मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

अपने लौंडे की भी हवा चलेगी

लल्लन मियाँ बोले - 'अमां यार, हम सोच रहे हैं कि अपने लौंडे को अगले सरपंची के चुनाव में खड़ा कर दें.'

मैंने पूछा कि क्यों तो बोले - 'कल ताश का महल बना रहा था. टेबल हिल रही थी सो कमबख्त ने बगल की अलमारी में रखी गुटका रामायण टेबल के टूटे पाए के नीचे सरका दी. टेबल पर रखी अपनी इतिहास की किताब एक कोने में फेंकी और जब हमने आपत्ति की तो बोला क्या फिजूल बातें करते हैं, अरे मैं भविष्य बना रहा हूँ. दुक्की-तिक्की टाइप निचले पत्तों से उसने निचली मंजिल बनाई और महल के सबसे ऊपर रखा बादशाह. हमने वजह पूछी तो बोला कि बताइए भला बादशाह ही अगर निचली मंजिल में लग जायेगा तो राज कौन करेगा? ये दुक्की जो तिक्की से पिट जाती है या ये नहला जिस पर दहला भारी पड़ता है? और सब किसके लिए पिटते-पिटाते हैं, बादशाह के लिए ही न! बादशाह सब को पीटता है और सब चुपचाप पिट जाते हैं, इसलिए बादशाह सबसे ऊपर. और जब महल बनकर तैयार हुआ तो  उसने ऐसा हल्ला मचाया कि घर सिर पर उठा लिया.'

'खैर... जब हमने कहा कि मियाँ बादशाह भी इक्के से पिट जाता है और देखो तो तुमने इस महल को बनाने के चक्कर में क्या किया, धर्म को टेका बना दिया, इतिहास की किताब के साथ-साथ शिक्षा को कोने में फेंक दिया तो वो बिदक गया. बोला - आप मेरी सफलता से जलते हैं, आपको बर्दाश्त नहीं हो रहा कि मैंने एक महल बना लिया है.'

'अब तुम खुद ही सोचो भाई मियाँ कि जो लड़का अभी से धर्म को बुनियाद में इस्तेमाल करता हो, सामाजिक ताने-बाने को जानता हो, हुक्मरान की हैसियत जानता हो, कुछ काम करने पर हल्ला मचाना जानता हो और आलोचना होने पर अपने बाप को भी कह दे कि वो उससे जलता है, उसके लिए राजनीति से अच्छा और कौन-सा रोज़गार होगा.' 

'हमें तो यकीन है भाई मियाँ कि एक दिन अपने लौंडे की भी हवा चलेगी.'

सोमवार, 10 मार्च 2014

हद्द है...


ज़िद पे अपनी वो अड़े हैं, हद्द है
हम इबादत में पड़े हैं, हद्द है

लाख समझाने की कोशिश हो चुकीं
चिकने लेकिन वो घड़े हैं, हद्द है

जिनको बहा देने थे सारे बाँध वो
अश्क़ मोती से जड़े हैं, हद्द है

बेतरह टूटे हैं कई-कई बार हम
हाँ मगर अब भी खड़े हैं, हद्द है

हाथ में है चाँद लेकिन पाँव तो
अब भी मिट्टी में गड़े हैं, हद्द है

धर्म, जाति, वर्ग और ये वोट बैंक
इन्सान के कितने धड़े हैं, हद्द है.

