़ी थी। फिर जितनी कहानियां पढ़ता गया, हर बार एक थप्पड़ का इजाफ़ा होता गया। मुझे यकीन है कि यह हर उस शख्स के साथ हुआ होगा, जिसने सआदत हसन मंटो की कहानियां पढ़ी हैं, ढंग से पढ़ी हैं।
     एक नजर में मंटो को थप्पड़ मारने वाला कहानीकार कहा जा सकता है, मगर हर कहानी में इस थप्पड़ की किस्म जुदा है। कभी वह झन्नाटेदार थप्पड़ मारते हैं, तो कभी हल्की सी चपत लगाते हैं। उनकी तकरीबन कहानियों में यह भाव है। बावजूद इसके उनकी बहुतेरी कहानियां हैं, जहां इंसान के दुर्भावनापूर्ण चेहरे के अलावा संवेदनाओं से लबरेज़ चेहरे भी दिखाई देते हैं। ‘काली सलवार’ जैसी कहानियां इसका उदाहरण हैं, जहां एक-दूसरे से नितांत दो अजनबी एक-दूसरे की अभिलाषाओं के बारे में सोचते हैं। 
     बहरहाल, मंटो की कहानियों के पात्रों के बारे में अगर बात करें, तो वे आज भी वैसे ही हैं, जैसे मंटो के समय में थे। यानी मंटो की कहानियों के पात्र सर्वकालिक हैं। कल भी वैसे ही थे, आज भी वैसे ही हैं। अपनी एक कहानी ‘सरकंडों के पीछे’ में मंटो खुद शुरुआत में ही लिखते हैं, ‘देखिए मैं उस स्त्री का नाम बताना भूल गया। बात असल में यह है कि उसका नाम कोई मायने नहीं रखता। उसका नाम आप कुछ भी समझ जाइए। सकीना, महताब, गुलशन या कोई और। आख़िर नाम में क्या रखा है।’ सच है, नाम में कुछ नहीं रखा। मंटो की कहानियों के पात्र हमारे चारों ओर हैं। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि मंटो ने उनके बारे में लिखा और हम उनके बारे में सोचने से भी क़तराने लगे हैं। ठीक ऐसे ही जब मंटो लिखते हैं, ‘कौन-सा शहर था, जहां तक मैं जानता हूं आपको मालूम करने और मुझे बताने की कोई जरूरत नहीं।’ तो यकीन जानिए कि जिस जगह का जिक्र मंटो कर रहे हैं, वह पेशावर भी हो सकती है, कोलकाता भी, मुंबई भी और उजाड़ में बसा कोई गांव भी। वह आज की पूरी दुनिया का कोई भी हिस्सा हो सकता है, जहां हर हाल में रोटी का जुगाड़ आज भी सबसे अहम सवाल है।
      मंटो के बारे में अमूमन यही कहा जाता है कि विभाजन, उसके दौरान और उसके बाद की विभीषिका पर उनसे ज्यादा दहलाने वाली कहानियां शायद किसी ने नहीं लिखीं। यह सच भी है, फिर भी मुझे लगता है कि यह मंटो जिस वक्त में कहानियां लिख रहे थे, उस वक्त के हालात से जोड़कर उन्हें देखने का नतीजा है। वरना उन्होंने ऐसी कहानियां भी लिखी हैं जो किसी खास वक्त की हो ही नहीं सकतीं। ठीक है कि आज हालात में काफ़ी तब्दीली आ चुकी है लेकिन ‘हीरामंडी’ के सलाहू और दूदा पहलवान हों, चाहे ‘लायसेंस’ की इनायत उर्फ नीति का अंजाम, आज भी चीजें वैसी ही हैं। आज जिस ढंग से तमाम तरीकों की आड़ में हिंदुस्तान, पाकिस्तान, ब्रिटेन, अमेरिका, अफगानिस्तान और अरब देशों में ऑनर किलिंग के मामले सामने आ रहे हैं, ऐसे में मंटो की कहानी ‘इश्क पर ज़ोर नहीं’ कुछ अलग ढंग की कहानी लगती है। शरुआत में ही मंटो लिखते हैं, ‘लोगों को यह शिकायत है कि मैं रोमांटिक कहानियां नहीं लिखता। मैं अब इश्क़िया कहानी लिख रहा हूं, ताकि लोगों की यह शिकायत भी किसी हद तक दूर हो जाए।’ इसके बाद मंटो बाकायदा एक इश्क़िया कहानी लिखते हैं, जहां नायक जमील पूरी तरह इश्क़ियाया हुआ दिखाई देता है। मगर यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है, जिसका अंत सुखद हो। जमील पूरी कहानी के दौरान इश्क़ तलाशता रह जाता है और अंत में पता चलता है कि मूर्खता की हद तक सादा और सीधी अजरा ने सिर्फ इसलिए ख़ुदकुशी कर ली कि उसे जमील से बेइंतहा मोहब्बत थी और जमील की शादी कहीं और तय हो चुकी थी, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर सकी। जहां तक समझ आता है मंटो ने अजरा की ख़ुदकुशी का ताना सिर्फ इसलिए नहीं बुना कि वह इश्क़ में हार जाने से टूट गई थी। हारना कैसा, जबकि उसने इज़हार-ए-मोहब्बत कभी किया ही नहीं। असल में यह ख़ुदकुशी उन ख़्वाबों की है, जो एक नौजवान स्त्री देखती है, जिनका इज़हार करने तक की उसे इजाज़त नहीं है। आज भी ऑनर किलिंग के नाम पर दुनियाभर के देशों में जो सबसे ज़्यादा आसान शिकार है, वह महिलाएं ही हैं। वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के कारण मारी जा रही हैं, और अजरा बिना व्यक्त किए मर गई। फ़र्क क्या है? 
     देखा जाए तो मंटो उर्दू के वैसे ही कहानीकार हैं, जैसे हिंदी के प्रेमचंद या बांग्ला के शरतचंद्र। या शायद उससे भी कहीं ज़्यादा, क्योंकि इंसानियत को जिस बुरी तरह से झिंझोड़ा जा सकता है, उसकी पराकाष्ठा सिर्फ मंटो के यहां मिलती है। मंटो की कहानियां किसी भी दौर में क़ैद नहीं की जा सकतीं। वह हर दौर में उसी के मुताबिक झंझोड़ती हैं, दिमाग की चूलें हिलाती हैं और सवाल खड़े करती हैं। ‘नंगी आवाज़े’, ‘तमाशा’, ‘दो क़ौमें’, ‘सड़क के किनारे’, ‘नारा’, ‘डरपोक’, ‘नया कानून’ जैसी उनकी तमाम कहानियों का ज़िक्र इस सिलसिले में किया जा सकता है। भले ही यह कहानियां बहुत अलग-अलग तरीके से अलग-अलग चीजों को बयां करती हैं, लेकिन अंतत: हमारे आसपास और बीच की स्थितियों को लेकर सवाल खड़े करती हैं। इसके बरअक्स ‘टोबा टेकसिंह’, ‘काली सलवार’, ‘मंजूर’, ‘हीरामंडी’ जैसी कहानियां इंसान की अतिशय संवेदनशीलता को भी नुमायां करती हैं, जहां कहानी के दो पात्र एक-दूसरे से किसी मुलाहजे में नहीं बंधे हैं, लेकिन एक की तक़लीफ से दूसरा द्रवित होता है। 
     कहानी कहने की विधाओं के बारे में अगर बात की जाए तो मुख्यत: दो किस्म की कहानियां सामने आती हैं। एक वह जो दृश्य वर्णन के साथ-साथ उसके मायने भी साथ ही व्यक्त करती जाती हैं, दूसरी वह जो महज़ एक कथ्य के माध्यम से पूरा दृश्य और उसका विस्तृत आख्यान वर्णित करती हैं। मंटो की कहानियां दूसरी किस्म की हैं, लेकिन फिर भी अलग हैं। वह कहानी लिखते नहीं, सुनाते हैं। अक्सर कहानियों में वह किस्सागो नज़र आते हैं। चाहे वह स्त्री देह का वर्णन हो या अस्पताल में पड़े मरीज़ों के बीच की बातचीत, वह अपनी हर पंक्ति के साथ एक दृश्य दिखाते हैं। दृश्य-दर-दृश्य चलती एक जीवंत कथा कहते हैं और अंत की तीन या चार पंक्तियों में पूरी कहानी की असलियत बयां करते हैं। कुछ इस तरह कि वह आखिरी पंक्तियां ही असली कहानी हो जाती हैं, बाकी पूरा वृत्तांत तो महज़ भूमिका भर लगता है। बकौल वाल्टर बेंजामिन कहानी कहने की आधी कला इसी में है कि सुनाते समय उसे तमाम स्पष्टीकरणों से मुक्त रखा जाए। इस नज़रिए से दुनियाभर के किस्सागो कहानी कहने की जिस शैली को सबसे बेहतर मानते रहे हैं, वही शैली मंटो की कहानियों में मौजूद है, यानी जहां अंत ही सबकुछ है। मंटो ऐसा ही करते हैं, वह कहानी के क्लाइमैक्स के साथ ऐसा कुछ छोड़ जाते हैं, जिस पर बात करनी अभी बाकी है। जिस पर सामाजिक नज़रिये से कदम उठाऐ जाने की अभी भी ज़रूरत बाकी है। अपने शब्दों में कहूं तो यह कि वह हर कहानी के अंत के साथ हमारे मुंह पर एक ऐसा तमाचा जड़ते हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वाकई हम इसी लायक हैं।
(जनपथ के जुलाई 2012 अंक में प्रकाशित)

