शनिवार, 5 जनवरी 2013

ज़रूरत शिक्षा की: ताकि दामिनी खुलकर चमके


-रजनीश ‘साहिल’

(3 जनवरी 2013 को दैनिक जनवाणी, मेरठ में प्रकाशित अंश)
16 दिसंबर की रात आज की रात से कहीं ज़्यादा सर्द थी। शायद इन सर्दियों की सबसे सर्द रात। इस मायने में नहीं कि ठिठुरन से हाथ-पांवों ने चलना बंद कर दिया था, बल्कि इस मायने में कि उस रात दिलो-दिमाग ने भी चलना बंद कर दिया था। जिसे भी वाकये की खबर लगी उसके पास बस एक सवाल था, ‘आखिर कोई इतना बर्बर कैसे हो सकता है?’ जवाब देने लायक दिमाग शायद ही किसी का चल रहा हो, सब बंद हो चुके थे। बलात्कार की खबरें लोग रोज की अखबारों में पढ़ते हैं, न्यूज चैनलों पर देखते हैं, थोड़ी ‘हाय-हाय, धिक्-धिक्’ करते हैं और फिर लग जाते हैं अपने काम में। पर इस बार ऐसा नहीं कर सके। उन्होंने अपने काम छोड़े, एकत्रित हुए, सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, देश के अलग-अलग हिस्सों में भी, और दोषियों को सजा, कानून में बदलाव की मांग की आवाजें उठाईं। दामिनी बुझते-बुझते भी लोगों को रास्ता दिखा गई।
       महिला अधिकारों की बात सालों से की जा रही है, लेकिन इस घटना के बाद उन्हें इस हद तक राजनीतिक मुद्दा बनते कम से कम बीते दस बरस में तो पहली बार देखा है। पर क्या यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा है? क्या इन घटनाओं पर सिर्फ कानून को सख्त बनाकर काबू पाया जा सकता है? इस कानून की मांग कर रहे लोगों का भी मानना है कि ऐसा नहीं है, क्योंकि यह राजनीतिक से कहीं ज्यादा एक सामाजिक मुद्दा है। और जहां तक बात कानून के सख्त होने की है, तो हिंदुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया के उदाहरण मौजूद हैं कि किसी भी अपराध की सजा कितनी भी सख्त क्यों न हो, अपराध फिर भी होते हैं। कहने का आशय यह कतई नहीं है कि कानून सख्त नहीं होना चाहिए, वह सख्त होना चाहिए और इस हद तक होना चाहिए कि उसमें लचीलेपन की कोई गुंजाइश बाकी न रहे। सख्त कानून अपराध की आशंका को मानसिक दबाव के जरिए कम करने में मददगार होता है। पर जब बात महिलाओं के साथ होने वाले यौन दुव्यर्वहार की, और वह भी ताजा आंकडों के परिप्रेक्ष्य में आती है, तो यह और भी साफ हो जाता है कि यह किसी सख्त कानून के बनने, उसके ठीक ढंग से लागू होने, दोषियों को सजा मिलने से कहीं पहले आपके-हमारे बीच के संबंधों और सोच को बदलने की मांग करती है।
       यह बात साफ तौर पर सामने है कि महिलाओं के प्रति यौन हिंसा की घटनाओं में भारत में तेजी से इजाफा हुआ है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक पूरे देश में दर्ज हुए बलात्कार को मामलों में 2010 में 7.1 प्रतिशत और 2011 में 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2012 की रिपोर्ट क्या कहेगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। अब अगर इन कुल दर्ज मामलों के विभाजन पर नजर डाली जाए, तो इस बात पर गर्व करना छोड़ देना होगा कि भारत में स्त्रियों को देवी का दर्जा प्राप्त है, वह घर की लक्ष्मी होती है। कुल दर्ज मामलों में से 94.2 प्रतिशत मामलों में बलात्कार करने वाला उस महिला का अपना पिता, भाई, चाचा, मामा, मौसा, ससुर, देवर, जीजा या ऐसा ही कोई रिश्तेदार या पड़ोसी या पारिवारिक मित्र था। यानी महज 5.2 प्रतिशत मामलों में महिला किसी अपरिचित की कुदृष्टि की शिकार हुई वरना उसे लूटने वाले उसके अपने थे। इस स्थिति में जब ऐसी खबरें आती हैं कि किसी लड़की का पिता उसका दो साल तक लगातार बलात्कार करता रहा, तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था में होने वाले बलात्कार के कितने मामले दर्ज ही नहीं होते। दो साल बाद भी अगर पता न चलता तो कानून-व्यवस्था अंतर्यामी तो है नहीं! यहीं यह सवाल भी खड़ा होता है कि कोई कानून किस हद तक कारगर हो सकता है? इन स्थितियों में कानून की भूमिका सिर्फ सजा देने भर तक सिमट कर रह जाती है; और जाहिर है कि महिला के सम्मान की रक्षा का मतलब उसका अपमान करने वाले को सजा देना भर तो नहीं है।
