सोमवार, 26 जुलाई 2010

टाट में मखमल का पैबंद

शीर्षक कुछ अजीब सा लगता है। लगता है कि शायद उल्टा लिख दिया गया है, कहावत तो कुछ और है। दरअसल ऐसा है नहीं। बदली परिस्थितियों और ख़ासकर वर्तमान में विकास की जिस परिभाषा के अंतर्गत भारत एक नई शक्ति और तेजी से आगे बढ़ते विकासशील देश के रूप में उभर कर सामने आ रहा है, उसके संदर्भ में कहावत का यह संस्करण ही ज्यादा सटीक है।

किसी भी देश के नागरिकों की प्राथमिक ज़रूरतें क्या हैं- भोजन, आवास, स्वास्थ्य, रोज़गार। खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए हमारे देश में भी बड़े-बड़े और अनूठे प्रयास किये गए हैं और अब भी किये ही जा रहे हैं। विश्व की सबसे बड़ी जन-वितरण व्यवस्था कायम करने का गौरव हमारे देश के पास है और आने वाले खाद्य सुरक्षा कानून व बीज कानून पर जो हो-हल्ला मचा हुआ है वह ऐसे ही तो नहीं है! और एक यह बुद्धिजीवी वर्ग है जो सरकार के इस नेक काम में नाहक ही बहसें कर-करके अड़ंगा डाल रहा है। इसे समझना चाहिए कि अभी-अभी राजस्थान, हरियाणा, बिहार के गोदामों में लाखों क्विंटल अनाज सड़-गलकर ख़राब हुआ है, ऐसी स्थिति में पूरे देश में सबको 35 किलो अनाज सस्ते दाम में मुहैया कराना कितना मुश्किल काम है। फिर भी सरकार 25 किलो अनाज देने का वादा कर रही है यह क्या कम बात है!

कुछ लोग इस पर भी सरकार का ही गला पकड़ते हैं। कहते हैं कि "गोदामों में अनाज सड़ना भी तो सरकार की ही लापरवाही है। अनाज रखने के लिए अगर पर्याप्त जगह नहीं है तो और गोदाम क्यों नहीं बनवाती सरकार?" हद्द है भई ये तो! अरे! हमारे देश की परंपरा है - "अतिथि देवो भव:।" हमारे देश में कामनवेल्थ गेम होने जा रहे हैं। तमाम देशों के खिलाड़ियों, राजनैतिक हस्तियों और न जाने किस-किस रूप में अतिथि पधारेंगे। सरकार उनके स्वागत की तैयारी करे या तुम्हारी सुने! सरकार उनके बिना अवरोध आवागमन और सुविधा से ठहरने के लिए फ्लाईओवर और खेल-गांव का निर्माण कराए या अनाज रखने के लिए कोठरियों का! हमारी परंपरा रही है कि स्वयं भूखे रहकर भी अतिथि का स्वागत धूम-धाम से किया जाता है। अब जब हमारी सरकार देश की इस गौरवशाली परंपरा का निर्वाह कर रही है तो क्या देश की जनता साल-दो साल भूखी नहीं रह सकती! और फिर सरकार पूरी तरह भूखा रहने को तो कह नहीं रही है, बस 10 किलो अनाज की कमी करने को ही तो कह रही है।