शनिवार, 9 नवंबर 2013

जोगी वही जो कपड़ा रंगाए


सुबह-सुबह मोबाइल फोन की घंटी बजी तो आदत के मुताबिक नींद में ही हरा बटन दबाया और कान पर लगा लिया। सुनाई दिया- ‘मन न रंगाए जोगी कपड़ा रंगाए....’। हरिओम शरण की आवाज़ में कबीर की यही एक लाइन बार-बार सुनाई दे रही थी, लगा कि टेप एक जगह अटक गया है शायद, लेकिन पीछे से गूँजी दूसरी खुरदरी आवाज़ ने भ्रम तोड़ दिया। पूछा गया- ‘बोलो, क्या समझे? सप्रसंग व्याख्या करो।’
       बिना किसी भूमिका के ऐसे सीधे सवाल दाग देने की हिम्मत और वह भी अलसुबह भला और किसकी हो सकती थी सिवाय लल्लन मियाँ के। फिर भी नींद की ख़ुमारी अब तक उतरी न थी सो मैंने पूछा- ‘कौन? लल्लन मियाँ!’ जवाब मिला- ‘नहीं भाई मियाँ, मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूँ और सीधा सवा अरब का सवाल पूछ रहा हूँ।’ मैंने याद दिलाते हुए कहा कि अमिताभ करोड़पति-करोड़पति खिलाते हैं अरबपति-अरबपति नहीं, तो जवाब आया- ‘वो तो रुपयों की बात है जो जीतने के बाद मिलते हैं, अपन तो खिलाड़ी को देखने वालों की बात कर रहे हैं। तुम तो ये बताओ कि क्या समझे?’
       ‘समझना क्या है, कबीर उन लोगों को गरिया रहे हैं जो धार्मिक होने का दिखावा करते हैं, आडंबर रचते हैं और.....।’ इससे पहले कि मैं अपनी बात पूरी करता लल्लन मियाँ बोल पड़े- ‘अमाँ क्या तोते की तरह स्कूल में रटी व्याख्या दोहरा रहे हो, कुछ नई व्याख्या करो, आधुनिक टाइप।’ कुछ क्षण सोचकर मैंने कहा- ‘मतलब है कि आपका ‘माइंडसैट’ तो पुराना वाला ही है ‘बट’ आप दिखाते हैं कि आप ‘चेंज्ड पर्सन’ हैं।’ इतना सुनते ही लल्लन मियाँ का रिकॉर्ड चालू हो गया। बोले- ‘हद्द है यार तुम्हारी भी! हिन्दी मीडियम स्कूल में पढ़कर ताजा-ताजा कॉलेज पहुँचे लौंडे की तरह आधुनिक हो रहे हो, बात में दो-चार अंग्रेजी के शब्द घुसेड़ कर अंग्रेज हुए जा रहे हो। अमाँ ये कोई आधुनिक व्याख्या नहीं है। अगर तुम कबीर की आधुनिक व्याख्या कर पाते, उस पर अमल कर पाते तो यूँ चप्पलें चटकाते, कलम घसीटते न फिर रहे होते, भावी प्रधानमंत्री या इसरो प्रमुख होते। रहने दो तुमसे न हो पाएगा।’
       जब लल्लन मियाँ चप्पल चटकाने वाली हालत का हवाला देकर मुझे अयोग्य साबित कर ही चुके, तो मेरा पलटकर उन्हीं से सही व्याख्या पूछना तो बनता था। वे तो जैसे तैयार ही बैठे थे, छूटते ही बोले- ‘देखो भाई, ये जो व्याख्या है न कि कबीर उन जोगियों को गरिया रहे हैं जो कपड़ा रंगा लेते हैं पर मन से सांसारिक ही रहते हैं, यह एकदम ग़लत है। इसका असल मतलब अब खुलकर सामने आया है और वह यह है कि असली जोगी वही है जो कपड़ा जरूर रंगा ले लेकिन मन न रंगने दे।’
       मैंने कहा कि यह तो भावार्थ हुआ, तो लल्लन मियाँ ने खुलासा किया- ‘देखो मियाँ! पुराने टाइम का जो जोगी होता था वो होता था ऐसा आदमी जिसके बारे में दिखता था कि ईश्वर से लौ लग गई है। मन का किसे पता कि भीतर क्या चल रहा है, लोग तो बाहरी चोला देखकर ही उसे जोगी कहते थे न। आवभगत भी खूब करते थे। कुल मिलाकर बात यही हुई न कि बेटा आवभगत करानी है तो मन रंगे या न रंगे, कपड़े का रंगना जरूरी है। अब आधुनिक टाइम के जोगी जो हैं वे कई फील्ड्स में हैं अलग-अलग रंग के चोलों में। जैसे वाल्मीकि की कथा से प्रेरणा लेकर कई चोर-लुटेरे जोगी-बाबा हो गए हैं। सालों से एक दल सेक्युलर धारा का चोला ओढ़ मौज काट रहा है। 84 के दंगे टाइप चीजें उसके मन के भीतर की चीजें हैं, बाहर से वह सेक्युलर जोगी है। जैसे जोगी हर चर्चा का मुँह ईश्वर की ओर मोड़ आदमी को भक्ति की दुनिया में पहुँचा देता है, वैसे ही अपने भगवा ब्रिगेड के भावी प्रधानमंत्री हर मुद्दे का मुँह भावनाओं की ओर मोड़ लोगों को देशभक्ति की दुनिया में पहुँचा देते हैं। आजकल पटेल से जुड़ी भावनाओं से खेल रहे हैं। चैनल-वैनल सब पटेल-कांग्रेस-आरएसएस के संबंध खंगालने में जुटे पड़े हैं। बताओ किसी ने पूछा कि भैया पटेल की मूर्ति बन जाने से आत्महत्या कर रहे उन किसानों का क्या भला होगा, जिनसे तुम लोहा मांग रहे हो? किसानों और देश का भला हो या न हो, देशभक्ति धारा के जोगी होने से इनकी मौज है। समाजवादी जोगियों की क्या मौज है ये तुम उत्तर प्रदेश में देख ही रहे हो।’
       थोड़ा रुक कर लल्लन मियाँ फिर बोले- ‘वैसे तुम्हारी ‘माइंडसैट’ वाली बात भी थोड़ी ठीक ही थी, पूछो कैसे?’ मैंने कहा- ‘आप ही बताइए।’ वे बोले- ‘ताजा उदाहरण तुम्हारी व्याख्या के करीब है। इसरो प्रमुख के. राधाकृष्णन ने कपड़े तो विज्ञान के रंग में रंग लिए पर मन तिरमाला तिरपति देवस्थानम के रंग में रंगा रहा। चलो अब फोन रखते हैं, बोलो ऊँ विज्ञान देवाय नमः।’ 
       इससे पहले कि वह फोन रखते मैंने पूछा लिया कि आपकी सवा अरब का सवाल वाली बात कहाँ फिट बैठती है। वह बोले- ‘तुम यार निरे मूरख ही रहे। अरे देखते नहीं हो देश की सवा अरब जनता अपने हाथ की रेखाओं से लेकर देश का भविष्य तक बांचने की उम्मीद लिए कैसे इन तरह-तरह के जोगियों का मुँह ताकती रहती है।’

