रविवार, 27 मार्च 2011

तर्क, विनम्रता और दृढ़ता के योग थे कमला प्रसाद

अच्छे आलोचक, साहित्य सर्जक की उनकी भूमिका परसाई रचनावली और वसुधा जैसे प्रगतिशील प्रकाशन से ही स्पष्ट हो जाती है, लेकिन वे इससे कहीं ज्यादा एक कार्यकर्ता और संगठनकर्ता थे। प्रगतिशील लेखक संघ का पूरे देश में विस्तार इसका उदाहरण है। कैंसर के बावजूद सतत कार्य करते कमला प्रसाद 25 मार्च 2011 को हमसे विदा हो गए। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी ने उन्हें इन शब्दों में याद किया।


उनसे आप लड़ सकते थे, नाराज हो सकते थे, लेकिन वो लड़ाई और नाराजगी कायम नहीं रह सकती थी। वे आलोचक थे इसलिए विश्लेषण उनका सहज स्वभाव था, साथ ही वे संगठनकर्ता थे इसलिए अपनी आलोचना सुनने, खामियों को दुरुस्त करने और दूसरों को गलतियां सुधारने का भरपूर मौका देने का जबर्दस्त संयम उनके पास था। कोई अगर एक अच्छे कार्यक्रम की अस्पष्ट सी आकांक्षा भी प्रकट कर दे, तो वे उसके सामने संसाधनों के प्रबंध से लेकर वक्ता, विषय आदि का विस्तृत खाका खींच निश्चित कर देते थे कि कार्यक्रम हो। सक्रियता और गतिविधि में उनका गहरा यकीन था। वे कहते भी थे कि अगर कुछ हो रहा है तो उसमें कुछ गलत भी हो सकता है और उसे ठीक भी किया जा सकता है। पूरी तरह पवित्र और सही तो वही बने रह सकते हैं जो कुछ करते ही न हों।
मध्य प्रदेश के प्रगतिशील लेखक संघ का महासचिव होने के नाते मेरा अनेक इकाइयों में जाना हुआ। हर जगह छोटे-बड़े अनेक साहित्यकार उनसे अपने परिचय का जिक्र करते। मुझे देखने का तो मौका नहीं मिला लेकिन कुमार अंबुज, हरिओम, योगेश वगैरह से कितनी ही बार जाना कि उन्होंने संगठनकर्ता के नाते कितनी ही असुविधाजनक यात्राएं कीं। कहीं से इकाई बनाने का संकेत मिलते ही शनिवार-रविवार की छुट्टी में चल देते। रिजर्वेशन तो दूर की बात, सीट न मिलने पर घंटों खड़े रहकर भी संगठन के विस्तार की चाह में दूर-दूर दौड़े जाते थे। वे अपना वैचारिक और सांगठनिक गुरू परसाई जी को कहा करते थे और उन्होंने अपने गुरू के नाम और काम को आगे ही बढ़Þाया। नामवर जी से लेकर होशंगाबाद के गोपीकांत घोष तक उन्हें कमांडर कहते थे। कार्यक्रम की योजना वे कमांडर की ही तरह बनाते भी थे और फिर एक साधारण कार्यकर्ता की तरह काम में हिस्सा भी बंटाते थे, लेकिन कभी शायद ही किसी ने उन्हें आदेशात्मक भाषा में बात करते सुना हो। उल्टे हम कुछ साथियों को तो कई बार कुछ अयोग्य व्यक्तियों के प्रति उनकी उतनी विनम्रता भी बर्दाश्त नहीं होती थी। लेकिन सांस्कृतिक संगठन बनाने का काम तुनकमिजाजी और अक्खड़पन से नहीं, बल्कि तर्क, विनय और दृढ़ता के योग से बनता है, यह सीख हमने उनके काम को देखते-देखते हासिल की। उनको याद करते हुए राजेन्द्र शर्मा की याद न आए, मुमकिन ही नहीं। राजेन्द्र शर्मा ने जैसे उनके काम में जितना हो सके उतना हिस्सा बंटाने को ही अपना मिशन बना लिया था।
