शनिवार, 24 अप्रैल 2010

ग्रामीण भारत में दलित - भाग तीन (राजनैतिक परिदृश्य व कानून व्यवस्था)


पिछली पोस्टों में दलितों शब्द के सन्दर्भ, उनकी सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक स्थिति पर अपनी बात रखी थी। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए इस बार दलितों की राजनैतिक स्थिति व कानून व्यवस्था के सन्दर्भ में ...

राजनैतिक परिदृश्य

लोकतांत्रिक व्यवस्था में दलितों की राजनैतिक सहभागिता को सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण व्यवस्था का उपयोग किया जा रहा है। शिक्षा, शासकीय नौकरियों के अलावा पंचायत से लेकर विधानसभा तक के चुनावों में दलित सीटों का आरक्षण निश्चित ही एक अच्छा संकेत है परंतु चुनाव जीत जाने के बाद भी दलितों को उनके अधिकारों से दूर रखने के तमाम हथकण्डे अपनाए जाते हैं। पंचायत चुनावों में जिन पंचायतों में दलित सरपंच, पंचायत सचिव या ग्राम प्रधान/मुखिया चुने गए हैं वहां यह आलम है कि वे सिर्फ़ नाम के लिए ही हैं, उन्हें प्रभावशाली वर्ग द्वारा ही संचालित किया जाता है। कई स्थानों पर तो बाकायदा चुने जाने के बाद भी दलित अपने अधिकार और पद, जिसके कि वे पात्र हैं, प्राप्त नहीं कर पाते और अविश्वास प्रस्ताव दलितों से उनके अधिकार छीनने का उच्च वर्ग द्वारा निकाला गया सबसे अच्छा रास्ता है। जब कभी भी दलित चुने गए हैं उनके खिलाफ़ हिंसा की घटनाएं सामने आई हैं। पंचायत में मुख्यत: दो तरह से भेदभाव किया जाता है। एक- दलितों को पंचायत की कार्यवाही, विकास कार्यों, योजनाओं से दूर रखा जाता है। दूसरा- जहां कहीं भी आरक्षण के बल पर दलित सत्ता में हैं, वे निशाना बनाए जाते हैं और एक समय के बाद उनका पद अमान्य और रद्द घोषित कर दिया जाता है। पंचायतों में दलित बस्तियों के विकास कार्य भी जाति पहचान का शिकार होते हैं और उन्हें ठीक ढंग से पूरा नहीं किया जाता, न ही इनके योजना निर्माण व क्रियान्वयन प्रक्रिया में दलितों को शामिल किया जाता है।

“बनारस जिले के हरूंआ विकासखण्ड के ग्राम वजीदपुर के निवासी श्री प्रेमनारायण, जो कि चमार समुदाय के सदस्य हैं, सितम्बर 2005 में ग्राम प्रधान चुने गए थे और 8 सितम्बर 2005 को पंचायत समिति का गठन हुआ था। निर्गामी समिति द्वारा श्री नारायण को ग्राम कार्यालय के कार्य रजिस्टर, सम्पत्ति रजिस्टर जो कि गांव के प्रबंधन से संबंधित हैं आदि कई दस्तावेज़ नहीं सौंपे गए। साथ ही दैनिक रजिस्टर संभालने को नकारने के लिए निर्गामी समिति ने चलायमान सम्पत्ति/वस्तुओं को सौंपने से इन्कार करते हुए कार्यालय में ही रखा। यहां तक कि श्री नारायण को उच्च जाति के सदस्यों द्वारा कई दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने के लिए भी बाध्य किया गया।"

एक ओर जहां चयनित प्रतिनिधियों के साथ इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं वहीं दूसरी ओर दलित समुदाय के मतदाताओं को किसी निश्चित व्यक्ति के पक्ष में मतदान करने के लिए बाध्य किया जाता है, जिसके लिए मत ख़रीदने से लेकर लालच देने और धमकाने तक कई तरह के हथकण्डे अपनाए जाते हैं। दलित मतदाताओं को अपने मताधिकार का उपयोग करने से रोकना एक और तरीका है, जिनके नाम पर किसी विशेष व्यक्ति के पक्ष में फर्जी मतदान किया जाता है।

