मंगलवार, 5 जुलाई 2011

पैरहन ख्वाबों का...

अरसे बाद कुछ लिखा है, हालांकि खुद इस लिखे से संतुष्ट नहीं हूँ, फिर भी.....
कहते हैं न कि कुछ ना होने से, कुछ होना बेहतर है...

पैरहन ख्वाबों का तुमने ओढ़ा दिया, अच्छा किया
हमारी हकीकत ढांप दी, पर्दा दिया, अच्छा किया

हम न समझे थे कभी ख्वाबों में कैसे आखिर जिएं
तुमने हमको ये अदब सिखला दिया, अच्छा किया

हम थे बच्चे तुम थे वालिद ये तुम्हे करना ही था
जिसको बजाए जा रहे हैं, झुनझुना दिया, अच्छा किया

अच्छे बुरे के फर्क में हम नादान थे उलझे रहे
चोर सब होते हैं भाई, दिखला दिया, अच्छा किया

कुछ के लिए मजबूरी थी, कुछ के लिए औजार थी
भूख उम्दा व्यापार है, तुमने किया, अच्छा किया |

शनिवार, 11 जून 2011

यकीन की ईंटें, मोहब्बत का गारा


हमारी जिंदगी तमाम रिश्तों के ताने-बाने में बुनी है। कुछ रिश्ते हमें विरासत में मिलते हैं, तो कुछ हम खुद बनाते हैं। खुदमुख्तारी में बनाए गए हमारे रिश्तों में एक रिश्ता बड़ा ही खास है। दुनिया के सबसे हसीन रिश्तों में से एक है यह रिश्ता, जिसकी मिसालें देते हुए कोई कभी थकता नहीं है। इस रिश्ते के लिए कुछ भी कर गुजरने का जज्बा इसकी गहराई को जुबान देता है। लेकिन बेखयाली में अक्सर हम इस रिश्ते की अहमियत को नहीं समझ पाते, और बना बैठते हैं एक न दिखाई देने वाली दीवार, जो वक्त के साथ-साथ फासले भी बढ़ाती जाती है। फिर भी इस रिश्ते की कशिश ताउम्र बरकरार रहती है। आखिर सबसे बड़े रिश्ते का रुतबा हासिल कर चुकी इस दोस्ती की बस्ती में क्यों आती हैं ये आंधियां, और क्यों हर बार ये फिर से बसने को रहती है तैयार? 


मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

मजरूह सुल्तानपुरी का यह शेर हर उस शख्स की जुबां पर कभी न कभी जरूर आया है, जिसने दोस्ती और दोस्तों की मुहब्बत के दायरे की कोई हद मुकर्रर नहीं की। जिंदगी के हर मोड़ पर साथ आए हर साए को जिसने अपना दोस्त तसलीम किया। दोस्ती, एक ऐसा लफ्ज, जिसके मायनों को हर दौर में, हर शख्स ने अपनी-अपनी तरह से एक इबारत देने की कोशिश की, लेकिन शायद ही कभी हुआ हो कि वह उस इबारत से खुद पूरी तरह मुतमइन हुआ हो। उम्र के अलग-अलग पड़ावों पर नि:तांत निजी तजुर्बों से दो-चार होते हुए ये इबारतें बदलती रही हैं। वक्त के साथ इबारतें बदलीं, मायने बदले, यहां तक कि लोगों के साथ-साथ दोस्ती की फितरत भी बदली, लेकिन इसमें कुछ तो खास है। ऐसा, जिसने इसके दायरे को वसीह किया है, जिसके चलते सारे जहां में इसका जिक्र उस जज्बे के साथ किया जाता है, जहां इसकी मुखालफत में एक भी लफ्ज की जगह नहीं है। यह दुनिया का एक अदद ऐसा रिश्ता है, जिसमें लड़ाई-झगड़े हैं, आलोचनाएं हैं, मन-मुटाव हैं, दोस्त की गलतियां हैं, लेकिन जिसकी अपनी एक भी खामी कोई नहीं गिना पाता। शायद यही वह वजह भी है, जिसने इसे सबसे कीमती और सबसे अजीज रिश्ते का रुतबा बख्शा है।