कमला प्रसाद की प्रतिष्ठा आलोचक के रूप में, लेखक व संपादक के रूप में खूब रही है। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने सांगठनिक कार्य का चयन अपनी प्राथमिकता के तौर पर कर लिया था और इसलिए अपनी लेखकीय क्षमताओं के भरपूर दोहन के बारे में वे बहुत सजग कभी नहीं रहे। उनका अपना लेखन, किसी हद तक पठन-पाठन भी, संगठन के रोज के कामों के चलते किसी न किसी तरह प्रभावित होता ही था। फिर भी उन्होंने खूब लिखा। 'वसुधा' में उनके संपादकीय तो अनेक रचनाकारों के लिए राजनीतिक व संस्कृतिकर्म के रिश्तों की बुनियादी शिक्षा, और अनेक के लिए रचनात्मक असहमति व लेखन के लिए उकसावा भी हुआ करते थे। लेकिन वे ऐसे लोगों की बिरादरी में थे, जिन्होंने संगठन के लिए, और नए रचनाकार तैयार करने के लिए अपने खुद के लेखक की महत्त्वाकांक्षा को कहीं पीछे छोड़ दिया था।
प्रगतिशील लेखक संगठन का देश भर में विस्तार। पहले हिन्दी क्षेत्र में संगठन को एक साथ सक्रिय करना, फिर उर्दू के लेखकों से संपर्क और हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील ताकतों को इकट्ठा करना, फिर कश्मीर में, उत्तर-पूर्व में, बंगाल में और दक्षिण भारत में संगठन का आधार तैयार करना, और फिर समान विचार वाले संगठनों से भी संवाद कायम करना, इस सबके साथ-साथ 'वसुधा' का संपादन। दरअसल इतना काम आदमी तब ही कर सकता है, जब उसके सामने एक बड़ा लक्ष्य हो। यह एक बड़े विजन वाले व्यक्ति की कार्यपद्धति थी। अभी एक महीना पहले जब कालीकट, केरल में हम लोग राष्ट्रीय कार्य परिषद की बैठक में साथ में थे, तभी देश भर से आए संगठन के प्रतिनिधियों ने बेहद प्यार और सम्मान के साथ उनका 75वां जन्मदिन वहीं सामूहिक रूप से मनाया था। कैंसर का असर उनके शरीर पर भले ही दिखने लगा था, लेकिन कैंसर उनके मन पर बिल्कुल बेअसर था। वहां बैठक में और बाद में केरल से भोपाल तक के सफर के दौरान उनके पास ढेर सारे सांगठनिक कामों की फेहरिस्त थी, ढेर सारी योजनाएं थीं। सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी ताकतों से अपने सांस्कृतिक औजारों से किस तरह मुकाबला किया जाए, किस तरह हम समाजवादी दुनिया के निर्माण में एक ईंट लगाने की अपनी भूमिका ठीक से निभा सकें, यह सोचते उनका मन कभी थकता नहीं था।
उनके जाने से उस पूरी प्रक्रिया में ही एक अवरोध आएगा, जो उन्होंने शुरू की थी। लेकिन हम उम्मीद करें कि देश में उनके जोड़े इतने सारे लेखक मिलकर उसे रुकने नहीं देंगे, आगे बढ़ाएंगे, यही उनके जाने के बाद उन्हें अपने साथ बनाए रखने का तरीका है, और यही उनके प्रति श्रद्धांजलि भी।