बुधवार, 6 नवंबर 2013

असहमति का सम्मान और मेरी तेरी उसकी बात


ठीक-ठीक याद नहीं पर शायद दसवीं या ग्यारहवीं में पढ़ता था, जब बड़े भाइयों और उनकी इप्टा, प्रलेसं वाली मित्र मंडली की सोहबत का असर मुझ पर होने लगा था और स्कूल के कोर्स में शामिल कहानियों से इतर भी हिन्दी साहित्य पढ़ने की ठीक-ठाक आदत विकसित हो चुकी थी। प्रेमचंद के 'गबन' और 'गोदान' सरीखे उपन्यास पढ़ चुका था। यही वक्त था जब पहली बार राजेन्द्र यादव का नाम जाना, उनके उपन्यास ‘सारा आकाश’ से। अब भी याद है कि बीच में एक-दो बार ही उठा था, वरना एक ही बैठक में पूरा पढ़ डाला था ‘सारा आकाश’। फिर अरसे तक इसके पात्र दिमाग में बने रहे, आज भी हैं। बहू के घड़ी पहनकर रसोई में जाने पर तंज़, ननद का दाल में मुट्ठीभर नमक झोंक देना, पत्नी के लिए साड़ी लाने पर मां का तंज़ जैसी कितनी छोटी-छोटी चीजों की कहानियां हैं इसमें। उस भाषा में, जिसे समझने के लिए हिन्दी के भारी-भरकम शब्दकोशीय ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। इतने सालों बाद भी यह उपन्यास कहानियों के कोलाज की शक्ल में ज़ेहन की दीवारों पर टंगा हुआ है।

