बुधवार, 6 नवंबर 2013

असहमति का सम्मान और मेरी तेरी उसकी बात


ठीक-ठीक याद नहीं पर शायद दसवीं या ग्यारहवीं में पढ़ता था, जब बड़े भाइयों और उनकी इप्टा, प्रलेसं वाली मित्र मंडली की सोहबत का असर मुझ पर होने लगा था और स्कूल के कोर्स में शामिल कहानियों से इतर भी हिन्दी साहित्य पढ़ने की ठीक-ठाक आदत विकसित हो चुकी थी। प्रेमचंद के 'गबन' और 'गोदान' सरीखे उपन्यास पढ़ चुका था। यही वक्त था जब पहली बार राजेन्द्र यादव का नाम जाना, उनके उपन्यास ‘सारा आकाश’ से। अब भी याद है कि बीच में एक-दो बार ही उठा था, वरना एक ही बैठक में पूरा पढ़ डाला था ‘सारा आकाश’। फिर अरसे तक इसके पात्र दिमाग में बने रहे, आज भी हैं। बहू के घड़ी पहनकर रसोई में जाने पर तंज़, ननद का दाल में मुट्ठीभर नमक झोंक देना, पत्नी के लिए साड़ी लाने पर मां का तंज़ जैसी कितनी छोटी-छोटी चीजों की कहानियां हैं इसमें। उस भाषा में, जिसे समझने के लिए हिन्दी के भारी-भरकम शब्दकोशीय ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। इतने सालों बाद भी यह उपन्यास कहानियों के कोलाज की शक्ल में ज़ेहन की दीवारों पर टंगा हुआ है।

उपन्यास के माध्यम से यह राजेन्द्र जी से पहला परिचय था. उनसे कभी मिलना नहीं हुआ, पर एक अरसे तक हर महीने उनकी बात सुनी जाती थी। सालों तक ‘हंस’ कहानियों के लिए कम उनके लिखे संपादकीय के लिए ज्यादा ख़रीदी गई और ये संपादकीय यानी ‘मेरी तेरी उसकी बात’ इस बात को और पुख्ता करते गए कि राजेन्द्र यादव छोटी-छोटी चीजों को देखने का नाम है। यह अपने शीर्षक के अनुरूप ही लगता था। भारी-भरकम शब्द विन्यास के बिना सीधे-सीधे छोटी लेकिन ज़रूरी चीजों पर खरी बात करता हुआ। अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकीयों से अलग, बातचीत करता हुआ, असहमतियों का प्रत्युत्तर देता हुआ और इस आग्रह के साथ अपने तर्क रखता हुआ कि असहमत हैं तो आइए चर्चा करें। बीच के कुछ अंतराल के बाद जब दो-ढाई साल पहले फिर से हंस खरीदना शुरू किया तो लगा कि संपादकीय की धार पहले जितनी तीखी नहीं रही, ‘मेरी बात’ शायद ज्यादा प्रधान हो गई है लेकिन ‘तेरी’ और ‘उसकी’ बात अभी भी जारी है।

हिन्दी के पाठकों की गिरती संख्या और साहित्य की दुर्दशा के बारे में उछलते जुमलों पर अपने एक संपादकीय में वह लिखते हैं- ‘हिंदी में पाठकों की कमी का रोना लगभग हर लेखक और प्रकाशक रोता है। मगर इस बात पर चिंता कभी-कभी ही की जाती है कि हमारे यहां बैठकी की वह परंपरा लुप्त हो गई है जहां से साहित्य ही नहीं दुनिया-भर की दूसरी बौद्धिक बहसें जन्म लेती हैं, आन्दोलन शुरू होते हैं। किसी भी साहित्यिक, राजनैतिक या सांस्कृतिक गतिविधि के लिए बैठकबाजी एक अनिवार्य तत्व है। इन दिनों दिल्ली में ऐसी जगह तलाश करना मुष्किल है जहां कुछ लोग दो-चार घंटे बैठकर अपनी बेचैनी और जेब के हिसाब से बकवास कर सकें।’ बैठकबाजी की इस अनिवार्यता के अलावा वह लेखकों के भीतर मौजूद कमी का भी ज़िक्र करते हैं- ‘किसी भी स्थिति को लंबे समय तक अपने भीतर पचाने और रचाने की क्षमता चूंकि लेखकों में कम हुई है इसीलिए लघुकथाओं की बाढ़ है। ये लघुकथाएं बेहद फॉर्मूलाबद्ध ढर्रे पर लिखी जाती हैं। राजनैतिक भ्रष्टाचार, अमीरों द्वारा ग़रीबों का शोषण या ऐसी ही दो-चार सामान्य घटनाएं।’ यहां यह आपत्ति तो दर्ज की जा सकती है कि भ्रष्टाचार और शोषण बड़ी और जवलंत समस्याएं हैं इसलिए इन्हें सामान्य तो नहीं कहा जा सकता लेकिन राजेन्द्र जी के ‘फॉर्मूलाबद्ध ढर्रे’ के आशय से असहमत भी नहीं हुआ जा सकता।