- विनीत तिवारी
महासचिव, मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ,
संपर्क: 2, चिनार अपार्टमेंट, 172, श्रीनगर एक्सटेंशन, इन्दौर-452018 
मोबाइल: ०९८९३१९२७४०

(२७ मार्च २०११ को दैनिक जनवाणी में प्रकाशित)

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

कल रात - त्रिवेणी की तरह

यूं तो इस तरह की छोटी-छोटी पंक्तियों की लिखाई कई बार की है, पर कभी किसी नाम के दायरे में नहीं रख सका। देखा तो गुलज़ार साहब की त्रिवेणियों की ही शक्ल है, पर कुछ लोग इन्हें क्षणिकाएं भी कहते हैं। मुझे नहीं पता कि इसे क्या कहा जाना चाहिए। अगर कोई कहे कि गुलज़ार साहब का फार्म लिया है तो ये सच भी होगा, क्योंकि लहज़े में थोड़ा फ़र्क तो पैदा हुआ है। आखिर प्रेरित होना या जो अच्छा लगे उसको दोहराना इंसानी फ़ितरत है।


(१)
कल जिस काग़ज़ पे लिखा था हमने तेरा नाम
बना के कश्ती बारिश की लहरों पे छोड़ दिया है

देर हो गई, आंखें अब भी सूखी लगती हैं।


(२)
कल देर रात तक तुझसे की थीं बातें
कितना हल्का ख़ुद को मैंने महसूस किया था

तेरी दी हुई वो क़िताब अब भी टेबल पर है।


(३)
कल फिर से चांद की किरणों पे बादल छाया था
कुछ टूटी किरणों की किरचें आंगन में गिरी थीं

रातरानी कल फिर से आधी भूखी सोई।


(४)
कल रात शहर की एक अजनबी गली से गुज़रा
दूर तलक कुछ कुत्ते पीछे-पीछे आए

जाने उनको फ़िक्र थी मेरी, या कोई डर था।

सोमवार, 26 जुलाई 2010

टाट में मखमल का पैबंद

शीर्षक कुछ अजीब सा लगता है। लगता है कि शायद उल्टा लिख दिया गया है, कहावत तो कुछ और है। दरअसल ऐसा है नहीं। बदली परिस्थितियों और ख़ासकर वर्तमान में विकास की जिस परिभाषा के अंतर्गत भारत एक नई शक्ति और तेजी से आगे बढ़ते विकासशील देश के रूप में उभर कर सामने आ रहा है, उसके संदर्भ में कहावत का यह संस्करण ही ज्यादा सटीक है।

किसी भी देश के नागरिकों की प्राथमिक ज़रूरतें क्या हैं- भोजन, आवास, स्वास्थ्य, रोज़गार। खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए हमारे देश में भी बड़े-बड़े और अनूठे प्रयास किये गए हैं और अब भी किये ही जा रहे हैं। विश्व की सबसे बड़ी जन-वितरण व्यवस्था कायम करने का गौरव हमारे देश के पास है और आने वाले खाद्य सुरक्षा कानून व बीज कानून पर जो हो-हल्ला मचा हुआ है वह ऐसे ही तो नहीं है! और एक यह बुद्धिजीवी वर्ग है जो सरकार के इस नेक काम में नाहक ही बहसें कर-करके अड़ंगा डाल रहा है। इसे समझना चाहिए कि अभी-अभी राजस्थान, हरियाणा, बिहार के गोदामों में लाखों क्विंटल अनाज सड़-गलकर ख़राब हुआ है, ऐसी स्थिति में पूरे देश में सबको 35 किलो अनाज सस्ते दाम में मुहैया कराना कितना मुश्किल काम है। फिर भी सरकार 25 किलो अनाज देने का वादा कर रही है यह क्या कम बात है!

कुछ लोग इस पर भी सरकार का ही गला पकड़ते हैं। कहते हैं कि "गोदामों में अनाज सड़ना भी तो सरकार की ही लापरवाही है। अनाज रखने के लिए अगर पर्याप्त जगह नहीं है तो और गोदाम क्यों नहीं बनवाती सरकार?" हद्द है भई ये तो! अरे! हमारे देश की परंपरा है - "अतिथि देवो भव:।" हमारे देश में कामनवेल्थ गेम होने जा रहे हैं। तमाम देशों के खिलाड़ियों, राजनैतिक हस्तियों और न जाने किस-किस रूप में अतिथि पधारेंगे। सरकार उनके स्वागत की तैयारी करे या तुम्हारी सुने! सरकार उनके बिना अवरोध आवागमन और सुविधा से ठहरने के लिए फ्लाईओवर और खेल-गांव का निर्माण कराए या अनाज रखने के लिए कोठरियों का! हमारी परंपरा रही है कि स्वयं भूखे रहकर भी अतिथि का स्वागत धूम-धाम से किया जाता है। अब जब हमारी सरकार देश की इस गौरवशाली परंपरा का निर्वाह कर रही है तो क्या देश की जनता साल-दो साल भूखी नहीं रह सकती! और फिर सरकार पूरी तरह भूखा रहने को तो कह नहीं रही है, बस 10 किलो अनाज की कमी करने को ही तो कह रही है।