उपन्यास के माध्यम से यह राजेन्द्र जी से पहला परिचय था. उनसे कभी मिलना नहीं हुआ, पर एक अरसे तक हर महीने उनकी बात सुनी जाती थी। सालों तक ‘हंस’ कहानियों के लिए कम उनके लिखे संपादकीय के लिए ज्यादा ख़रीदी गई और ये संपादकीय यानी ‘मेरी तेरी उसकी बात’ इस बात को और पुख्ता करते गए कि राजेन्द्र यादव छोटी-छोटी चीजों को देखने का नाम है। यह अपने शीर्षक के अनुरूप ही लगता था। भारी-भरकम शब्द विन्यास के बिना सीधे-सीधे छोटी लेकिन ज़रूरी चीजों पर खरी बात करता हुआ। अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकीयों से अलग, बातचीत करता हुआ, असहमतियों का प्रत्युत्तर देता हुआ और इस आग्रह के साथ अपने तर्क रखता हुआ कि असहमत हैं तो आइए चर्चा करें। बीच के कुछ अंतराल के बाद जब दो-ढाई साल पहले फिर से हंस खरीदना शुरू किया तो लगा कि संपादकीय की धार पहले जितनी तीखी नहीं रही, ‘मेरी बात’ शायद ज्यादा प्रधान हो गई है लेकिन ‘तेरी’ और ‘उसकी’ बात अभी भी जारी है।

हिन्दी के पाठकों की गिरती संख्या और साहित्य की दुर्दशा के बारे में उछलते जुमलों पर अपने एक संपादकीय में वह लिखते हैं- ‘हिंदी में पाठकों की कमी का रोना लगभग हर लेखक और प्रकाशक रोता है। मगर इस बात पर चिंता कभी-कभी ही की जाती है कि हमारे यहां बैठकी की वह परंपरा लुप्त हो गई है जहां से साहित्य ही नहीं दुनिया-भर की दूसरी बौद्धिक बहसें जन्म लेती हैं, आन्दोलन शुरू होते हैं। किसी भी साहित्यिक, राजनैतिक या सांस्कृतिक गतिविधि के लिए बैठकबाजी एक अनिवार्य तत्व है। इन दिनों दिल्ली में ऐसी जगह तलाश करना मुष्किल है जहां कुछ लोग दो-चार घंटे बैठकर अपनी बेचैनी और जेब के हिसाब से बकवास कर सकें।’ बैठकबाजी की इस अनिवार्यता के अलावा वह लेखकों के भीतर मौजूद कमी का भी ज़िक्र करते हैं- ‘किसी भी स्थिति को लंबे समय तक अपने भीतर पचाने और रचाने की क्षमता चूंकि लेखकों में कम हुई है इसीलिए लघुकथाओं की बाढ़ है। ये लघुकथाएं बेहद फॉर्मूलाबद्ध ढर्रे पर लिखी जाती हैं। राजनैतिक भ्रष्टाचार, अमीरों द्वारा ग़रीबों का शोषण या ऐसी ही दो-चार सामान्य घटनाएं।’ यहां यह आपत्ति तो दर्ज की जा सकती है कि भ्रष्टाचार और शोषण बड़ी और जवलंत समस्याएं हैं इसलिए इन्हें सामान्य तो नहीं कहा जा सकता लेकिन राजेन्द्र जी के ‘फॉर्मूलाबद्ध ढर्रे’ के आशय से असहमत भी नहीं हुआ जा सकता।