तामीर है हमारी
जब हमारी आंखें इस दुनिया से चार होती हैं, तो हमारे साथ होते हैं वे रिश्ते जिन्हें हम खुद तय नहीं करते। पैदाइश सिर्फ एक इंसान की नहीं होती, साथ ही जन्म लेते हैं वे तमाम रिश्ते, जो ताजिंदगी हमारे साथ चलने का दंभ भरते हैं और कहलाते हैं खून के रिश्ते। कभी जिनका खून पतला होता है तो कभी गाढ़ा। इन रिश्तों को निभाने की हम कोई शर्त तय नहीं करते, कोई कायदा भी नहीं बनाते, बल्कि पहले से मौजूद कायदों और शर्तों को ही जीते हैं। जब कभी इनमें कोई दरकन आती है, तो जुमला नुमायां होता है कि रिश्ता कोई हमने थोड़े ही बनाया था। शायद इसी वजह से इस दरकन की तकलीफ भी जल्द ही जज्ब हो जाती है। लेकिन दोस्ती के रिश्ते की बुनियाद हम खुद तैयार करते हैं, इस पर यकीन की इमारत खुद ही तामीर करते हैं, और इसे जीने के कायदे भी खुद ही तय करते हैं। बुनियाद रखने के साथ ही इस रिश्ते से शर्त जैसे लफ्ज को गैर-जरूरी मानकर बाहर फेंक दिया जाता है। अक्सर दोस्ती के बारे में जिक्र करते हुए कहा जाता है कि दोस्ती में कोई शर्त नहीं होती। सुनने में निहायत रूहानी लगने वाला यह जुमला बोलने वाले शायद इस रिश्ते की एकमात्र जरूरी शर्त को भूल जाते हैं। ईमानदारी है वह शर्त। ईमानदारी के बिना न तो बुनियाद मजबूत होती है और न ही यकीन की इमारत बुलंद होती है। जब भी हमारी तामीर इस इमारत की दीवारों में दरकन की पहला वाकया नमूदार होता है, तब अक्सर हम उस मोहब्बत का पलस्तर उस पर चस्पां कर देते हैं, जो हमारे बनाए कायदों में शामिल होती है। लेकिन जब इस दरकन से यकीन की र्इंटें गिरने लगती हैं, तब अहसास होता है कि ईमानदारी के गारे की कमी थी। तब जिन शिकवे-शिकायतों का सिलसिला शुरू होता है, उनका खास मरकज होती है यह ईमानदारी। चूंकि इस खूबसूरत बुत को तराशने वाले हम खुद ही होते हैं, इसलिए इसकी टूटी किरचें ताउम्र हमारे जहन में किसी नीमकश तीर की तरह खलिश पैदा करती रहती हैं। कभी जज्ब न हो पाने वाली यह तकलीफ बस एक नासूर बनकर रह जाती है।