अनाज के सड़ने में भी तो जनता का ही फायदा है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र सरकार के निर्णय को ही देख लीजिए कितना दया भरा कदम उठाया है। महाराष्ट्र के किसानों की सारी चिंता ही हर ली, और जो चिंता बर्दाश्त न कर पाने की कमज़ोरी के कारण आत्महत्या कर चुके उनकी आत्माओं को भी निश्चित रूप से शांति मिल जाएगी। पिछले साल महाराष्ट्र में ज्वार, बाजरा की फसल ख़राब होने से किसानों को जो नुक़सान हुआ उससे महाराष्ट्र सरकार इतनी आहत हुई कि इस सोच में डूब गई कि अगर आगे फिर से किसानों की फ़सल ख़राब हुई तो क्या किया जाएगा। अंतत: एक बेजोड़ उपाय ढूंढ ही लिया। अब अगर किसानों की फसल ख़राब हो जाए तो उन्हें चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, वे अपनी फसल शराब बनाने वाली कंपनियों/उद्यमों को बेच सकते हैं क्योंकि महाराष्ट्र सरकार ने अनाज से शराब बनाने वाले 32 उद्यमों को अनुमति प्रदान कर दी है। कहीं ये उद्यम किसी प्रकार के अभाव के चलते बंद न हो जाएं इसके लिए सरकार इन्हें भारी सब्सिडी भी देगी। हालांकि इनके बंद होने की संभावना कम ही है क्योंकि ये उद्यम (अधिकांश) या तो जनता के चुने गए प्रतिनिधियों के हैं या फिर उनके भाई-भतीजों के। शराब की एक बोतल बनाने के लिए लगभग 2.5 किलोग्राम अनाज की ज़रूरत होती है यानि कि किसानों को अनाज की अच्छी कीमत मिलेगी, और फिर जब बढ़िया कीमत मिलेगी तो गेहूं-चावल-दाल उगाने की ज़रूरत ही क्या है? ज्वार, बाजरा उगाओ - पैसा कमाओ, भूख मिटाने के लिए मैक्डोनाल्ड का हैप्पी प्राइस मैन्यू तो है ही! चाहें तो इस सब्सिडाइज्ड शराब का भी मज़ा ले सकते हैं क्योंकि यह महाराष्ट्र के बाहर नहीं बिकेगी।

अब जबकि सरकार इतने अचूक नुस्खे निकाल रही है तब भी देखिए लोगों को चैन नहीं है। लोग  कहते हैं कि  "वैसे ही देश में कई लोगों  के  पास रहने को  घर  नहीं  है और सरकार तमाम विकास  कार्यों  के नाम पर लोगों को  विस्थापित कर रही  है।  सेज, बड़े बांधों,  विद्युत परियोजनाओं  के  नाम पर लोगों को उनके गांवों से उजाड़ रही है, किसानों को उनकी ज़मीन से बेदख़ल कर रही है।" तो भई इसका तो एक ही जवाब है - कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। विद्वतजनों ने कहा भी है कि बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता।  जब तक कुछ लोग डूबेंगे नहीं बाकी लोगों को बिजली कैसे मिलेगी? खेतों की सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी कैसे मिलेगा। जिन जगहों पर खेती के लिए किसानों को पानी नहीं मिलता उन तक पानी पहुंचाने के लिए अगर सरकार बांध बनाती है और इस सब में कुछ लोगों की ज़मीन डूब जाती है तो कौन सा बड़ा नुक़सान हो गया! और फिर जनता ही तो है जो बेरोज़गारी का हल्ला मचाए रहती है। जब सरकार रोज़गार के लिए उद्योगों को बढ़ावा देती है और विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना करती है तो यही लोग हाय-तौबा मचाने लगते हैं। अरे भई! ज़मीन नहीं दोगे तो उद्योग कहां स्थापित होंगे? और जब उद्योग स्थापित नहीं होंगे तो मल्टीनेशनल कंपनियां देश में क्यों आएँगी? जब ये कंपनियां नहीं आएँगी तो देश में विदेशी निवेश कैसे होगा, जब विदेशी निवेश नहीं होगा तो देश का व्यापार कैसे बढ़ेगा और जब यह नहीं होगा तो सरकार (?) को लाभ कैसे होगा, देश का विकास कैसे होगा? भूल गए  हरित क्रांति को जिसने देश में कृषि का स्वरुप ही बदल दिया था, कितनी उन्नत हो गई थी देश की कृषि व्यवस्था। क्या वर्ल्ड बैंक की सहायता के बिना ये सब हो पाता! और फिर ये लोग जो ज़मीन डूबने, रोज़गार नष्ट होने की शिकायत करते हैं ये यह क्यों नहीं सोचते कि लाभ तो इन्हें ही मिलेगा। अभी कई सारे गांवों को बिजली नहीं मिलती फिर सबको बिजली मिलेगी, सबको खेती के लिए पानी मिलेगा, सबको रोज़गार मिलेगा, और फिर सुविधाओं से वंचित गांवों की संख्या में भी तो कमी होगी कि नहीं!