इन दिनों जब हिन्दी के बरअक्स अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य की मौजूदगी और उसे महत्वपूर्ण स्थान दिए जाने की चर्चाएं और अधिक गंभीर होती जा रही हैं, तब पांचवे जयपुर साहित्य समारोह पर लिखे गए राजेन्द्र जी के संपादकीय के अंश याद आते हैं, जहां वह भाषा को अपना हथियार बनाने की साम्राज्यवाद की मंशा और मानसिक औपनिवेशिकता की परतों को देखते हैं। वह लिखते हैं- ‘भारतीय भाषाएं ही नहीं, क्यों इसमें चीन, जापान, रूस या ऐसे ही दूसरे देश सिरे से गायब हैं? पश्चिमी, विशेषकर योरुप, अमेरिका के नोबेल-बुकर से सुसज्जित देशों के अलावा दूसरे कोई नाम चूंकि सुनाई नहीं देते इसलिए उनका यहां नामलेवा भी नहीं है।...... जब से योरुपीय और अमेरिकन पुरस्कार और फैलोशिप तीसरी दुनिया के युवा लेखकों को दिए जाने लगे हैं और जिस तरह मीडिया उन्हें उछाल रहा है, तब से अंग्रेजी में लिखने वाला हर नया लेखक महान बनने के लिए बेचैन हो उठा है।...... सेकेंड और थर्डरेट रचनाओं की जिस तरह अंग्रेजी के अखबारों में पूरे पन्नों पर समीक्षाएं आती हैं वह किसी के भी मन में ईर्ष्या जगाने को काफ़ी है।’ साहित्य, साहित्यिक चर्चाओं और सत्ता से आम-जन की दूरी पर उन्होंने अपनी चिंता लगातार व्यक्त की। इसी संपादकीय में सत्ता के चरित्र का ज़िक्र करते हुए वह लिखते हैं- ‘दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर पर गणतंत्र दिवस का भव्य आयोजन और जयपुर साहित्य समारोह लगभग एक साथ ही मनाए जा रहे हैं; जिस जनता के प्रतिनिधित्व की कसमें ये खाते हैं, वह सामान्य-जन दोनों ही जगह ताली बजाऊ दर्शक है। पता नहीं क्यों, सत्ता के चरित्र पर सोचते हुए मुझे जयपुर समारोह का ही ध्यान हो आया। क्या इसे सत्ता का सांस्कृतिक विस्तार कहना बहुत दूर की कौड़ी लाना है?’

राजेन्द्र यादव को जितना श्रेय इस बात के लिए दिया जाता है कि उन्होंने कई अच्छे रचनाकारों को सामने लाने का काम किया, उतना ही श्रेय इस बात का भी दिया ही जाना चाहिए कि उन्होंने असहमत होने के अधिकार का पूरी ईमानदारी से सम्मान किया। जितनी बेबाकी से आप अपनी असहमति हंस में व्यक्त कर सकते हैं, बिना किसी संकोच के, और वह शामिल भी की जाती है तो इसके पीछे वजह राजेन्द्र यादव जैसे संपादक का होना है। असहमति के संवाद को किसी पत्रिका में बनाए रखना इस व्यावसायिक दौर में कम जोखिम भरा नहीं है, जबकि पत्रिका की सामग्री की तारीफ करते पत्र शामिल करना अधिकांश संपादक मुफीद मानते हों। ‘अपना मोर्चा’ पूरी तरह पाठकों का मोर्चा ही रहा, जहां वे खुलकर तारीफ भी कर सकते हैं और गलतियां बताते हुए आलोचना भी कर सकते हैं। उन्होंने अपने संपादकीयों में विभिन्न विषयों पर खुलकर अपनी असहमति भी व्यक्त की, फिर चाहे वह सत्ता पक्ष से असहमति हो या किसी विचार से असहमत लोगों से असहमति। वैचारिक-राजनैतिक चेतना और युवा वर्ग की इसके प्रति जागरूकता पर सहमति, असहमति और एक विचारधारा से असहमत लोगों से सवाल करते हुए वह लिखते हैं- ‘जब हमारे पास विचारधारा थी तो वह समाज के हर वर्ग में राजनैतिक जागरूकता और अपने दायित्व को बार-बार रेखांकित करती थी। चारों ओर से निराशा और हताश परिवेष में राजनीतिक चेतना संपन्न युवा हजारों की संख्या में आज भी नक्सल आंदोलनों में शामिल हो रहे हैं। इनमें दलितों, आदिवासियों और सर्वहाराओं को संघर्षों से जोड़ने का एक जनून है जिसे सरकार सिर्फ कानून और व्यवस्था से अधिक कुछ भी मानने को तैयार नहीं है।......... वे किनके खिलाफ और क्यों लड़ रहे हैं, यह सवाल अक्सर ही सरकारी तबकों में नहीं पूछा जाता।............. बैंगन की तरह मार्क्सवाद नाम से ही चिढ़ने वाले हमारे अशोक वाजपेयी और ओम थानवी जैसे लोग उन लागों लाख संघर्षशील युवाओं के उभार को क्या नाम देना चाहेंगे? दुनिया में जहां भी शोषक और शोषित के बीच असमानताओं की लड़ाई है, उसे बिना मार्क्सवाद के कैसे समझा जा सकता है, अगर अशोक जी इस पर भी प्रकाश डालते तो हम जैसे मूढ़मतों को कोई दिशा दिखाई देती।’