अनाज के सड़ने में भी तो जनता का ही फायदा है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र सरकार के निर्णय को ही देख लीजिए कितना दया भरा कदम उठाया है। महाराष्ट्र के किसानों की सारी चिंता ही हर ली, और जो चिंता बर्दाश्त न कर पाने की कमज़ोरी के कारण आत्महत्या कर चुके उनकी आत्माओं को भी निश्चित रूप से शांति मिल जाएगी। पिछले साल महाराष्ट्र में ज्वार, बाजरा की फसल ख़राब होने से किसानों को जो नुक़सान हुआ उससे महाराष्ट्र सरकार इतनी आहत हुई कि इस सोच में डूब गई कि अगर आगे फिर से किसानों की फ़सल ख़राब हुई तो क्या किया जाएगा। अंतत: एक बेजोड़ उपाय ढूंढ ही लिया। अब अगर किसानों की फसल ख़राब हो जाए तो उन्हें चिंता करने की ज़रूरत नहीं है, वे अपनी फसल शराब बनाने वाली कंपनियों/उद्यमों को बेच सकते हैं क्योंकि महाराष्ट्र सरकार ने अनाज से शराब बनाने वाले 32 उद्यमों को अनुमति प्रदान कर दी है। कहीं ये उद्यम किसी प्रकार के अभाव के चलते बंद न हो जाएं इसके लिए सरकार इन्हें भारी सब्सिडी भी देगी। हालांकि इनके बंद होने की संभावना कम ही है क्योंकि ये उद्यम (अधिकांश) या तो जनता के चुने गए प्रतिनिधियों के हैं या फिर उनके भाई-भतीजों के। शराब की एक बोतल बनाने के लिए लगभग 2.5 किलोग्राम अनाज की ज़रूरत होती है यानि कि किसानों को अनाज की अच्छी कीमत मिलेगी, और फिर जब बढ़िया कीमत मिलेगी तो गेहूं-चावल-दाल उगाने की ज़रूरत ही क्या है? ज्वार, बाजरा उगाओ - पैसा कमाओ, भूख मिटाने के लिए मैक्डोनाल्ड का हैप्पी प्राइस मैन्यू तो है ही! चाहें तो इस सब्सिडाइज्ड शराब का भी मज़ा ले सकते हैं क्योंकि यह महाराष्ट्र के बाहर नहीं बिकेगी।

अब जबकि सरकार इतने अचूक नुस्खे निकाल रही है तब भी देखिए लोगों को चैन नहीं है। लोग  कहते हैं कि  "वैसे ही देश में कई लोगों  के  पास रहने को  घर  नहीं  है और सरकार तमाम विकास  कार्यों  के नाम पर लोगों को  विस्थापित कर रही  है।  सेज, बड़े बांधों,  विद्युत परियोजनाओं  के  नाम पर लोगों को उनके गांवों से उजाड़ रही है, किसानों को उनकी ज़मीन से बेदख़ल कर रही है।" तो भई इसका तो एक ही जवाब है - कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। विद्वतजनों ने कहा भी है कि बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता।  जब तक कुछ लोग डूबेंगे नहीं बाकी लोगों को बिजली कैसे मिलेगी? खेतों की सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी कैसे मिलेगा। जिन जगहों पर खेती के लिए किसानों को पानी नहीं मिलता उन तक पानी पहुंचाने के लिए अगर सरकार बांध बनाती है और इस सब में कुछ लोगों की ज़मीन डूब जाती है तो कौन सा बड़ा नुक़सान हो गया! और फिर जनता ही तो है जो बेरोज़गारी का हल्ला मचाए रहती है। जब सरकार रोज़गार के लिए उद्योगों को बढ़ावा देती है और विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना करती है तो यही लोग हाय-तौबा मचाने लगते हैं। अरे भई! ज़मीन नहीं दोगे तो उद्योग कहां स्थापित होंगे? और जब उद्योग स्थापित नहीं होंगे तो मल्टीनेशनल कंपनियां देश में क्यों आएँगी? जब ये कंपनियां नहीं आएँगी तो देश में विदेशी निवेश कैसे होगा, जब विदेशी निवेश नहीं होगा तो देश का व्यापार कैसे बढ़ेगा और जब यह नहीं होगा तो सरकार (?) को लाभ कैसे होगा, देश का विकास कैसे होगा? भूल गए  हरित क्रांति को जिसने देश में कृषि का स्वरुप ही बदल दिया था, कितनी उन्नत हो गई थी देश की कृषि व्यवस्था। क्या वर्ल्ड बैंक की सहायता के बिना ये सब हो पाता! और फिर ये लोग जो ज़मीन डूबने, रोज़गार नष्ट होने की शिकायत करते हैं ये यह क्यों नहीं सोचते कि लाभ तो इन्हें ही मिलेगा। अभी कई सारे गांवों को बिजली नहीं मिलती फिर सबको बिजली मिलेगी, सबको खेती के लिए पानी मिलेगा, सबको रोज़गार मिलेगा, और फिर सुविधाओं से वंचित गांवों की संख्या में भी तो कमी होगी कि नहीं!