कब तक यही भूख और ग़रीबी का रोना रोते रहोगे, इतने साल गुज़र गए अब तक तो इसकी आदत हो जानी चाहिए थी। सारी दुनिया मानती है कि भारत भी तरक्की कर रहा है पर इसे दिखाने की भी तो ज़रूरत है। अब जब सारी दुनिया हमारे बाज़ार में आना चाहती है तो हमें इसका लाभ उठाना चाहिए इसलिए हमें दिखाना होगा कि हम भी अमीर हो रहे हैं वरना ग़रीब के पास कौन जाता है। हमें और तरक्की करनी है इसलिए ज़रूरी है कि हम विदेशी/मल्टीनेशनल कंपनियों को अपने देश में आने दें, उन्हें यहां तरक्की करने दें और उनकी पूंछ पकड़कर हम भी तरक्की करें। अब इस सबके लिए कुछ तो ऐसा दिखाना होगा न जिससे उन कंपनियों में यहां आने का उत्साह जागे। तो भई, देश के अंदरूनी हिस्सों में भले ही हालत टाट जैसी हो पर दुनिया को लुभाने के लिए मखमल तो दिखाना पड़ेगा न, इसलिए हमारी सरकार सही रास्ते पर जा रही है जो टाट में मखमल का पैबंद लगा रही है। पर देश की जनता है कि कहावत का सही मतलब अभी तक नहीं समझी। मखमल में टाट का पैबंद होने को मतलब है कि स्थिति जो पहले बेहतर थी अब ख़राब हो रही है। पर हमारा देश तो तरक्की कर रहा है इसलिए हम टाट में मखमल का पैबंद लगा रहे हैं।

सोमवार, 21 जून 2010

तुम्हारी याद में मेरा वजूद

वक्त की शोख़ सरगर्मियों से
दूर जा गिरा हूँ छिटककर
नहीं आता कोई बरसों का साथी नज़र
चेहरा अपना भी

कुछ चेहरे टटोले हैं यादों में अक्सर
पर धुंधला इक कोलाज-सा कुछ बन रह जाता है
अपना चेहरा ढूंढा है उसमें कई बार
हर चेहरे पर अटकती आँखें
आगे बढ़ जाती हैं
क्या गुज़रे वक़्त में मेरा कोई दख्ल नहीं था ?

