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शुक्रवार, 8 अगस्त 2014

ख़बर बारूद होती है


शहर की भीड़ में यूँ तो बहुत ज़्यादा निकलते हैं 
मगर कुछ तो हैं सन्नाटे जो अपने साथ चलते हैं 

कोई रस्ता नहीं सच का जहाँ क़दमों को राहत हो 
जहाँ भी जाएँ हम ये आबले भी साथ चलते हैं

उन्हें ख़ुशफ़हमियाँ हैं ये के सबकुछ है यहाँ बेहतर 
हमीं जानें के कब कैसे ये अपने दिन निकलते हैं 

बहुत तामीर मुश्किल है मगर उसको यक़ीं भी है 
अभी मुफ़लिस की आँखों में सुनहरे ख़्वाब पलते हैं 

सभी को फ़िक्र है बेहद दरिंदे क्यों हैं बस्ती में 
यहीं आँचल सरकते के मगर क़िस्से उछलते हैं 

बदल जाता है हाकिम भी निज़ाम-ए-दहर भी लेकिन 
फ़क़त काग़ज़ बदलते हैं कहाँ ये दिन बदलते हैं 

ख़बर जो देते हैं सब को उन्हें कोई ख़बर ये दे 
ख़बर बारूद होती है शहर इससे भी जलते हैं

शनिवार, 12 नवंबर 2011

बस एक चिट्ठी, आपके लिए...