कब तक यही भूख और ग़रीबी का रोना रोते रहोगे, इतने साल गुज़र गए अब तक तो इसकी आदत हो जानी चाहिए थी। सारी दुनिया मानती है कि भारत भी तरक्की कर रहा है पर इसे दिखाने की भी तो ज़रूरत है। अब जब सारी दुनिया हमारे बाज़ार में आना चाहती है तो हमें इसका लाभ उठाना चाहिए इसलिए हमें दिखाना होगा कि हम भी अमीर हो रहे हैं वरना ग़रीब के पास कौन जाता है। हमें और तरक्की करनी है इसलिए ज़रूरी है कि हम विदेशी/मल्टीनेशनल कंपनियों को अपने देश में आने दें, उन्हें यहां तरक्की करने दें और उनकी पूंछ पकड़कर हम भी तरक्की करें। अब इस सबके लिए कुछ तो ऐसा दिखाना होगा न जिससे उन कंपनियों में यहां आने का उत्साह जागे। तो भई, देश के अंदरूनी हिस्सों में भले ही हालत टाट जैसी हो पर दुनिया को लुभाने के लिए मखमल तो दिखाना पड़ेगा न, इसलिए हमारी सरकार सही रास्ते पर जा रही है जो टाट में मखमल का पैबंद लगा रही है। पर देश की जनता है कि कहावत का सही मतलब अभी तक नहीं समझी। मखमल में टाट का पैबंद होने को मतलब है कि स्थिति जो पहले बेहतर थी अब ख़राब हो रही है। पर हमारा देश तो तरक्की कर रहा है इसलिए हम टाट में मखमल का पैबंद लगा रहे हैं।

सोमवार, 21 जून 2010

तुम्हारी याद में मेरा वजूद

वक्त की शोख़ सरगर्मियों से
दूर जा गिरा हूँ छिटककर
नहीं आता कोई बरसों का साथी नज़र
चेहरा अपना भी

कुछ चेहरे टटोले हैं यादों में अक्सर
पर धुंधला इक कोलाज-सा कुछ बन रह जाता है
अपना चेहरा ढूंढा है उसमें कई बार
हर चेहरे पर अटकती आँखें
आगे बढ़ जाती हैं
क्या गुज़रे वक़्त में मेरा कोई दख्ल नहीं था ?

आईने में देखा है जिसको अभी-अभी
कल शायद इसको फिर न देख सकूं
माथे पे उग आएं शायद कुछ और लकीरें
आवाज़ हो बदली-बदली सी
आँखों में बदले सालों की बदली तारीख़ें
जब दफ्तर से लौटूं

बैठ के इक दिन खोजूंगा ख़ुद को शायद

है शुकर, बचाए रखा है
तुमने अपनी यादों में मुझे।

बुधवार, 16 जून 2010

चलेगी जून में बड़ी ही ठेठ हवा

पढ़ना छूट जाए तो लिखना भी छूट सा जाता है। अरसे से न ही कोई कविता पढ़ी है, न गज़ल सो जब लिखने बैठा तो बड़ी मुश्किल हुई। बहरहाल जो लिखा, जैसा लिखा वो यही है -

शहर से गाँव तक एक हवा
धूप से छाँव तक एक हवा

चुभ गया तीर की तरह जी में
साथ लाई जो लफ्ज़ एक हवा

चाल अपनी ही रख मगर एक पल
ज़माने की भी ज़रा देख हवा

मिरे घर आई थी नश्तर लेकर
साथ बैठी तो गई नेक हवा

लजाती सिकुड़ी सहमी हो भले ही
चलेगी जून में बड़ी ही ठेठ हवा

तुम्हारी मर्ज़ी आज जैसे चाहे जिओ
कल निकालेगी मीन-मेख हवा

जो खरीद रहा है वही बिक भी रहा
कमाल जादू दिखाती है देख हवा.