मंगलवार, 26 जून 2012

दास्तान-ए-किस्सागोई




एक था राजा एक थी रानी
दोनों मर गए खतम कहानी
यह वह पंक्तियां हैं, जो बचपन में हम सभी ने कभी न कभी जरूर सुनी हैं। आज यह पंक्तियां अपने सही अर्थों में हमारे सामने भी हैं। बचपन में जब कभी कहानियां सुनने का जी करता था, छुट्टियों में अपनी दादी-नानी के करीब होते थे, तो उनसे कहानी सुनने की जिद भी किया करते थे। आपने भी की होगी।
खुले आसमान के नीचे, सितारों की छांव में दादी-नानी से राजा-रानी, राजकुमार, राक्षसों और परियों की कहानियां सुना करते थे हम। जब दादी या नानी कोई कहानी सुनाती थीं, तो उसका एक-एक पात्र हमारी आंखों के सामने जीवंत हो उठता था। कहानी कितनी ही अकल्पनीय क्यों न हो, सच ही लगती थी। हमारे जीवन में किस्सागोई की शुरुआत भी यहीं से होती है। वैसे, किस्सागोई ठीक-ठीक कब और कैसे शुरू हुई, इसका पता लगा पाना मुश्किल है। इतना तय है कि बचपन में मां की लोरी के साथ हम शब्दों को पहचानना सीखते हैं और कहानियों के साथ किस्सागोई से परिचित होते हैं। बचपन में सुनी कहानियों से किस्सागोई का जो सम्मोहन हम पर तारी होता है, उसका असर ताजिंदगी बरकरार रहता है। इसकी वजह भी है, और वह वजह है कल्पना की मधुरता का रस। किस्सागो यानी किस्से-कहानी कहने वाला अपनी योग्यता और कल्पनाशक्ति का भरपूर इस्तेमाल करता है। सुनाए जाने के मौके के अनुसार वह कहानी को रोचक और अविस्मरणीय बनाने के लिए उसमें बदलाव भी करता है, नाटकीयता भी डालता है और कोशिश रहती है कि सुनने वाला उसकी निरंतरता में डूब जाए।