खुली किताब सा खास दोस्त
उम्र के साथ-साथ बदलते जिंदगी के पड़ावों पर हमारे दोस्तों की फेहरिस्त में कई नाम शुमार होते हैं। कुछ 'सिर्फ दोस्त' होते हैं, कुछ 'दोस्त', और एक कोई होता है, जिसे हम 'खास दोस्त' के तमगे से नवाजते हैं। आपकी जिंदगी में भी कोई एक ऐसा शख्स जरूर होगा। आप ही बताएं कि यह खास दोस्त क्या होता है? सोचने की जहमत न उठाएं जनाब, जवाब हम ही आपको मुहैया कराते हैं। 'एक ऐसा दोस्त जो हमारी तकलीफों को समझे, जो हमारी आदतों-जरूरतों को समझ सके, जब हमें उसकी जरूरत हो, वो हमारे साथ खड़ा हो, जिससे हम अपनी हर बात साझा कर सकें, जिसके कंधे पर अपना सिर रखकर रो सकें', और ऐसे ही कुछ और जुमले गूंज रहे हैं न आपके जेहन में। लेकिन साहबान, कहीं आप बुरा तो नहीं मानेंगे अगर हम कहें कि आप स्वार्थी हो रहे हैं। खुद ही गौर करें, हर जुमले में आप अपनी ही जरूरतों को अहमियत दे रहे हैं। एक बार भी जिक्र नहीं किया कि आपके 'खास दोस्त' की जरूरतें क्या हैं, उसकी पसंद क्या है, या आप उसकी आदतों से कितने वाकिफ हैं। आपका हर जुमला अगर हकीकत में तब्दील हो जाए तो जाहिर है कि आपको खास दोस्त नसीब होगा, लेकिन यकीन जानिए आप उसके खास दोस्त में शुमार नहीं किए जाएंगे। बेशक यह इस हाथ दे उस हाथ ले वाला रिश्ता नहीं है, मगर कहा जाता है कि दोस्त एक-दूसरे के सामने खुली किताब की मानिंद होते हैं। अगर यह 'दोस्तों' के बारे में कहा जाता है, तो 'खास दोस्त' तो उस किताब का दर्जा रखते हैं, जिसके एक-एक वरके पर लिखी इबारत आप कई-कई बार पढ़ चुके हैं, जिसके हर लफ्ज से आप बावस्ता हैं। मगर चाहत अक्सर इससे उलट होती है। दरअसल हम अपनी किताब ही दोस्तों को पढ़ाने की कोशिश में मुब्तिला रहते हैं। आहिस्ता-आहिस्ता पीले पड़ते जा रहे उसकी किताब के वरकों पर लिखी इबारत जब तक हम पूरी पढ़ पाते हैं, तब तक ये पन्ने चटकने लगते हैं।

मीठी-कड़वी दोस्ती
अक्सर हम उम्मीद करते हैं कि हमारा दोस्त हर हाल में हमारे साथ खड़ा होगा। उस वक्त भी, जब हमारे अजीज, हमारे करीबी, यहां तक कि हमारा परिवार भी हमसे मुंह फेर लेगा। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि यही एक अच्छे दोस्त की निशानियां भी हैं। लेकिन जब इन हालात में हमारा दोस्त भी नासेह बह नसीहतें देने लगता है, तो बहुत नागवार गुजरता है। कई बार अपने दोस्त पर बेइंतहा गुस्सा भी आता है। लेकिन अगर हम उसे अपना अच्छा दोस्त मानते हैं तो लाजिम है कि उसकी नसीहतों पर गौर करें। बहुत मुमकिन है कि हम गलती पर हों और दोस्त से अपनी तरफदारी की उम्मीद कर रहे हों। दोस्त अगर अच्छा है, सच्चा है तो नसीहतें देने और तीखा बोलने से उसे जरा भी गुरेज नहीं होगा। एक बड़ा ही रूमानी जुमला उछाला जाता है दोस्ती की गहराई को जुबान देने के लिए, दोस्त के लिए कुछ भी कर गुजरने का, दोस्ती में सब कुछ जायज करार दिए जाने का। यह जुमला सुनते ही हम रूमानियत और मोहब्बत के समंदर में अपनी कश्ती को दौड़ाने लगते हैं, दिल का बाग गुलजार हो जाता है। यह जुमला बोलने वाला शख्स दुनिया का सबसे प्यारा इंसान नजर आता है। अच्छा है, अगर दोस्तों के बीच रहकर भी ऐसी रूमानियत न हो, ऐसा जेहनी सुकून न हासिल हो, तो और कहां होगा। वेशक ये लम्हे हमारी जिंदगी के सबसे हसीनतरीन लम्हों में शुमार किए जाने के काबिल होते है, लेकिन जब कोई दोस्त इस जुमले को हकीकत में बदलने लगे, तो जरा चौकन्ना हो जाना ही मुफीद है। असल में, दोस्ती के लिए कुछ भी कर गुजरने का जज्बा मोहब्बत की उस कशिश से लबरेज होता है, जिसमें अच्छे-बुरे, सही-गलत का फर्क करना नामुमकिन हो जाता है। कहा भी जाता है कि मोहब्बत अंधी होती है। इसी अंधी मोहब्बत से पैदा होता है यह जज्बा, जिसमें चीजों, हालातों में मुनासिब फर्क न कर पाने के चलते दोस्त अक्सर उस बात में भी साथ देने के लिए तैयार हो जाते हैं जो गैरमुनासिब हैं, जिन्हें परवान न चढ़ने देने में ही हमारी बेहतरी है। मगर क्या करें कि हमारी फितरत ही कुछ ऐसी है कि अच्छे दोस्त की कड़वी बातें हमें नागवार गुजरती हैं और एक रूमानी जुमले को गैरजरूरी तौर पर हकीकत में बदलता दोस्त सबसे अजीज महसूस होता है। फिर 'मीठा-मीठा घप्प, कड़वा-कड़वा थू' की मिसाल कायम करते हुए एक अच्छे और सच्चे दोस्त से दूरियां बढ़ाते हमें वक्त नहीं लगता।