शनिवार, 5 जून 2010

इसका भी बाज़ार है

यह बस सीधे वैसा है, जैसा उपजा, बिना किसी काट-छांट के -

गज़ब की भीड़ है, शोर है, रफ़्तार है
जिसे भी देखिये वो थोडा सा बेज़ार है

जब भी बेची अपनी मेहनत बैठकर रोया
हर बार ही घाटा है क्या व्यापार है

रोज़ ही होते हैं वादे बेहतरी के बेशुमार
रोज़ लगता कल ही का तो अखबार है

जब लुट चुकीं उम्मीदें सारी उसके जीने की
फिर है चर्चा ख़ुदकुशी का गुनाहगार है

दोस्ती इतनी न जताओ कि कहना पड़े
दोस्त तो अच्छा है, थोडा सा बीमार है

मैं अपनी भूख से शर्मिंदा क्यों लगती है मुझे
क्या नहीं जानती कि इसका भी बाज़ार है

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

भूख की कीमत

(1)
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में
पाया गया अगर
अनाज का एक भी दाना पेट में
तो नहीं दिया जा सकता इसे क़रार
भूख से मौत

भले ही मौत के दिन ही
क्यों न मिला हो भोजन
एक माह बाद।

(2)
अनाज
गोदामों में पड़ा-पड़ा सड़ गया
दे दिया गया
शराब बनाने के लिए
शराब पर दी गई उतनी सब्सिडी
जितने में पहुँचाया जा सकता था
सब तक

अब
पैंतीस किलो की जगह
पच्चीस किलो अनाज से भरेगा
परिवार का पेट

शायद भूख हो गई है
कम
लोगों की
या शायद ज़्यादा
अन्नदाताओं की।

(3)
अब नहीं मिलते
आम, संतरे, चीकू
पपीते, नाशपाती
सेब, तरबूज़
किलो के हिसाब से
और केले दर्जन के
एक-एक नग पर
चिपका हुआ है प्राइज टैग
घोषणा करता हुआ
आज सुनहरा मौका है
लाभ उठाइये और ले जाइये
पंद्रह रुपये में एक आम
या पच्चीस रुपये में एक सेब

कार्बोनेटेड शीतल पेयों का सेवन करते हुए
याद करेंगे कभी आपके बच्चे
पापा लाया करते थे कभी
और स्मृतियों में बचे रह जायेंगे

आम, संतरे, सेब…..

(4)
अगर आपके पास
लाल या पीला
है कार्ड
तो नहीं मर सकते
भूख से आप
यह सुनिश्चितता नहीं
फ़रमान है सरकारी

(5)
शकर हो गई चालीस रुपये
दाल सत्तर की
और चावल
सबसे सस्ता वाला भी पच्चीस रुपये
सबको जगाने वाली
टाटा टी भी
हो गई पचास रुपये की ढाई सौ ग्राम
और गुड़ मिल रहा है थैलियों में बंद
साढ़े बारह का सौ ग्राम
आटा पच्चीस रुपये किलो

दाल-रोटी
और गुड़ की चाय
है ग़रीब का भोजन

क्या सचमुच?

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

ग्रामीण भारत में दलित - भाग तीन (राजनैतिक परिदृश्य व कानून व्यवस्था)


पिछली पोस्टों में दलितों शब्द के सन्दर्भ, उनकी सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक स्थिति पर अपनी बात रखी थी। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए इस बार दलितों की राजनैतिक स्थिति व कानून व्यवस्था के सन्दर्भ में ...

