शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

ख़रामा ख़रामा गजब कर रहे हैं


ख़रामा ख़रामा गजब कर रहे हैं
फ़स्ल-ए-मोहब्बत हड़प कर रहे हैं
हमारी रगों में ज़हर भर रहे हैं

था उन्वान तो ख़ूबसूरत बड़ा
अंजाम पर मुँह के बल गिर पड़ा
किरदार बदलते गए, रंग भी
इक अफ़साने में हम सफ़र कर रहे हैं

अपनी ज़मीं क्यों गई उनकी जानिब
कोई बता दे कारण मुनासिब
अपने ही घर से बेगाने हुए हम
और दुःख बन के मोती उधर झर रहे हैं

मैं उनके फ़साने सुना तो कई दूँ
ज़ालिम के ज़ुल्मों की ला तो बही दूँ
मगर मेरे मुंसिफ़ की देखो अदा तो
कागज़ पे कागज़ महज़ धर रहे हैं

मैं क़तरा सही पर हूँ मौजों का ज़रिया
है अपना सफ़र जैसे इक बहता दरिया
कल-कल तुम इसकी मधुर ही न जानो
कि तूफ़ान इसमें कई भर रहे हैं। 

बुधवार, 14 अगस्त 2013

विज्ञापनों का आपत्तिजनक रंग


ज़रा कल्पना कीजिये- 'एक पुरुष का सिर दर्द से फटा जा रहा है और आसपास से लड़कियां उसकी तरफ देखकर नाक-भौं सिकोड़ती हुई दूर-दूर से निकली चली जा रही हैं. फिर वो पुरुष सिर दर्द से निजात दिलाने वाली एक गोली खाता है, गोली खाते ही उसका सिर दर्द दूर होता है और लड़कियों की उसी भीड़ से एक सुन्दर सी कन्या आकर उस पुरुष की गोद में बैठ जाती है.'

आप कहेंगे कि ये क्या बेहूदा कल्पना है, पर जनाब नाराज़ होने कि ज़रूरत नहीं है, ये भविष्य में किसी भी दवा कंपनी का विज्ञापन हो सकता है. इन दिनों विज्ञापन जिस ढंग से अपने-अपने ब्रांड के माध्यम से लड़की पटाने की गारंटी करवाते दिख रहे हैं, उसे देखते हुए कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि आने वाले समय में आप ऐसा विज्ञापन देखें जिसमे एक ख़ास कंपनी की दवा खाने से आप पर कोई लड़की मोहित हो जाये, बीमारी ठीक होने का ज़िक्र हो न हो लड़की का मोहित हो जाना ख़ासतौर से दिखाया जायेगा उसमें. जैसे कि अब चश्मे का विज्ञापन नज़र दुरुस्त करने या धूप से आँखों को बचाने के बजाय लड़की को राजी करने के नुस्खे में बदल गया है. 

आज ही एक विज्ञापन देखा- 'लाइब्रेरी में बैठा चश्माधारी लड़का एक लड़की के सामने चाय का प्रस्ताव रखता है, लड़की इनकार कर देती है. यही सीक्वेंस बार-बार दोहराया जाता है, हर बार लड़के के चश्मे का फ्रेम बदला हुआ होता है और हर बार चाय के प्रस्ताव पर लड़की 'नहीं, कभी नहीं से लेकर पुलिस को बुलाये जाने तक के वाक्यों द्वारा कई अलग-अलग तरीकों से इंकार ही करती है.... पर अंतिम बार में जैसे ही लड़का नयी फ्रेम के साथ अपना प्रस्ताव दोहराता है, अगले ही शॉट में लड़की लड़के की गोद में बैठी नज़र आती है और दोनों के हाथ में थमे चाय के कपों में दिल धड़क रहा होता है... फिर दिखाई देता है उस चश्मा कंपनी का नाम.'

