शनिवार, 5 जनवरी 2013

ज़रूरत शिक्षा की: ताकि दामिनी खुलकर चमके


-रजनीश ‘साहिल’

(3 जनवरी 2013 को दैनिक जनवाणी, मेरठ में प्रकाशित अंश)
16 दिसंबर की रात आज की रात से कहीं ज़्यादा सर्द थी। शायद इन सर्दियों की सबसे सर्द रात। इस मायने में नहीं कि ठिठुरन से हाथ-पांवों ने चलना बंद कर दिया था, बल्कि इस मायने में कि उस रात दिलो-दिमाग ने भी चलना बंद कर दिया था। जिसे भी वाकये की खबर लगी उसके पास बस एक सवाल था, ‘आखिर कोई इतना बर्बर कैसे हो सकता है?’ जवाब देने लायक दिमाग शायद ही किसी का चल रहा हो, सब बंद हो चुके थे। बलात्कार की खबरें लोग रोज की अखबारों में पढ़ते हैं, न्यूज चैनलों पर देखते हैं, थोड़ी ‘हाय-हाय, धिक्-धिक्’ करते हैं और फिर लग जाते हैं अपने काम में। पर इस बार ऐसा नहीं कर सके। उन्होंने अपने काम छोड़े, एकत्रित हुए, सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, देश के अलग-अलग हिस्सों में भी, और दोषियों को सजा, कानून में बदलाव की मांग की आवाजें उठाईं। दामिनी बुझते-बुझते भी लोगों को रास्ता दिखा गई।
       महिला अधिकारों की बात सालों से की जा रही है, लेकिन इस घटना के बाद उन्हें इस हद तक राजनीतिक मुद्दा बनते कम से कम बीते दस बरस में तो पहली बार देखा है। पर क्या यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा है? क्या इन घटनाओं पर सिर्फ कानून को सख्त बनाकर काबू पाया जा सकता है? इस कानून की मांग कर रहे लोगों का भी मानना है कि ऐसा नहीं है, क्योंकि यह राजनीतिक से कहीं ज्यादा एक सामाजिक मुद्दा है। और जहां तक बात कानून के सख्त होने की है, तो हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया के उदाहरण मौजूद हैं कि किसी भी अपराध की सजा कितनी भी सख्त क्यों न हो, अपराध फिर भी होते हैं। कहने का आशय यह कतई नहीं है कि कानून सख्त नहीं होना चाहिए, वह सख्त होना चाहिए और इस हद तक होना चाहिए कि उसमें लचीलेपन की कोई गुंजाइश बाकी न रहे। सख्त कानून अपराध की आशंका को मानसिक दबाव के जरिए कम करने में मददगार होता है। पर जब बात महिलाओं के साथ होने वाले यौन दुव्यर्वहार की, और वह भी ताजा आंकडों के परिप्रेक्ष्य में आती है, तो यह और भी साफ हो जाता है कि यह किसी सख्त कानून के बनने, उसके ठीक ढंग से लागू होने, दोषियों को सजा मिलने से कहीं पहले आपके-हमारे बीच के संबंधों और सोच को बदलने की मांग करती है।
       यह बात साफ तौर पर सामने है कि महिलाओं के प्रति यौन हिंसा की घटनाओं में भारत में तेजी से इजाफा हुआ है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक पूरे देश में दर्ज हुए बलात्कार को मामलों में 2010 में 7.1 प्रतिशत और 2011 में 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2012 की रिपोर्ट क्या कहेगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। अब अगर इन कुल दर्ज मामलों के विभाजन पर नजर डाली जाए, तो इस बात पर गर्व करना छोड़ देना होगा कि भारत में स्त्रियों को देवी का दर्जा प्राप्त है, वह घर की लक्ष्मी होती है। कुल दर्ज मामलों में से 94.2 प्रतिशत मामलों में बलात्कार करने वाला उस महिला का अपना पिता, भाई, चाचा, मामा, मौसा, ससुर, देवर, जीजा या ऐसा ही कोई रिश्तेदार या पड़ोसी या पारिवारिक मित्र था। यानी महज 5.2 प्रतिशत मामलों में महिला किसी अपरिचित की कुदृष्टि की शिकार हुई वरना उसे लूटने वाले उसके अपने थे। इस स्थिति में जब ऐसी खबरें आती हैं कि किसी लड़की का पिता उसका दो साल तक लगातार बलात्कार करता रहा, तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था में होने वाले बलात्कार के कितने मामले दर्ज ही नहीं होते। दो साल बाद भी अगर पता न चलता तो कानून-व्यवस्था अंतर्यामी तो है नहीं! यहीं यह सवाल भी खड़ा होता है कि कोई कानून किस हद तक कारगर हो सकता है? इन स्थितियों में कानून की भूमिका सिर्फ सजा देने भर तक सिमट कर रह जाती है; और जाहिर है कि महिला के सम्मान की रक्षा का मतलब उसका अपमान करने वाले को सजा देना भर तो नहीं है।
       महिलाओं के सम्मान और स्वतंत्रता की प्रारंभिक इकाई समाज है। पिछले बहुत थोड़े से वक्फे में ऐसे कई बयान और फरमान सामने आ चुके हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बलात्कार की घटनाओं के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। यह बयान या फरमान समाज के ही प्रतिष्ठित लोगों द्वारा दिए गए हैं। कुछ तथ्यों पर नजर डालना जरूरी हो जाता है, जो इन बयानों और फरमानों की की धज्जियां उड़ाते हैं, जिनमें लड़कियों के कम कपड़़े पहनने का, मोबाइल इस्तेमाल करने का या लड़कों से संपर्क बढ़ने का हवाला दिया गया।
       एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार के कुल दर्ज मामलों में से लगभग 11 प्रतिशत मामलों में पीड़िता की उम्र 14 वर्ष से कम थी। क्या 14 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं के बलात्कार के संदर्भ में भी यह तर्क दिए जा सकते हैं? ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिनमें पूरी तरह पारंपरिक पोशाक पहने, बुर्के में सिर से पांव तक ढंकी महिलाएं भी बलात्कार की शिकार हुई हैं। मोबाइल का तर्क तो और भी बचकाना है। स्टॉकिंग, यानी फोन पर परेशान करने, अश्लील मैसेज भेजने, अभद्र बातें करने और धमकाने के लगभग 91 प्रतिशत मामलों में लड़के दोषी पाए गए हैं।
       इन तथ्यों और इन बयानों से साफ जाहिर होता है कि गड़बड़ी कहीं न कहीं हमारी सामाजिक व्यवस्था और सोच में है। तभी तो घर के भीतर से लेकर समाज के बाहरी हिस्सों तक हर कोई महिलाओं को ही बचकर निकलने की, कन्नी काट जाने की सलाह देता है, जबकि यह पुरुषों से कहना ज्यादा जरूरी है कि वे महिलाओें को ससम्मान निकलने के लिए रास्ता दें।
       यदि बारीकी से देखें, तो बलात्कार का मुद्दा कई और मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है। यह जानकर शायद आपको हैरानी हो कि डायन कहकर मार डाले जाने के कई मामलों के मूल में किसी पुरुष द्वारा महिला को हासिल करने की कोशिश और महिला का प्रतिरोध रहा है। असफल होने पर पुरुष का दंभ अशिक्षित और अंधविश्वासी  समाज में डायन प्रथा का रूप लेता है, तो शिक्षित समाज में प्रताड़ना के नये-नये तरीके अपनाता है। यह संभवतः पुरुष होने का दंभ और स़्त्री को कमजोर समझने की पीढ़ियों से हासिल हुई ट्रेनिंग ही है जो मणिपुर से लेकर छत्तीसगढ़ तक, मनोरमा से लेकर सोनी सोरी तक महिलाएं सुरक्षा और शांति के लिए तैनात फौज और पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार की शिकार होती हैं, और उतनी ही बर्बरता से जितनी बर्बरता से दिल्ली में दामिनी। यह एक पितृसत्तात्मक समाज का, पुरुष होने का दंभ ही है, वरना ऐसा करने की इजाजत उन्हें कानून या संविधान ने तो नहीं दी।
       कुल मिलाकर सारे तथ्य इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इन घटनाओं के पीछे की सबसे महत्वपूर्ण वजह महिलाओं के बारे में वह सोच है, जो उन्हें पुरुष से कमतर मानती है। यानी यह एक सामाजिक व्यवस्था की कमी है। निश्चित है कि इस कमी को एक झटके में जादू के जोर से दूर नहीं किया जा सकता। यह एक सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया है, जो वक्त लेगी। लेकिन इसके लिए संदर्भित कानून के प्रस्तावों में से उस प्रस्ताव पर गंभीरता से ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है जो सबसे जरूरी है, और जिस पर कि शायद अब तक सबसे कम बात की गई है। शिक्षा में जेंडर इक्वलिटी और उससे जुड़े बिंदुओं को विषय के रूप में शामिल किए जाने का प्रस्ताव। विचार, सोच की पुरातन बेड़ियों को हमेशा से ही नये ज्ञान स्रोतों और अध्ययन की नयी कोशिशों  ने काटा है। कानून समाज को नियंत्रित रखने की एक पद्धति है, जिसका होना भी ज़रूरी है; लेकिन समाज में बदलाव हमेशा एक सकारात्मक विचार और ज्ञान स्रोतों के माध्यम से आया है। इसलिए इन स्थितियों में बदलाव लाने का और सही मायनों में महिला और पुरुष को बराबरी पर खड़ा करने का इससे बेहतर कोई और विकल्प संभव नहीं है कि हम न केवल अपनी अकादमिक शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाएं, बल्कि ऐसे विकल्प भी तलाशें जिनके माध्यम से समाज के हर तबके में महिलाओं के प्रति बराबरी और संवेदनशीलता के बीज बोए जा सकें। संविधान और कानून व्यवस्था में तो अब तक कई संशोधन हम करके देख चुके हैं, क्यों न इस बार शिक्षा में संशोधन करके देख लिया जाए, ताकि आने वाले समय में कोई दामिनी अपने सपनों के फलक पर खुल कर चमक सके और हमें शर्मसार न होना पड़े।

1 टिप्पणी:

  1. कई महत्त्वपूर्ण पहलुओं को उठाया गया है...एक बेहतर आलेख...

    पूंजीगत राजनैतिक ढ़ांचे के भीतर...पोषित होती हुए सामंती संस्कार और मानसिकताएं...इस सामाजिक व्यवस्था के मूल में है...

    आमूल-चूल परिवर्तनों के लिए...संघर्षों के कई पायदानों से गुजरना होगा अभी..

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