राजनैतिक परिदृश्य

लोकतांत्रिक व्यवस्था में दलितों की राजनैतिक सहभागिता को सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण व्यवस्था का उपयोग किया जा रहा है। शिक्षा, शासकीय नौकरियों के अलावा पंचायत से लेकर विधानसभा तक के चुनावों में दलित सीटों का आरक्षण निश्चित ही एक अच्छा संकेत है परंतु चुनाव जीत जाने के बाद भी दलितों को उनके अधिकारों से दूर रखने के तमाम हथकण्डे अपनाए जाते हैं। पंचायत चुनावों में जिन पंचायतों में दलित सरपंच, पंचायत सचिव या ग्राम प्रधान/मुखिया चुने गए हैं वहां यह आलम है कि वे सिर्फ़ नाम के लिए ही हैं, उन्हें प्रभावशाली वर्ग द्वारा ही संचालित किया जाता है। कई स्थानों पर तो बाकायदा चुने जाने के बाद भी दलित अपने अधिकार और पद, जिसके कि वे पात्र हैं, प्राप्त नहीं कर पाते और अविश्वास प्रस्ताव दलितों से उनके अधिकार छीनने का उच्च वर्ग द्वारा निकाला गया सबसे अच्छा रास्ता है। जब कभी भी दलित चुने गए हैं उनके खिलाफ़ हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं। पंचायत में मुख्यत: दो तरह से भेदभाव किया जाता है। एक- दलितों को पंचायत की कार्यवाही, विकास कार्यों, योजनाओं से दूर रखा जाता है। दूसरा- जहां कहीं भी आरक्षण के बल पर दलित सत्ता में हैं, वे निशाना बनाए जाते हैं और एक समय के बाद उनका पद अमान्य और रद्द घोषित कर दिया जाता है। पंचायतों में दलित बस्तियों के विकास कार्य भी जाति पहचान का शिकार होते हैं और उन्हें ठीक ढंग से पूरा नहीं किया जाता, न ही इनके योजना निर्माण व क्रियान्वयन प्रक्रिया में दलितों को शामिल किया जाता है।

“बनारस जिले के हरूंआ विकासखण्ड के ग्राम वजीदपुर के निवासी श्री प्रेमनारायण, जो कि चमार समुदाय के सदस्य हैं, सितम्बर 2005 में ग्राम प्रधान चुने गए थे और 8 सितम्बर 2005 को पंचायत समिति का गठन हुआ था। निर्गामी समिति द्वारा श्री नारायण को ग्राम कार्यालय के कार्य रजिस्टर, सम्पत्ति रजिस्टर जो कि गांव के प्रबंधन से संबंधित हैं आदि कई दस्तावेज़ नहीं सौंपे गए। साथ ही दैनिक रजिस्टर संभालने को नकारने के लिए निर्गामी समिति ने चलायमान सम्पत्ति/वस्तुओं को सौंपने से इन्कार करते हुए कार्यालय में ही रखा। यहां तक कि श्री नारायण को उच्च जाति के सदस्यों द्वारा कई दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने के लिए भी बाध्य किया गया।"

एक ओर जहां चयनित प्रतिनिधियों के साथ इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं वहीं दूसरी ओर दलित समुदाय के मतदाताओं को किसी निश्चित व्यक्ति के पक्ष में मतदान करने के लिए बाध्य किया जाता है, जिसके लिए मत ख़रीदने से लेकर लालच देने और धमकाने तक कई तरह के हथकण्डे अपनाए जाते हैं। दलित मतदाताओं को अपने मताधिकार का उपयोग करने से रोकना एक और तरीका है, जिनके नाम पर किसी विशेष व्यक्ति के पक्ष में फर्जी मतदान किया जाता है।