अब आप ही बताएं ये चश्मे का विज्ञापन है या यह बताया जा रहा है कि जनाब हमारी कंपनी का चश्मा पहनिए और लड़की पटाइए. आज अधिकतर विज्ञापन तकरीबन यही भाव लिए हुए हैं. फलां कंपनी के रेजर से दाढ़ी बनाइये, फलां कंपनी का अंडरवियर पहनिए, फलां कंपनी का परफ्यूम लगाइए, फलां कंपनी का टूथपेस्ट इस्तेमाल कीजिये, फलां च्युइंगगम चबाइए, और कुछ हो न हो एक सुन्दर कन्या आपके पहलू में आ जाएगी.

कितना आपत्तिजनक है विज्ञापनों का यह संसार. युवा मस्तिष्क को कुंठाओं से भर देने वाला, प्रेम को महज़ सेक्स के दायरे में समेट देने वाला, संवेदनाओं को वस्तु भर बना देने वाला और स्त्री विरोधी तो निश्चित रूप से है. स्त्री को बस भोग्या बना दिया गया है इन विज्ञापनों में. मगर सबसे तकलीफदेह बात यह है कि इन विज्ञापनों ने धीरे-धीरे दर्शकों को ऐसा बना दिया है कि वे यह सोचते भी नहीं कि आखिर चल क्या रहा है, ये विज्ञापन कैसे उनकी संवेदनाओं और सामाजिकता से खिलवाड़ कर रहे हैं और उन्हें कुंठित किये चले जा रहे हैं.

सोमवार, 5 अगस्त 2013

बज़्मे ख़ुश है सजी हुई...

एक ताज़ा ग़ज़ल -

बज़्मे ख़ुश है सजी हुई रंग शाद डाले बैठे हैं
ये बात अपने तक रही कि ग़म संभाले बैठे हैं

इक अजनबी सा शख़्स है रिश्ता है मुस्कान का
यूँ भी हम जीने का इक अन्दाज़ पाले बैठे हैं

ग़म बरसता खूब है चश्म पुरनम भी मगर
दिल में अब तक रंज की इक आग पाले बैठे हैं

जब से हमने चाँद से बात करना कम किया
जाने किस किस बात के अशआर ढाले बैठे हैं

दोस्ती दुनिया को अपनी ख़ार सी बनकर चुभी
और अपने दिल पे हम अब ख़ाक डाले बैठे हैं

धीरे धीरे झर गईं शाख से सब पत्तियाँ
हम अभी भी छाँव के कुछ ख़्वाब पाले बैठे हैं।

गुरुवार, 18 जुलाई 2013

जानवरों का विरोध प्रदर्शन


अभी-अभी लल्लन मियाँ का फोन आया था। यूँ तो वे आसानी से होते नहीं हैं लेकिन बड़े परेशान थे। उनका परेशान होना ही गंभीर मसले का आभास देता है, सो इस बार तो वे बड़े परेशान थे। बोले- ‘भाई मियाँ गजब हो गया। मेरे मोहल्ले के सारे जानवर अचानक से विरोधी हो उठे हैं। गाय, भैंस, गधे, कुत्ते, मुर्गे-मुर्गियां, सुअर सब इतनी रात गए इकट्ठे होकर गलियों में रैली निकाल रहे हैं और नारे लगा रहे हैं।’
(कल्पतरु एक्सप्रेस में 16 जुलाई 2013 को प्रकाशित)

मैंने कहा कि ‘यूँ ही मौज में आए होंगे। अभी भी गर्मी अच्छी-खासी है तो रात की ठंडक का मजा लेने निकले होंगे और हँसी-ठिठोली कर रहे होंगे। दिन में तो आप लोग उन्हें घूमने नहीं देते, कभी लट्ठ मारते हो कभी लतिया देते हो तो कभी अपनी गाड़ी के नीचे कुचलकर भी शर्म नहीं करते। अब जब खुल्ली सड़कें मिली हैं तो वे भी अपना कोटा पूरा कर रहे होंगे।’ इस पर लल्लन मियाँ बोले- ‘अमाँ यार तुम बकवास न करो। हम क्या उनकी हँसी-ठिठोली समझते नहीं हैं। रात-दिन देखते हैं उन्हें। मियाँ मामला इतना सरल नहीं है, वे नारे ही लगा रहे हैं और कह रहे हैं कि इस इन्सानी जिन्स का कुछ इलाज करना पड़ेगा। अब वक़्त आ गया है कि हम अपने प्रति अन्याय का इससे हिसाब माँगें।’