       महिलाओं के सम्मान और स्वतंत्रता की प्रारंभिक इकाई समाज है। पिछले बहुत थोड़े से वक्फे में ऐसे कई बयान और फरमान सामने आ चुके हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बलात्कार की घटनाओं के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। यह बयान या फरमान समाज के ही प्रतिष्ठित लोगों द्वारा दिए गए हैं। कुछ तथ्यों पर नजर डालना जरूरी हो जाता है, जो इन बयानों और फरमानों की की धज्जियां उड़ाते हैं, जिनमें लड़कियों के कम कपड़़े पहनने का, मोबाइल इस्तेमाल करने का या लड़कों से संपर्क बढ़ने का हवाला दिया गया।
       एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि बलात्कार के कुल दर्ज मामलों में से लगभग 11 प्रतिशत मामलों में पीड़िता की उम्र 14 वर्ष से कम थी। क्या 14 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं के बलात्कार के संदर्भ में भी यह तर्क दिए जा सकते हैं? ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिनमें पूरी तरह पारंपरिक पोशाक पहने, बुर्के में सिर से पांव तक ढंकी महिलाएं भी बलात्कार की शिकार हुई हैं। मोबाइल का तर्क तो और भी बचकाना है। स्टॉकिंग, यानी फोन पर परेशान करने, अश्लील मैसेज भेजने, अभद्र बातें करने और धमकाने के लगभग 91 प्रतिशत मामलों में लड़के दोषी पाए गए हैं।
       इन तथ्यों और इन बयानों से साफ जाहिर होता है कि गड़बड़ी कहीं न कहीं हमारी सामाजिक व्यवस्था और सोच में है। तभी तो घर के भीतर से लेकर समाज के बाहरी हिस्सों तक हर कोई महिलाओं को ही बचकर निकलने की, कन्नी काट जाने की सलाह देता है, जबकि यह पुरुषों से कहना ज्यादा जरूरी है कि वे महिलाओें को ससम्मान निकलने के लिए रास्ता दें।
       यदि बारीकी से देखें, तो बलात्कार का मुद्दा कई और मुद्दों से भी जुड़ा हुआ है। यह जानकर शायद आपको हैरानी हो कि डायन कहकर मार डाले जाने के कई मामलों के मूल में किसी पुरुष द्वारा महिला को हासिल करने की कोशिश और महिला का प्रतिरोध रहा है। असफल होने पर पुरुष का दंभ अशिक्षित और अंधविश्वासी  समाज में डायन प्रथा का रूप लेता है, तो शिक्षित समाज में प्रताड़ना के नये-नये तरीके अपनाता है। यह संभवतः पुरुष होने का दंभ और स़्त्री को कमजोर समझने की पीढ़ियों से हासिल हुई ट्रेनिंग ही है जो मणिपुर से लेकर छत्तीसगढ़ तक, मनोरमा से लेकर सोनी सोरी तक महिलाएं सुरक्षा और शांति के लिए तैनात फौज और पुलिसकर्मियों द्वारा बलात्कार की शिकार होती हैं, और उतनी ही बर्बरता से जितनी बर्बरता से दिल्ली में दामिनी। यह एक पितृसत्तात्मक समाज का, पुरुष होने का दंभ ही है, वरना ऐसा करने की इजाजत उन्हें कानून या संविधान ने तो नहीं दी।
       कुल मिलाकर सारे तथ्य इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इन घटनाओं के पीछे की सबसे महत्वपूर्ण वजह महिलाओं के बारे में वह सोच है, जो उन्हें पुरुष से कमतर मानती है। यानी यह एक सामाजिक व्यवस्था की कमी है। निश्चित है कि इस कमी को एक झटके में जादू के जोर से दूर नहीं किया जा सकता। यह एक सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया है, जो वक्त लेगी। लेकिन इसके लिए संदर्भित कानून के प्रस्तावों में से उस प्रस्ताव पर गंभीरता से ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है जो सबसे जरूरी है, और जिस पर कि शायद अब तक सबसे कम बात की गई है। शिक्षा में जेंडर इक्वलिटी और उससे जुड़े बिंदुओं को विषय के रूप में शामिल किए जाने का प्रस्ताव। विचार, सोच की पुरातन बेड़ियों को हमेशा से ही नये ज्ञान स्रोतों और अध्ययन की नयी कोशिशों  ने काटा है। कानून समाज को नियंत्रित रखने की एक पद्धति है, जिसका होना भी ज़रूरी है; लेकिन समाज में बदलाव हमेशा एक सकारात्मक विचार और ज्ञान स्रोतों के माध्यम से आया है। इसलिए इन स्थितियों में बदलाव लाने का और सही मायनों में महिला और पुरुष को बराबरी पर खड़ा करने का इससे बेहतर कोई और विकल्प संभव नहीं है कि हम न केवल अपनी अकादमिक शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाएं, बल्कि ऐसे विकल्प भी तलाशें जिनके माध्यम से समाज के हर तबके में महिलाओं के प्रति बराबरी और संवेदनशीलता के बीज बोए जा सकें। संविधान और कानून व्यवस्था में तो अब तक कई संशोधन हम करके देख चुके हैं, क्यों न इस बार शिक्षा में संशोधन करके देख लिया जाए, ताकि आने वाले समय में कोई दामिनी अपने सपनों के फलक पर खुल कर चमक सके और हमें शर्मसार न होना पड़े।

