गुरुवार, 21 जून 2012

कहानी कहने की कला



- वाल्टर बेंजामिन

हर सुबह अपने साथ दुनिया भर की खबरें लेकर आती है। लेकिन फिर भी हमारे पास अच्छी कहानियों का दारिद्र्य बना रहता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई भी घटना स्पष्टीकरण के बारीक छिद्रों से गुजरे बगैर हम तक नहीं पहुंचती। या यूं कहें कि लगभग हर चीज हमारी जानकारी में इजाफा भर करती है, लेकिन कहानी के पक्ष को बढ़ावा देने वाला उसमें कुछ भी नहीं होता। कहानी कहने की आधी कला इसी में है कि सुनाते समय उसे तमाम स्पष्टीकरणों से मुक्त रखा जाए। इस दृष्टि से आदिकाल के लोग, और उनमें भी हेरोटोटस, इस हुनर में माहिर थे। अपनी किताब 'हिस्टरीज' के तीसरे खंड के चौदहवें अध्याय में वे सैमेनिटस की कहानी सुनाते हैं।

युद्ध में हार के बाद मिस्र के बादशाह सैमेनिटस को ईरान के राजा कैंबिसेस ने बंदी बना लिया था। कैंबिसेस अपने बंदी को नीचा दिखाने पर आमादा था। उसने आदेश दिया कि सैमेनिटस को उस सड़क पर लाया जाए जहां से ईरानी विजेताओं का जुलूस निकल रहा था। उसने यह इंतजाम भी किया कि बंदी अपनी बेटी को एक साधारण नौकरानी के रूप में पानी का घड़ा लिए कुंए की ओर जाता देखे। इस नजारे को देख सारे मिस्रवासी जहां बिलखने और विलाप करने लगे, वहीं सैमेनिटस चुपचाप, बिना बोले जमीन पर नजरें गड़ाए खड़ा रहा। फिर इसके बाद जब उसके बेटे को फांसी देने के लिए जुलूस में ले जाया जा रहा था, तब भी वह खामोश रहा। लेकिन जब उसने अपने एक पुराने बूढ़े नौकर को बंदियों की कतार में भिखारियों की तरह जाते देखा, तो उसने अपने सिर को पीटते हुए गहनतम तकलीफ और दु:ख का इजहार किया। इस कहानी में हम किस्सागोई की असली मिसाल देख सकते हैं। सूचना का महत्व सिर्फ उस क्षण में रहता है, जब वह नई होती है। उस एक क्षण से आगे वह जिंदा नहीं रहती। उस एक क्षण के प्रति समर्पित होकर उसे बिना वक्त गंवाए अपने-आपको व्यक्त कर देना होता है। कहानी के साथ ऐसा नहीं है। वह अपने-आपको खर्च न करते हुए अपनी शक्ति को अपने भीतर जुटाए रहने और लंबे समय बाद उसे मुक्त करने की क्षमता रखती है। और इस तरह मोंतेन ने मिस्र के बादशाह की इस कहानी को पढ़ने के बाद अपने-आप से पूछा कि बादशाह ने अपने नौकर को देखने के बाद ही दु:ख का इजहार क्यों किया, और पहले क्यों नहीं? और मोंतेन ने स्वयं ही उत्तर देते हुए कहा, 'चूंकि वह व्यथा में इस कदर सराबोर हो चुका था कि एक छोटा सा झटका और लगते ही उसके भीतर का बांध टूट गया।'