जिज्ञासावश मैंने पूछा कि आपको कैसे पता कि वे क्या कह रहे हैं? क्या आप उनकी भाषा समझते हैं? तो लल्लन मियाँ बोले- ‘लो कल्लो बात! अरे जब इन्सान उनकी तरह चुनावों में एक-दूसरे पर भौंक सकते हैं, उल्टी पड़ जाने पर मिमिया सकते हैं, समर्थन में डेंचू-डेंचू बोल सकते हैं, दुलत्ती मारकर भी गाय की तरह भोलेपन से रँभा सकते हैं तो क्या वे हमारी भाषा नहीं सीख सकते, टूटी-फूटी ही सही। वे सुबह चौक पर इकट्ठे होकर इन्सानों से जवाब तलब करने की माँग कर रहे हैं और ऐसा न होने पर पूरे शहर में चक्का जाम करने की धमकी दे रहे हैं। मियाँ हमें तो समझ नहीं आ रहा कि क्या करें?’

मैंने उन्हें मशविरा दिया कि आप सुबह उनकी बात सुन ही आइए, एक दफा बातचीत कर लेने में हर्ज भी कोई नहीं है। लगे कि बात संभल नहीं रही तो आप भी चुनावी वक्तव्यों टाइप का कुछ इस्तेमाल कर लीजिएगा, उन्हें अपना भाई-बहिन कह दीजिएगा। कह दीजिएगा कि आप खुद में और उनमें कोई भेद नहीं समझते, जैसा कि हाल ही में एक नेताजी ने कहा है।

लल्लन मियाँ थोड़े आश्वस्त हुए। बोले- ‘ठीक है मियाँ। सुन लेते हैं कि आखिर ये सारे जानवर चाहते क्या हैं। लेकिन यार धुकधुकी तो फिर भी लगी है, पता नहीं वे किन सवालों के जवाब चाहते हैं? ख़ैर सुबह जाते हैं चौक पर और लौटकर बताते हैं क्या हुआ?’

लल्लन मियाँ तो फोन रखकर गायब हो गए लेकिन मेरा दिमाग उलझन में पड़ गया कि आख़िर माजरा क्या है? किस अन्याय से इन जानवरों की आत्मा आहत हो गई है? किसी की भावनाओं को सबसे जल्दी ठेस तो तब लगती है जब बाचतीत में उसके धर्म का ज़िक्र आ जाए, पर इन्सान तो हमेशा एक-दूसरे के धर्म का तिया-पाँचा करने में लगा रहा, इनके धर्म की तो कभी बात ही नहीं हुई? कभी इनकी माँ-बहनों को भी नहीं छेड़ा क्योंकि इन्सान को अभी तक अपनी ही प्रजाति का चीरहरण करने से फुरसत नहीं मिली। न जाने क्या मामला है?
पता नहीं क्या-क्या दिमाग में घूम रहा है। अब तो लल्लन मियाँ ही इन गुत्थियों को सुलझा सकते हैं जब वे चौक पर आयोजित जानवरों की सभा से लौटेंगे। 

बुधवार, 17 जुलाई 2013

निशाँ कुछ बचे हैं मिटाते-मिटाते


तीन साल पहले एक शेर कहा था, दो साल पहले दो और कहे और फिर तीन शेर अभी कुछ दिन पहले। तीन साल का सफ़र तय करके एक गज़ल बनी और मजे की बात यह कि मतला, जो किसी ग़ज़ल का प्रस्थान बिंदु होता है और सबसे पहले अस्तित्व में आता है, सबसे आख़िर में कहा गया। बहरहाल ग़ज़ल यूं है-