फिक्र इतनी न जताओ
दोस्ती के हर दौर में तलाशे जाते रहे मायनों  और इबारतों का दायरा इतना वसीह है कि चंद लफ्जों में शायद ही इसे पूरी तरह समेटा जा सके। इन्हीं मायनों में से एक है फिक्र करना और खयाल रखना। अक्सर दोस्ती की गहराई इस बात से तय की जाती है कि हमें अपने दोस्त की कितनी फ्रिक है, कितना खयाल रखते हैं हम उसका। जैसे-जैसे हम दोस्त की आदतों से वाकिफ होते जाते हैं, उसी के मुताबिक हमारी फिक्र और खयाल रखने की आदत भी मुसलसल बढ़ती जाती है। कई बार तो हम दोस्त की हर छोटी से छोटी हरकत, परेशानी, यहां तक कि हर बात में अपना ख्याल जाहिर करने से भी खुद को रोक नहीं पाते। आहिस्ता-आहिस्ता यह हमारी फितरत बन जाती है और हम पुरजोर लहजे में अपनी मर्जी को दोस्त पर थोपने लग जाते हैं। बिना इस बात की परवाह किए कि अपनी जिंदगी पर उसका भी कोई अख्तियार है। इस मसले को दोबाला होने में तब जरा भी देर नहीं लगेगी जब दोस्त भी 'ठीक कह रहे हो' कहकर हमारी बात से इत्तेफाक जाहिर करेगा। अमूमन दोस्तों के बीच ऐसे हालात पैदा होते हैं, जब फिक्र और खयाल रखने की कोई हद बाकी नहीं रहती, और जो हमारी नजर में खयाल रखना है वह हमारे दोस्त के लिए मुसीबत का सबब बन जाता है। फिर दोस्ती की बेतकल्लुफी हो जाती है नदारद, हम खुद ही उठा लेते है वह दीवार जो दिखाई तो नहीं देती, लेकिन वक्त गुजरने के साथ-साथ जिसकी दीवारों पर वे अनकही पर्तें जम चुकी होती हैं, जिनके पार न तो हमारी आवाज जा पाती है और न ही उस पार से हम तक किसी हर्फ की गूंज पहुंचती है।