आईने में देखा है जिसको अभी-अभी
कल शायद इसको फिर न देख सकूं
माथे पे उग आएं शायद कुछ और लकीरें
आवाज़ हो बदली-बदली सी
आँखों में बदले सालों की बदली तारीख़ें
जब दफ्तर से लौटूं

बैठ के इक दिन खोजूंगा ख़ुद को शायद

है शुकर, बचाए रखा है
तुमने अपनी यादों में मुझे।

बुधवार, 16 जून 2010

चलेगी जून में बड़ी ही ठेठ हवा

पढ़ना छूट जाए तो लिखना भी छूट सा जाता है। अरसे से न ही कोई कविता पढ़ी है, न गज़ल सो जब लिखने बैठा तो बड़ी मुश्किल हुई। बहरहाल जो लिखा, जैसा लिखा वो यही है -

शहर से गाँव तक एक हवा
धूप से छाँव तक एक हवा

चुभ गया तीर की तरह जी में
साथ लाई जो लफ्ज़ एक हवा

चाल अपनी ही रख मगर एक पल
ज़माने की भी ज़रा देख हवा

मिरे घर आई थी नश्तर लेकर
साथ बैठी तो गई नेक हवा

लजाती सिकुड़ी सहमी हो भले ही
चलेगी जून में बड़ी ही ठेठ हवा

तुम्हारी मर्ज़ी आज जैसे चाहे जिओ
कल निकालेगी मीन-मेख हवा

जो खरीद रहा है वही बिक भी रहा
कमाल जादू दिखाती है देख हवा.

शनिवार, 5 जून 2010

इसका भी बाज़ार है

यह बस सीधे वैसा है, जैसा उपजा, बिना किसी काट-छांट के -

गज़ब की भीड़ है, शोर है, रफ़्तार है
जिसे भी देखिये वो थोडा सा बेज़ार है

जब भी बेची अपनी मेहनत बैठकर रोया
हर बार ही घाटा है क्या व्यापार है

रोज़ ही होते हैं वादे बेहतरी के बेशुमार
रोज़ लगता कल ही का तो अखबार है

जब लुट चुकीं उम्मीदें सारी उसके जीने की
फिर है चर्चा ख़ुदकुशी का गुनाहगार है

दोस्ती इतनी न जताओ कि कहना पड़े
दोस्त तो अच्छा है, थोडा सा बीमार है

मैं अपनी भूख से शर्मिंदा क्यों लगती है मुझे
क्या नहीं जानती कि इसका भी बाज़ार है

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

भूख की कीमत

(1)
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में
पाया गया अगर
अनाज का एक भी दाना पेट में
तो नहीं दिया जा सकता इसे क़रार
भूख से मौत

भले ही मौत के दिन ही
क्यों न मिला हो भोजन
एक माह बाद।

(2)
अनाज
गोदामों में पड़ा-पड़ा सड़ गया
दे दिया गया
शराब बनाने के लिए
शराब पर दी गई उतनी सब्सिडी
जितने में पहुँचाया जा सकता था
सब तक

अब
पैंतीस किलो की जगह
पच्चीस किलो अनाज से भरेगा
परिवार का पेट

शायद भूख हो गई है
कम
लोगों की
या शायद ज़्यादा
अन्नदाताओं की।

(3)
अब नहीं मिलते
आम, संतरे, चीकू
पपीते, नाशपाती
सेब, तरबूज़
किलो के हिसाब से
और केले दर्जन के
एक-एक नग पर
चिपका हुआ है प्राइज टैग
घोषणा करता हुआ
आज सुनहरा मौका है
लाभ उठाइये और ले जाइये
पंद्रह रुपये में एक आम
या पच्चीस रुपये में एक सेब

कार्बोनेटेड शीतल पेयों का सेवन करते हुए
याद करेंगे कभी आपके बच्चे
पापा लाया करते थे कभी
और स्मृतियों में बचे रह जायेंगे

आम, संतरे, सेब…..

(4)
अगर आपके पास
लाल या पीला
है कार्ड
तो नहीं मर सकते
भूख से आप
यह सुनिश्चितता नहीं
फ़रमान है सरकारी

(5)
शकर हो गई चालीस रुपये
दाल सत्तर की
और चावल
सबसे सस्ता वाला भी पच्चीस रुपये
सबको जगाने वाली
टाटा टी भी
हो गई पचास रुपये की ढाई सौ ग्राम
और गुड़ मिल रहा है थैलियों में बंद
साढ़े बारह का सौ ग्राम
आटा पच्चीस रुपये किलो

दाल-रोटी
और गुड़ की चाय
है ग़रीब का भोजन

क्या सचमुच?