यह स्पष्ट करता है कि ग्रामीण स्तर पर विकास कार्य और योजना निर्माण में दलित समुदाय की सहभागिता को किस प्रकार प्रभावित किया जाता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का गौरव-गान करने वाली राजनैतिक व्यवस्था में किस तरह समाज में हाशिए पर रह रहे समुदाय के राजनैतिक अधिकारों का हनन किया जाता है।

दलित और कानून व्यवस्था

दलितों के लिए अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989 और नियम 1995 जैसे कानून होने के बावजूद दलितों के विरुद्ध अत्याचार की स्थितियों में कोई सार्थक परिवर्तन नज़र नहीं आता। देश के विभिन्न राज्यों में दलित अत्याचार के आंकड़ों में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। यदि एन.सी.आर.बी. के आंकड़े ही देखे जाएं तो उत्तरप्रदेश में, जहां कि सर्वाधिक दलित जनसंख्या है, वर्ष 2005 में दर्ज 4403 घटनाओं के मुकाबले वर्ष 2007 में 6148 घटनाएं दर्ज हुई । इसी प्रकार आंध्रप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखण्ड व तमिलनाडु में क्रमश: 3632, 1906, 951, 760, 139 के मुकाबले 4136, 2851, 1126, 806, 1760 घटनाएं दर्ज हुईं।

इसके अतिरिक्त यह भी एक तथ्य है कि कई घटनाएं ऐसी होती हैं जो दर्ज ही नहीं होतीं। ग्रामीण स्तर पर दलितों के ख़िलाफ़ अत्याचार, मारपीट, अभद्र व्यवहार की ऐसी कई घटनाएं होती हैं जिनके ख़िलाफ़ पुलिस में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं कराई जाती। ग्रामीण स्तर पर ही दबंग व्यक्तियों द्वारा मामले को दबा दिया जाता है।

एससी/एसटी एक्ट होने के बावजूद दलितों को न्याय नहीं मिल पाता है। इसमें पुलिस प्रशासन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दलित विरोधी मानसिकता, स्थानीय पुलिस प्रशासन पर प्रभावशाली जातियों के प्रभाव और राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण या तो पुलिस प्राथमिकी (एफ.आई.आर.) ही दर्ज नहीं करती या फिर प्राथमिकी में उचित धाराओं का प्रयोग नहीं किया जाता। इसके अतिरिक्त केस वापस लेने और समझौता करने के लिए भी पुलिस द्वारा दबाव बनाया जाना व पुलिस थानों में दलितों के साथ किया जाने वाला अभद्रतापूर्ण व्यवहार भी दलितों को न्याय की पहुंच से दूर रखता है।

एक ओर जहां अधिनियम के अनुसार जांच अधिकारियों की अपर्याप्तता है वहीं दूसरी ओर अधिवक्ताओं  में भी कानून के बारे में पूरी जानकारी न होना और प्रावधान के अनुसार विशिष्ट न्यायालयों का अभाव भी अधिनियम के अनुरूप दलितों को न्याय दिलाने में बाधक है। ऐसे भी उदाहरण मौजूद हैं जहां पुलिस की जानकारी में दलितों पर अत्याचार की घटनाएं अंजाम दी गई हैं।

दरअसल दलितों के शोषण की सामंतवादी प्रवृत्ति आज भी अपने चरम पर है। उन्हें अपने से नीचा और अपने पर आश्रित मानने वाली विचारधारा के कारण कानून व्यवस्था में दलितों के लिए संवेदनहीनता बढ़ी है। सख्त कानूनी धाराएं होने के बावजूद स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों व तथाकथित उच्च वर्ग का पोषण करने वाली राजनीति के प्रभाव के चलते यह धाराएं सिर्फ़ कानून की किताबों में ही बंद हैं। इसके अतिरिक्त अधिकांश राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में दलितों के विरुद्ध अपराधों की बढ़ती हुई घटनाओं के ग्राफ को प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति ने भी प्रकरण दर्ज होने को प्रभावित किया है, क्योंकि यह ग्राफ पुलिस प्रशासन और कानून व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाता है।

(मई २००९, पैरवी संवाद में प्रकाशित लेख का अंश)

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