शनिवार, 4 अप्रैल 2009

छिपकली

कल कपड़े धोते समय
तल्लीन था जब
अपनी कमीज़ को बनाने में
इतना सफ़ेद
कि देखते ही लोग कहें
भला इससे ज़्यादा सफेदी और कहाँ
अचानक
स्नानगृह की छत से चिपकी छिपकली
आ गिरी भरभरा कर
मेरी पीठ पर

अनायास ही आ गए याद
माँ के शब्द
अपशगुन होता है छू जाना
छिपकली का हमारे शरीर से

सोचता रहा था उस वक्त भी
आख़िर ऐसा क्या होता है
छिपकली की देह में
जिसका छू जाना
होता है अपशगुन
और क्या होता होगा उनका
जो मानते हैं उसे भी
एक लज़ीज़ व्यंजन

पता नही कौन सा हिस्सा
बताया था माँ ने हमारे शरीर का
बायाँ या दायाँ
जिस पर छू जाना छिपकली का
होता है अपशगुन

पर कुछ नहीं होता
याद होने पर भी
छिपकली गिरी थी
पीठ के ऐन बीचों-बीच
ठीक मेरी रीढ़ के ऊपर।

2 टिप्‍पणियां:

  1. सोचता रहा था उस वक्त भी
    आख़िर ऐसा क्या होता है
    छिपकली की देह में
    जिसका छू जाना
    होता है अपशगुन
    और क्या होता होगा उनका
    जो मानते हैं उसे भी
    एक लज़ीज़ व्यंजन

    अशोक जी बहुत खूब ....!!
    एक बार मैंने भी एक ऐसी ही कविता लिखी थी ...बिल्ली का रास्ता काटना, उल्लू का छत पर बैठना या जाते समय खाली balti का milna आदि कैसे अपशगुन हो जाते हैं पता नहीं ....!!

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