मंगलवार, 18 जून 2013

आडवाणी, मोदी और किसान


इन दिनों भारतीय जनता पार्टी सुर्खियों में है। कारण रहे लालकृष्ण आडवाणी, नरेन्द्र मोदी और बिहार। न्यूज चैनलों, न्यूज पोर्टलों यहां तक कि सोशल मीडिया में भी इस समय अगर चर्चा का कोई केन्द्र है तो बस बीजेपी। एक अरसे तक पार्टी के मास्टर माइंड रहे आडवाणी की अपनी ही पार्टी में ‘घर के रहे न घाट के’ जैसी स्थिति हो जाना निश्चित ही राजनीति के विश्लेषकों और मीडिया के लिए बड़ी ख़बर थी। इसलिए और भी क्योंकि आगामी समय में उनकी जगह नरेंद्र मोदी के बैठे दिखाई देने के आसार नज़र आ रहे हैं। यानी सारथी रथी बनने की ओर अग्रसर है और जो कभी रथी था वह बस टुकुर-टुकुर देखेगा। आडवाणी की इस स्थिति पर टिप्पणी करने वाले कई लोगों का अनुमान है कि अब शायद आडवाणी उस वक्त को याद कर रहे होंगे जब वे नरेन्द्र मोदी की पीठ थपथपा रहे थे। बहुत संभव है कि आडवाणी अपनी गलतियों के लिए भीतर ही भीतर ग्लानि भी अनुभव कर रहे हों।

यहां ‘बोया पेड़ बबूल का तो फूल कहां से पाय’ की कहावत का उपयोग उचित ही होगा। आडवाणी की राजनीति की फसल जिस मौकापरस्ती की जमीन पर लहलहाई उसमें हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद, साम्प्रदायिकता और दंगों पर अपना विकास करने के बीज उन्होंने ही तो बोए थे, जिसकी फसल पहले वे खुद काटते रहे और अब खाद-पानी देकर मोदी काट रहे हैं। यह और बात है कि मोदी ने वक्त की नजाकत समझते हुए इसमें कुछ दूसरी किस्म के बीज भी डाल दिए हैं। बाबरी मस्जिद की घटना से पहले क्या आडवाणी का कद इतना बड़ा था? राम मन्दिर के मुद्दे पर उन्होंने अपनी रोटियां सेंकीं। गुजरात के दंगे के बाद नरेन्द्र मोदी पार्टी के नेशनल हीरो बन गए और अब वे अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। तो इस मौकापरस्ती के खेल में अगर मोदी आडवाणी को किनारे कर आगे बढ़ रहे हैं तो यह कोई अचरज की बात नहीं होनी चाहिए।

हालिया घटना बिहार में बीजेपी-जेडीयू की तकरार है। मोटे तौर पर यह ‘गुड़ से यारी, गुलगुलों से परहेज’ की तरह है, जिसमें आडवाणी गुड़ हैं तो मोदी गुलगुला। लेकिन गौर से देखें तो जिस तरह मोदी भाजपा समर्थक क्षेत्रों में सब पर हावी होते जा रहे हैं, उसके मद्देनजर यह वर्चस्व की लड़ाई ज़्यादा नज़र आती है। हाल ही में हुई सिर-फुटौवल शायद इसी ओर इशारा भी कर रही है। बहरहाल एक तरफ आडवाणी, बीजेपी-जेडीयू वाली उठापटक है और दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी। जहां-जहां भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियां हैं, वे गुजरात के विकास के कसीदे पढ़ते नहीं थकते। यह स्पष्ट है कि आगामी चुनावों के लिहाज से मोदी हर तरह से अपने कद को और ऊँचा दिखाने की जुगत में लगे हुए हैं और इसके लिए वे अपने ‘तथाकथित विकास’ को आधार बना रहे हैं। इसी क्रम में हाल ही में सरदार वल्लभ भाई पटेल की 392 फुट ऊंची प्रतिमा के निर्माण की घोषणा के साथ मोदी ने खुद को किसानों का हितैषी दर्शाने की कोशिश भी की है, जो कि मोदी की अवसरवादिता का एक और नमूना है।