इन दिनों जब हिन्दी के बरअक्स अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य की मौजूदगी और उसे महत्वपूर्ण स्थान दिए जाने की चर्चाएं और अधिक गंभीर होती जा रही हैं, तब पांचवे जयपुर साहित्य समारोह पर लिखे गए राजेन्द्र जी के संपादकीय के अंश याद आते हैं, जहां वह भाषा को अपना हथियार बनाने की साम्राज्यवाद की मंशा और मानसिक औपनिवेशिकता की परतों को देखते हैं। वह लिखते हैं- ‘भारतीय भाषाएं ही नहीं, क्यों इसमें चीन, जापान, रूस या ऐसे ही दूसरे देश सिरे से गायब हैं? पश्चिमी, विशेषकर योरुप, अमेरिका के नोबेल-बुकर से सुसज्जित देशों के अलावा दूसरे कोई नाम चूंकि सुनाई नहीं देते इसलिए उनका यहां नामलेवा भी नहीं है।...... जब से योरुपीय और अमेरिकन पुरस्कार और फैलोशिप तीसरी दुनिया के युवा लेखकों को दिए जाने लगे हैं और जिस तरह मीडिया उन्हें उछाल रहा है, तब से अंग्रेजी में लिखने वाला हर नया लेखक महान बनने के लिए बेचैन हो उठा है।...... सेकेंड और थर्डरेट रचनाओं की जिस तरह अंग्रेजी के अखबारों में पूरे पन्नों पर समीक्षाएं आती हैं वह किसी के भी मन में ईर्ष्या जगाने को काफ़ी है।’ साहित्य, साहित्यिक चर्चाओं और सत्ता से आम-जन की दूरी पर उन्होंने अपनी चिंता लगातार व्यक्त की। इसी संपादकीय में सत्ता के चरित्र का ज़िक्र करते हुए वह लिखते हैं- ‘दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर गणतंत्र दिवस का भव्य आयोजन और जयपुर साहित्य समारोह लगभग एक साथ ही मनाए जा रहे हैं; जिस जनता के प्रतिनिधित्व की कसमें ये खाते हैं, वह सामान्य-जन दोनों ही जगह ताली बजाऊ दर्शक है। पता नहीं क्यों, सत्ता के चरित्र पर सोचते हुए मुझे जयपुर समारोह का ही ध्यान हो आया। क्या इसे सत्ता का सांस्कृतिक विस्तार कहना बहुत दूर की कौड़ी लाना है?’