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

ताकि जब चाहें वे चुन सकें फूल

बार-बार लिखता हूँ और डिलीट कर देता हूँ। क्योंकि बात एक नहीं कई हैं जो दिलो दिमाग में घुमड़ रही हैं।  क्योंकि बात सिर्फ एक दामिनी की या एक शहर और उसके प्रशासन व समाज व्यवस्था की नहीं है। रोज़ देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग अख़बारों में न जाने कितनी ही दामिनियों का ज़िक्र होता रहा है और अब भी जारी है, जो इस इंतजार में हैं कि उन्हें वह मिले जिसे देने की ज़िम्मेदारी समाज और सरकार दोनों पर है, नैतिक भी और संवैधानिक भी। यानी बराबरी का अधिकार, स्वतंत्रता और शोषण मुक्त समाज।....
      समाज, जो अब तक पितृ सत्तात्मक सोच से मुक्त नहीं हो पाया।... सरकार, प्रशासन और तथाकथित राजनीति, जिसकी मंशा पर एक प्रश्न खड़ा करते ही पचास प्रश्न अपने-आप खड़े हो जाते हैं।... और फिर हम खुद, जो अच्छी-अच्छी बातों को बस नारा बनाकर दोहराने के आदी हो गए हैं। मणिपुर, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, असम, देश के किस हिस्से से यह दामिनी सामने आकर खड़ी नहीं हुई?
     बार-बार लिखता हूँ और डिलीट कर देता हूँ। क्योंकि बहुत कुछ एक साथ और तरतीब से लिखने लायक शांत दिमाग फ़िलहाल मुझमे नहीं है। बस बहुत साल पहले लिखी एक कविता और कुछ अरसा पहले ही बनाया गया एक अधूरा चित्र बार-बार याद आ रहा है-


मैंने कहा
बहार आई है
उन्होंने कहा
ख़ुशगवार है

मैंने कहा
नयी कोपलें फूटी हैं
उन्होंने कहा
कितनी कोमल हैं

मैंने कहा
पौधों पर
हरियाली छा रही है
उन्होंने कहा
कितनी मनमोहक है

मैंने कहा
फूल खिल रहे हैं
उन्होंने कहा
कितनी सुंदर पंखुड़ियाँ हैं

मैंने कहा
फूलों की सुरक्षा के लिए
उग आए हैं काँटे भी
उन्होंने कहा
काँटे नष्ट कर दो

फिर उन्होंने तान दिये
फूलों के चारों ओर
कंटीले तार
ताकि जब चाहें
वे चुन सकें फूल।

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

इन तीस सालों में

मेरी जिंदगी के तीस सालों में
अट्ठाइस और बीस साल इंतजार के हैं
इंतजार कई लोगों का सामूहिक

मेरे जन्मदिन के दो दिन पहले
और एक दिन बाद का इंतजार
न्याय प्रक्रिया की बेहतरी का इंतजार
इस्तेमाल से अलग
इंसान समझे जाने का इंतजार
समझ आने का इंतजार

मैं पैदा हुआ 5 दिसंबर 1982 को
3 दिसंबर 1984 का भोपाल
6 दिसंबर 1992 की अयोध्या
बहुत बदल गई है अब तक
गवाह-मुलजिम कई
विदा ले चुके हैं दुनिया से