कहानी को इस तरह से समझा जा सकता है, लेकिन इसमें दूसरे स्पष्टीकरणों की भी गुंजाइश है। मोंतेन के इस प्रश्न को अपने दोस्तों के बीच पूछकर कोई भी इन तक पहुंच सकता है। मेरे एक मित्र ने कहा, 'बादशाह शाही खानदान की नियति से विचलित नहीं होता, क्योंकि यह लहू उसका अपना है।' एक अन्य ने कहा, 'मंच पर हमें बहुत सी ऐसी बातें विचलित करती हैं, जिनसे सचमुच की जिंदगी में शायद हम प्रभावित न हों। बादशाह के लिए यह नौकर सिर्फ एक अभिनेता है।' तीसरा बोला, 'गहरी यंत्रणा तब तक जमा होती जाती है, जब तक थोड़ी सी फुरसत न मिल जाए। बादशाह के लिए नौकर का दिखना फुरसत का ऐसा ही क्षण था।' चौथे ने कहा 'अगर यह घटना आज की दुनिया में घटी होती, तो सभी अखबारों ने यह दावा किया होता कि सैमेनिटस अपने नौकरों को अपने बच्चों से भी अधिक चाहता था।' जो भी हो, यह सच है कि हर रिपोर्टर लगे हाथ कोई-न-कोई स्पष्टीकरण जरूर ईजाद कर लेगा। हेराडोटस कोई स्पष्टीकरण नहीं देता। उसका वृत्तांत सबसे शुष्क है। और यही कारण है कि पुरातन मिस्र की यह कहानी आज हजारों वर्षों बाद भी विस्मय और विचार को जागृत करने में सक्षम है। इसमें अन्न के उन दानों के से गुण हैं, जो पिरामिडों के गर्भग्रहों में सुरक्षित बंद रहने के बाद आज भी अपने भीतर अंकुर प्रस्फुटित करने की क्षमता को बचाए हुए हैं।
अनुवाद: जितेंद्र भाटिया
(पहल 69, सितंबर-नवंबर 2001 से)

गुरुवार, 14 जून 2012

वो लगावट छोड़कर चले गए


‘अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें...’