गौरतलब है कि इस प्रतिमा के निर्माण के लिए उन्होंने देश के सभी किसानों से लोहे की मांग की है। असल में तो यह राजनीति का एक हथकंडा ही है जिसके सहारे वे देश के उन किसानों के बीच अपनी जगह बनाना चाहते हैं, जिनकी बदहाली का जिम्मा अकेले केन्द्र के सिर पर मढ़़ दिया जाता है। जबकि हकीकत यह है कि किसानों की बदहाली के लिए जितनी जिम्मेदार केन्द्र सरकार है, उतनी ही राज्य सरकारें भी। शायद मोदी यह भूल गए हैं कि उनके अपने राज्य गुजरात में किसान उनसे खुश नहीं हैं।

गुजरात के विकास का ढिंढोरा पीटने वाले मोदी के लिए उनकी सरकार द्वारा किया गया भूमि अधिग्रहण मुसीबत बना ही हुआ है। स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ गुजरात के चार जिलों के 35 गांवों ने आंदोलन छेड़ रखा है। इस हद तक कि दीवारों पर दर्ज अक्षरों और चस्पां पोस्टरों में सरकारी अधिकारियों और उद्योगपतियों को स्पष्ट चेताया गया है कि वे जमीन अधिग्रहण के मामले में गांव में कदम न रखें अन्यथा उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। इसी क्षेत्र में किसानों की कई एकड़ उपयोगी जमीन को इस्तेमाल में न आने वाली जमीन बताकर मारुति को दे देने के कारण किसान पहले से ही मोदी सरकार के प्रति गुस्से में हैं। गुजरात के किसान स्पष्ट कहते हैं कि विकास के नाम पर जिस जमीन का अधिग्रहण किया जाता है उस पर सिर्फ उद्योगपतियों का विकास होता है।

29 मई 2013 की एक सूचना के अनुसार जनवरी 2008 से अगस्त 2012 तक गुजरात में 112 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। वजह थी सूखा, कर्ज और उसके भुगतान के लिए बैंकों का दबाव। 2005 में जिन किसानों ने फसल सुरक्षा बीमा लिया था, उन्हें सरकार से आज तक एक पैसा भी नहीं मिला है, जबकि किसानों से बीमा के पैसे वसूलने में कोई कोताही नहीं की जाती। गौरतलब है कि 2012 के शुरुआती 5 महीनों में ही 65 किसानों ने आत्महत्या की और यह सिलसिला अब भी जारी है। बावजूद इसके मोदी कृषि मेलों का आयोजन करते हैं और गुजरात में कृषि क्षेत्र की स्थिति बहुत अच्छी होने का दिखावा करते हैं। क्या इन किसानों की मौत के प्रति मोदी सरकार की कोई जवाबदेही नहीं बनती? या फिर मोदी का गुजरात और विकास केवल शहरों और उद्योगपतियों तक ही सीमित है?

मोदी देश के पांच लाख से अधिक गांवों के किसानों से स्टैचू ऑफ़ यूनिटी यानी सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा के निर्माण के लिए लोहा तो मांग रहे हैं, लेकिन शायद उन्हें पता नहीं है कि इसमें शामिल हो सकने वाले 90 लाख लोहे के टुकड़े कम हो चुके हैं और जब तक उनका यह अभियान जोर पकड़ेगा तब तक कमी की यह मात्रा और बढ़ चुकी होगी। ताजा आंकड़ों की मानें तो पिछले एक दशक में देश में 90 लाख किसानों ने कृषि से किनारा कर लिया है और खेतिहर मजदूरों की संख्या में तीन करोड़ 80 लाख की वृद्धि हुई है। लेकिन जब मोदी को अपने ही राज्य के किसानों की दुर्गति नहीं दिखाई देती तो पूरे देश के किसानों की व्यथा से उन्हें क्या लेना-देना। दूसरी बात ये कि अपनी-अपनी परेशानियों में डूबे पूरे देश के किसानों को भी कहां गुजरात के किसानों की स्थिति का अंदाजा होगा। खबरों मे दिखाई देने वाले कृषि मेले बेहतरी का भ्रम फैलाते हैं। अपनी दुर्गति के लिए दोषी ठहराने हेतु किसानों का मुंह कई तरीकों से केंद्र सरकार की ओर मोड़ दिया जाता है, फिर चाहे वह मध्य प्रदेश हो, उत्तर प्रदेश हो या गुजरात। ऐसे में पूरे देश के किसानों में अपनी छवि को ऊंचा करने का अवसर मोदी भला कैसे छोड़ सकते थे, जिसका फायदा चुनावों के इस दौर में उन्हें और उनकी पार्टी को मिल सकता है। इसीलिए देश भर के किसानों से लोहे का टुकड़ा मांगकर उन्होंने मौके का फायदा उठाने की कोशिश की है।