मेरी जिंदगी के तीस सालों में
अट्ठाइस और बीस साल इंतजार के हैं।






सोमवार, 12 नवंबर 2012

बीमार मानसिकता और शब्दों से बलात्कार


मुझे नहीं पता कि क्या लिखूँगा? कुछ लिख भी पाऊँगा या नहीं? पर आज बहुत बेचैनी और गुस्सा है। किसके ख़िलाफ़? मुझे नहीं पता। आख़िर पता हो भी कैसे सकता है? कोई एक नाम या शक्ल सामने नहीं है। है तो बस एक विशेष पहचान, एक विशेष भाव, एक बीमार मानसिकता, जिससे ग्रस्त हजारों लोग हमारे बीच हैं। चाहे अपनों की बात हो, चाहे गली-मोहल्ले की या फिर शहर, देश, दुनिया की, एक स्त्री की ‘औकात’ क्या है? क्या सिर्फ यही उसका अंतिम अस्तित्व है कि पुरुष किसी भी बहाने से उसकी देह को भोगे, वास्तविकता में नहीं तो कल्पनालोक में ही सही! 
     छेड़छाड़ और बलात्कार की घटनाएं जिस गति से बढ़ रही हैं और जितना उनके बारे में लिखा, कहा जा रहा है वह तो सबके सामने है, पर एक स्त्री के लिए संकट सिर्फ तब ही नहीं है, जब वह पुरुष की पहुँच में है। बहुत सारे लोगों ने किसी लड़के को किसी लड़की के बारे में अनाप-शनाप बकते सुना होगा, आपने भी। यहां तक कि अगर उनके बीच रहे निःतांत निजी अंतरंग संबंधों के बारे में भी सुना हो तो कोई बड़ी बात नहीं। 
पर क्या जो कुछ आपने सुना वह सच ही होता है? जी नहीं, ऐसा कतई जरूरी नहीं है। एक स्त्री का पुरुष की पहुँच में न होना भी इन बातों को जन्म देता है। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसी घटनाओं का खुली तरह से उल्लेख करना भी परेशानी का सबब बन सकता है, इसलिए इससे परहेज ही रखूँगा, लेकिन ऐसी कई घटनाओं की तह में जाने का जो नतीजा हासिल हुआ वह यह है कि किसी लड़की के साथ अपने या किसी और के अंतरंग संबंधों के अधिकांश किस्से एक बीमार मानसिकता, यौनिक कुंठा, उस लड़की को हासिल करने की दबी हुई इच्छा और उसके पूरा न होने के कारण उपजे हैं। उदाहरण के लिए बिना व्यक्ति और शहर का नाम लिए एक किस्सा कुछ यूं है- 
     एक लड़की पढ़ाई के लिए किसी दूसरे शहर में थी। वह बीमार हुई तो उसी शहर में मौजूद अपने रिश्तेदार के घर चली गई और तकरीबन 15-20 दिन वहीं रही। जब तबियत ने सुधरने का नाम नहीं लिया तो उसके रिश्तेदार का बेटा, जो कि रिश्ते में उसका भाई था, उसे उसके घर छोड़ आया। लड़की बड़ी ही कमजोर हालत में अपने घर पहुंची और एक महीना वहीं रही। इस दौरान वह घर से बाहर भी बहुत कम निकली। जब वह वापस अपनी पढ़ाई के लिए पहुंची तो सारा माहौल बदला हुआ था। सहपाठी लड़के और लड़कियां उसे अजीब से नज़रों से देखते, शोहदे चुटकियां लेते हुए अभद्र इशारे करते। आखिर ऐसा क्यों हुआ? इसकी वजह तब सामने आई जब उस लड़की का वह भाई, जो मेरा करीबी था, एक दिन बेहद गुस्से में भरा मेरे साथ था। गुस्सा इतना था कि उसकी आवाज़ कांप रही थी, हालात को सही न कर पाने की बेबसी इतनी थी कि गला भर-भर आता था। हुआ यह था कि उस लड़की के साथ ‘संपर्क’ बढ़ाने के ख़्वाहिशमंद एक लड़के ने शराब के नशे में उस लड़की को लेकर अपने कुंठित सपने कुछ दोस्तों को कह सुनाए, कुछ इस ढंग से कि ‘मेरा उसके साथ पुराना संबंध है..., वह बहुत .... है, दोनों कई रातें साथ गुजार चुके हैं आदि-आदि’ और फिर अंतरंग संबंधों का वर्णन। 
     ...अब बात तो बात होती है, एक मुंह से निकली तो सार्वजनिक संपत्ति हो जाती है। कुछ उस लड़के की कल्पना और कुछ जिस-जिस तक बात पहुँची उसकी कल्पना, लब्बोलुआब यह कि लड़की प्रेगनेंट हो गई थी, गर्भपात कराना पड़ा जिसकी वजह से उसकी हालत गिर गई थी। बात यहाँ-वहाँ फैली और लड़की के दामन पर एक ऐसा दाग लगा गई कि वह न जाने कितनी नज़रों के लिए बस एक ‘भोग्या’ भर बन कर रह गई। एक लड़के की कुंठित मानसिकता के अपराध की सजा यह कि वह लड़की कहीं निकलती तो अपनी नज़रें नीची करके, ताकि वह किसी की नजरों का सामना न करे जिनमें तमाम तरह के सवाल और कीड़े बिलबिलाते दिखाई देते थे। 
     ऐसे कई मामलों की कभी भनक पड़ी, तो कई के बारे में बहुत करीब से जाना। आज जब फिर से किसी के दामन पर ऐसी ही कीचड़ उछलते देखी (जिसके निर्दोष होने का इत्तफ़ाकन मैं खुद गवाह हूँ) तो उस लड़की के भाई के रुंधे गले से निकली वह बात किसी खंजर की तरह फिर दिल में उतर गई कि ‘भैया, मुझे पता है कि मेरी बहिन निर्दोष है। अगर यह बात सच होती तो क्या हमें पता न चलता? वह जिस दिन बीमार हुई थी उसी दिन हमारे घर आ गई थी। मैं खुद उसे डॉक्टर के पास लेकर गया था, उसे तो बस टाइफाइड हुआ था। लेकिन यह बात मैं किस-किस को समझाऊँ? किस-किस का मुँह पकड़ूँ? उस ..... लड़के को मैं खुद मार डालूं या पुलिस कार्यवाही करूँ, तो भी यह बदनामी पीछा नहीं छोड़ेगी। बेचारी को घर से निकलते डर लगता है। आखिर मैं करूँ तो क्या करूँ?’ 