बाकी है मोहब्बत
बेखयाली में हम अक्सर इस रौशनदान को बंद कर देते हैं, जिसके जरिए हम तक खुदाई सुकून की रौशनी पहुंचती है। अपनी मुसलसल भागती जिंदगी में हम उन धागों को सीवन उधड़ने के डर से तोड़ते चले जाते हैं, जिनसे हमारा पूरा चोला सिला हुआ है। स्कूल की किताबों में पढ़े सबक हम भले ही भूल जाएं, लेकिन जिंदगी के वे सबक शायद कभी नहीं भूलते जो दोस्तों के साथ बिताए लम्हों में सीखे हैं। जब भी उदासी हमें घेरती है, जब भी हमें किसी मशविरे की जरूरत महसूस होती है, या जब भी खुशगवार लम्हें बिताने का जिक्र उठता है, हमें अपने दोस्त ही याद आते हैं। लड़ते-झगड़ते, मगर हंसते-मुस्कुराते बांहे फैलाए कलेजे से लगाने को तैयार दोस्त। वजह कोई भी रही हो, दरमियां दूरियां कितनी ही हों, फिर भी यादों में सबसे करीब होते हैं दोस्त। जिनकी दोस्ती की इमारत मोहब्बत और यकीन से लबरेज है, जो वक्त के साथ बदलती फितरतों और हालातों के बावजूद आसमान में सिर उठाए पूरी बुलंदी के साथ बरकरार है, यकीनन उनकी तामीर में वह मजबूती है जिसकी दीवारों में वक्त की सीलन को पैबस्त होने का कोई मौका हाथ नहीं लगा है। उनकी इस पुरयकीन तामीर और मजबूत बुनियाद को सलाम। जिनकी तामीर में यह सीलन पैबस्त हुई और दरकनें नमूदार हो गई हैं, उन्हें भी बस एक बार मुस्कुराते हुए बांहें फैलाने की जरूरत है। यकीन जानिए अब भी वहां यकीन की र्इंटें और ईमानदार मोहब्बत का गारा मौजूद है।

(27 मार्च 2011, रविवार को दैनिक जनवाणी, मेरठ में प्रकाशित)

मंगलवार, 7 जून 2011

मौसम का बदलता मिजाज़...

मौसम के बदलते मिजाज़ यानी जलवायु परिवर्तन पर आज सभी चिंतित हैं. इसके कारणों पर भी खूब चर्चा है और उपायों पर भी. विश्व पर्यावरण दिवस पर इस मुद्दे पर सभी ने कुछ न कुछ कहा है, लिखा है. एक आम आदमी पर पड़ रहे प्रभावों, मानवाधिकार के नज़रिए से उल्लेखित किये जाने वाले कुछ बिन्दुओं और अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की ईमानदारी पर सामाजिक कार्यकर्ता बीजू नेगी और अजय के झा से बातचीत पर आधारित एक रिपोर्ट हमने भी तैयार की. प्रस्तुत है उसी रिपोर्ट की प्रति...

पढ़ने के लिए कतरन पर क्लिक करें 

गुरुवार, 2 जून 2011

सुनहरे संगीत पर थिरकता हिंदुस्तान


कुछ अरसा पहले एक कॉमेडी शो में जब ये बतौर अतिथि जज आए थे, तब एक प्रतियोगी ने इन पर जो कमेंट किया था, वो कुछ यूं था, 'इतने सुर भरे पड़े हैं कि एसिडिटी भी हो जाए तो दो-तीन कंपोजिशन वैसे ही बाहर निकल आएंगी।' शो चूंकि कॉमेडी का था तो तारीफ भी कुछ उसी अंदाज में की गई, लेकिन यह बात गलत नहीं है कि उनके भीतर सचमुच सुर कुछ इस तरह भरे पड़े हैं कि आज भी हिंदुस्तान उनकी धुनों पर नाचता है और अपने प्यार का इजहार करता है। दर्शकों, श्रोताओं के बीच चलती फिरती सोने की तिजोरी जैसे संबोधन पा चुके अपनी अलग ही स्टाइल के लिए मशहूर आलोकेश उर्फ बप्पी लहरी का जन्म 27 नवंबर 1952 को संगीत की धरती कोलकाता में हुआ। एक तो संगीत की धरती और दूसरी ओर संगीतमय परिवार के माहौल ने बप्पी के बाल मन में ही संगीत का बीज बो दिया था। उनके पिता अपरेश लहरी बंगाल के प्रख्यात गायकों में शुमार किए जाते थे, तो उनकी मां बंसरी लहरी शास्त्रीय संगीत और श्याम संगीत की संगीतज्ञ और गायिका के रूप में जानी जाती थीं। 