प्रिय दोस्तो,
एक वक्त था जब खत लिखे जाते थे, संजो कर रखे जाते थे, और जब खात्मे की नौबत आती थी, तो तकलीफ की नदी में आग लग जाती थी। बकौल शायर राजेंद्रनाथ रहबर ये खत अपनी खूशबू के साथ जलाते हुए हम तड़प के उस अहसास से गुजरते थे, जहां सब कुछ खाक लगता है। इश्क की रूमानियत अब नहीं रही। बस कुछ क्लिक की हिम्मत और बीच के सारे तार टूट जाते हैं। या फिर मोबाइल में सिम बदलनी होती है, और कह दिया जाता है, सब कुछ अनकहा, एक साथ। मुहब्बत की नर्मी के बीच वे खत भी याद आते हैं, जो उस दोस्त को लिखे जाते थे, जिसके साथ बचपन बीता लेकिन किशोरवय और जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही रास्ते जुदा हो गए। मौसी से मामा और बुआ से चाची तक के रिश्तों को आत्मीय संबोधनों के साथ लिखे गए खत हों या अपने समकक्ष और अधिकारियों को लिखे गए कार्यालयीन पत्र, सभी में संवेदना से लेकर प्रतिरोध का खास अंदाज होता था। इनमें हाल-चाल की बारीकी से लेकर खत के अंत में घर आने की जिद्दी टेक भी शामिल होती थी।
पहला खत
आपको याद ही होंगे वे स्कूली दिन, हिंदी और अंग्रेजी की वे कक्षाएं जिनमें पत्र लिखना सिखाया जाता था। एक अजनबी सा नाम और पता होता था, फिर कभी आप किताबें खरीदने के लिए पिताजी से पैसे मंगाने हेतु पत्र लिखते थे, तो कभी अपने भाई की शादी में मित्र को बुलाने के लिए आमंत्रण-पत्र भेजते थे। इस दौरान पत्रों के प्रकार जानते हुए हम सभी ने अपना पहला पत्र उत्तर पुस्तिकाओं में पूरे मन से लिखा था। नंबर पाने के लिए रट्टा लगाकर याद किया गया वह पत्र कुछ इस तरह जेहन में बैठता था कि अगर आप याद करें उस पत्र को जो आपने वाकई किसी को पहली बार लिखा था, तो पाएंगे कि उसकी भाषा और शब्द विन्यास तकरीबन वैसा ही था, जैसा आपसे स्कूल में लिखवाया जाता था।
पहले प्यार की पहली चिट्ठी
प्रेम में लिखे खतों की तो दुनिया ही बड़ी रूमानी है। वो रातों को जागकर लिखे गए खत, किताबों में छुपाकर दिए गए खत, और फिर जिसका इंतजार किया जाता था, वो जवाबी खत। इश्क के रंग में डूबे इन खतों ने शाइरों, गीतकारों को लुभाया और कई कालजयी रचनाएं सामने आर्इं। एक तरफ जहां कबूतर के जरिए पहले प्यार की पहली चिट्ठी साजन तक पहुंची, तो वहीं खत में फूल भेजकर उसे दिल समझने की बात भी कही गई है। दिल-ए-बेकरार का किस्सा लिखकर लफ्जों में हाल-ए-दिल बयां करने का एक वक्त में जो जरिया था, वह खत ही था। यह प्यार के कागज पर दिल की कलम से लिखा जाता था और अब कंप्यूटर या मोबाइल के स्क्रीन रूपी कागज पर की-बोर्ड की कलम से लिखा जाता है। बहरहाल, जवाबी खत यानी ईमेल या मैसेज का इंतजार अब भी तड़प वैसी ही पैदा करता है। फर्क इतना है कि पहले काफी मशक्कतों के बाद एक खत पहुंचाने के बाद जवाब न आया, तो दूसरा भेजते वक्त लगता था, अब इंतजार में एक के बाद एक संदेशों की झड़ी लग जाती है। हाथ की लिखाई में रचे-बसे खतों से प्रियतम का चेहरा झलकता था, और इन्हें खत्म करने के लिए बढ़े हाथ थम जाया करते थे। लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक फार्म में मौजूद खतों से न दिलबर के हाथों की महक उठती है, न ही उसका चेहरा दिखाई देता है, उसकी लिखावट को पहचानने की तो बात दूर ही है। शायद इसीलिए इन पर डिलीट कमांड चलाने में ज्यादा तकलीफ भी नहीं होती।
चिट्ठी आई है
फिल्म ‘नाम’ का वह गीत शायद आप भूले नहीं होंगे, जिसमें वतन से चिट्ठी आने का जिक्र है। घर, गांव, शहर छोड़ किसी दूसरे नगर में बसे हर आदमी को लुभाया है इस गीत ने। कल्पना कीजिए उस वक्त की, जब ईमेल और मोबाइल नहीं थे। ऐसे में डाकिया आवाज लगाता था, तो बच्चे भागते थे दरवाजे की ओर। और चिट्ठी लेकर शोर मचाते लौटते थे कि अम्मा-पिताजी फलां की चिट्ठी आई है। चिट्ठी करीबी रिश्तेदार की हुई तो पूरा घर या तो एक-एक कर चिट्ठी पढ़ता था या फिर एक साथ बैठकर सुनता था। छुट्टियों में महिलाओं को जानकारी मिलती थी कि फलां तारीख को भाई आ रहा है, तो बच्चे खुशी से भर उठते थे कि अब मामा के यहां जाएंगे। खुशी और उल्लास का सारा माहौल बस एक चिट्ठी का ही जहूरा होता था। एक परंपरा थी कि किसी की चिट्ठी आई है, अपनी कुशल-क्षेम के समाचार के साथ उसने हमारा हाल जानना चाहा है, तो उसका जवाब देना ही है। पत्र मिलते ही उसका जवाब लिखने बैठ जाना लोगों की आदत में शुमार हो चुका था, जिसमें यह भी जिक्र किया जाता था कि परिवार का कौन-सा सदस्य कहां है और कैसा है। कई टुकड़ों में बंटा परिवार चिट्ठी में एक साथ समा जाता था।  हमारी सरकार ने भी इस सामाजिक हकीकत के ही तहत जवाबी पोस्टकार्ड का चलन दिया था।
