मंगलवार, 2 जून 2009

हँसी


बहुत अरसा पहले लिखी थी ये कविता, आज अचानक से याद आ गई। अभी भी लगता है कि अधूरी है, पर जो भी है प्रस्तुत है।

हँसना यूँ तो बहुत अच्छा होता है
पर कभी-कभी मुझे चुभती है हँसी
बेवजह, छोटी-छोटी बात पर
अगर ना हँसें लोग
तो शायद जीवन की आपाधापी
लोगों को मौका भी ना दे हँसने का

जानता हूँ फिर भी
कभी-कभी गुस्से से भर देती है हँसी
जब कोई गिरता है केले के छिलके पर फिसलकर
तो लोग हँसते हैं
मानो वो गिरा हो आपको हँसाने के लिए ही
जानबूझकर किसी सर्कस के जोकर की तरह

लोग हँसते हैं
नहीं समझते मन:स्थिति
गिरने के बाद अपने ही भीतर
सिमट जाने को आतुर उस व्यक्ति की

मुझे चुभती है ये हँसी और
मैं देखता हूँ उस केले के छिलके की ओर
जिसमें लगा बाकी का गूदा भी
निकाल बाहर किया फिसलकर लोगों को हँसाने वाले पैर ने.

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

चुनावी मंगल गान...

चुनाव की बेला है, हर जगह प्रत्याशी मतदाताओं को लुभाने में लगे हैं, और "बेचारा आम आदमी" किसी विरहिणी की तरह सशंकित है। चुनावी सजन के लिए मन की आशंकाओं को व्यक्त करता एक मंगल गान -


मंगल गाओ री सजन घर आए

सजन घर आए, बलम घर आए
कर मीठी बतियाँ मोहे ललचाए
मोरा मन भरमाए
सखी री सजन घर आए

पैयाँ पड़े मोरे करे मोसे विनती
कहे तोरा साथ न छोडूं मैं अबकी
कपटी कहीं न फिर लूट ले जाए
मोरा मन घबराए
सखी री सजन घर आए

सतरंगी सपनों की लाए चुनरिया
महल छोड़ रहे मोरी छपरिया
बड़ी प्रीत से मोरी पूछे खबरिया
फिर न कहीं बिसराए
सखी री सजन घर आए.

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

रेख्ता के उस्ताद...

साथियों,
आज से एक और नए ब्लॉग की शुरुआत की है, उम्मीद है कि आपको भी पसंद आएगा।
जिन्हें अक्सर बार-बार पढ़ता हूँ उन रचनाओं को आपसे साझा करने का प्रयास है। यह ब्लॉग उन रचनाकारों को समर्पित है जो मुझे हर समय प्रासंगिक लगे हैं और जिन्हें पढ़ते हुए मैंने ख़ुद को कुरेदना सीखा है।

इसी पेज पर आपको इस नए ब्लॉग का लिंक भी उपलब्ध है.....
"रेख्ता के तुम ही उस्ताद नहीं हो..."

उम्मीद है आपको यह प्रयास पसंद आएगा।

सोमवार, 6 अप्रैल 2009

यार चाँद...