असल में मोदी को किसानों के हालात से कोई सरोकार नहीं है, होता तो वे किसानों के हित में कोई घोषणा करते। वे तो सिर्फ किसानों के खून से लथपथ लोहे के टुकड़ों से सरदार पटेल की प्रतिमा बनवाकर एक मिसाल कायम करना चाहते हैं। दिखाना चाहते हैं कि देखो मैंने स्टैचू ऑफ़ लिबर्टी से दोगुने आकार की प्रतिमा बनवाई। इस प्रतिमा के सहारे वे खुद का कद बड़ा दिखाने के ख्वाहिशमंद हैं। वैसे यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि मोदी किसानों के लोहे की इस प्रतिमा को उसी सरदार सरोवर बांध के किनारे स्थापित करना चाहते हैं, जिसकी नींव में सैकड़ों किसानों के विस्थापन का इतिहास दफन है। शायद मोदी इस ताबूत में एक कील और ठोकना चाहते हैं।

मंगलवार, 11 जून 2013

चंद लम्हे असास रखे थे


चंद लम्हे असास रखे थे          
रंज कुछ अपने पास रखे थे 

तज़रिबे होते नहीं सब मीठे 
हमने नमकीन ख़ास चखे थे 

आसमां में दिखे थे कुछ बादल             
ख़ाली बर्तन भी पास रखे थे 

एक कमरे का मकाँ था जिसमें 
सारी दुनिया के ख़्वाब रखे थे 

मिल गए माज़ी के बक्से में 
कितने उधड़े लिबास रखे थे 

ख़ुद पे उतरेगा कहाँ जाना था 
जाने कब से ये ताब रखे थे 

एक ख़ामोश ग़ज़ल सा था वो 
क़ैद जिसके मजाज़ रखे थे 

वक़्त बदला तो नहीं है यूँ ही 
हमने कुछ नगमे साज़ रखे थे 

जब सुलगते थे धुआँ उठता था 
शोले फ़ितरत में आब रखे थे 

रोज़-ए-अव्वल ही से दुनिया में 
प्यार पे सख्त पास रखे थे 

पारा-पारा ही मिले हैं अक्सर 
कल के हिस्से में आज रखे थे 

अहद का नफ़ा-ज़ियाँ क्या है 
हमने कब ये हिसाब रखे थे 

कच्ची मिट्टी से मकाँ ऊँचे तक 
सबके अपने अज़ाब रखे थे 

चलो तामीर पूरी करते हैं 
कुछ अधूरे से ख़्वाब रखे थे।

असास: बुनियाद /नींव, माज़ी: इतिहास, ताब: गुस्सा, मजाज़: कानूनी रूप से स्वीकृत बात, आब: पानी, 
रोज़-ए-अव्वल: पहला दिन, पास: कब्जा, पारा-पारा: खंड-खंड /टुकड़े-टुकड़े, अहद: वादा, नफ़ा-जियां: लाभ-हानि, अज़ाब: मुश्किलें।

रविवार, 9 जून 2013

ये ख़ून नज़र किसका...

यूँ तो हर एक हाथ उठा है दुआ में
तेज़ाब किसने फिर ये फेंका है हवा में

क्या बात है कि जिससे बरहम है ज़माना
हर सिम्त कोई खौफ़ सा उठा है फ़िज़ा में

जो पीर थी हमारी धू-धू के जल रही
पर ध्यान अब भी उनका ज़्यादा है अदा में

बरसात का है मौसम बादल हैं तुम्हारे
ये ख़ून नज़र किसका आता है घटा में

घर से थे पाँव निकले मंजिल के सफ़र पे
हर मोड़ इस सफ़र का काटा है गुमां में

'साहिल' सुनो की लहरें ख़ामोश हैं बहुत
कोई नाला मगर इनका आता है सदा में।

सोमवार, 3 जून 2013

एक दामाद का दुःख

जकल सुबह बड़ी देर तक सोता हूँ। ऐसे में अगर सुबह-सुबह कोई फ़ोन आ जाए तो बड़ी झल्लाहट होती है। मित्रों से कह भी रखा है कि भई सुबह-सुबह फोन मत करना। पर लल्लन मियाँ को कौन रोक सकता है, वे कभी भी फोन खड़का देते हैं। आज भी वे असमय बरास्ता फोन प्रकट हुए और प्रकट होते ही हमेशा की तरह सवाल फेंका- ‘तुमने शादी कर ली?’ 