मित्रों को लिखे पत्रों में शब्द कुछ यूं बयां होते थे मानो आमने-सामने बैठकर बात कर रहे हों। बदले वक्त में संचार माध्यम बढ़े, तो यह बानगी कम होती गई। ईमेल की तेजी और फॉन्ट्स की कारीगरी वह उल्लास पैदा नहीं कर पाती जो 25 पैसे के पोस्टकार्ड में होता था। भागती-दौड़ती जिंदगी में टुकड़ों में बंटा परिवार ईमेल में एक-साथ दिखाई नहीं देता। घर के बुजुर्गों के लिए ईमेल आज भी एक दूसरी दुनिया का शब्द है, सो हम उनके हाल-चाल जानने और गांव की गलियों की लय सुनने से महरूम हो गए हैं। याद कीजिए जरा कि आखिरी बार मौसी, बुआ, दादी या नानी की लिखी हुई कोई चिट्ठी-पत्री कब पढ़ी थी। यह भी तो हमारे समय का ही सच है कि ईमेल एड्रेस में दोस्त ज्यादा हैं, परिवार के सदस्य कम।
गुम हो गया पता
कहते हैं कि अगर आप कागज-कलम का इस्तेमाल करके कुछ लिख रहे हैं, तो वह अरसे तक जेहन में मौजूद रहता है। एक जमाना था जब लोगों के पते जुबानी याद थे। डायरी देखने तक की जरूरत नहीं होती थी। जबकि तब आप किसी को उतने पत्र भी नहीं लिखते थे, जितने आज ईमेल करते हैं। गौरतलब है कि पहले पूरे परिवार का एक ही पता होता था, जिसे चिट्ठी में दर्ज किया जाता था, अब एक ही परिवार के कई पते हैं, कई बार तो एक ही आदमी के कई पते हो जाते हैं। एक बहुत छोटा सा सवाल है जनाब, आपको अपने कितने मित्रों के ईमेल एड्रेस याद हैं? ....आठ-दस नामों के बाद दिक्कत पेश आने लगी न। जनाब यही है वह नतीजा जो पत्र लेखन के खात्मे से उपजा है।
सिर्फ पता ही नहीं बदला
बदलते परिवेश में न सिर्फ पते बदल गए हैं, बल्कि कागज कलम के जरिए जज्बात उकेरने की रवायत भी बदली है। कुछ खत सहेजकर रखे हों, तो जरा देखिए कि सहेजा गया आखिरी खत किस तारीख का है। उसे पढ़िए, एक-एक लफ्ज एक चित्र उकेरता है, उन यादों का, उन बातों का जिनसे उपजे हैं वे लफ्ज। फोन या ईमेल के दौर में आप कितनी बातें हूबहू वैसी याद कर सकते हैं, जैसी वे बातचीत में थीं। हूबहू तो दूर की बात, कई बार तो बातचीत ही याद नहीं होगी। खत लिखने के साथ उनकी कांट-छांट और ऊपर नीचे करने की कसरत भी खत्म हो गई। अब मेल या मैसेज में कोई बात सामने वाले को ठीक से समझ नहीं आई, तो दूसरा कर देंगे वाली स्थिति है। वाक्यों को दोहराकर फिर-फिर लिखने की आदत भी खत्म हो चुकी कवायद है। और इसी के साथ खत्म हो रही है भाषायी शुद्धता।
पत्रों में हमने कई स्मृतियां संजो रखी हैं। जो पत्र लिखा है या पाया है, उससे जुड़ी कोई स्मृति अभी तक जेहन में बाकी है। अब, जबकि तकनीकी रूप से परिष्कृत दूरभाष यंत्रों के संदेश बक्से में या ईमेल के इनबॉक्स में एकट्ठे संदेश भी मौजूद हैं, तब आखिर क्यों उनकी संख्या के अनुपात में वैसी स्मृतियां नहीं हैं, जैसे पत्रों के साथ थीं। सीधी बात है जनाब, उनकी लिखावट में हाथ की वो कारीगरी नहीं होती, जिसे देखते ही आप कह दें कि यह अमुक व्यक्ति का लिखा खत है। उसके शब्दों में वो इत्तमीनान नहीं होता जिसका रंग शब्दों के साथ-साथ कागज पर भी उभरता था। वह शब्द विन्यास नहीं रहा, जिसमें दिल की किताब नुमायां होती थी। अरसा हो गया है न कोई खत पाए हुए। ऐसा खत जिसे आप संजो कर रख सकें, बार-बार पढ़ सकें। बहुत सुखद अनुभव होगा न, जब फिर से कोई ऐसा खत लिए डाकिया आपके दरवाजे पर दस्तक देगा। यह सुखद अनुभव ज्यादा दूर नहीं है आपसे, बस एक बार अपने करीबी को पत्र लिखकर तो देखिए, जवाबी पत्र की डाक डाकिया जरूर लाएगा।