हम रह गए थे बुलाते-बुलाते
कुछ अरमान जागे सुलाते-सुलाते

लगता नहीं जी कहीं अब हमारा
जो तुम याद आए भुलाते-भुलाते

बस इक ख़ता ने ये अंजाम पाया
नज़र मिल गई थी चुराते-चुराते

निस्बत तो उसको हमसे भी थी कुछ
न यूँ अश्क़ बोता छुपाते-छुपाते

यूँ तो शहर ये बदला बहुत है
निशाँ कुछ बचे हैं मिटाते-मिटाते

कम तो नहीं है 'साहिल' कि इक दिन
वो हँस पड़ा था रुलाते-रुलाते।

शनिवार, 13 जुलाई 2013

‘गद्दार’ का ‘कमीनापन’

आसान नहीं होता कि आपके कमीनेपन के अभिनय को देखकर लोग आपको सचमुच कमीना ही मानने लग जाएं। पर उन्होंने ऐसा कर दिखाया। मुझे याद है बचपने में जब टीवी पर उनकी कोई फिल्म देख रहा होता था, तो उनकी एंट्री होते ही दर्शक कहते थे- ‘ गया गद्दार, जरूर कोई कमीनगी करेगा।’ (मेरे गांव में विलेन को गद्दार ही कहा जाता है।) 

फिल्म गुड्डी का एक दृश्य याद आता है जब धर्मेंद्र उनकी कलाई घड़ी की तारीफ़ करते हैं और वे अपने अपने हाथ से निकाल कर वह घड़ी धर्मेंद्र को भेंट कर देते हैं। इस पर गुड्डी यानी जया भादुड़ी धर्मेंद्र को कहती हैं कि - ‘इसमें ज़रूर इनकी कोई चाल होगी, ये बहुत बुरे आदमी हैं।’ (ठीक-ठीक डायलॉग तो याद नहीं पर भाव यही था।) फिल्म में जया धर्मेंद्र की जबरदस्त फैन दिखाई गई हैं और यह दृश्य तब का है जब वे फिल्म की शूटिंग देखने जाती हैं।
गुड्डीमें एक दर्शक के रूप में जया भादुड़ी का नज़रिया और मेरे गांव के दर्शकों की प्रतिक्रया एक ही भाव लिए है। इसे उनके अभिनय की तारीफ़ ही माना जाना चाहिए। वरना क्या यह संभव है कि बेहद ख़ूबसूरत शक्लोसूरत, शानदार कद-काठी और बेहतरीन आवाज़ वाले शख़्स को परदे पर देख लोग एक अलग से ख़ौफ़ अनिष्ट की आशंका से भर जाएं और फिल्मों को असली ज़िंदगी की तरह देखने वाले उन्हें निजी ज़िन्दगी में भी बुरा ही समझने लगें।
बेशक वे अपने द्वारा निभाए गए कई दूसरे चरित्रों जैसे कि मलंग चाचा, शेरखान, जसजीत, अमरनाथ कपूर आदि के लिए भी याद किए जाएंगे लेकिन खलनायकी के किरदार सब पर भारी ही पड़ेंगे। हिन्दी सिनेमा में संभवतः वह पहले खलनायक रहे जिनके प्रशंसकों की संख्या ने नायकों की फैनफाॅलोइंग को टक्कर दी। उनके अभिनय की बानगी क्या रही इसके बारे में इससे ज्यादा क्या कहा जाए कि बाद के दौर में आए कई खलनायकों ने उनका कमीनापन उधार तो लिया, पर उनके जितने कमीने बन सके।
यकीनन प्राण कृष्ण सिकंद जैसेगद्दारकाकमीनेपनसे भरा अभिनय याद आता रहेगा।

शुक्रवार, 28 जून 2013

ज़ुल्म बढ़ते थे पर झुका न गया


ज़ुल्म बढ़ते थे पर झुका न गया
उनके सजदे में कुछ कहा न गया

तेरी ख़्वाहिश तड़प के बोलूँ कभी
हाय हमसे ये उफ़! कहा न गया

जबसे बाज़ार ख़बरें देने लगा
खेत का हाल कुछ कहा न गया

आज बाज़ार में मैं उतरा था
एक ठप्पे के बिन बिका न गया

लब को उसके गुलाब कैसे कहूँ
बात जिसकी से इक छुरा न गया

अब भी करते हैं भरोसा तो मगर
तेरे वादे पे बस मरा न गया।