झल्लाहट तो बड़ी हुई, सुबह-सुबह ही लल्लन मियाँ यह क्या राग अलापने लगे। मैंने कहा- ‘क्या लल्लन मियाँ आप भी! भई रात दो बजे ही तो आपने बात की थी, तब तक मैं अविवाहित था, इतनी जल्दी विवाहित कैसे हो जाऊँगा?’

लल्लन मियाँ के जवाब ने बता दिया कि वे लखनऊ वाया सहारनपुर के रास्ते पर हैं। बोले- ‘भई जब चंद घंटों में किसी का दामाद ‘पॉपुलर’ हो सकता है, तो यह भी हो सकता है। वैसे इस वक्त हमें अपने पिताजी पर बड़ा गुस्सा आ रहा है। और हमें ही क्या दुनियाभर के मिडल क्लास दामादों को अपने पिताजी पर गुस्सा आ रहा होगा।’

आँखों में नींद भरी थी लेकिन न पूछना बेअदबी कहलाता सो मैंने पूछ लिया- ‘किस बात का गुस्सा?’

‘अब क्या बताएँ, उन्होंने हमारा ‘उज्ज्वल भविष्य’ जो चौपट कर दिया। सिर्फ यह देखकर कि लड़की सुशील है, पढ़ी-लिखी है, पिताजी ने हमारी शादी करा दी। यह देखा ही नहीं कि ससुर किसी ‘लायक’ हैं या नहीं। अगर हमारे ससुर साहब किसी कबड्डी कमेटी के भी अध्यक्ष होते तो हम भी मय्यप्पन की तरह पॉपुलर न हो गए होते।’

‘लेकिन मय्यप्पन इसलिए थोड़े ही पॉपुलर हुए हैं कि श्रीनिवासन के दामाद हैं, फिक्सिंग की वजह से हुए हैं। और फिर वह फिल्मजगत से ताल्लुक रखते परिवार का चश्मोचिराग है, उसकी अपनी हैसियत है इसलिए अध्यक्ष जी का दामाद है।’

‘अमाँ छोड़ो हैसियत की बात। इंटरनेट से ढ़ूँढ़-ढाँढ़कर पता कर लिया होगा कि फिल्मजगती परिवार के चश्मोचिराग हैं, वरना ख़बरें देखने वालों को अब भी कहाँ पता है। और भाई क्या इतनी बड़ी आग लगा पाता वो केवल फिल्मजगती परिवार की आँख और दीपक होकर। फिक्सिंग भला क्यों कर पाता जो अध्यक्ष जी का दामाद न होता?’

‘वो तो इसलिए कि वह ख़ुद एक टीम का सीईओ है।’

‘वो भी क्यों है, क्योंकि अध्यक्ष जी की बेटी उस टीम के मालिकान में से एक है। इसीलिए तो हमें गुस्सा है। अगर हमारे ससुर भी किसी खेल कमेटी के अध्यक्ष होते तो बीवी की मार्फ़त हम भी तो कुछ न कुछ होते। फिर दिखाते मीडिया को कि एक अकेला वही होनहार दामाद नहीं है। उसे ‘अपोर्चुनिटी’ मिली, हमें नहीं मिली तो इसमें हमारा क्या दोष? पर नहीं सबको तो केवल एक वही दामाद नज़र आ रहा है, हम सब तो जैसे निखट्टू हैं। देखते ही नहीं कि सुबह पानी की लाइन, बच्चे के स्कूल एडमिशन, रेड लाइट क्रासिंग, नौकरी की लाइन और न जाने कहाँ-कहाँ हम भी कितनी तरह की फिक्सिंग करते हैं।’

‘लेकिन दामाद की करनी तो देखिए, बेचारे ससुर जी को अध्यक्ष पद से अलग होना पड़ा। संगी-साथियों ने ही उन पर दबाव बनाने के लिए अपना इस्तीफा तक दे दिया था।’