किस्सागोई के रिश्ते
अब घर की किस्सागोई ही देख लीजिए। जब दादी-नानी कहानियां सुनाती थीं, तो बड़े-बड़ दांतों वाला राक्षस जब राजकुमारी को अपने जादुई उड़नखटोले में बिठाकर ले जाता था, और राजा परेशान होकर राजकुमारी को ढूंढ लाने वाले को राजा बनाने की घोषणा करता था, तो सब सच लगता था। फिर जब कोई राजकुमार राक्षस के किले में जाकर उससे वीरता से लड़कर राजकुमारी को छुड़ाने की कोशिश करता था, तब तक हम कहानी में इतने डूब चुके होते थे कि खुद को राजकुमार की जगह रखकर हम अपनी कल्पनाओं में सारा मंजर सजीव-सा पैदा कर चुके होते थे। घर की किस्सागोई में दादी-नानी इस मंजर को पैदा करने में हर किरदार के भावों के मुताबिक शब्दों की लंबाई, आवाज की गहराई का बखूबी इस्तेमाल करती थीं। वैसे, इन कहानियों से एक और किस्सा भी उपजता है। वह है हमारे घर और रिश्तों की बुनावट का किस्सा। दादी-नानी के बाद कहानियां सुनाने की जिम्मेदारी होती थी हमारी मां, मौसी, चाची, मामी की। इनकी कहानियों में भी दादी-नानी की कहानियों जैसा ही रस होता था। भले ही किसी बात पर मां और चाची के बीच अनबन हो गई हो, लेकिन हमें उससे कभी कोई फर्क नहीं पड़ता था। कहानियों का सम्मोहन इतना होता था कि चले ही जाते थे चाची के पास कहानियां सुनने। चाची भी ऊपर से भले ही हमसे कह दे कि जाओ अपनी मां से सुनो कहानी, लेकिन फिर भी हमारी उत्सुकता को शांत करने के लिए कहानी सुना ही देती थी। इन्हीं किस्से-कहानियों के बीच वह वात्सल्य और प्रेम उपजता था, जो हमेशा के लिए हमारे दिल में घर कर जाता है। फिर परिवार में तनाव चाहे कितना भी हो, दिल के किसी कोने में एक-दूसरे का हिस्सा होने का भाव हमेशा बना रहता है। इस मामले में सिर्फ घर की महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी सहभागी होते हैं। तभी तो चाचा, मामा, नाना के साथ भी रिश्ते की ऐसी ही बुनावट होती है। यह एक अलग बात है कि उनकी कहानियों में परियां नहीं होती थी, बल्कि वीर लड़ाके, हमारे पुरोधा और महान व्यक्तित्व ज्यादा शामिल होते थे। गौर से देखा जाए तो यह दोनों तरह की कहानियां हमारे कल्पना संसार को भी विस्तृत करती थीं और ज्ञान को भी।
मगर अब यह बुनावट कमजोर होती जा रही है। आधुनिक समाज की व्यवस्था में अब बच्चों के करीब न दादी-नानी हैं, न चाची-मौसी और न चाचा-मामा। माता-पिता के पास नौकरी की व्यस्तता है। दरअसल एकल परिवार की परिपाटी ने इस किस्सागोई की निरंतरता को बाधित किया है, जिसका असर बच्चों के कल्पनालोक पर तो पड़ा ही है, किसी हद तक रिश्तों की बुनावट की कमजोर होती गई है।

चेतना और मूल्यबोध
किस्सागोई सिर्फ घर की दहलीज के भीतर ही नहीं रही। यह हमारे समाज और संस्कृति का अहम हिस्सा रही है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि समाज में बड़े-बूढ़े ही किस्सागो की जिम्मेदारी प्रमुखता से निभाते आए हैं। नई पीढ़ी को सामाजिक मूल्यों से परिचित कराने की जिम्मेदारी भी इन्हीं के कंधों पर रही है। पारंपरिक ग्रामीण जीवन में इन मूल्यों का महत्व कितना है, इसे बताने की जरूरत नहीं है। लोग इन मूल्यों से विचलन के खतरों को न केवल जानते-समझते थे, बल्कि जितना हो सके इस विचलन और दूरी से बचने की कोशिश भी करते थे। नैतिक और सामाजिक मूल्यों से नई पीढ़ी को परिचित कराने के लिए उन्हें आज की तरह साहित्य या अन्य किसी माध्यम की जरूरत नहीं होती थी, क्योंकि पास किस्सागोई की कला होती थी। नई पीढ़ी के बीच ग्राम्य जीवन में सहअस्तित्व जैसे सामाजिक मूल्य किस्सागोई के साथ विकसित होते रहे हैं। यही वजह है कि गांवों की चौपालों पर किस्सागोई खूब फली-फूली। यह अलग बात है कि किस्सागोई लोकरंजन का प्रतिरूप है। किस्से-कहानियों के संपर्क में आने वाला श्रोता मुख्यत: मनोरंजन की ही तलाश करता है, उसमें निहित मूल्य उसके बाद ही समझे जाते हैं। इसीलिए किस्सागोई में रोचकता भी बहुत मायने रखती है। इसके अभाव में किस्सागो की सफलता शायद संभव नहीं है।