यह स्पष्ट करता है कि ग्रामीण स्तर पर विकास कार्य और योजना निर्माण में दलित समुदाय की सहभागिता को किस प्रकार प्रभावित किया जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का गौरव-गान करने वाली राजनैतिक व्यवस्था में किस तरह समाज में हाशिए पर रह रहे समुदाय के राजनैतिक अधिकारों का हनन किया जाता है।

दलित और कानून व्यवस्था

दलितों के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 और नियम 1995 जैसे कानून होने के बावजूद दलितों के विरुद्ध अत्याचार की स्थितियों में कोई सार्थक परिवर्तन नज़र नहीं आता। देश के विभिन्न राज्यों में दलित अत्याचार के आंकड़ों में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। यदि एन.सी.आर.बी. के आंकड़े ही देखे जाएं तो उत्तरप्रदेश में, जहां कि सर्वाधिक दलित जनसंख्या है, वर्ष 2005 में दर्ज 4403 घटनाओं के मुकाबले वर्ष 2007 में 6148 घटनाएं दर्ज हुई । इसी प्रकार आंध्रप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखण्ड व तमिलनाडु में क्रमश: 3632, 1906, 951, 760, 139 के मुकाबले 4136, 2851, 1126, 806, 1760 घटनाएं दर्ज हुईं।

इसके अतिरिक्त यह भी एक तथ्य है कि कई घटनाएं ऐसी होती हैं जो दर्ज ही नहीं होतीं। ग्रामीण स्तर पर दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार, मारपीट, अभद्र व्यवहार की ऐसी कई घटनाएं होती हैं जिनके ख़िलाफ़ पुलिस में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई जाती। ग्रामीण स्तर पर ही दबंग व्यक्तियों द्वारा मामले को दबा दिया जाता है।

एससी/एसटी एक्ट होने के बावजूद दलितों को न्याय नहीं मिल पाता है। इसमें पुलिस प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दलित विरोधी मानसिकता, स्थानीय पुलिस प्रशासन पर प्रभावशाली जातियों के प्रभाव और राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण या तो पुलिस प्राथमिकी (एफ.आई.आर.) ही दर्ज नहीं करती या फिर प्राथमिकी में उचित धाराओं का प्रयोग नहीं किया जाता। इसके अतिरिक्त केस वापस लेने और समझौता करने के लिए भी पुलिस द्वारा दबाव बनाया जाना व पुलिस थानों में दलितों के साथ किया जाने वाला अभद्रतापूर्ण व्यवहार भी दलितों को न्याय की पहुंच से दूर रखता है।

एक ओर जहां अधिनियम के अनुसार जांच अधिकारियों की अपर्याप्तता है वहीं दूसरी ओर अधिवक्ताओं  में भी कानून के बारे में पूरी जानकारी न होना और प्रावधान के अनुसार विशिष्ट न्यायालयों का अभाव भी अधिनियम के अनुरूप दलितों को न्याय दिलाने में बाधक है। ऐसे भी उदाहरण मौजूद हैं जहां पुलिस की जानकारी में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं अंजाम दी गई हैं।

दरअसल दलितों के शोषण की सामंतवादी प्रवृत्ति आज भी अपने चरम पर है। उन्हें अपने से नीचा और अपने पर आश्रित मानने वाली विचारधारा के कारण कानून व्यवस्था में दलितों के लिए संवेदनहीनता बढ़ी है। सख्त कानूनी धाराएं होने के बावजूद स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों व तथाकथित उच्च वर्ग का पोषण करने वाली राजनीति के प्रभाव के चलते यह धाराएं सिर्फ़ कानून की किताबों में ही बंद हैं। इसके अतिरिक्त अधिकांश राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में दलितों के विरुद्ध अपराधों की बढ़ती हुई घटनाओं के ग्राफ को प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति ने भी प्रकरण दर्ज होने को प्रभावित किया है, क्योंकि यह ग्राफ पुलिस प्रशासन और कानून व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।

(मई २००९, पैरवी संवाद में प्रकाशित लेख का अंश)