‘महान बनने के लिए कुछ तो छोड़ना ही पड़ता है बंधु। उनका बयान देखो- किसी ने इस्तीफा नहीं माँगा, खुद ही अलग हो गए पद से। दामाद की करनी ने उन्हें महान बनने का मौका दे दिया भई। और मूरख हैं संगी-साथी। अरे भई जब कप्तान चुप है, जिस टीम का सीईओ है उसके मालिकान चुप हैं, ससुर जी का कुछ बिगड़ नहीं रहा, तो ये काहे झमेला कर रहे हैं। इसीलिए कहता हूँ भाई जो अपोर्चुनिटी हमारे पिताजी की वजह से हमें नहीं मिली, उसे तुम मत खो देना। शादी के लिए लड़की ढ़ूँढने के चक्कर में मत पड़ना, बस एक ‘लायक ससुर’ ढ़ूँढो, तुम भी पॉपुलर बनो और हम जैसे दामादों की पीड़ा का निवारण करो।’

‘यानी पॉपुलर होने के लिए घपला करूँ। क्या उल्टी राय दे रहे हैं!’

‘तो क्या तुम यह समझ रहे हो कि कलम घसीट-घसीट कर इतने पॉपुलर हो जाओगे कि अदालत तुम्हें शादी करने के लिए छोड़ देगी। तुम क्या कोई क्रिकेट स्टार हो! तुम्हारे भले के लिए हमें जो कहना था कह दिया, आगे तुम्हारी मर्जी।’

लल्लन मियाँ फोन पटक चुके थे। मैं सोचने लगा था निगेटिव चीजें भी कमाल ‘पॉपुलैरिटी’ देती हैं।

शुक्रवार, 31 मई 2013

दृश्यों से लुभाता शख्स

फिल्म के क्रेडिट्स में हम यह तो देख लेते हैं कि फिल्म के कलाकार कौन हैं, निर्माता-नर्देशक कौन है, संगीत किसका है, गीत किसके हैं, लेकिन इन्हीं के बीच आने वाले उस व्यक्ति का नाम हम देखते की जहमत भी नहीं उठाते, जिसकी आंखों से हम फिल्म देखते हैं।


जब हम कोई फिल्म देखते हैं, तो अक्सर किसी दृश्य को देखकर हम अभिभूत हो जाते हैं कि वाह! कितना खूबसूरत फिल्माया गया है। कई बार यह सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि यह दृश्य फिल्माया कैसे गया होगा? और अंत में हम निर्देशक की तारीफ करते हैं कि भई वाह! क्या दिमाग लगाया है, कमाल कर दिया है, वगैरह-वगैरह। लेकिन उन आंखों को हम अक्सर भूल जाते हैं, जिनके जरिए हमने वह दृश्य देखा और साथ ही भूल जाते हैं उस शख्स को, जिसकी वे आंखें हैं। जबकि वह फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है यानी सिनेमेटोग्राफर। एक सिनेमेटोग्राफर के बिना फिल्म का निर्माण भला कैसे संभव हो सकता है।

तमाम बेहतरीन सिनेमेटोग्राफरों की सूची में एक ऐसा नाम है, जिसने अपनी आंखों, यानी कैमरे से हमें ऐसे
यादगार दृश्य दिखाए हैं, जो आज भी मिसाल के तौर पर सामने रखे जाते हैं। यह नाम है गुरुदत्त की तकरीबन सारी फिल्मों की सिनेमेटोग्राफी करने वाले वीके मूर्ति का।

26 नवंबर 1923 को मैसूर में जन्मे वीके मूर्ति बचपन से ही सामान्य-सी घटनाओं और रोजमर्रा के दृश्यों को आंखों में कैद करने में खासी दिलचस्पी लिया करते थे। वे सिर्फ दृश्यों को आंखों में कैद ही नहीं करते थे, बल्कि उनमें अपनी कल्पनाशीलता का इस्तेमाल करते हुए, एक नए तरीके से उन्हें तरतीब में रखने के ख्वाब भी बुनते थे। चीजों को नए दृष्टिकोण से देखने का यही नजरिया उन्हें बैंगलौर के राजेन्द्र पॉलीटेक्निक तक लेकर गया, जहां से 1946 में उन्होंने सिनेमेटोग्राफी का डिप्लोमा हासिल किया।