दुनिया एकाकार
यह किस्सागोई का ही कमाल है कि बिना किसी प्रकाशन व्यवस्था और तकनीकी संचार माध्यमों के भी बीती सदियों में कहानियां दूर देश की यात्रा कर चुकी हैं। पूरी दुनिया का लोकसाहित्य देखा जाए, तो इस किस्सागोई की ताकत का अंदाजा होता है। किस्सागोई के कारण ही पंचतंत्र की कहानियां सारी दुनिया भर में न केवल प्रचलित हैं, बल्कि उनमें स्थानीय रुचियों और परंपराओं के मुताबिक बदलाव भी दिखाई देते हैं। ईसप की कहानियां इसका मजबूत उदाहरण हैं। यूनान में जन्मे ईसप एक बेहतरीन किस्सागो थे। नीति और व्यावहारिक ज्ञान को कहानियों की शक्ल देने में उनका कोई सानी नहीं है। अपनी कई कहानियों में ईसप ने पंचतंत्र की कहानियों का भी उपयोग किया है। तकरीबन सत्रह शताब्दियों तक कहने-सुनने की कला के चलते ही दुनिया भर की सैर करती रही कहानियां, आज भी मौजूद हैं। लू श्युन ने जिन चीनी लोककथाओं का संग्रह किया, उनमें भी हमारी कहानियों जैसा-ही कुछ है और ग्रिम बंधुओं द्वारा संकलित की गई जर्मनी की लोककथाओं में भी। दुनिया के बनने की कथाएं भी मिलती-जुलती हैं और परियों की कहानियां भी। दरअसल यह किस्सागोई का ही नतीजा है कि सारी दुनिया का लोक-साहित्य लगभग एकाकार हो गया है।

बच्चों की दुनिया
इस बात से आप भी सहमत होंगे कि बच्चे कहानियां पढ़ने से ज्यादा सुनना पसंद करते हैं। दरअसल कहानी सुनने के दौरान उनके दिमाग पर वह दबाव नहीं होता, जो पढ़ने के दौरान होता है, और वे कहानी के साथ-साथ अपने कल्पनालोक में उन्मुक्त उड़ान भर सकते हैं। कहानी की घटनाएं, उनके पात्र उनके मानस में जीवंत होते चले जाते हैं और साथ ही कहानी में निहित संदेश भी वे आत्मसात करते चले जाते हैं। किस्सागोई की अंतरंगता के कारण ही यह शैली बच्चों द्वारा सबसे ज्यादा पसंद की जाती है। शायद यही वजह है कि बच्चों के बीच वही कहानीकार ज्यादा लोकप्रिय हुए हैं, जिन्होंने बातचीत के ढंग में उनके मन की बात कही है।
दादी-नानी की किस्सागोई की कम होती निरंतरता के चलते आज बच्चों की कल्पनाशक्ति भी क्षीण हो गई है। इसकी एक वजह यह भी है कि आज उन्हें सब-कुछ मूर्त रूप में देखने को मिल रहा है। आज वे अपनी कल्पना में परी की तस्वीर नहीं बनाते, बल्कि एनिमेशन फिल्मों और टीवी पर दिखाई देने वाली परी को देखते हैं। चाहे राक्षस हो, राजकुमार हो, या चुड़ैल, सब कुछ उनके सामने रख दिया गया है। वे अब अपनी चुड़ैल तैयार नहीं करेंगे, बल्कि पहले से मौजूद चुड़ैल को देखेंगे।  बचपन में जब हम दादी-नानी के मुंह से इन किरदारों का वर्णन सुनते थे, तो अपने मन में उन्हें गढ़ते थे। शायद इसीलिए हम सबके राजा, राक्षस और चुड़ैलें अलग-अलग हुआ करते थे। यह प्रक्रिया हमारी कल्पनाशीलता को भी बढ़ाती थी और हमारे दिमाग को तीवृ भी, लेकिन तकनीक का विस्तार आज बच्चों की कल्पनाशीलता को खत्म करता जा रहा है। दूसरी ओर किस्सागोई की कमी नए किरदारों को गढ़ने में बाधक बनी है।