यह दुःखद है कि मरणोपरांत आखिर लोगों ने अपनी मनमानी कर ही ली। धार्मिक रीतियों से उनके विचारों को फूंकने की कोशिश की गई लेकिन विचार शरीर के साथ ख़त्म नहीं हो जाते। राजेन्द्र यादव के विचार भी नहीं ख़त्म नहीं होंगे। वे जब तक जीये धार्मिक कर्मकांडों और साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ लिखते रहे। धर्म के नाम पर सरकार की चुप्पी और जनमानस की धार्मिक आस्था पर भी उन्होंने प्रहार किए। अपने एक संपादकीय में उन्होंने लिखा है- ‘सरकार चाहे जितनी लोकतांत्रिक हो, मगर उसे यह अधिकार नहीं है कि किसी के धर्म में हस्तक्षेप करे - धार्मिक स्वतंत्रता के इस सिद्धांत के तहत धोखेबाजी और हत्या-बलात्कार के इन अड्डों को खुलेआम पनपने दिया जा रहा है। अनधिकृत रूप से किसी भी ज़मीन पर कब्जा करके मंदिर या मठ बनाने की बातें तो आम हो गई हैं और धार्मिक भावनाओं को चोट न पहुंचे, इसलिए सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है।........... हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन्हीं आस्थाओं और भावनाओं का आधार लेकर हमारे यहां लाखों औरतों को सती कर दिया गया या मासूमों के सिर काट कर देवी-देवताओं पर चढ़ा दिए गए।’

अपने अंतिम समय तक विवाद में घिरे रहे राजेन्द्र यादव की व्यक्तिगत और कार्यक्षेत्र की गतिविधियों पर लोगों की अपनी-अपनी राय है। कुछ उनसे सहमत हैं कुछ असहमत, लेकिन शायद यही राजेन्द्र यादव होने की शर्त भी थी। तमाम असहमतियों को स्वीकारने और पुरजोर ढंग से अपनी बात रखने की शर्त। व्यक्तिगत जीवन में वह क्या थे, क्या नहीं थे यह अलग बात है लेकिन एक लेखक-संपादक के रूप में असहमति को सम्मान देने वाले शख्स तो निश्चित ही थे।

बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

तात्कालिक राहत


गलती अपनी ही थी
परवाह ही न की
अब भुगतनी तो होगी ही तकलीफ़ 

हरारत महसूस होने पर हर बार
गले से उतार ली कोई क्रोसिन
टूटा शरीर, फैलने लगा दर्द तो 
गटक ली कॉम्बीफ्लेम या उबाल लिया 
देसी नुस्खा हल्दी वाला दूध
ख़ून में घुलते गए वायरस और हम
रोकते रहे शरीर का गरम होना
दबाते रहे आँखों की जलन 
मार-मार कर पानी के छींटे

मिलती रही तात्कालिक राहत
बना रहा भ्रम ठीक होने का 
कभी किया नहीं ढंग से इलाज
दोहराते रहे सावधानी ही बचाव है 
पर रखी नहीं कभी
नीम-हकीम बहुत थे हमारे आसपास
उनके पास सौ नुस्खों वाली किताब थी,
हमने छोड़ दिया उनके हवाले खुद को 
वे देते रहे हर तरह के बुखार में पेरासिटामोल

गलती अपनी ही थी
नहीं होता जब तक ढंग से इलाज
झेलनी ही होगी तकलीफ़ 
जागना ही होगा रात भर

बीमारियों ने नींद उड़ा रखी है....

कोई बताएगा
कितनी रातें नहीं सोया ये मुल्क?

