बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

वेलेंटाइन जी: इंडियन मटीरियल का सुख


प्रेम पर्व समाप्त होने में बस एक दिन और बाकी है और इस पर्व को मनाने वाले अपनी सुरक्षा के इंतजाम के साथ हैं। ठीक वैसे ही जैसे दीवाली पर पटाखे छोड़ते वक्त कुछ लोग पानी की बाल्टी साथ रख लेते हैं। कल एक युवक मिला। यूं तो वह हाथ अगरबत्ती पांव मोमबत्ती था, लेकिन कल अचानक से मोटा हो उठा था। उसने मोटे-मोटे कपड़ों की दो-तीन तहें अपने शरीर पर जमा रखी थीं। हाथ में लाल गुलाब, चॉकलेट का डिब्बा और दो-तीन और गिफ्ट आइटम।
       चूंकि सर्दी का मौसम है तो मैंने पूछ लिया, ‘क्यों भाई सर्दी कुछ ज्यादा ही लग रही है क्या?’, वह बोला, ‘नहीं जी, यह तो सब सुरक्षात्मक इंतजाम है, अपनी भावी पत्नी के साथ प्रेम पर्व के अवसर पर घूमने का इरादा है।’
       बात कुछ अटपटी लगी, मैंने पूछा, ‘भैया क्या तुम्हारी भावी पत्नी जूडो-कराटे में ब्लैक-बेल्ट है, जिसके गुस्से से बचने का यह उपाय खोजा है?’ वह बोला, ‘अरे नहीं भैया, मेरी भावी पत्नी तो बिल्कुल गौ है, जहां गुस्सा दिखाना चाहिए वहां भी रो पड़ती है। यह उपाय तो डंडों से बचने के लिए किया है।’ जब पूछा कि किसके डंडे? तो बोला, ‘अब धर्मरक्षक, संस्कृति रक्षक, शिवभक्त, रामभक्त, हनुमानभक्त या पुलिस, कब, कौन डंडा बरसा दे, कह नहीं सकते न।’
       मैंने तर्क फेंका, ‘भैया, तुम्हारा जल्द ही ब्याह होने जा रहा है, वह भी घर वालों की सहमति से, तो अपनी भावी पत्नी से तुम्हारे मिलने में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?’ उसने इतने सपाटे से जवाब दिया कि मैं तो हैरान रह गया। बोला, ‘अपने तर्क अपने पास रखो महाराज, लगता है तुम कभी इस पर्व के दौरान घर से बाहर नहीं निकले। भैया अपने देश का रिवाज है, पिटाई पहले होती है, सही-गलत बाद में तय किया जाता है। पिछली बार तो कई जगह इस पर्व के दौरान भाई-बहन तक पिट गए। ठीक है कि बाद में पीटने वालों की थू-थू हुई, लेकिन बेचारे भाई की पीठ और बहन का चेहरा तो लाल हो ही गया न। तो भैया हम तो फिर भी प्रेम करने जा रहे हैं।’
       मैंने कहा, ‘जब इतना ही डर है, तो जा ही क्यों रहे हो? जब विवाह हो जाए तो घर में बैठकर मनाना यह पर्व।’ यह सुनते वह नौजवान क्रांतिकारी हो उठा। रामप्रसाद बिस्मिल का शैर दोहराते हुए बोला, ‘अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं, प्रेम करना हमारा अधिकार है, और अब से नहीं है, भगवान राम के जमाने से है। उन्हें भी तो अशोक वाटिका में सीता से प्रेम हो गया था, इसलिए हम तो प्रेम करेंगे, अब देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है। भगवान राम ने प्रेम के बल पर शिव का धनुष तोड़ दिया था, हम डंडे सह लेंगे। सुरक्षा का इंतजाम हमने कर ही लिया है।’