       अहमद फराज की लिखी यह पंक्तियां जिसने भी मेहदी हसन के गले से निकले सुरों में सुनी हैं, आज उसे जरूर याद आ रही होंगी। असल में यह वह पंक्तियां हैं, जो सुनने के बाद कभी भुलाई ही नहीं जा सकीं। वजह अहमद फराज की लेखनी तो रही ही, उससे कहीं ज्यादा मेहदी हसन की आवाज रही। वह आवाज, जो सुनने वाले को खुद में नहीं रहने देती, रूमानियत से लबरेज खयालों और सकून की अनकही-अनसुनी अनुभूति वाली दुनिया में ले जाती है।
       वे, जो संगीत की बारीकियों को जानते हैं और वे भी, जो सिर्फ शब्दों में छिपे अर्थ को ढूंढते हैं, इस अद्भुत आवाज के मुरीद रहे हैं। जब मेहदी हसन की आवाज में 'चराग-ए-तूर जलाओ बड़ा अंधेरा है' सुनाई देती है, तो वाकई भीतर कोई दीया-सा जल उठता है। 'कुछ उसके दिल में लगावट जरूर थी' का अहसास कुछ इस शिद्दत से होता है मानो कोई अजीज चुपके से 'हाथ दबाकर' गुजर गया हो और 'गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार' चली ही आती है।
       मेहदी हसन ने ताजिंदगी गाया, और सिर्फ गाया। जैसे इसके अलावा दूसरा कोई काम उन्हें था ही नहीं। उन्होंने न जाने कितनी गजलें गार्इं, उन्हें चाहने वालों की संख्या भी बेतहाशा है। उनकी आवाज किसी एक मुल्क की आवाज होकर नहीं रही, वह रॉयल अल्बर्ट हॉल तक गूंजी, जिसके कंसर्ट के रिकॉर्ड मेहदी हसन की अब तक गाई गजलों में सबसे ज्यादा बिकने वाले रिकॉर्ड हैं। यह भी बड़ी ही दिलचस्प बात है कि इस सबके बावजूद उनकी गाई गजलों के बारे में किसी से पूछिए, तो कुछ चुनिंदा गजलों के मुखड़े ही लोगों को याद आते हैं।
       बहरहाल, गजलों को शास्त्रीय संगीत में पिरोने वाले मेहंदी हसन 'शहंशाह-ए-गजल' कहे जाते हैं, तो इस बात के एक पहलू पर भी बात करना जरूरी है। शायद ऐसे लोग बहुत न हों, जिन्हें यह पता हो कि मेहदी हसन ने फिल्मों में भी गाया। पाकिस्तानी फिल्मों में उनके गाए गीत और गजलें जिन्होंने सुनी हैं, वे यह बात बखूबी समझ सकते हैं कि फिल्मी गीतों में वह मेहदी हसन दिखाई नहीं देते, जो गजलों में नुमायां होते हैं। 'भीगी-भीगी रातों में', 'सच्ची बात कहो', 'क्या पूछते हो, क्या तुमसे कहूं', 'मेरे हमदम तुम्हें पाकर करार आया है' जैसे तमाम फिल्मी गीतों में यही आवाज कुछ उथली-सी नजर आती है। इसमें उस गहराई का अहसास नहीं होता, जिसमें डूब जाने का दिल करे। और संगीत की वह रवानी तो इन गीतों में बिल्कुल भी नहीं है, जो खास मेहदी हसन की पहचान है।
       एक तरफ उनकी नॉन-फिल्मी गजलें हैं और दूसरी तरफ उनके फिल्मी गीत, दोनों में आवाज एक ही है, लेकिन दोनों का मेहदी हसन बिल्कुल जुदा है। जहां तक संगीत की बात है, तो मेहदी हसन को सुनने वाले और खासकर वे, जिन्हें संगीत की भी समझ है, ऐसे न जाने कितने ही लोगों के मुंह से सुना है कि 'मेहदी हसन साहब को तो संगतकारों की जरूरत ही नहीं। उनकी आवाज ही ऐसी है कि संगीत खुद-ब-खुद सुनाई देने लगता है। जब वह गजल की शुरुआत में सुर साधते हैं, तो जैसे मन के तार झंकृत हो जाते हैं।' फिर क्या वजह है कि फिल्मी गीतों में हमें ऐसे मेहदी हसन दिखाई नहीं देते? वजह बिल्कुल साफ है। वह एक ऐसे गायक-संगीतज्ञ थे, जिन्होंने संगीत को कभी भाव पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने जितनी भी बंदिशें कीं, संगीत भाव का साथी रहा, उसका रहनुमा नहीं। वे गाते नहीं थे, बल्कि गजल के भाव को जीते थे। शायद यही वजह थी कि जब शब्द उनके गले से होकर गुजरते थे, तो शब्द नहीं रह जाते थे, अनुभूति में तब्दील हो चुके होते थे। उनके फिल्मी गीतों में संगीत और भाव का यह ताल-मेल कमजोर पड़ता है। जाहिर है कि यह फिल्मकारों की जरूरत के चलते ही हुआ होगा और एक न भुलाई जा सकने वाली आवाज इन जरूरतों के मद्देनजर वह जलवा न बिखरा सकी, जो वह अपनी स्वतंत्रता में हमेशा बिखराती रही और एक अजब सी लगावट का अहसास कराती रही। आज भले ही खान साहब हमारे बीच नहीं हैं, पर यह लगावट मौजूद रहेगी।