     उसके इस ‘क्या करूँ?’ का जवाब न तब मेरे पास था, न आज है। किसी एक को समझाया भी जा सकता है, पर..... बात तो बात होती है, एक बार मुँह से निकली तो सार्वजनिक संपत्ति हो जाती है। 
     बलात्कार को एक गंभीर अपराध माना जाता है। क्या यह भी बलात्कार नहीं, जिसे एक कुंठित बीमार मानसिकता महज शब्दों से ही अंजाम देती है। क्या इन घटनाओं की शिकार लड़कियाँ भी उसी मानसिक वेदना और परिस्थिति से नहीं गुजरतीं, जिनसे एक बलात्कार पीड़िता गुजरती है। वह भाई ‘क्या करूँ?’ का गंभीर प्रश्न करने के बाद रोने लगा था। ऐसे में इन परिस्थितियों की शिकार हुई लड़की पर क्या गुजरती होगी, इसका शायद अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। 
     छोटे-बड़े कस्बों-शहरों में न जाने कितनी लड़कियाँ रोज ही इस कुंठाग्रस्त मानसिकता द्वारा शब्दों से किए गए बलात्कार की शिकार होती हैं। शायद उससे कहीं ज्यादा जितनी कि शारीरिक बलात्कार की शिकार होती हैं। और जब शारीरिक अपराध की शिकायत दर्ज कराने में आज भी बदनामी बढ़ने के ख़तरे के बारे में पहले सोचा जाता हो, वहाँ  इस शाब्दिक अपराध की शिकायत भला कितनी होती होगी? और शिकायत भी क्या कि ‘यह कल्पनाओ में मेरे साथ.....’ या ‘इसने लोगों से कहा कि इसने मुझे इस-इस तरह से....।’ 
     यहाँ यह बात भी गौरतलब है कि कस्बों में पुलिस को रिपोर्ट लिखाते वक्त यह लिखाने से काम नहीं चलता कि ‘अश्लील बातें कहीं’ या ‘अश्लील हरकतें कीं’, वह सब हू-ब-हू वैसा ही लिखाना होता है, जैसा कि कहा गया या किया गया। माँ-बहन की गालियों से लेकर अंगों के नाम और उनसे की गई हरकतों तक। और फिर इस तरह के मामलों को सुलझने में लगने वाले वक्त के दौरान न जाने कितनी ही बार लजा देने वाली परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं। पुरुष इस बेशर्मी का सार्वजनिक रूप से जितना आदी और अभ्यस्त है, महिलाएँ अब तक नहीं हैं। शायद यही वजह है कि इस अपराध की शिकायत अमूमन नहीं ही होती और एक व्यक्ति की कुंठा और सड़ी-गली कल्पनाओं की बदबू का बादल एक निर्दोष के जीवन में कई बार इस तरह छा जाता है कि उसके कॅरियर और भविष्य के उजालों को ग्रहण लग जाता है। 
     वर्तमान स्थितियों में यह मानसिकता सिर्फ शब्दों को मुँह से निकालने तक ही सीमित नहीं है। इंटरनेट पर न जाने कितनी लड़कियों की पहचान का इस्तेमाल करके फेक अकाउंट हैं, पोर्न साइट्स बॉलीवुड, हॉलीवुड से लेकर आपके-हमारे बीच की स्कूल-कॉलेज की छात्राओं, घरेलू और कामकाजी महिलाओं की मॉर्फ़ और फेक तस्वीरों से भरी पड़ी हैं। तकनीक का इस तरह दुरुपयोग करने में भारत सबसे अव्वल है। बावजूद इसके आलम यह है कि इन फेक अकाउंट्स की शिकायत करने के बाद भी उनमें से कई बंद नहीं होते, चलते रहते हैं।
     यह सच है कि किसी के दिमाग पर काबू नहीं पाया जा सकता है, उसे सोचने से रोका नहीं जा सकता लेकिन गुस्सा इस बात का है कि इस तरह की सोच को व्यक्त करने पर भी जो दोषी है उसके बजाय निर्दोष ही क्यों दण्डित और परेशान होता है? क्या कभी सुना है कि किसी लड़की ने एक लड़के के बारे में ऐसा-वैसा कुछ कहा हो और उस लड़के का किसी से नजरें मिलाना मुश्किल हो गया हो? नहीं न! और अगर लड़के के बारे में ऐसा कह भी दिया जाए, तो भी लड़का ‘मर्द का बच्चा’ कहलाएगा, मगर लड़की, एक स्त्री..... क्या है वह? वह तो इन बीमारों के लिए बस एक मांस का लोथड़ा भर है और बाकी समाज के लिए ‘इज्जत’ की टोकरी सिर पर उठाने वाली सबसे कमजोर कड़ी। किसी ने कुछ कहा नहीं कि ‘इज्जत’ गई नहीं। 
     कितनी हैरत की बात है कि बीमार पुरुष है और तकलीफ स्त्री सहन करती है, बेइज्जत महिलाओं को किया जाता है और इज्जत की टोकरी भी उन्हीं के सिर पर लाद दी जाती है। इलाज भी महिलाओं के लिए नियम बनाकर खोजे जाते हैं। सभ्यता, संस्कृति और स्त्री के पूजनीय होने की झंडाबरदारी करने वाले बताएँ कि उनके पास इस बीमारी का क्या इलाज है? यह सवाल इसलिए नहीं है कि कोई संस्कृति रक्षा आंदोलन चलाना है, न ही कोई नैतिकता का पाठ पढ़ाना है, बल्कि इसलिए है कि महिलाओं के सिर पर इज्जत का ठीकरा फोड़ने वाली, बात-बात पर संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देने वाली, नैतिकता का झंडा उठाए फिरने वाली और आज भी भीतर से पुरुषवादी यह समाज व्यवस्था पुरुषों की ‘बदतमीजी’ और महिलाओं के ‘सब्र’ के फर्क को समझे, कुंठित और बीमार मानसिकता के इस शाब्दिक अपराध के दूरगामी प्रभावों-परिणामों के बारे में सोचे, अपने गिरेबां में झांके और इस सवाल का जबाब दे, जो ऐसी परिस्थितियों में किसी भी महिला और उसके हितचिंतकों के सामने खड़ा होता है कि - ‘क्या करूँ?’

