मंगलवार, 11 जून 2013

चंद लम्हे असास रखे थे


चंद लम्हे असास रखे थे          
रंज कुछ अपने पास रखे थे 

तज़रिबे होते नहीं सब मीठे 
हमने नमकीन ख़ास चखे थे 

आसमां में दिखे थे कुछ बादल             
ख़ाली बर्तन भी पास रखे थे 

एक कमरे का मकाँ था जिसमें 
सारी दुनिया के ख़्वाब रखे थे 

मिल गए माज़ी के बक्से में 
कितने उधड़े लिबास रखे थे 

ख़ुद पे उतरेगा कहाँ जाना था 
जाने कब से ये ताब रखे थे 

एक ख़ामोश ग़ज़ल सा था वो 
क़ैद जिसके मजाज़ रखे थे 

वक़्त बदला तो नहीं है यूँ ही 
हमने कुछ नगमे साज़ रखे थे 

जब सुलगते थे धुआँ उठता था 
शोले फ़ितरत में आब रखे थे 

रोज़-ए-अव्वल ही से दुनिया में 
प्यार पे सख्त पास रखे थे 

पारा-पारा ही मिले हैं अक्सर 
कल के हिस्से में आज रखे थे 

अहद का नफ़ा-ज़ियाँ क्या है 
हमने कब ये हिसाब रखे थे 

कच्ची मिट्टी से मकाँ ऊँचे तक 
सबके अपने अज़ाब रखे थे 

चलो तामीर पूरी करते हैं 
कुछ अधूरे से ख़्वाब रखे थे।

असास: बुनियाद /नींव, माज़ी: इतिहास, ताब: गुस्सा, मजाज़: कानूनी रूप से स्वीकृत बात, आब: पानी, 
रोज़-ए-अव्वल: पहला दिन, पास: कब्जा, पारा-पारा: खंड-खंड /टुकड़े-टुकड़े, अहद: वादा, नफ़ा-जियां: लाभ-हानि, अज़ाब: मुश्किलें।

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत सुंदर भावभिव्यक्ति... http://aapki-pasand.blogspot.co.uk/2013/06/blog-post_11.html

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  2. बहुत सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति . आभार जो बोया वही काट रहे आडवानी आप भी दें अपना मत सूरज पंचोली दंड के भागी .नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

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