एक सुरमयी सांझ का अंत


       संगीत की सुनहरी किताब का एक और पन्ना मुड़ गया और साथ ही मुड़ गया वह रास्ता, जो थके-मांदे दिल-ओ-दिमाग, यायावरी सोच और हर उस लम्हे को, जिसमें कहीं कोई चुभन होती थी, सुकून की मंजिल तक ले जाता था। दुनियाभर के गजलप्रेमियों के बेहद चहेते और शहंशाह-ए-गजल के खिताब से नवाजे गए मेहदी हसन नहीं रहे।
       यह कहने की जरूरत नहीं कि वे लंबे अरसे से बीमार थे, लेकिन यह बात जरूर कहने की है कि उनकी बीमारी ने फिर एक बार यह साफ किया कि सियासत के गलियारों में कला की कोई कद्र नहीं। मेहदी हसन से जुड़कर उनकी जन्मस्थली राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूणा गांव का जिक्र उनकी बीमारी के साथ ही शुरू हुआ। हर कोई जानता था कि उन्हें हिंदुस्तान से बहुत प्यार था। उनकी मृत्यु के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री कहते हैं, ‘मेहदी हसन को इलाज के लिए राजस्थान सरकार ने पाकिस्तान से भारत लाने के लिऐ पूरे प्रयास किए, उनके परिवार के चार लोगों को केंद्रीय विदेश मंत्री के सहयोग से वीजा भी उपलब्ध करा दिया गया, लेकिन दुर्भाग्य से ज्यादा बीमार होने के कारण वे भारत नहीं आ सके।’ अब सवाल यह उठता है कि क्या मेहदी हसन तेरह वर्षों से लगातार इतने बीमार थे, कि उनका भारत की यात्रा करना मुश्किल था, और खासकर पिछले तीन साल, जो उनके लिए सबसे ज्यादा तकलीफदेह रहे, में भी क्या उनकी हालत कभी इस यात्रा के लायक नहीं रही, जबकि 2010 में आए एलबम ‘सरहदें’ के लिए गीत तैयार करने की उनकी स्थिति रही।
       इसे दो देशों के बीच की आपसी राजनैतिक स्थितियों का नतीजा भी नहीं कहा जा सकता कि एक जिंदगी से जूझता फनकार अपने इलाज के लिए उस सरहद को पार नहीं कर सका, जिसे अपनी आवाज के जरिए वह कब का नेस्तोनाबूद कर चुका था। असल में यह हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों ही मुल्कों की सरकार की कला और कलाकारों के प्रति उदासीनता का नतीजा है। प्रख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खां, राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित ढोलक वादक उस्ताद शकूर खां, और ऐसे ही कई नाम पहले भी इस उदासीनता का शिकार हो चुके हैं। यह किसी भी देश की सरकार के लिए एक सवालिया निशान है कि आखिर क्यों जिन फनकारों पर पूरा देश नाज करता है, जिनकी शोहरत को उनका बाजार भुनाता है और सरकार गर्व करती है, वह अपने आखिरी वक्त में सरकार की तरफ से मिल सकने वाली मदद से महरूम रह जाते हैं। मेहदी हसन का किस्सा भी इससे कुछ अलग नहीं है। यहां यह भी सवाल खड़ा होता है कि जब तमाम म्यूजिकल शोज के लिए बीते सालों में कई कलाकारों ने हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच की सरहद पार की, तब आखिर मेहदी हसन के लिए कौन-सी रुकावट थी? क्या यह कि एक उखड़ी हुई सांस बाजार उपलब्ध नहीं करा सकती थी?
       मेहदी हसन, जिनके लिए हिंदुस्तान और पाकिस्तान में कोई फर्क नहीं था, उन्हें दोनों देशों की सरकार बस शोक संवेदना ही दे सकी और दोनों मुल्कों की आवाम को एक जैसा सुकून देने वाली एक सुरमयी सांझ बिना कोई शिकवा किए ढल गई।

मंगलवार, 12 जून 2012

अपने हिस्से की जमीन


‘चल हट! यहां क्या तेरे बाप ने पट्टा लिखाया था?’

मूंछों पर ताव देते हुए जब वह रमुआ से यह कह रहा था, तब शायद उसने खुद सोचा भी नहीं था कि वहां पट्टा तो उसके सदा शराबखोर स्वर्गवासी पिता ने भी नहीं लिखाया था। पर ठसक थी ठकुराई की, जिसके बूते अपने खलिहान की सीमा के विस्तार में आड़े आती रमुआ की झोंपड़ी उसकी अपनी बपौती थी।

रमुआ यानी रामअवतार, जो देशज उच्चारण के चलते रामौतार और फिर संक्षिप्तिकरण का शिकार हो बस रमुआ ही बचा था, खुद भी इसी तरह सिकुड़ता जा रहा था। वैसे था तो वह इतना हट्टा-कट्टा कि अगर तैश में आ जाता तो सामने वाले को एक हाथ में ही बता देता कि पट्टा तो तुम्हारे बाप ने भी नहीं लिखाया। बस चुप था तो इसलिए कि पैरों में कुछ जंजीरें पड़ी थीं।

