कल रांझना देखी और कह सकता हूं कि अरसे बाद कोई अच्छी फिल्म देखी... एंटरटेनमेंट के लिहाज से। वैचारिक स्तर पर कुछ गड़बड़ियां हैं, लेकिन यह देखकर थोड़ी राहत भी मिलती है कि फिल्में भव्य सेट, लकदक परिवेश, स्विटजरलैंड की हसीन वादियों, ढिशुम-ढिशुम और चकाचाौंध से बहार निकलने की कोशिश कर रही हैं। मसाला फिल्मों का दर्शक वर्ग बड़ा है, सो मसाले की मौजूदगी शायद मजबूरी भी है।

हां, यह बात जरूर ख़ास है कि अरसे बाद मुख्यधारा की किसी फिल्म में बहुत ही सामान्य से परिवार और लोग दिखे हैं, जिनके किरदारों में कोई एक्स्ट्रा एलिमेंट नहीं डाला गया है। सामान्य सी कहानी को निर्देशक आनंद राय ने अच्छा ट्रीटमेंट दिया है और लेखन के लिए हिमांशु शर्मा तो बधाई के पात्र हैं ही। फिल्म में अभिनय के भी पहले अगर कोई चीज ध्यान आकर्षित करती है, तो वह संवाद हैं।
अभिनय की बात करें तो चाॅकलेटी चेहरे वाले नायक न होने के बाजूद धनुष इस फिल्म के जरिए अपनी अलग उपस्थिति दर्ज कराने में कामयाब हुए हैं। मोहम्मद जीशान अयूब और स्वरा भास्कर ने अपने-अपने किरदार को पूरी संवेदना के साथ जीया है। उनके अभिनय में रंगमंच से जुड़ाव की छाप दिखाई देती है। जहां तक पृष्ठभूमि की बात है तो फिल्म में बनारस डायलेक्ट और परिवेश के लिहाज से कहीं नहीं दिखाई देता, तब भी अगर बनारस की झलक कहीं मिलती है तो वह जीशान अयूब के किरदार में। कुंदन के मित्र के किरदार में उन्होंने कमाल अभिनय किया है।यूं तो पूरी फिल्म में धनुष का अभिनय अच्छा है, लेकिन प्रथम भाग में खासकर स्कूली दिनों के प्रेमी, फिर प्रेम के लिए कुछ भी कर जाने की संवेदनाओं वाले दृश्यों में ज्यादा प्रभावी रहे हैं। धनुष के किरदार को उभारने का जितना श्रेय जीशान के किरदार को मिलना चाहिए उतना ही बिंदिया को भी। बिंदिया के किरदार में दोस्ती और प्रेम दोनों हैं और Swara Bhaskar इसे बहुत बेहतर निभाया है। सहयोगी किरदार होते हुए भी यह अपने-आप में एक पूरी कहानी है। इस तिकड़ी के बरअक्स देखें तो सोनम का अभिनय बहुत अपरिपक्व दिखाई देता है।
फिल्म का गीत-संगीत पूरी तरह सिचुएशनल है। ध्यान देने की बात है कि फिल्म का एक भी दृश्य संगीत के बिना नहीं है और वह दृश्य के भाव से ज़रा सा भी इधर-उधर नहीं है। इरशाद कामिल के गीत और ए.आर. रहमान का संगीत फिल्म को देखते हुए ऐसे नहीं लगते कि कुछ जबरदस्ती शामिल कर दिया गया है। बिल्कुल बैलेंस्ड म्यूजिक।
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