बाल मन में संगीत का बीज कुछ ऐसे प्रस्फुटित हुआ कि मात्र तीन साल की उम्र में बप्पी ने तबला बजाना शुरू कर दिया था। यहीं से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त करने के उस सपने ने आंखें मलनी शुरू कीं, जिसे बप्पी लहरी कब का पूरा कर चुके हैं। बंगाली रंगमंच से शुरुआत करने वाले बप्पी लहरी की संगीत प्रतिभा कितनी अद्भुत रही होगी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 19 साल की उम्र में बप्पी फिल्मों के संगीत निर्देशक बन चुके थे। बंगाली फिल्म 'दादू' (1972) वह फिल्म थी, जिसने बप्पी को बतौर संगीत निर्देशक लोगों के सामने पहुंचाया। इसके बाद बप्पी ने मुंबई और सफलता की राह पकड़ी, जिस पर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 'नन्हा शिकारी' (1973) बतौर संगीत निर्देशक बप्पी की पहली हिंदी फिल्म थी, और 1975 में आई जख्मी से वे बतौर गायक-संगीतकार के रूप में पहचाने जाने लगे। इस फिल्म में मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे दिग्गज गायकों के साथ उन्होंने 'नथिंग इस इंपॉसिबल' गीत गाया। 70 से 90 के दशक के दौरान बप्पी लहरी इंडियन डिस्को म्युजिक के पर्याय बन चुके थे। मिथुन चक्रवर्ती के साथ उनकी फिल्म डिस्को डांसर के गीत 'आई एम अ डिस्को डांसर' पर आज भी लोग थिरकते हैं। डिस्को किंग कहे जाने वाले इस संगीतकार ने डिस्को म्युजिक को भारतीय खुशबू के साथ प्रस्तुत करने का अनूठा काम किया साथ ही विजय बेनेडिक्ट, शेरोन प्रभाकर, अलीशा चिनॉय जैसे गायकों को इंडस्ट्री के रूबरू कराया। वहीं ऊषा उथुप, आशा भोंसले और किशोर कुमार से भी डिस्को सांग गवाए।

1972 से लेकर अब तक के अपने संगीत से बप्पी लहरी ने न केवल श्रोताओं को थिरकने के लिए मजबूर किया है, बल्कि ऐसे गीत भी दिए हैं जो आज भी प्रेम की गहरी संवेदनाओं को प्रकट करने में श्रोताओं के दिल के बहुत करीब हैं। 'चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना', 'किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है', 'मंजिलें अपनी जगह हैं, रास्ते अपनी जगह', 'प्यार मांगा है तुम्हीं से', 'दिल में हो तुम आंखों में तुम', 'मुस्कुराता हुआ, दिल जलाता हुआ मेरा प्यार', 'प्यार कभी कम नहीं करना', 'याद आ रहा है तेरा प्यार', 'तू मुझे जान से भी प्यारा है', जैसे यादगार गीत देने वाले बप्पी पर दूसरे संगीतकारों का संगीत बिना उन्हें कोई रॉयल्टी या क्रेडिट दिए उपयोग करने का भी आरोप लगा। लेकिन 'बंबई से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो' कहने वाले बप्पी को आरोप लगाने वाले सलाम कर वापस चले गए। गोरी कलाइयों पर हरी-हरी चूड़ियों का जिक्र करने से लेकर सांवली-सलोनी की झील सी आंखों में दिल खोने के सफर में बप्पी लहरी के संगीत के समंदर की रवानगी में कहीं कमी नजर नहीं आती। तभी तो विशाल-शेखर जैसे संगीतकार उनके साथ टैक्सी नं. 9211 में बैठकर बंबई नगरिया का सफर करते हैं और ए आर रहमान जैसे महारथी उनके साथ एक लो एक मुफ्त वाला गुरु का फलसफा सिखाते हैं।

(25 मार्च 2011 को दैनिक जनवाणी, मेरठ में प्रकाशित)

बुधवार, 25 मई 2011

काम का मन नहीं है


आज काम करने का मन नहीं है
आज बस सोचना चाहता हूं
वही सब जो काम से जुड़ा है
मेरे या किसी के भी
जो किया जा चुका है
या फिर बाकी है जिसका किया जाना
लेकिन सोचना...