किस्सागोई का बाजार
देखा जाए तो किस्सागोई कभी खत्म न होने वाली विधा है, उसमें बदलाव होते रहते हैं। किस्सागोई आज भी है, लेकिन अब उसने अपने रूप के साथ-साथ जगह भी बदल ली है। अब वह घर, चौपालों, दोस्तों की बैठकी के बजाय टीवी के पर्दे और विज्ञापन संसार में सिमट गई है। अब किस्सागोई बड़े पैमाने पर उत्पाद बेचने का माध्यम बन गई है। फिर चाहे वह जूजू की बिना आवाज की किस्सागोई हो, या फिर मनुष्य के विकासक्रम का किस्सा दिखाने वाला महज 'दद्दू' की आवाज वाला एक च्युइंग गम का विज्ञापन। आज विज्ञापन जगत किस्सागोई का इस्तेमाल करता है, ताकि दर्शकों की नजर से विज्ञापन आसानी ने न गुजर जाए, उसे विज्ञापन में कुछ रोचक लगे। वैसे भी सेठ गोडिन ने अपनी किताब 'आॅल मार्केटर्स आर लायर्स' में लिखा है कि 'मार्केटिंग एक किस्सागोई है। उत्पादों को उन कहानियों के जरिए ब्रांड्स में बदला जाता है, जो बाजार के खिलाड़ी उनके इर्द-गिर्द बुनते हैं। इन खिलाड़ियों में विज्ञापन एजेंसियां भी हैं। तो जब तक मार्केटिंग बरकरार रहेगी, किस्सागोई भी रहेगी।' अब सवाल यह है कि क्या मार्केटिंग की किस्सागोई, चेतना, मूल्यबोध, रिश्तों की बुनावट और हमारे कल्पनालोक को भी बरकरार रख सकेगी?

गुरुवार, 21 जून 2012

कहानी कहने की कला



- वाल्टर बेंजामिन

हर सुबह अपने साथ दुनिया भर की खबरें लेकर आती है। लेकिन फिर भी हमारे पास अच्छी कहानियों का दारिद्र्य बना रहता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई भी घटना स्पष्टीकरण के बारीक छिद्रों से गुजरे बगैर हम तक नहीं पहुंचती। या यूं कहें कि लगभग हर चीज हमारी जानकारी में इजाफा भर करती है, लेकिन कहानी के पक्ष को बढ़ावा देने वाला उसमें कुछ भी नहीं होता। कहानी कहने की आधी कला इसी में है कि सुनाते समय उसे तमाम स्पष्टीकरणों से मुक्त रखा जाए। इस दृष्टि से आदिकाल के लोग, और उनमें भी हेरोटोटस, इस हुनर में माहिर थे। अपनी किताब 'हिस्टरीज' के तीसरे खंड के चौदहवें अध्याय में वे सैमेनिटस की कहानी सुनाते हैं।