कितने बदल गए हैं हालात यार चाँद
करते भी नहीं हम अब बात यार चाँद

भटके थे कितनी रातें सड़कों पे साथ-साथ
क्या फिर कभी मिलेगी वो रात यार चाँद

बसों का सफर, दफ़्तर थका देता है मुझे तो
तूने भी कोई नौकरी क्या कर ली यार चाँद

मेरे जैसे कई साथी तेरे तो और भी थे
क्या उनसे अब भी होती है बात यार चाँद

खिड़की के पार आकर मिल जा कभी मुझसे
आधी रात तक तो मैं भी जगता हूँ यार चाँद

कैसी कटीं रातें तेरी पिछले इन दिनों की
मैं बताऊँ तुझको दिन की बात यार चाँद

मैंने सुनाई थी जो एक-एक नज़्म तुझको
कुछ याद हों तो मुझको सुना जा यार चाँद

दिन का पता मुझे है रातें तेरी नज़र में
बता तो दिल्ली कैसी लगती है यार चाँद

रफ़्तार में शहर की कहीं ख़ुद को खो न बैठूं
मेरे साथ बैठ कुछ पल कर बात यार चाँद ।

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

छिपकली

कल कपड़े धोते समय
तल्लीन था जब
अपनी कमीज़ को बनाने में
इतना सफ़ेद
कि देखते ही लोग कहें
भला इससे ज़्यादा सफेदी और कहाँ
अचानक
स्नानगृह की छत से चिपकी छिपकली
आ गिरी भरभरा कर
मेरी पीठ पर

अनायास ही आ गए याद
माँ के शब्द
अपशगुन होता है छू जाना
छिपकली का हमारे शरीर से

सोचता रहा था उस वक्त भी
आख़िर ऐसा क्या होता है
छिपकली की देह में
जिसका छू जाना
होता है अपशगुन
और क्या होता होगा उनका
जो मानते हैं उसे भी
एक लज़ीज़ व्यंजन

पता नही कौन सा हिस्सा
बताया था माँ ने हमारे शरीर का
बायाँ या दायाँ
जिस पर छू जाना छिपकली का
होता है अपशगुन

पर कुछ नहीं होता
याद होने पर भी
छिपकली गिरी थी
पीठ के ऐन बीचों-बीच
ठीक मेरी रीढ़ के ऊपर।

मंगलवार, 31 मार्च 2009

साँची कहो तो.... (१)

(१)
गधे के सर पर भी
होते ही थे सींग
फिर उसने सीख लिया
टोपी पहनना।

(२)
बड़े वफादार होते हैं
जो रोटी दे उस पर
कभी नहीं झपटते
दाता के इशारे पर
उधेड़ सकते हैं
सामने वाले के बखिये

टोपी से निकली पेंट के नीचे
छुपा लेते हैं अपनी पूँछ।

(३)
सालों पहले
सियार के कहने पर
बकरियों ने चुना
भेड़िये को अपना संरक्षक
और बकरियां मारी गयीं

परम्परा आज भी जीवित है।

(४)
खरगोश बहुत चालाक था
कुंए में दिखाकर शेर को
उसकी ही परछाईं
डुबाकर उसे
अपनी जान बचाई

अफ़सोस कि बाकी शेर
भेड़ नहीं थे।

(५)
कौआ और हंस के बीच
उड़ान भरने की प्रतिस्पर्धा में
थक गया था कौआ
दया से पसीजा हंस का हृदय
अपनी पीठ पर कराकर सवार कौए को
लौट आया हंस

तब से कौआ
हंसों की सवारी कर रहा है।

(६)
उल्लू की आँखें
सुना है कि देख लेती हैं
एक ही समय में
अलग-अलग दिशाओं में

जैसे इनकी
लोकतंत्र और सामंतवाद।

(७)
दो बिल्लियों की लड़ाई में
बन्दर ने खा ली रोटी
चूहे तो लड़े भी नहीं

फिर अनाज ...?

सोमवार, 30 मार्च 2009

मेरी रगों के लहू से

धोखा हुआ है आपको में एक इंसान हूँ
इस जगह कभी उस जगह फेंका हुआ सामान हूँ

जाति धर्म ऊँच नीच और सियासी ढंग में
जाने कितनी पीढियों से बंटता हुआ सामान हूँ

मेरे हाथों की जुम्बिश से बना जो रूप पत्थर का
वो स्वर्ग का है देवता मैं आज भी वीरान हूँ

मेरी ही तामीर थी जो अब उस इमारत में
गिरती अपने हाथ पर शमशीर से हैरान हूँ

मेरी रगों के लहू से है जिनके घर में रौशनी
उनके लिए मैं बेवजह बे-ईमां बेजान हूँ.