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

ग्रामीण भारत में दलित - भाग दो (आर्थिक व सांस्कृतिक परिदृश्य)



पिछली पोस्ट में दलितों की सामाजिक स्थिति पर अपनी बात रखी थी। ग्रामीण भारत में दलितों की स्थिति के संदर्भ में अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए इस पोस्ट में आर्थिक सुदृढ़ता के पहलू पर अपनी बात रखने का प्रयास किया है----


आर्थिक परिदृश्य

गौरवपूर्ण जीवन जीने के लिए मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति एक अहम बिंदु है, जिसके लिए आर्थिक सक्षमता आवश्यक है। ग्रामीण क्षेत्रों में दलित आज भी या तो अपने पारंपरिक व्यवसाय में संलग्न हैं या फिर मज़दूरी पर आश्रित हैं। वे सभी कार्य जिनको करने में हर व्यक्ति को घिन हो, इस समुदाय की आजीविका हैं – जैसे कि मैला साफ करना, मृत जानवरों को फेंकना, चमड़ी उतारना आदि। इसके अलावा उच्च जाति के घरों में तमाम तरह की बेगारी करना भी इस समुदाय के लिए विवशता है क्योंकि इनके पास आजीविका के अन्य स्थाई साधन उपलब्ध् नहीं हैं। खेतों में काम करने के एवज़ में भी उन्हें जितनी मज़दूरी मिलती है वह किसी भी मायने में पर्याप्त या उचित नहीं कही जा सकती। मध्यप्रदेश के कई अंचलों में भूमिस्वामियों के खेतों में फसल काटने की मज़दूरी पचासी या बीसौरी के रूप में दी जाती है (यह फसल की किस्म पर निर्भर करता है) यानि कि जब भूमिस्वामी के लिए पचास या बीस गट्ठे फसल के काट लिए जाते हैं तब मज़दूर अपने लिए एक गट्ठा फसल का पाता है। अब जबकि कुछ स्थितियां बदली हैं तो प्रतिदिन 40 से 50 रुपये मज़दूरी का भी समावेश हुआ है। परंतु फसल बोने, खेतों में पानी देने, कटाई जैसे कार्य होने के बावजूद कृषि कार्य निरंतर वर्ष भर नहीं चलता और मज़दूर उच्च वर्ग के सदस्यों के लिए अन्य कार्य करने को विवश होता है जिसके एवज़ में उसे कई क्षेत्रों में अभी भी सिर्फ़ भोजन प्राप्त होता है, यदा-कदा आवश्यकता पड़ने पर थोड़ी आर्थिक मदद।

वर्तमान समय में जबकि सरकार द्वारा राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम जैसा कानून क्रियान्वित है जिसके ज़िरये यह वर्ग अपनी आर्थिक स्थिति में थोड़ा सुधार कर सकता है, तो उसमें भी इस वर्ग का शोषण स्पष्ट नज़र आता है। ज़ाहिर है कि अकुशल शारीरिक श्रम करने वालों में इस वर्ग की संख्या काफी है और अधिकांश सदस्य अशिक्षित हैं। परिणामस्वरूप मस्टर रोल में काम के दिनों की गलत प्रविष्टियों, निर्धारित से कम मज़दूरी के भुगतान और यदि लाभुक भी दलित है तो उससे तमाम कागज़ी कार्यवाहियों के लिए रिश्वत की मांग के कई उदाहरण सामने हैं।