      जब मैंने पूछा, ‘भाई जब राम और कृष्ण के प्रेम को पूजा जाता है, मंदिर में राधा-कृष्ण की मूर्तियां हैं, तो फिर इतना बवाल क्यों?’ तो वह बोला, ‘वो क्या है कि प्रेम जो है न, वह भगवानों के लिए रिजर्व्ड है, वह इसे ‘लीला’ की कैटेगरी में करते थे, जैसे कृष्णलीला, रासलीला वगैरह-वगैरह। आम आदमियों के लिए यह अलाउड नहीं है। पर हमारी कोशिश जारी है।’
       मैंने उसके जोश की दाद देते हुए कहा, ‘लगता है तुम जैसे नौजवान इन तर्कों और इस जोश के सहारे इस पर्व के विरोध को खत्म करवा ही देंगे।’ खींसें निपोरते हुए वह बोला, ‘शुरुआत हो चुकी है भैया जी। अब जब यह लगने लगा है कि वेलेंटाइन जी को लोग याद करना बंद नहीं करेंगे, तो जापानी कंपनी के माइक पर स्वदेशी और भारत के दर्शन की बात करने वाले एक सज्जन ने कहा है कि संत वैलेंटाइन यूरोप में शादियां कराते थे, और यह सब उन्होंने भारतीय परंपरा और दर्शन का अध्ययन करके सीखा था। वह लोगों को समझाते थे कि एक पति-एक पत्नि के साथ रहो और यह यूरोप की परंपरा के खिलाफ था, इसलिए उन्हें 14 फरवरी 498 ईसवी को फांसी दे दी गई।’
       दिमाग में फिर कुछ कीड़े कुलबुलाए तो मैंने कहा, ‘लेकिन भारत में बहुविवाह  प्रथा भी तो रही है। खुद राम के पिता जनक की तीन पत्नियां थीं, कृष्ण की तो सोलह हजार से उपर रानियां थी, पांच पांडवों की एक कॉमन पत्नी थी, और उसके बाद जब तक राजे-रजवाड़ों का दौर चला तब तक भी कई राजाओं की एक से अधिक पत्नियां थीं, फिर कैसे कहा जा सकता है कि वेलेंटाइन ने यह भारत से सीखा?’
       युवक बोला, ‘भैया खुद पर गौरव करने का जो सुख होता है न, उसे भला आप क्या समझेंगे जो हर चीज का विश्लेषण करने लगते हैं। अरे भारत और भारत की संस्कृति सर्वश्रेष्ठ है की नहीं, तो भला ये कैसे हो सकता है कि कोई भारत से बिना कुछ सीखे अच्छा काम कर ले। यह हमारी संस्कृति की महानता ही तो है कि जिसे हम परास्त नहीं कर पाते, उसे अपना लेते हैं। यह पता कर ही लेते हैं कि उसका जो प्रबल पक्ष है, वह उसने भारत की सभ्यता और संस्कृति से ही हासिल किया है। मेड इन यूएसए आइटम में भी इंडियन मटीरियल ढूंढ ही लेते हैं। आखिर ऐसे ही तो हम विश्वगुरु और महान नहीं हैं।’
       मैंने कहना चाहा, ‘लेकिन यह कहना कि यूरोप में इसके पहले शादियां नहीं होती थीं...’ युवक बीच में ही बोल पड़ा, ‘पता है बड़े बनने का सबसे आसान तरीका क्या है, दूसरे को नीचा दिखा दो।’ मैंने फिर कहना चाहा, ‘पर इस प्रेम प्रकट करने के पर्व का विरोध क्यों, जबकि हमारे यहां भी पहले वसंतोत्सव व चंद्रोत्सव जैसे पर्वों और कृष्ण के प्रेम के कई उदाहरण....’, उसने फिर बीच में बात काटी और बोला, ‘ज्ञानीजन कहते हैं कि ईश व स्व-संस्कृति की निंदा करना और सुनना पाप है। देशद्रोह है। आप पर ज़रूर देशद्रोह का मुकदमा चलेगा। मैं चलता हूं, भावी पत्नी इंतजार कर रही होगी।’

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