फिल्म 'बाजी' में सिर्फ एक शॉट फिल्माने का मौका मिलने पर वीके मूर्ति ने वह कमाल दिखाया कि वे गुरुदत्त की टीम का अभिन्न हिस्सा बन गए। गुरुदत्त की फिल्में अपने कला सौंदर्य के लिए खास तौर से जानी जाती हैं, लेकिन यह कला सौंदर्य सिर्फ गुरुदत्त का नहीं था, वीके मूर्ति उनके जोड़ीदार हुआ करते थे। फिल्मांकन के समय के ऐसे कई किस्से हैं, जिनमें किसी दृश्य के फिल्मांकन के दौरान निर्देशक की जगह पर मूर्ति खड़े होते थे, क्योंकि वे उस दृश्य को बेहतर ढंग से शूट करना चाहते थे।

मूर्ति अपने काम में बेतरह डूब जाने वाले इंसान थे और उनकी हमेशा कोशिश होती थी कि वे अपनी सीमाओं से परे जाकर भी दृश्यों को यादगार बना सकें। 1959 में आई फिल्म 'कागज के फूल' उनकी इसी लगन और धुन का एक अनूठा उदाहरण है। भारतीय हिंदी सिनेमा में सिनेमेटोग्राफी को नए आयाम देने वाली इस फिल्म का वह दृश्य, जहां मंच पर सूर्य की किरण गिर रही है, जिसकी रोशनी में फिल्म का नायक मौजूद है, अपनी कलात्मकता के लिए आज भी मील का पत्थर है। इस दृश्य की कलात्मकता मूर्ति की ही देन थी। गुरुदत्त का खुद का कहना था कि उन्होंने भी वह दृश्य उतना खूबसूरत नहीं सोचा था, जितना कुछ आईनों का प्रयोग करके मूर्ति ने बना दिया था। यह भारतीय सिनेमा की पहली सिनेमास्कोप फिल्म भी थी और वह फिल्म भी, जिसने पहली बार एक सिनेमेटोग्राफर को फिल्मफेयर के मंच तक पहुंचाया। अपनी नायाब कलात्मकता का नमूना पेश करने वाले वीके मूर्ति को 'कागज के फूल' के लिए बेस्ट सिनेमेटोग्राफर का फिल्मफेयर का पुरस्कार मिला। अपनी इस कामयाबी को मूर्ति ने 1962 में फिर दोहराया, जब 'साहब बीवी और गुलाम' के लिए उन्हें एक बार फिर फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया।

गुरुदत्त के जीवनकाल में मूर्ति ने किसी अन्य निर्देशक के साथ काम नहीं किया। शायद इसमें गुरुदत्त के साथ उनके प्रोफेशनल से ज्यादा, मित्रवत और आत्मीय रिश्तों की मजबूती एक वजह रही, लेकिन गुरुदत्त की मौत के बाद उन्होंने अन्य निर्देशकों के साथ भी काम किया। हालांकि गुरुदत्त के बाद उन्होंने कम ही काम किया, लेकिन जो भी किया, वह बेमिसाल किया। कमाल अमरोही की 'पाकीजा' और 'रजिया सुल्तान', प्रमोद चक्रवती की 'नया जमाना' और 'जुगनू' की यादगार सिनेमेटोग्राफी मिर्ति ने ही की थी। इसके अलावा श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी (तमस) के साथ भी उन्होंने यादगार दृश्यों को जन्म दिया है। हिंदी के अलावा 1993 में उन्होंने राजेंद्र सिंह बाबू के निर्देशन में बनी सुपर हिट कन्नड़ फिल्म 'होवू हन्नू' की सिनेमेटोग्राफी भी की। वे इस फिल्म के न केवल सिनेमेटोग्राफर रहे, बल्कि उन्होंने इसमें अभिनय भी किया।

मूर्ति ने भारतीय सिनेमा जगत में न सिर्फ सिनेमेटोग्राफी को एक नए मुकाम पर पहुंचाया, बल्कि फिल्मफेयर हासिल करने वाला पहला सिनेमेटोग्राफर बनकर इस विधा से जुड़े लोगों की हौसलाअफजाई भी की। रंगीन फिल्मों की सिनेमेटोग्राफी की ट्रेनिंग हासिल करने इंग्लैंड गए मूर्ति ने 'द गंस ऑफ़ नेवरॉन' जैसी फिल्म की
यूनिट के साथ भी काम किया और अपनी छाप छोड़ी। सिनेमा जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए वीके मूर्ति को 2005 में आईफा लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और 19 जनवरी 2010 को वर्ष 2008 के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया। 2001 में मूर्ति सिनेमा को अलविदा कहकर वापस बैंगलौर जा बसे। उन्होंने भले ही फिल्मों को अलविदा कह दिया है, लेकिन उनका कलात्मक पक्ष आज भी दूसरे सिनेमेटोग्राफर्स को प्रेरणा देने का काम करता है।