युद्ध में हार के बाद मिस्र के बादशाह सैमेनिटस को ईरान के राजा कैंबिसेस ने बंदी बना लिया था। कैंबिसेस अपने बंदी को नीचा दिखाने पर आमादा था। उसने आदेश दिया कि सैमेनिटस को उस सड़क पर लाया जाए जहां से ईरानी विजेताओं का जुलूस निकल रहा था। उसने यह इंतजाम भी किया कि बंदी अपनी बेटी को एक साधारण नौकरानी के रूप में पानी का घड़ा लिए कुंए की ओर जाता देखे। इस नजारे को देख सारे मिस्रवासी जहां बिलखने और विलाप करने लगे, वहीं सैमेनिटस चुपचाप, बिना बोले जमीन पर नजरें गड़ाए खड़ा रहा। फिर इसके बाद जब उसके बेटे को फांसी देने के लिए जुलूस में ले जाया जा रहा था, तब भी वह खामोश रहा। लेकिन जब उसने अपने एक पुराने बूढ़े नौकर को बंदियों की कतार में भिखारियों की तरह जाते देखा, तो उसने अपने सिर को पीटते हुए गहनतम तकलीफ और दु:ख का इजहार किया। इस कहानी में हम किस्सागोई की असली मिसाल देख सकते हैं। सूचना का महत्व सिर्फ उस क्षण में रहता है, जब वह नई होती है। उस एक क्षण से आगे वह जिंदा नहीं रहती। उस एक क्षण के प्रति समर्पित होकर उसे बिना वक्त गंवाए अपने-आपको व्यक्त कर देना होता है। कहानी के साथ ऐसा नहीं है। वह अपने-आपको खर्च न करते हुए अपनी शक्ति को अपने भीतर जुटाए रहने और लंबे समय बाद उसे मुक्त करने की क्षमता रखती है। और इस तरह मोंतेन ने मिस्र के बादशाह की इस कहानी को पढ़ने के बाद अपने-आप से पूछा कि बादशाह ने अपने नौकर को देखने के बाद ही दु:ख का इजहार क्यों किया, और पहले क्यों नहीं? और मोंतेन ने स्वयं ही उत्तर देते हुए कहा, 'चूंकि वह व्यथा में इस कदर सराबोर हो चुका था कि एक छोटा सा झटका और लगते ही उसके भीतर का बांध टूट गया।'

कहानी को इस तरह से समझा जा सकता है, लेकिन इसमें दूसरे स्पष्टीकरणों की भी गुंजाइश है। मोंतेन के इस प्रश्न को अपने दोस्तों के बीच पूछकर कोई भी इन तक पहुंच सकता है। मेरे एक मित्र ने कहा, 'बादशाह शाही खानदान की नियति से विचलित नहीं होता, क्योंकि यह लहू उसका अपना है।' एक अन्य ने कहा, 'मंच पर हमें बहुत सी ऐसी बातें विचलित करती हैं, जिनसे सचमुच की जिंदगी में शायद हम प्रभावित न हों। बादशाह के लिए यह नौकर सिर्फ एक अभिनेता है।' तीसरा बोला, 'गहरी यंत्रणा तब तक जमा होती जाती है, जब तक थोड़ी सी फुरसत न मिल जाए। बादशाह के लिए नौकर का दिखना फुरसत का ऐसा ही क्षण था।' चौथे ने कहा 'अगर यह घटना आज की दुनिया में घटी होती, तो सभी अखबारों ने यह दावा किया होता कि सैमेनिटस अपने नौकरों को अपने बच्चों से भी अधिक चाहता था।' जो भी हो, यह सच है कि हर रिपोर्टर लगे हाथ कोई-न-कोई स्पष्टीकरण जरूर ईजाद कर लेगा। हेराडोटस कोई स्पष्टीकरण नहीं देता। उसका वृत्तांत सबसे शुष्क है। और यही कारण है कि पुरातन मिस्र की यह कहानी आज हजारों वर्षों बाद भी विस्मय और विचार को जागृत करने में सक्षम है। इसमें अन्न के उन दानों के से गुण हैं, जो पिरामिडों के गर्भग्रहों में सुरक्षित बंद रहने के बाद आज भी अपने भीतर अंकुर प्रस्फुटित करने की क्षमता को बचाए हुए हैं।
अनुवाद: जितेंद्र भाटिया
(पहल 69, सितंबर-नवंबर 2001 से)

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

अभिव्यक्ति और शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया...