जब वह पंद्रह-सोलह की उम्र में था तो अक्सर इस बात पर चिढ़ जाता था कि गांव के सात-आठ बरस के लड़के भी उसे सीधा नाम लेकर बुलाते हैं। दद्दा, दादा कुछ नहीं, बस रमुआ। इस बात पर उसके पिता ने कहा था, ‘वे ठाकुर हैं, ऊंची जात के। एक तो हमारी जात नीची, फिर हम काम भी तो उन्हीं के खेतों में करते हैं।’ तब वह नहीं समझ सका था कि नीची जात का होने की वजह से ठाकुरों के छोटे बच्चे उसका आदर नहीं करते, या इस वजह से कि वह उनके खेतों में काम करता है। पर वजह समझ न आने पर भी उसने इसी को अपने भी जीवन का सत्य मान लिया।

अब जब वह खुद एक पंद्रह-सोलह बरस के लड़के का पिता है और आज जब उसकी झोंपड़ी भी किसी के खलिहान में समाने वाली है, तो वह जान चुका है कि असल में वह सामने खड़े उससे आधी उम्र के लड़के के लिए रमुआ क्यों है। वह जान चुका है कि बिना ऐसा किए उसको नीचा या कमतर होने का एहसास नहीं कराया जा सकता और बिना इस एहसास के वह उन लोगों के तलुवे नहीं चाटेगा, जो उसकी मेहनत का फल भी उसे कृपा की तरह देते हैं।

उसे लग रहा था कि अगर आज वह अपनी झोंपड़ी किसी और के हवाले कर देता है, तो उसका बेटा भी इन्हीं जंजीरों में जकड़ा दूसरा रमुआ होगा। बेशक उसका पिता और आज वह खुद भी जिस जमीन पर बसा हुआ है, वह उसकी नहीं है, लेकिन वह जमीन उसे हड़पने को तैयार शख्स की भी नहीं है।

सामने से पड़ती गालियों की बौछार के बीच आखिरकार वह बोल ही उठा, ‘पट्टा किसके बाप ने लिखाया था, यह तो पटवारी ही आकर बताएगा।’

अपने हिस्से की जमीन पर रमुआ के पैर मजबूती से टिके थे।

शनिवार, 26 मई 2012

छोड़ो ये बेकार की बातें


अच्छी बातें, प्यारी बातें
छोड़ो ये बेकार की बातें

दो पल हंसकर बोले थे
बन बैठी हैं प्यार की बातें

उसकी ग़लती इतनी थी
कर बैठा था ख़ार-सी बातें

दोस्त बहुत गहरे हैं लेकिन
हो गई हैं दुश्वार भी बातें

आजिज़ अपनों से आकर
करता है बेज़ार-सी बातें

छूट गया वो हमसे ‘साहिल’
डुबा न दें मझधार-सी बातें

बुधवार, 16 मई 2012

मेरा हक़ तो मिल जाता...


दुनिया भर की बातों में अपनी सुनना सीख गया
बातों से निकली बातों को अब मैं गुनना सीख गया

अब कितने दिन रह पाएगी इस घर में वीरानी ये
मैं दीवारों की सीलन में तस्वीरें बुनना सीख गया

मेरा हक़ तो मिल जाता येन-केन-प्रकरेण मुझे
अपने जैसों की ख़ातिर मैं सिर धुनना सीख गया

उनकी नज़रों में बेशक अब भी ख़ाली हाथ सही
बेहतर दुनिया के टुकड़े पर मैं चुनना सीख गया

झूठ बोलता हूं अक्सर ताकि उनको दुःख न हो
सच के गहरे ज़ख़्मों को मैं तो सिलना सीख गया

बात मज़े की इतनी है ‘साहिल’ चुप-चुप बैठा है
ख़ामोश ज़ुबां में वो भी अब कहना-सुनना सीख गया