                                                                                                                                    आपका
                                                                                                                                           मैं.

बुधवार, 16 जून 2010

चलेगी जून में बड़ी ही ठेठ हवा

पढ़ना छूट जाए तो लिखना भी छूट सा जाता है। अरसे से न ही कोई कविता पढ़ी है, न गज़ल सो जब लिखने बैठा तो बड़ी मुश्किल हुई। बहरहाल जो लिखा, जैसा लिखा वो यही है -

शहर से गाँव तक एक हवा
धूप से छाँव तक एक हवा

चुभ गया तीर की तरह जी में
साथ लाई जो लफ्ज़ एक हवा

चाल अपनी ही रख मगर एक पल
ज़माने की भी ज़रा देख हवा

मिरे घर आई थी नश्तर लेकर
साथ बैठी तो गई नेक हवा

लजाती सिकुड़ी सहमी हो भले ही
चलेगी जून में बड़ी ही ठेठ हवा

तुम्हारी मर्ज़ी आज जैसे चाहे जिओ
कल निकालेगी मीन-मेख हवा

जो खरीद रहा है वही बिक भी रहा
कमाल जादू दिखाती है देख हवा.

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

संग-संग चलो रे भाई

सितम्बर की एक शाम कुछ साथियों के साथ बैठकर गुनगुनाई गईं शुरूआती पंक्तियाँ बजती रहीं दिमाग में किसी टेप की तरह... दिसंबर के आखिरी सप्ताह में नाटक "भूख आग है" की तैयारी के दौरान कुछ और चीज़ों ने जगह बनाई... नतीजा यह गीत... जैसा भी है... पढ़िए... और जो कहना है... कहिये...


संग-संग चलो रे भाई
समझो इतनी बात भाई
हाथ में दो हाथ भाई रे, भाई रे

फिर से है वो रात आई
हर तरफ है घात भाई
हमारे घर की रोटियों तक
इनकी है निगाह भाई
इससे पहले बेच दें ये
हमको अपनी ही ख़ुशी
पहचानो इनकी जात भाई रे, भाई रे

इस घनेरी रात में
दुश्मनों के हाथ में
न तीर न तलवार है
मीठा सा हथियार है
ख़ुशी के ख़्वाब बेचकर
ये झोली अपनी लें न भर
जाग लो इस रात भाई रे, भाई रे

हसरतों को क्या हुआ
रास्तों को क्या हुआ
सहमी सी है हर हँसी
है रौशनी बुझी-बुझी
भोर आएगी मगर
तुम करो इतना अगर
तुम्हे सुबह का वास्ता
हाथ में दो हाथ भाई रे, भाई रे...

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

ख़याल का भी है अब सवाल दोस्तो

आज के दौर का अजब है हाल दोस्तो
जो भी चुप रहा हुआ हलाल दोस्तो

है ख़्वाब की ये दुनिया या दुनिया ही ख़्वाब है
काश हो भी जाए सच से विसाल दोस्तो

खुद ही सर झुकाया  कातिल के सामने
है किस बात का फिर मलाल दोस्तो

बाज़ार जाने कब रगों में आ मिला
सब ख़्वाब बन गए अब माल दोस्तो

बात सिर्फ हक की बाक़ी नहीं रही
ख़याल का भी है अब सवाल दोस्तो

साहिल'  है ऐतराज़ कि बातें ही सुर्ख हों
ख़याल भी तो चाहिए अब लाल दोस्तो