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

मंटो: थप्पड़ मारने वाला कहानीकार

 -रजनीश ‘साहिल’
‘सब कुछ अच्छा भला चल रहा था। दिन-रात, चौबीस घंटे कभी विज्ञापन में, तो कभी धारावाहिकों-फ़िल्मों में दिखती साड़ी से लेकर बिकनी तक में मौजूद देहयष्टि की कल्पना करते दिमाग को जो कुछ पढ़ने में मज़ा आ सकता था, उसके लिहाज से सब अच्छा भला ही चल रहा था। फिर अचानक लगा कि किसी ने अपनी पूरी ताकत से एक झन्नाटेदार थप्पड़ मार दिया हो। एक ऐसा थप्पड़, जो रंगीन कल्पनाओं की दुनिया से खींचकर सीधे उस हकीकत से रू-ब-रू कराता है, जो तकलीफ़देह है, घिनौनी है, इंसान के जानवर होने की तसदीक़ करती है और जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। और भी कुछ ऐसा महसूस होता है यार, जिसे मैं कह नहीं पा रहा हूं।’
     जब मेरे मित्र ने मुझसे यह कहा था, तब मैं बखूबी समझ रहा था कि वह क्या महसूस कर रहा है, क्या कहना चाहता है, जिसके लिए सही शब्द नहीं ढूंढ पा रहा है। वह जो कुछ महसूस कर रहा था, तकरीबन वैसा ही कुछ मैंने भी महसूस किया था, जब उस बदनाम कहानीकार की कहानी सही मायनों में पहली बार पढ़ी थी। फिर जितनी कहानियां पढ़ता गया, हर बार एक थप्पड़ का इजाफ़ा होता गया। मुझे यकीन है कि यह हर उस शख्स के साथ हुआ होगा, जिसने सआदत हसन मंटो की कहानियां पढ़ी हैं, ढंग से पढ़ी हैं।
     एक नजर में मंटो को थप्पड़ मारने वाला कहानीकार कहा जा सकता है, मगर हर कहानी में इस थप्पड़ की किस्म जुदा है। कभी वह झन्नाटेदार थप्पड़ मारते हैं, तो कभी हल्की सी चपत लगाते हैं। उनकी तकरीबन कहानियों में यह भाव है। बावजूद इसके उनकी बहुतेरी कहानियां हैं, जहां इंसान के दुर्भावनापूर्ण चेहरे के अलावा संवेदनाओं से लबरेज़ चेहरे भी दिखाई देते हैं। ‘काली सलवार’ जैसी कहानियां इसका उदाहरण हैं, जहां एक-दूसरे से नितांत दो अजनबी एक-दूसरे की अभिलाषाओं के बारे में सोचते हैं। 
     बहरहाल, मंटो की कहानियों के पात्रों के बारे में अगर बात करें, तो वे आज भी वैसे ही हैं, जैसे मंटो के समय में थे। यानी मंटो की कहानियों के पात्र सर्वकालिक हैं। कल भी वैसे ही थे, आज भी वैसे ही हैं। अपनी एक कहानी ‘सरकंडों के पीछे’ में मंटो खुद शुरुआत में ही लिखते हैं, ‘देखिए मैं उस स्त्री का नाम बताना भूल गया। बात असल में यह है कि उसका नाम कोई मायने नहीं रखता। उसका नाम आप कुछ भी समझ जाइए। सकीना, महताब, गुलशन या कोई और। आख़िर नाम में क्या रखा है।’ सच है, नाम में कुछ नहीं रखा। मंटो की कहानियों के पात्र हमारे चारों ओर हैं। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि मंटो ने उनके बारे में लिखा और हम उनके बारे में सोचने से भी क़तराने लगे हैं। ठीक ऐसे ही जब मंटो लिखते हैं, ‘कौन-सा शहर था, जहां तक मैं जानता हूं आपको मालूम करने और मुझे बताने की कोई जरूरत नहीं।’ तो यकीन जानिए कि जिस जगह का जिक्र मंटो कर रहे हैं, वह पेशावर भी हो सकती है, कोलकाता भी, मुंबई भी और उजाड़ में बसा कोई गांव भी। वह आज की पूरी दुनिया का कोई भी हिस्सा हो सकता है, जहां हर हाल में रोटी का जुगाड़ आज भी सबसे अहम सवाल है।
      मंटो के बारे में अमूमन यही कहा जाता है कि विभाजन, उसके दौरान और उसके बाद की विभीषिका पर उनसे ज्यादा दहलाने वाली कहानियां शायद किसी ने नहीं लिखीं। यह सच भी है, फिर भी मुझे लगता है कि यह मंटो जिस वक्त में कहानियां लिख रहे थे, उस वक्त के हालात से जोड़कर उन्हें देखने का नतीजा है। वरना उन्होंने ऐसी कहानियां भी लिखी हैं जो किसी खास वक्त की हो ही नहीं सकतीं। ठीक है कि आज हालात में काफ़ी तब्दीली आ चुकी है लेकिन ‘हीरामंडी’ के सलाहू और दूदा पहलवान हों, चाहे ‘लायसेंस’ की इनायत उर्फ नीति का अंजाम, आज भी चीजें वैसी ही हैं। आज जिस ढंग से तमाम तरीकों की आड़ में हिंदुस्तान, पाकिस्तान, ब्रिटेन, अमेरिका, अफगानिस्तान और अरब देशों में ऑनर किलिंग के मामले सामने आ रहे हैं, ऐसे में मंटो की कहानी ‘इश्क पर ज़ोर नहीं’ कुछ अलग ढंग की कहानी लगती है। शरुआत में ही मंटो लिखते हैं, ‘लोगों को यह शिकायत है कि मैं रोमांटिक कहानियां नहीं लिखता। मैं अब इश्क़िया कहानी लिख रहा हूं, ताकि लोगों की यह शिकायत भी किसी हद तक दूर हो जाए।’ इसके बाद मंटो बाकायदा एक इश्क़िया कहानी लिखते हैं, जहां नायक जमील पूरी तरह इश्क़ियाया हुआ दिखाई देता है। मगर यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है, जिसका अंत सुखद हो। जमील पूरी कहानी के दौरान इश्क़ तलाशता रह जाता है और अंत में पता चलता है कि मूर्खता की हद तक सादा और सीधी अजरा ने सिर्फ इसलिए ख़ुदकुशी कर ली कि उसे जमील से बेइंतहा मोहब्बत थी और जमील की शादी कहीं और तय हो चुकी थी, जिसे वह बर्दाश्त नहीं कर सकी। जहां तक समझ आता है मंटो ने अजरा की ख़ुदकुशी का ताना सिर्फ इसलिए नहीं बुना कि वह इश्क़ में हार जाने से टूट गई थी। हारना कैसा, जबकि उसने इज़हार-ए-मोहब्बत कभी किया ही नहीं। असल में यह ख़ुदकुशी उन ख़्वाबों की है, जो एक नौजवान स्त्री देखती है, जिनका इज़हार करने तक की उसे इजाज़त नहीं है। आज भी ऑनर किलिंग के नाम पर दुनियाभर के देशों में जो सबसे ज़्यादा आसान शिकार है, वह महिलाएं ही हैं। वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के कारण मारी जा रही हैं, और अजरा बिना व्यक्त किए मर गई। फ़र्क क्या है? 
     देखा जाए तो मंटो उर्दू के वैसे ही कहानीकार हैं, जैसे हिंदी के प्रेमचंद या बांग्ला के शरतचंद्र। या शायद उससे भी कहीं ज़्यादा, क्योंकि इंसानियत को जिस बुरी तरह से झिंझोड़ा जा सकता है, उसकी पराकाष्ठा सिर्फ मंटो के यहां मिलती है। मंटो की कहानियां किसी भी दौर में क़ैद नहीं की जा सकतीं। वह हर दौर में उसी के मुताबिक झंझोड़ती हैं, दिमाग की चूलें हिलाती हैं और सवाल खड़े करती हैं। ‘नंगी आवाज़े’, ‘तमाशा’, ‘दो क़ौमें’, ‘सड़क के किनारे’, ‘नारा’, ‘डरपोक’, ‘नया कानून’ जैसी उनकी तमाम कहानियों का ज़िक्र इस सिलसिले में किया जा सकता है। भले ही यह कहानियां बहुत अलग-अलग तरीके से अलग-अलग चीजों को बयां करती हैं, लेकिन अंतत: हमारे आसपास और बीच की स्थितियों को लेकर सवाल खड़े करती हैं। इसके बरअक्स ‘टोबा टेकसिंह’, ‘काली सलवार’, ‘मंजूर’, ‘हीरामंडी’ जैसी कहानियां इंसान की अतिशय संवेदनशीलता को भी नुमायां करती हैं, जहां कहानी के दो पात्र एक-दूसरे से किसी मुलाहजे में नहीं बंधे हैं, लेकिन एक की तक़लीफ से दूसरा द्रवित होता है। 
     कहानी कहने की विधाओं के बारे में अगर बात की जाए तो मुख्यत: दो किस्म की कहानियां सामने आती हैं। एक वह जो दृश्य वर्णन के साथ-साथ उसके मायने भी साथ ही व्यक्त करती जाती हैं, दूसरी वह जो महज़ एक कथ्य के माध्यम से पूरा दृश्य और उसका विस्तृत आख्यान वर्णित करती हैं। मंटो की कहानियां दूसरी किस्म की हैं, लेकिन फिर भी अलग हैं। वह कहानी लिखते नहीं, सुनाते हैं। अक्सर कहानियों में वह किस्सागो नज़र आते हैं। चाहे वह स्त्री देह का वर्णन हो या अस्पताल में पड़े मरीज़ों के बीच की बातचीत, वह अपनी हर पंक्ति के साथ एक दृश्य दिखाते हैं। दृश्य-दर-दृश्य चलती एक जीवंत कथा कहते हैं और अंत की तीन या चार पंक्तियों में पूरी कहानी की असलियत बयां करते हैं। कुछ इस तरह कि वह आखिरी पंक्तियां ही असली कहानी हो जाती हैं, बाकी पूरा वृत्तांत तो महज़ भूमिका भर लगता है। बकौल वाल्टर बेंजामिन कहानी कहने की आधी कला इसी में है कि सुनाते समय उसे तमाम स्पष्टीकरणों से मुक्त रखा जाए। इस नज़रिए से दुनियाभर के किस्सागो कहानी कहने की जिस शैली को सबसे बेहतर मानते रहे हैं, वही शैली मंटो की कहानियों में मौजूद है, यानी जहां अंत ही सबकुछ है। मंटो ऐसा ही करते हैं, वह कहानी के क्लाइमैक्स के साथ ऐसा कुछ छोड़ जाते हैं, जिस पर बात करनी अभी बाकी है। जिस पर सामाजिक नज़रिये से कदम उठाऐ जाने की अभी भी ज़रूरत बाकी है। अपने शब्दों में कहूं तो यह कि वह हर कहानी के अंत के साथ हमारे मुंह पर एक ऐसा तमाचा जड़ते हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वाकई हम इसी लायक हैं।
(जनपथ के जुलाई 2012 अंक में प्रकाशित)