(मुक्तिबोध की डायरी पढते हुए विचारो के लेखन प्रक्रिया से गुज़रने को लेकर जो विचार मन मे आए.)



          निश्चय ही जीवनानुभूतियां/भावनाएं, लिखने या शब्दबद्ध होकर प्रस्तुत होने से पृथक होती हैं। जीवनानुभूतियों से उत्पन्न पीड़ा, आनंद और उनके उद्वेग से उत्पन्न भावनाएं स्वयमेव ही एक काव्य हैं, जिन्हें पूर्णत: समझ पाना स्वयं के लिए ही संभव होता है। (कई बार नहीं भी होता क्योंकि मन विचारात्मक दुविधाओ से दो-चार होता है।) परंतु इन समस्त अनुभूतियों को शब्दबद्ध करने की प्रक्रिया में बहुत ही मंद गति से और स्वयमेव ही अन्य अनुभूतियो, विंबों, व्याख्यात्मक शब्दों के समाहित होने से अनुभूतियां निरंतर परिष्कृत होती हैं। अनुभूतियों से उत्पन्न हुई कलात्मक/सौंदर्यात्मक बिंब दृष्टि नवीन चित्रों, शब्दों, अभिव्यक्ति की भाषा के समावेश होते ही शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया में परिष्कृत होती है और शब्दबद्ध होने के उपरान्त उत्पन्न सौन्दर्यबोध, प्रारंभकि सौन्दर्यबोध से पृथक होता है।

          अक्सर जिस बिंब दृष्टि, जिस अनुभूति को हम शब्दबद्ध करके प्रदर्शित करने के अभिलाषी होते हैं, शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया में निरंतर वह अपने मूल रूप से कहीं न कहीं भिन्न होती जाती है। परिणामत: अंत तक पहुंचते-पहुंचते यह आभास होता है कि जिस बिंब को हम प्रदर्शित करना चाहते थे उसमें हम पूर्णत: सफल नहीं हो सके। बहुत कुछ ऐसा छूट गया है जो व्यक्त किया जाना था और बहुत कुछ ऐसा व्यक्त हो गया है जिसे प्रारंभ में सोचा नहीं गया था किन्तु रचना प्रक्रिया में स्वत: ही जुड़ गया है।

          निश्चय ही शब्दबद्ध करने की प्रक्रिया भी अत्यंत जटिल होती है। जीवनानुभूतियां या उनसे उत्पन्न भावबोध जितना मानसिक/भावनात्मक रूप से स्पर्श करता है उस स्पर्श को, उस उद्वेलन को शब्दबद्ध करने में शब्द और भाषा का चयन एक जटिल समस्या है। विचारात्मक या भावनात्मक उद्वेलन जिस गंभीरता, गहनता से अनुभूत होता है उसे व्यक्त करने के लिये प्रयुक्त किया जाने वाला शब्द या शब्द-समूह वैसी ही गहनता से उसे पाठक के मन में भी अनुभूत करा सके यह सदैव संदेहास्पद है। कई बार लेखक को स्वयं भी वे शब्द-समूह नाकाफ़ी प्रतीत होते हैं। परिणामत: लेखक निरंतर अपनी शैली और भाषा को परिष्कृत करने को प्रयासरत होता है। वह अपनी स्वयं की एक ऐसी भाषा तैयार करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील होता है जो उसकी अनुभूतियों को बिल्कुल वैसा प्रदर्शित कर सके जैसा वह करना चाहता है।

          शब्दबद्ध करने की प्रक्रिया में उपस्थित यह जटिलता ही अनुभूतियों के परिष्कृत होने और मूल रूप से भिन्न हो जाने में संभवत: महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। साथ ही अनायास ही और कई बार व्याख्या या सरल करने की दृष्टि से समाहित हो जाने वाले अनुभूति-चित्र भी अपना सहयोग देते ही हैं। निश्चय ही अभिव्यक्ति की संपूर्ण प्रक्रिया में शब्दबद्ध करने की प्रक्रिया सर्वाधिक जटिल है।