राजेन्द्र यादव को जितना श्रेय इस बात के लिए दिया जाता है कि उन्होंने कई अच्छे रचनाकारों को सामने लाने का काम किया, उतना ही श्रेय इस बात का भी दिया ही जाना चाहिए कि उन्होंने असहमत होने के अधिकार का पूरी ईमानदारी से सम्मान किया। जितनी बेबाकी से आप अपनी असहमति हंस में व्यक्त कर सकते हैं, बिना किसी संकोच के, और वह शामिल भी की जाती है तो इसके पीछे वजह राजेन्द्र यादव जैसे संपादक का होना है। असहमति के संवाद को किसी पत्रिका में बनाए रखना इस व्यावसायिक दौर में कम जोखिम भरा नहीं है, जबकि पत्रिका की सामग्री की तारीफ करते पत्र शामिल करना अधिकांश संपादक मुफीद मानते हों। ‘अपना मोर्चा’ पूरी तरह पाठकों का मोर्चा ही रहा, जहां वे खुलकर तारीफ भी कर सकते हैं और गलतियां बताते हुए आलोचना भी कर सकते हैं। उन्होंने अपने संपादकीयों में विभिन्न विषयों पर खुलकर अपनी असहमति भी व्यक्त की, फिर चाहे वह सत्ता पक्ष से असहमति हो या किसी विचार से असहमत लोगों से असहमति। वैचारिक-राजनैतिक चेतना और युवा वर्ग की इसके प्रति जागरूकता पर सहमति, असहमति और एक विचारधारा से असहमत लोगों से सवाल करते हुए वह लिखते हैं- ‘जब हमारे पास विचारधारा थी तो वह समाज के हर वर्ग में राजनैतिक जागरूकता और अपने दायित्व को बार-बार रेखांकित करती थी। चारों ओर से निराशा और हताश परिवेष में राजनीतिक चेतना संपन्न युवा हजारों की संख्या में आज भी नक्सल आंदोलनों में शामिल हो रहे हैं। इनमें दलितों, आदिवासियों और सर्वहाराओं को संघर्षों से जोड़ने का एक जनून है जिसे सरकार सिर्फ कानून और व्यवस्था से अधिक कुछ भी मानने को तैयार नहीं है।......... वे किनके खिलाफ और क्यों लड़ रहे हैं, यह सवाल अक्सर ही सरकारी तबकों में नहीं पूछा जाता।............. बैंगन की तरह मार्क्सवाद नाम से ही चिढ़ने वाले हमारे अशोक वाजपेयी और ओम थानवी जैसे लोग उन लागों लाख संघर्षशील युवाओं के उभार को क्या नाम देना चाहेंगे? दुनिया में जहां भी शोषक और शोषित के बीच असमानताओं की लड़ाई है, उसे बिना मार्क्सवाद के कैसे समझा जा सकता है, अगर अशोक जी इस पर भी प्रकाश डालते तो हम जैसे मूढ़मतों को कोई दिशा दिखाई देती।’

यह दुःखद है कि मरणोपरांत आखिर लोगों ने अपनी मनमानी कर ही ली। धार्मिक रीतियों से उनके विचारों को फूंकने की कोशिश की गई लेकिन विचार शरीर के साथ ख़त्म नहीं हो जाते। राजेन्द्र यादव के विचार भी नहीं ख़त्म नहीं होंगे। वे जब तक जीये धार्मिक कर्मकांडों और साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ लिखते रहे। धर्म के नाम पर सरकार की चुप्पी और जनमानस की धार्मिक आस्था पर भी उन्होंने प्रहार किए। अपने एक संपादकीय में उन्होंने लिखा है- ‘सरकार चाहे जितनी लोकतांत्रिक हो, मगर उसे यह अधिकार नहीं है कि किसी के धर्म में हस्तक्षेप करे - धार्मिक स्वतंत्रता के इस सिद्धांत के तहत धोखेबाजी और हत्या-बलात्कार के इन अड्डों को खुलेआम पनपने दिया जा रहा है। अनधिकृत रूप से किसी भी ज़मीन पर कब्जा करके मंदिर या मठ बनाने की बातें तो आम हो गई हैं और धार्मिक भावनाओं को चोट न पहुंचे, इसलिए सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है।........... हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं आस्थाओं और भावनाओं का आधार लेकर हमारे यहां लाखों औरतों को सती कर दिया गया या मासूमों के सिर काट कर देवी-देवताओं पर चढ़ा दिए गए।’

अपने अंतिम समय तक विवाद में घिरे रहे राजेन्द्र यादव की व्यक्तिगत और कार्यक्षेत्र की गतिविधियों पर लोगों की अपनी-अपनी राय है। कुछ उनसे सहमत हैं कुछ असहमत, लेकिन शायद यही राजेन्द्र यादव होने की शर्त भी थी। तमाम असहमतियों को स्वीकारने और पुरजोर ढंग से अपनी बात रखने की शर्त। व्यक्तिगत जीवन में वह क्या थे, क्या नहीं थे यह अलग बात है लेकिन एक लेखक-संपादक के रूप में असहमति को सम्मान देने वाले शख्स तो निश्चित ही थे।

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