सोचना, काम नहीं होता
कोई नहीं मानता इसे काम
भले ही क्यों न होता हो यह
हर काम के पीछे की वजह
लेकिन सोचना सिर्फ सोचना होता है
काम नहीं होता

इसीलिए कहना पड़ रहा है मुझे
आज काम करने का मन नहीं है
आज बस सोचना चाहता हूं।

रविवार, 27 मार्च 2011

तर्क, विनम्रता और दृढ़ता के योग थे कमला प्रसाद

अच्छे आलोचक, साहित्य सर्जक की उनकी भूमिका परसाई रचनावली और वसुधा जैसे प्रगतिशील प्रकाशन से ही स्पष्ट हो जाती है, लेकिन वे इससे कहीं ज्यादा एक कार्यकर्ता और संगठनकर्ता थे। प्रगतिशील लेखक संघ का पूरे देश में विस्तार इसका उदाहरण है। कैंसर के बावजूद सतत कार्य करते कमला प्रसाद 25 मार्च 2011 को हमसे विदा हो गए। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी ने उन्हें इन शब्दों में याद किया।


उनसे आप लड़ सकते थे, नाराज हो सकते थे, लेकिन वो लड़ाई और नाराजगी कायम नहीं रह सकती थी। वे आलोचक थे इसलिए विश्लेषण उनका सहज स्वभाव था, साथ ही वे संगठनकर्ता थे इसलिए अपनी आलोचना सुनने, खामियों को दुरुस्त करने और दूसरों को गलतियां सुधारने का भरपूर मौका देने का जबर्दस्त संयम उनके पास था। कोई अगर एक अच्छे कार्यक्रम की अस्पष्ट सी आकांक्षा भी प्रकट कर दे, तो वे उसके सामने संसाधनों के प्रबंध से लेकर वक्ता, विषय आदि का विस्तृत खाका खींच निश्चित कर देते थे कि कार्यक्रम हो। सक्रियता और गतिविधि में उनका गहरा यकीन था। वे कहते भी थे कि अगर कुछ हो रहा है तो उसमें कुछ गलत भी हो सकता है और उसे ठीक भी किया जा सकता है। पूरी तरह पवित्र और सही तो वही बने रह सकते हैं जो कुछ करते ही न हों।
मध्य प्रदेश के प्रगतिशील लेखक संघ का महासचिव होने के नाते मेरा अनेक इकाइयों में जाना हुआ। हर जगह छोटे-बड़े अनेक साहित्यकार उनसे अपने परिचय का जिक्र करते। मुझे देखने का तो मौका नहीं मिला लेकिन कुमार अंबुज, हरिओम, योगेश वगैरह से कितनी ही बार जाना कि उन्होंने संगठनकर्ता के नाते कितनी ही असुविधाजनक यात्राएं कीं। कहीं से इकाई बनाने का संकेत मिलते ही शनिवार-रविवार की छुट्टी में चल देते। रिजर्वेशन तो दूर की बात, सीट न मिलने पर घंटों खड़े रहकर भी संगठन के विस्तार की चाह में दूर-दूर दौड़े जाते थे। वे अपना वैचारिक और सांगठनिक गुरू परसाई जी को कहा करते थे और उन्होंने अपने गुरू के नाम और काम को आगे ही बढ़Þाया। नामवर जी से लेकर होशंगाबाद के गोपीकांत घोष तक उन्हें कमांडर कहते थे। कार्यक्रम की योजना वे कमांडर की ही तरह बनाते भी थे और फिर एक साधारण कार्यकर्ता की तरह काम में हिस्सा भी बंटाते थे, लेकिन कभी शायद ही किसी ने उन्हें आदेशात्मक भाषा में बात करते सुना हो। उल्टे हम कुछ साथियों को तो कई बार कुछ अयोग्य व्यक्तियों के प्रति उनकी उतनी विनम्रता भी बर्दाश्त नहीं होती थी। लेकिन सांस्कृतिक संगठन बनाने का काम तुनकमिजाजी और अक्खड़पन से नहीं, बल्कि तर्क, विनय और दृढ़ता के योग से बनता है, यह सीख हमने उनके काम को देखते-देखते हासिल की। उनको याद करते हुए राजेन्द्र शर्मा की याद न आए, मुमकिन ही नहीं। राजेन्द्र शर्मा ने जैसे उनके काम में जितना हो सके उतना हिस्सा बंटाने को ही अपना मिशन बना लिया था।
