मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

बिल्ली, चूहा और चंद खाली डिब्बे


कल वह हुआ जो पिछले कई दिनों से नहीं हुआ था। दिन तो क्या महीनों से नहीं हुआ था। कल संध्याकालीन बेला में जब मैं शीतल मंद समीर का सेवन करता हुआ चांद को निहार रहा था और एक नई गजल कहने की कोशिश में था, एक बिल्ली मेरी गायबखयाली का लाभ उठाते हुए घर में घुस गई। यह जरूर मोहल्ले में नई आई थी, वरना घर में घुसने के पहले दस बार सोचती और यही निर्णय लेती कि इस घर की तरफ तो नजर उठाकर भी नहीं देखना। जरूर उसने अपनी और सहेलियों से मशविरा नहीं किया होगा।
       खैर, वह मेरी अर्द्धध्यानावस्था के दौरान छत के रास्ते घर में प्रवेश कर गई और जा पहुंची सीधे रसोई में। पहुंचते ही उसकी बांछें जरूर खिल गई होंगी। सोचा होगा कि ‘वाह! आज तो मजा आ गया, इतने सारे डिब्बे-डिब्बियां। बर्तन भी तमाम बिखरे पड़े हैं। आज तो मौज हो गई।’ इसी खुशी में उसने एक-एक कर डिब्बे-डिब्बयों को खोलना शुरू किया। मगर यह क्या! दो चार डिब्बों पर जोरआजमाइश के बाद ही उसका मिजाज बदलने लगा। जरूर उसने तभी से कोसना शुरू कर दिया होगा कि ‘एक तो कमबख्त ने एयरटाइट डिब्बे रखे हुए हैं, दूसरे उनमें भी काम की कोई चीज नहीं मिल रही। बुरा हो इन प्लास्टिक की फैक्ट्रियों का, जिन्होंने एयर टाईट डिब्बे बनाये, पहले टीन, एल्युमीनियम और स्टील के डिब्बे तो रखते थे लोग, जो कम से कम आसानी से खुल तो जाते थे।’
       तो साहब जैसे-जैसे बिल्ली आगे बढ़ती गई, उसे आटा, दलिया, दाल, चावल, पापड़, हल्दी, मिर्ची, जीरा, धनिया के कुछ भरे और ज्यादातर खाली डिब्बे ही मिलते गए और उसका पारा चढ़ता गया। क्योंकि सब कच्चा माल ही उसके पल्ले पड़ रहा था और आजकल तो बिल्लियों को भी पकी-पकाई खाने की आदत हो गई है। वैसे वे कच्चा माल भी खा लेती हैं, लेकिन या तो वह मोटे-ताज़ा चूहा हो या फिर दूध-मलाई जैसा हैल्दी फूड, जिसके लिए आजकल वैल्थ बहुत खर्च होती है। वैसे आटा, दाल, चावल देखकर दूध-मलाई की उम्मीद उसने की होगी, जिसे पंख लगाए उस चायपत्ती के डिब्बे ने, जिसने उसने सबसे आखिर में पटक कर खोला था। सोचा होगा कि चायपत्ती है, तो बंदा चाय तो बनाता ही होगा, इसलिए दूध तो होना ही चाहिए। इसी सोच के चलते उसने बर्तनों की तलाशी लेनी शुरू की और माथा पीट लिया कि न जाने किस कंगले के घर में घुस गई। जब पारा आसमान छूने लगा तो उसने किसी नाराज पत्नी की तरह बर्तन पटकने शुरू कर दिए।