शुक्रवार, 3 मई 2013

आवाज़


वह तक़रीबन 80 वर्ष का बुज़ुर्ग था जिसके बस एक पाँव में जूता था। कंधे पर एक छोटी-सी पोटली और तन पर ऐसे मैले कपड़े जिन्हें देखकर ही लग रहा था कि वह पाँच-छः दिन की धूल-धूप खा चुके हैं। वह किसी गाँव से शहर आया था शायद। कह रहा था- ‘भैया कछु कर दो। हमरे मुंडा तक भड़िया लए (जूते तक चोरी कर लिये)। एकई पईसा नईंएँ चाय-रोटी खों। भईया कछु कर दो।’
         आवाज़ में कुछ अजीब-सा था जो भीतर विचलन पैदा कर रहा था। दिल कह रहा था कि वाकई ज़रूरतमंद है, कुछ तो मदद कर ही देनी चाहिए। अरसे बाद उस शहर और बदले हुए हालात को देख रहा था। आसपास के लोगों का उस बुज़ुर्ग के प्रति उदासीन या हड़काने वाला रवैया मन को शंकित भी कर रहा था कि यह कहीं उसका कारोबार न हो।
         मन की शंका और दिल की संवेदनशीलता एक डोर को दो विपरीत धुरों से तान रहे थे। दो बार तो हाथ पर्स वाली जेब तक जाकर लौटा। आख़िरकार बाइक की किक पर पूरी झल्लाहट के साथ पैर पटका और सधा-सधाया जुमला, जो ऐसे मौकों पर अक्सर कहा जाता है, कह दिया - ‘छुट्टे नहीं हैं बाबा।’
         भर्राती हुई, घबराहट औैर बेचैनी से भरी, रोने को तत्पर वह आवाज़ जैसे बाइक पर मेरे पीछे सवार हो गई थी। पर्स की तरफ़ बढ़ते हाथ की तरह बाइक भी वापस मुड़ते-मुड़ते रह गई थी। हर बार शंका बलवती साबित हुई थी- ‘ अगर यह उसका धंधा हुआ तो?’
         ‘हुआ भी तो क्या! उसे कुछ पैसे देकर तेरी उलझन तो दूर होगी कि तूने कुछ क्यों नहीं किया।’ ख़ुद को दिया गया यह तर्क ठीक लगा। बाइक ठिठकी ही थी कि इस तर्क की काट भी सामने आ गई- ‘पर ऐसे तो रोज़ ही कोई न कोई मिलता है।’
         भीतर यह विचार और बाहर बाइक दोनों लगातार चल रहे थे। घर आ गया था। कई गलियों से घूम कर, कई मोड़ों को काट कर आया था। शोर भरे बाज़ारों से होकर आया था। वह कहीं नहीं गिरी। रोने को तत्पर वह आवाज़ रोने लगी थी। अब वह बाइक से उतर कर मेरे कंधों पर सवार थी।

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

ये भी कोई काम हुआ


चुपके-चुपके दिन बीता, चुपके से ही रात ढली
जब भी अपना ज़िक्र चला, ख़ामोशी ही साथ चली

अब इतने दरवाज़े हैं, कातिल जाने किससे निकला
ख़्वाब बेचती मजलिस में, मुझको ज़िंदा लाश मिली

झोले में हर चीज भरी है, नींद से ले के ख़्वाब तलक
क्या हासिल है इसका जब, धज्जी-धज्जी रात मिली

मैं सोचूँ उनके कहने से, लिखूँ तो उनके अल्फ़ाज़
ये भी कोई काम हुआ, इससे तो बेगार भली

नक़्श-ए-पा बाज़ारी के, हैं जो गहरे तो भी क्या
जो भी इनकी राह चला, आख़िरकर तो मात मिली

इक दिन तो ऐसा आए, लरज़े न धमके आवाज़
कहते-कहते हाँ जी हुज़ूर, किसको कितनी ख़ैरात मिली.