कमला प्रसाद की प्रतिष्ठा आलोचक के रूप में, लेखक व संपादक के रूप में खूब रही है। लेकिन मेरा मानना है कि उन्होंने सांगठनिक कार्य का चयन अपनी प्राथमिकता के तौर पर कर लिया था और इसलिए अपनी लेखकीय क्षमताओं के भरपूर दोहन के बारे में वे बहुत सजग कभी नहीं रहे। उनका अपना लेखन, किसी हद तक पठन-पाठन भी, संगठन के रोज के कामों के चलते किसी न किसी तरह प्रभावित होता ही था। फिर भी उन्होंने खूब लिखा। 'वसुधा' में उनके संपादकीय तो अनेक रचनाकारों के लिए राजनीतिक व संस्कृतिकर्म के रिश्तों की बुनियादी शिक्षा, और अनेक के लिए रचनात्मक असहमति व लेखन के लिए उकसावा भी हुआ करते थे। लेकिन वे ऐसे लोगों की बिरादरी में थे, जिन्होंने संगठन के लिए, और नए रचनाकार तैयार करने के लिए अपने खुद के लेखक की महत्त्वाकांक्षा को कहीं पीछे छोड़ दिया था।
प्रगतिशील लेखक संगठन का देश भर में विस्तार। पहले हिन्दी क्षेत्र में संगठन को एक साथ सक्रिय करना, फिर उर्दू के लेखकों से संपर्क और हिन्दी-उर्दू की प्रगतिशील ताकतों को इकट्ठा करना, फिर कश्मीर में, उत्तर-पूर्व में, बंगाल में और दक्षिण भारत में संगठन का आधार तैयार करना, और फिर समान विचार वाले संगठनों से भी संवाद कायम करना, इस सबके साथ-साथ 'वसुधा' का संपादन। दरअसल इतना काम आदमी तब ही कर सकता है, जब उसके सामने एक बड़ा लक्ष्य हो। यह एक बड़े विजन वाले व्यक्ति की कार्यपद्धति थी। अभी एक महीना पहले जब कालीकट, केरल में हम लोग राष्ट्रीय कार्य परिषद की बैठक में साथ में थे, तभी देश भर से आए संगठन के प्रतिनिधियों ने बेहद प्यार और सम्मान के साथ उनका 75वां जन्मदिन वहीं सामूहिक रूप से मनाया था। कैंसर का असर उनके शरीर पर भले ही दिखने लगा था, लेकिन कैंसर उनके मन पर बिल्कुल बेअसर था। वहां बैठक में और बाद में केरल से भोपाल तक के सफर के दौरान उनके पास ढेर सारे सांगठनिक कामों की फेहरिस्त थी, ढेर सारी योजनाएं थीं। सांप्रदायिक और साम्राज्यवादी ताकतों से अपने सांस्कृतिक औजारों से किस तरह मुकाबला किया जाए, किस तरह हम समाजवादी दुनिया के निर्माण में एक ईंट लगाने की अपनी भूमिका ठीक से निभा सकें, यह सोचते उनका मन कभी थकता नहीं था।
उनके जाने से उस पूरी प्रक्रिया में ही एक अवरोध आएगा, जो उन्होंने शुरू की थी। लेकिन हम उम्मीद करें कि देश में उनके जोड़े इतने सारे लेखक मिलकर उसे रुकने नहीं देंगे, आगे बढ़ाएंगे, यही उनके जाने के बाद उन्हें अपने साथ बनाए रखने का तरीका है, और यही उनके प्रति श्रद्धांजलि भी।

- विनीत तिवारी
महासचिव, मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ,
संपर्क: 2, चिनार अपार्टमेंट, 172, श्रीनगर एक्सटेंशन, इन्दौर-452018 
मोबाइल: ०९८९३१९२७४०

(२७ मार्च २०११ को दैनिक जनवाणी में प्रकाशित)