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

तुम्हारी आवाज़ अपनी ही तो लगी है


कहते हैं कि अगर आप संगीत की बारीकियों को समझते हैं तो इसका आनंद दोगुना हो जाता है. सुर-ताल-लय, राग-रागनियाँ, आरोह-अवरोह के ज्ञान के साथ इस समंदर की लहरों का कुछ अलग ही भान होता है. कुछ अलग ही मज़ा आता है स्वरलहरियों पर तैरने का. पर जब मामला डूबने का हो, तब! 

.....तब कहाँ याद रहता है कि उंगलियों पर दादरा, कहरवा, रूपक या दीपचंदी की चाल पकड़ी जा रही है या नहीं, कि जो किसी किनारे से रिसता हुआ मन को धीरे-धीरे भिगोये दे रहा है वह मल्हार है या मेघ मल्हार, कि कब कौन सा सुर कोमलता से छू गया और कौन सा बार-बार अपने होने को हठात जता रहा है. बस एक आवाज़ गूँजती है कानों में और हम चल पड़ते हैं उसके पीछे-पीछे, चले जाते हैं उतरते हुए..... गहरे और गहरे.

कितना अद्भुत है न कि कभी-कभी कैसे बस एक आवाज़ सुनते हुए अचानक हम उसे जीने लग जाते हैं. लगने लगता है मानो अपने ही भीतर से गूँज रही हो वह. कितनी भूली-बिसरी टीसें कचोटने लगती हैं जब ये आवाज़ कहती है कि कसमें-वादे सब बस बातें भर हैं, कितना क्षणभंगुर सा लगने लगता है जीवन और जब पिंजरे वाली मुनिया के यहाँ-वहाँ जा बैठने का किस्सा सुनाई देता है तो इसी जीवन में कितने रस दिखाई देने लगते हैं. कभी इसी आवाज़ के सहारे प्यार के इक़रार और इश्क़ में डूबकर हँसते हुए जान और ईमान कुर्बान कर देने का दिल हो उठता है तो कभी यही दिल खिले हुए फूलों के बीच ख़ुद के मुरझाने के ग़म में डूब-डूब जाता है और एक हूक सी उठती है कि अब जब सुर ही नहीं सजते तो आख़िर क्या गाऊँ.

अब यह उस आवाज़ का जादू नहीं तो और क्या है कि वह मुड़-मुड़ के न देखने की हिदायत देती हुई भी उतनी ही अपनी लगती है जितनी मधुर चाँदनी के तले मिलन को वीराने में बहार की उपमा देते हुए लगती है. और तब तो कमाल ही कर देती है जब शास्त्रीय संगीत की जटिलताओं में उलझाए बिना हमारे ही विनोदी स्वभाव में लपकते-झपकते बदरवा को बुलाती है या किसी चतुर नार की होशियारी पर चुटकी भरती है.


किस-किस अंदाज़ की बात की जाए. हर मूड, हर अंदाज़ में तुम्हारी आवाज़ अपनी ही तो लगी है मन्ना डे.

शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

ख़रामा ख़रामा गजब कर रहे हैं


ख़रामा ख़रामा गजब कर रहे हैं
फ़स्ल-ए-मोहब्बत हड़प कर रहे हैं
हमारी रगों में ज़हर भर रहे हैं

था उन्वान तो ख़ूबसूरत बड़ा
अंजाम पर मुँह के बल गिर पड़ा
किरदार बदलते गए, रंग भी
इक अफ़साने में हम सफ़र कर रहे हैं

अपनी ज़मीं क्यों गई उनकी जानिब
कोई बता दे कारण मुनासिब
अपने ही घर से बेगाने हुए हम
और दुःख बन के मोती उधर झर रहे हैं

मैं उनके फ़साने सुना तो कई दूँ
ज़ालिम के ज़ुल्मों की ला तो बही दूँ
मगर मेरे मुंसिफ़ की देखो अदा तो
कागज़ पे कागज़ महज़ धर रहे हैं

मैं क़तरा सही पर हूँ मौजों का ज़रिया
है अपना सफ़र जैसे इक बहता दरिया
कल-कल तुम इसकी मधुर ही न जानो
कि तूफ़ान इसमें कई भर रहे हैं।