रविवार, 16 सितंबर 2012

बिखरे रंग

(16 सितम्बर को जनवाणी में प्रकाशित )
रोजाना एक न एक एक्सीडेंट की खबर सामने आती ही है। कभी अखबार के जरिए, कभी चर्चाओं में। यूं तो एक्सीडेंट की घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी भी रहा हूं और कई बार चोटिलों को अस्पताल तक भी पहुंचाया है, पर जब भी तेज रफ्तार दौड़ते वाहनों को टकराते देखा है, यही सवाल दिमाग में आया है कि आखिर सबको इतनी जल्दी क्यों है? ओवरटेक करने की इतनी आपाधापी क्यों है? क्या यह हमारी आदत बन चुका है या हमेशा पहले नंबर पर रहने की लालसा भर है? या कि यह भी उसी तरह है कि ‘आखिर किसी और की कमीज हमारी कमीज से ज्यादा सफेद क्यों हो!’
बहरहाल, अभी तीन दिन पहले ही मेरठ से दिल्ली जा रहा था, तब भी एक एक्सीडेंट का दृश्य देखा। जो देखा वह घटना घट चुकने के बाद का दृश्य था। एक आदमी बीच सड़क पर लहूलुहान पड़ा था। सड़क पर बिखरे दिमाग और बगल से झांकती पसलियों को देखकर मेरे बस के कुछ सहयात्री उबकाइयां लेने लगे थे, महिलाओं ने मुंह-नाक पर रूमाल रखते हुए नजरें फेर ली थीं। कुछ पुरुषों का भी यही हाल था। कोई बड़ी बात नहीं थी, जब एक्सीडेंट में चोटिल हुए व्यक्ति की तरफ से लोग नजरें फेर लेते हैं ताकि ‘व्यर्थ के झंझट’ में पड़ने से बचा जा सके, तो फिर यह आदमी तो मर चुका था। लेकिन मरकर भी यह आदमी लोगों के लिए ‘मुसीबत’ था, क्योंकि बीच रोड पर पड़ी उसकी मृत देह के पास भीड़ जमा थी, ट्रैफिक जाम था और लोगों को अपने-अपने गंतव्य तक पहुंचने की ‘जल्दी’ में बाधा बन रहा था। मेरे सहयात्री एक सज्जन का कहना था, ‘पता नहीं लोगों को इतनी जल्दी क्यों रहती है! देखो, जल्दबाजी में सड़क पार कर रहा था और ट्रक ने ठोक दिया। अब इसकी वजह से ट्रैफिक जाम हुआ पड़ा है। मुझे आठ बजे घर पहुंचना था, बच्चों के साथ फिल्म देखने का प्रोग्राम था। ...अरे ड्राइवर साहब, धीरे-धीरे गाड़ी बढ़ाओ यार, जल्दी पहुंचना है।’
उस आदमी की मृत देह से थोड़ी दूरी पर कुछ सामान बिखरा पड़ा था। एक पॉलीथिन से बाहर छिटक कर गिरीं वाटर कलर की कुछ शीशियों का सड़क पर बिखरा हुआ रंग, कुछ पेंसिलें और बच्चों के इस्तेमाल में आने वाली ड्राइंग बुक। उसके बच्चे के हाथों से बनने वाले न जाने कितने ही चित्र दिमाग में कौंध गए, जिन्हें देखने की शायद उसे भी जल्दी थी। मगर रंग तो बिखर चुके। सहयात्री के शब्द दिमाग में गूंज रहे थे- ‘बच्चे... फिल्म का प्रोग्राम... जल्दी...।’

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

कुछ कदम...


कुछ साथ चले तुम कदम काफ़ी है
कोई साथ मिला ये भरम काफ़ी है

मंज़िल-ए-दिल का पता यूं भी सही
हासिल-ए-सब्र-ओ-सदा यूं भी सही
कितना है ज़ब्त कितने उथले हैं
अपनी सीरत का पता यूं भी सही
जो तुमने याद दिलाया वो दम काफ़ी है

चुपचाप रहे लब कोई बात नहीं
सुबह के नाम रही शब कोई बात नहीं
मुश्क़िलें आती रहीं शिकवे भी होते रहे
लाख पहरों में रहा हक़ कोई बात नहीं
न हुई आंख तुम्हारी जो नम काफी है

आएगा वक़्त भी जब न इम्तिहां होगा
ख़िज्र न होगा कोई अपना ही इम्कां होगा
ज़र्द पत्तों का भी तो रंग होता है कोई
जो जल उठेंगे रोशन तो कुछ समां होगा
जो हसरतों में ढला है वो ख़म काफी है।