शनिवार, 9 नवंबर 2013

जोगी वही जो कपड़ा रंगाए


सुबह-सुबह मोबाइल फोन की घंटी बजी तो आदत के मुताबिक नींद में ही हरा बटन दबाया और कान पर लगा लिया। सुनाई दिया- ‘मन न रंगाए जोगी कपड़ा रंगाए....’। हरिओम शरण की आवाज़ में कबीर की यही एक लाइन बार-बार सुनाई दे रही थी, लगा कि टेप एक जगह अटक गया है शायद, लेकिन पीछे से गूँजी दूसरी खुरदरी आवाज़ ने भ्रम तोड़ दिया। पूछा गया- ‘बोलो, क्या समझे? सप्रसंग व्याख्या करो।’
       बिना किसी भूमिका के ऐसे सीधे सवाल दाग देने की हिम्मत और वह भी अलसुबह भला और किसकी हो सकती थी सिवाय लल्लन मियाँ के। फिर भी नींद की ख़ुमारी अब तक उतरी न थी सो मैंने पूछा- ‘कौन? लल्लन मियाँ!’ जवाब मिला- ‘नहीं भाई मियाँ, मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूँ और सीधा सवा अरब का सवाल पूछ रहा हूँ।’ मैंने याद दिलाते हुए कहा कि अमिताभ करोड़पति-करोड़पति खिलाते हैं अरबपति-अरबपति नहीं, तो जवाब आया- ‘वो तो रुपयों की बात है जो जीतने के बाद मिलते हैं, अपन तो खिलाड़ी को देखने वालों की बात कर रहे हैं। तुम तो ये बताओ कि क्या समझे?’
       ‘समझना क्या है, कबीर उन लोगों को गरिया रहे हैं जो धार्मिक होने का दिखावा करते हैं, आडंबर रचते हैं और.....।’ इससे पहले कि मैं अपनी बात पूरी करता लल्लन मियाँ बोल पड़े- ‘अमाँ क्या तोते की तरह स्कूल में रटी व्याख्या दोहरा रहे हो, कुछ नई व्याख्या करो, आधुनिक टाइप।’ कुछ क्षण सोचकर मैंने कहा- ‘मतलब है कि आपका ‘माइंडसैट’ तो पुराना वाला ही है ‘बट’ आप दिखाते हैं कि आप ‘चेंज्ड पर्सन’ हैं।’ इतना सुनते ही लल्लन मियाँ का रिकॉर्ड चालू हो गया। बोले- ‘हद्द है यार तुम्हारी भी! हिन्दी मीडियम स्कूल में पढ़कर ताजा-ताजा कॉलेज पहुँचे लौंडे की तरह आधुनिक हो रहे हो, बात में दो-चार अंग्रेजी के शब्द घुसेड़ कर अंग्रेज हुए जा रहे हो। अमाँ ये कोई आधुनिक व्याख्या नहीं है। अगर तुम कबीर की आधुनिक व्याख्या कर पाते, उस पर अमल कर पाते तो यूँ चप्पलें चटकाते, कलम घसीटते न फिर रहे होते, भावी प्रधानमंत्री या इसरो प्रमुख होते। रहने दो तुमसे न हो पाएगा।’
       जब लल्लन मियाँ चप्पल चटकाने वाली हालत का हवाला देकर मुझे अयोग्य साबित कर ही चुके, तो मेरा पलटकर उन्हीं से सही व्याख्या पूछना तो बनता था। वे तो जैसे तैयार ही बैठे थे, छूटते ही बोले- ‘देखो भाई, ये जो व्याख्या है न कि कबीर उन जोगियों को गरिया रहे हैं जो कपड़ा रंगा लेते हैं पर मन से सांसारिक ही रहते हैं, यह एकदम ग़लत है। इसका असल मतलब अब खुलकर सामने आया है और वह यह है कि असली जोगी वही है जो कपड़ा जरूर रंगा ले लेकिन मन न रंगने दे।’
       मैंने कहा कि यह तो भावार्थ हुआ, तो लल्लन मियाँ ने खुलासा किया- ‘देखो मियाँ! पुराने टाइम का जो जोगी होता था वो होता था ऐसा आदमी जिसके बारे में दिखता था कि ईश्वर से लौ लग गई है। मन का किसे पता कि भीतर क्या चल रहा है, लोग तो बाहरी चोला देखकर ही उसे जोगी कहते थे न। आवभगत भी खूब करते थे। कुल मिलाकर बात यही हुई न कि बेटा आवभगत करानी है तो मन रंगे या न रंगे, कपड़े का रंगना जरूरी है। अब आधुनिक टाइम के जोगी जो हैं वे कई फील्ड्स में हैं अलग-अलग रंग के चोलों में। जैसे वाल्मीकि की कथा से प्रेरणा लेकर कई चोर-लुटेरे जोगी-बाबा हो गए हैं। सालों से एक दल सेक्युलर धारा का चोला ओढ़ मौज काट रहा है। 84 के दंगे टाइप चीजें उसके मन के भीतर की चीजें हैं, बाहर से वह सेक्युलर जोगी है। जैसे जोगी हर चर्चा का मुँह ईश्वर की ओर मोड़ आदमी को भक्ति की दुनिया में पहुँचा देता है, वैसे ही अपने भगवा ब्रिगेड के भावी प्रधानमंत्री हर मुद्दे का मुँह भावनाओं की ओर मोड़ लोगों को देशभक्ति की दुनिया में पहुँचा देते हैं। आजकल पटेल से जुड़ी भावनाओं से खेल रहे हैं। चैनल-वैनल सब पटेल-कांग्रेस-आरएसएस के संबंध खंगालने में जुटे पड़े हैं। बताओ किसी ने पूछा कि भैया पटेल की मूर्ति बन जाने से आत्महत्या कर रहे उन किसानों का क्या भला होगा, जिनसे तुम लोहा मांग रहे हो? किसानों और देश का भला हो या न हो, देशभक्ति धारा के जोगी होने से इनकी मौज है। समाजवादी जोगियों की क्या मौज है ये तुम उत्तर प्रदेश में देख ही रहे हो।’
       थोड़ा रुक कर लल्लन मियाँ फिर बोले- ‘वैसे तुम्हारी ‘माइंडसैट’ वाली बात भी थोड़ी ठीक ही थी, पूछो कैसे?’ मैंने कहा- ‘आप ही बताइए।’ वे बोले- ‘ताजा उदाहरण तुम्हारी व्याख्या के करीब है। इसरो प्रमुख के. राधाकृष्णन ने कपड़े तो विज्ञान के रंग में रंग लिए पर मन तिरमाला तिरपति देवस्थानम के रंग में रंगा रहा। चलो अब फोन रखते हैं, बोलो ऊँ विज्ञान देवाय नमः।’ 
       इससे पहले कि वह फोन रखते मैंने पूछा लिया कि आपकी सवा अरब का सवाल वाली बात कहाँ फिट बैठती है। वह बोले- ‘तुम यार निरे मूरख ही रहे। अरे देखते नहीं हो देश की सवा अरब जनता अपने हाथ की रेखाओं से लेकर देश का भविष्य तक बांचने की उम्मीद लिए कैसे इन तरह-तरह के जोगियों का मुँह ताकती रहती है।’

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