भूमिहीनों को शासकीय भूमि के आबंटन में भी धांधली की बात आम सुनाई देती है। कई स्थानों पर दलितों को आबंटित की जाने वाली भूमि सवर्णों के नाम कर दी गई। दलितों को आबंटित की गई भूमि पर नाम तो दलित का है परंतु कब्जा किसी और का। ऐसे में वह अपनी ही भूमि का उपयोग नहीं कर पा रहा है। ऐसे भी उदाहरण हैं जहां दलित भूमिहीनों को बंजर या अनुपजाऊ भूमि आबंटित की गई। इसी से स्पष्ट होता है कि जिस वर्ग के पास अपनी कृषि भूमि नहीं है, स्थाई रोज़गार नहीं है, आर्थिक सुदृढ़ता के अवसरों में जिसका शोषण किया जा रहा है, जो जीविकोपार्जन के लिए मज़दूरी, उच्च वर्ग की बेगारी और घृणित कार्यों पर आश्रित है वह किस हद तक आर्थिक सुदृढ़ हो सकता है और बेहतर जीवन की कल्पना कर सकता है।


सांस्कृतिक परिदृश्य

हमारे देश में विभिन्न संस्कृतियों के मिलाप और एकीकरण की बात बड़े ही गर्व से कही जाती है और इस बात से सभी सहमत हैं कि हर वर्ग की, क्षेत्र की अपनी अलग व अनूठी संस्कृति है। किसी क्षेत्र की संस्कृति को निर्मित करने में वहां के प्रत्येक वर्ग की परंपराएं और मान्यताएं प्रमुख कारक होती हैं। हमारे संविधान में भी प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म, संस्कृति के पालन की स्वतंत्रता दी गई है परंतु वास्तविकता में दलितों को अपनी परंपराओं, संस्कृति के पालन की उतनी स्वतंत्रता नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार के सुदूर ग्रामीण अंचलों में दलित परिवारों में धूम-धाम से विवाह करना, धार्मिक आयोजनों में अन्य समुदायों की तरह सक्रिय भागीदारी करना ख़तरे से खाली नहीं है। अभी भी देश के अंदरूनी ग्रामीण अंचलों में यहां तक स्थिति है कि इस समुदाय के सदस्य आधुनिक वस्त्र नहीं पहन सकते, उच्च वर्ग के लोगों के सामने साइकिल पर नहीं चल सकते, धूप का चश्मा नहीं लगा सकते।

धार्मिक मान्यताओं के मामले में भी इस वर्ग की अपनी स्वतंत्रता नहीं है। वर्षों से सामाजिक , आर्थिक और वैचारिक गुलामी सहते और सुविधाओं से दूर रहते इस वर्ग ने जब अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर ईसाई धर्म को अपनाना शुरू किया तो जो विवाद उत्पन्न हुआ उससे सभी वाकिफ़ हैं (जबकि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार किसी भी धर्म को मानने का अधिकार है)। और उसके बाद घर वापसी के नाम पर चलाई गई मुहिम जिसमें कहा गया कि यह वर्ग हिन्दू समाज का एक अभिन्न हिस्सा है (जिन आदिवासियों को पहले भारत का मूल निवासी ही नहीं माना जा रहा था, वे भी इस मुहिम में हिन्दू समाज का अभिन्न हिस्सा कहे गए), यह स्पष्ट करती है कि इस वर्ग की अपनी संस्कृति स्वीकार्य नहीं है, वह किसी धर्म के शरणागत ही होगी। हालांकि दलितों को अपना अभिन्न हिस्सा कहने वाले, अपने भाई का दर्जा देने वाले कथाकथित धर्मावलम्बियों ने यह स्पष्ट नहीं किया कि घर वापसी के बाद इस समुदाय के सदस्यों का दर्जा क्या होगा। उन्हें भी अन्य समुदायों के सदस्यों के समान बराबरी का अधिकार प्राप्त होगा या फिर से दलित ही रहेंगे? जिस जाति के सदस्य होने के कारण वे आज तक प्रताड़ित और बहिष्कृत होते रहें हैं, क्या फिर से वही जाति उनकी पहचान होगी और सामाजिक स्थितियों को सुनिश्चित करेगी?

(मई २००९, पैरवी संवाद में प्रकाशित लेख का अंश)
(दलितों के स्थिति के सन्दर्भ में राजनैतिक व कानून व्यवस्था सम्बन्धी पहलुओं पर आगामी पोस्ट में...)