       मैं धड़धड़ाते हुए सीढ़ियां उतरा। देखा तो बिल्ली मुझे घूर रही थी। लगा जैसे कह रही हो, ‘कैसा आदमी है! अरे आज तो महीने की आठ तारीख ही है, तनख्वाह मिले एक हफ्ता ही बीता है और यह हाल है। घर आए मेहमान के स्वागत के लिए कुछ भी नहीं है। धिक्कार है तुझ पर।’ अब मैं मेहमान से कैसे कहता कि अब तक तनख्वाह नहीं मिली है। तभी बिल्ली के हाथ वह दूध पाउडर का पैकेट लग गया, जो दो महीने पहले लाया था। उसने आव देखा न ताव, बस पैकेट फर्श पर दे मारा और बड़े क्रोध में मुझे देखा। जैसे तंज कस रही हो कि ‘वाह बेटा! अपना इंतजाम कर रखा है। मार्केट डिपेंडेंट हो गए हो और आलसी इतने कि गर्म न करना पड़े इसलिए दूध की जगह दूध पाउडर। समझ आ रहा है तुम्हारी सेहत का राज। मगर हम तुम्हारी तरह डिब्बा बंद उत्पादों के हिमायती नहीं है। बोलो! हमारा क्या इंतजाम है?’ मैंने उसे समझाने की कोशिश की कि 'भई घर में अकेला प्राणी रहता हूं, तो अपनी सहूलियत के लिहाज से ही तो इंतजामात रखूंगा। आजकल तो दोस्त-यार भी बिना बताए नहीं आते, तुम अचानक आ धमकीं तो इसमें मेरा क्या कसूर। पहले कोई हिंट दिया होता, तो इंतजाम करके रखता।
       इतने में ही वह चूहा आ धमका, जो रोज रात को मेरे सिरहाने कुछ धमाचौकड़ी मचाया करता था। उसने अपने मुंह में रखा अखबार का टुकड़ा बिल्ली के सामने ऐसे पटका मानो कह रहा हो, ‘बहन जी! इससे ज्यादा क्या हो सकता है कि मैं इस घर में इस आदमी के होते हुए कागज खा कर गुज़ारा कर रहा हूं। पहले तो इसने दो महीने तक खूब बना-बना कर फेंका और मुझे खिलाया। इतना खिलाया कि मेरी आदत खराब हो गई। मुझे भी इन्हीं लोगों की तरह हराम का माल उड़ाने में मजा आने लगा। इसकी वैल्थ पर अपनी हैल्थ मस्त हो रही थी। अब कमबख्त ने ऐसा इंतजाम कर रखा है कि सब कुछ एयर टाइट डिब्बों में। रोज रात को इससे कहता हूं कि अबे दिन भर तो भूखा रखा है, अब क्या सुलाएगा भी भूखा, पर इसके कान पर जूं नहीं रेंगती। यह भी नहीं समझता कि इसने ही तो मेरी आदतें खराब की हैं, अब मेरी सेहत का ध्यान रखना इसकी जिम्मेदारी बनती है कि नहीं। इसने तो मेरी यह हालत कर दी है कि मुझे मरने से भी डर नहीं लगता, तभी तो आपके सामने आ गया हूं। अब आप ही मेरा उद्धार करो।’
       मैं और चूहा दोनों ही बिल्ली की और टकटकी लगाए देख रहे थे। बिल्ली ने बारी-बारी से मुझे और चूहे को देखा और शायद यह बड़बड़ाती हुई बाहर निकल गई कि ‘तुम दोनों का कुछ नहीं हो सकता। एक मार्केट ओरिएंटेड, अपने में मग्न है, जिसे सिर्फ अपनी सुविधाएं दिख रही हैं, और दूसरा खुद पर नियंत्रण न रख पाने की जिम्मेदारी भी दूसरों पर डाल रहा है। तुम दोनों को ही अपने अलावा किसी और चीज से सरोकार नहीं है। मैं ही बेवकूफ हूं, जो तुम जैसों से कोई उम्मीद लगा बैठी थी।’

3 टिप्‍पणियां:

  1. :) अच्छा लागा आपकी पोस्ट पढ़कर अच्छा लिखा है आपने... समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://mhare-anubhav.blogspot.co.uk/

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